भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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“मैं मद्रास के फाटक पर आ रहा हूँ और गवरनर और उसकी कौन्सिल
को जो कुछ कहना होगा वहीं आकर सुनूँगा।”
कप्तान ब्रूक निराश होकर मद्रास लौट आया। हैदर ने अपना
[अंगरेज़ों का] तमाम भारी सामान और माल असबाब मैसूर भेज
[भयभीत हो] दिया और खुद सेना सहित मद्रास की ओर
[जाना] बढ़ा। हैदर की तमाम सैन्य यात्राएँ अत्यन्त
आश्चर्यजनक होती थीं। विशाल सेनाओं सहित
पूरब से पच्छिम और पच्छिम से पूरब सैकड़ों मील की यात्राएँ
चन्द दिनों के अन्दर तय करना और फिर बिना आराम किए
घबराई हुई अँगरेज़ी सेना पर जा टूटना उसके लिए एक मामूली
बात थी। इस बार साढ़े तीन दिन के अन्दर उसने १३० मील का
फ़ासला तय किया और एक दिन अचानक मद्रास के क़िले से दस
मील की दूरी पर दिखाई दिया। अंगरेज़ भय से काँप उठे। हैदर
की सेना और मद्रास के बीचों बीच सेण्ट टॉमस की पहाड़ी थी।
यह वही जगह थी जिस पर टीपू एक बार क़ब्ज़ा कर चुका था।
अंगरेज़ों ने अब बड़ी फुरती के साथ इस पहाड़ी की रक्षा का
इन्तज़ाम किया और वहाँ पर अपनी सेना जमा की, ताकि हैदर
आसानी से मद्रास तक न पहुँचने पावे। किन्तु अंगरेज़ी सेना अभी
सेण्ट टॉमस पर जमने भी न पाई थी कि हैदर अपनी विशाल सेना
सहित दूर का चक्कर देकर मद्रास क़िले के दूसरी ओर के फाटक
पर आ पहुँचा। अंगरेज़ी सेना क़िले के दूसरी ओर फ़सील से दो
तीन मील के फ़ासले पर थी। अंगरेज़ों के भय की उस समय कोई