भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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१५ अप्रैल सन् १७६६ को अंगरेज़ों, सुलतान हैदरअली और
[हाशिया: सीरा के सूबेदार] अरकाट के नवाब मोहम्मदअली के दरमियान दो
[हाशिया: और बादशाह] अलग अलग सुलहनामे लिखे गए और हर
[हाशिया: तीसरे जॉर्ज में] सुलहनामे पर तीनों के दस्तख़त हुए ।
[हाशिया: सन्धि] अब तक की सन्धियाँ ईस्ट इण्डिया कम्पनी
और भारतीय नरेशों के बीच हुआ करती थीं।
हैदरअली ने कम्पनी के किसी तरह के राजनैतिक अस्तित्व ही को
स्वीकार करने से इनकार किया। इसलिए इनमें पहला सुलहनामा
इंगलिस्तान के बादशाह के नाम से, जिस तरह हैदर ने चाहा उस
तरह लिखा गया। इस सन्धि में तय हुआ कि इंगलिस्तान के
बादशाह तीसरे जॉर्ज और सीरा प्रान्त के सूबेदार हैदरअली ख़ाँ
और इन दोनों की प्रजा के बीच सदा अमन और मित्रता क़ायम
रहेगी, इत्यादि। हैदरअली का जो कुछ इलाक़ा युद्ध के शुरू में
अंगरेज़ों ने ले लिया था और जिसे हैदरअली फिर से विजय कर
चुका था, वह सब हैदरअली के पास रहा और अंगरेज़ों का जो
कुछ इलाक़ा हाल में हैदरअली ने जीत लिया था, वह उसने अंगरेज़ों
को लौटा दिया। केवल कारूड़ का प्रान्त, जो अंगरेज़ों के दोस्त
अरकाट के नवाब मोहम्मद अली के राज में शामिल था, अंगरेज़ों ने
उससे लेकर सदा के लिए हैदरअली की नज़र कर दिया। युद्ध के
the private houses of Madras were at his mercy. In the panic which his
arrival had caused, the fort itself might have fallen. He was in a position to
dictate his own terms, and, virtually, he did dictate them."—The Decisive
Battles of India, By Colonel Malleson, p. 230.