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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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हैदरअली ३३६
अब वह समय आया जब कि नाना फड़नवीस ने अंगरेज़ों की
चालों और उनसे देश की हानि को अच्छी तरह
हैदर और नाना समझ कर सन् १७८० में अपना एक दूत
फड़नवीस में गणेशराव हैदर के पास मेल करने के लिए भेजा ।
अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ हैदर को भी अंगरेज़ों के चरित्र का काफ़ी अनुभव
सन्धि हो चुका था । हैदर और नाना फड़नवीस दोनों
में ख़ास समझौता हो गया । 'चौथ' की उस रक़म को, जो मैसूर
दरबार से पेशवा दरबार को मिला करती थी और जिस पर
मराठों और हैदर में अनेक बार झगड़े हो चुके थे, आइन्दा के लिए
नाना ने बहुत कम कर दिया । हैदर का जो इलाक़ा पहले मराठों ने
ले लिया था और हाल में टीपू ने मराठों से विजय किया था उसे
पेशवा दरबार ने हैदर ही का इलाक़ा स्वीकार कर लिया, और
हैदर ने मराठों से वादा किया कि अंगरेज़ों को हिन्दोस्तान से बाहर
निकालने में मैं आप लोगों की पूरी मदद करूँगा ।
अंगरेज़ों को जब इस सन्धि का पता चला और मालूम हुआ
कि हैदर अंगरेज़ी इलाक़े पर फिर से हमला करने की तैयारी कर
रहा है तो उन्होंने मद्रास से एक दूसरे के बाद दो दूत दोबारा
सन्धि करने के लिए हैदर के दरबार में भेजे । किन्तु हैदर अंगरेज़ों
को पूरी तरह समझ चुका था, उसने स्वीकार न किया । अंगरेज़
दूत ग्रे को उसने अंगरेज़ों की दग़ाबाज़ी पर लानत मलामत की और
अपने यहाँ उसके साथ वह सलूक किया जो एक राजदूत के साथ
नहीं, बल्कि किसी जासूस के साथ किया जाता है ।