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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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हैदरअली ३३१

उस समय तक के लिए क़ैद कर दिया, जब तक कि हैदर और
अंगरेज़ों में सुलह न हो गई।
मङ्गलोर की विजय के बाद हैदर वहाँ की हिफ़ाज़त का
उचित प्रबन्ध कर स्वयं टीपू तथा सेना सहित
[पार्श्व-शीर्षक: हैदरअली मद्रास के फाटक पर] बङ्गलूर की रक्षा के लिए पीछे लौट आया।
इस बार हैदर ने अपनी सेना के तीन हिस्से
किए और वह तीन रास्तों से आगे बढ़ा। जनरल स्मिथ के लिए
बङ्गलूर विजय करने का इरादा स्वप्न मात्र साबित हुआ। हैदर की
सेना के लौटते ही जनरल स्मिथ और करनल वुड की सेना को
बुरी तरह हैदर की सेना के आगे आगे भागना पड़ा। अपने तमाम
इलाक़े से अंगरेज़ी सेना को फिर एक बार बाहर निकाल देने के
बाद हैदर की तीनों सेनाएँ अब अंगरेज़ों और नवाब करनाटक के
इलाक़ों में बढ़ती चली गईं। हैदरअली की सेना के मुक़ाबले में
कम्पनी की सेना के कहीं भी पैर न जम सके। नवाब मोहम्मदअली
बेहद डर गया। बढ़ते बढ़ते हैदर की सेना मद्रास के निकट पहुंचने
लगी। मद्रास का अंगरेज़ गवर्नर और उसकी कौन्सिल के मेम्बर
घबरा गए।
मद्रास की कौन्सिल ने अब कप्तान ब्रूक को हैदर के पास सुलह
के लिए भेजा। हैदर को मौक़ा मिला कि जो व्यवहार चन्द महीने
पहले अंगरेज़ों ने हैदर के दूत के साथ किया था वही अब हैदर
अंगरेज़ दूत के साथ करे। हैदर ने कप्तान ब्रूक को उत्तर दिया—