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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

पहला मराठा युद्ध २६३
२६ फ़रवरी सन् १७७६ को वह अपनी विशाल सेना सहित सूरत
पहुँच गया।
वारन हेस्टिंग्स को जिस समय बम्बई की सेना की इस
अपमानजनक हार और नई सन्धि का पता लगा तो उसने फ़ौरन
करनल गॉडर्ड को लिख भेजा कि आप उस सन्धि की बिलकुल
परवा न करें, और आगे बढ़ते जावें।
मराठा मण्डल के पाँच मुख्य स्तम्भों में से एक महाराजा
[हाशिया: सींधिया और होलकर कुलों की उत्पत्ति] गायकवाड़ को अंगरेज़ अपनी ओर फोड़ चुके थे।
बरार के महाराजा भोंसले ने वारन हेस्टिंग्स की
सलाह न मानी थी, फिर भी वारन हेस्टिंग्स ने
अपनी चालों द्वारा उसे इस संग्राम से तटस्थ
कर रक्खा था। पेशवा की मदद के लिए अब केवल होलकर और
सींधिया दो नरेश बाक़ी रह गए थे।
मालवा का प्रान्त जिसे मध्यभारत कहते हैं, १८ वीं सदी के
प्रारम्भ तक मुग़ल साम्राज्य का एक भाग था और निज़ाम की
सूबेदारी में था। सन् १७२१ में निज़ाम के बग़ावत करने पर दिल्ली
सम्राट ने निज़ाम की जगह एक हिन्दू राजा गिरधरराय को
मालवे का सूबेदार नियुक्त कर दिया। कुछ समय बाद पेशवा ने
राजा गिरधरराय से मालवा विजय करके उत्तरीय भाग अपने एक
अनुचर रानोजी सींधिया को और दक्षिणी भाग एक दूसरे
अनुचर मलहरराव होलकर को दे दिया। यही इन दोनों राजकुलों
का प्रारम्भ था।

२६४ भारत में अंगरेज़ी राज
जिस समय का हाल हम लिख रहे हैं उस समय दक्खिन
महारानी मालवे का शासन उस प्रातःस्मरणीया महारानी
अहिल्याबाई अहिल्याबाई के हाथों में था, जिसकी बुद्धिमत्ता,
योग्यता, न्यायशासन, सच्चरित्र और आदर्श
राजप्रबन्ध की प्रशंसा अनेक भारतीय और विदेशी इतिहास लेखकों
ने मुक्तकण्ठ से की है; जिसकी गाढ़ धार्मिकता के कारण उत्तर से
दक्खिन तक हिन्दू और मुसलमान समस्त भारतीय नरेश उसे
अपनी श्रद्धा और आदर का पात्र स्वीकार करते थे; और जिसका
नाम आज तक भारत के एक एक गांव और एक एक झोपड़े में,
श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता है। अहिल्याबाई इन विदेशियों
के साथ मेल या अपने यहाँ उनका हस्तक्षेप पसन्द न करती थी,
इसलिए वारन हेस्टिंग्स को पेशवा के ख़िलाफ़ सींधिया कुल के
साथ साज़िश करनी पड़ी ।
माधोजी सींधिया उस समय पेशवा के अत्यन्त योग्य और
माधोजी सींधिया विश्वस्त सेनापतियों में से था । वारन हेस्टिंग्स ने
के साथ झूठा वादा देख लिया कि नाना को पंगुल कर देने का सबसे
अच्छा तरीक़ा माधोजी को अपनी ओर फोड़
लेना है । अदूरदर्शी माधोजी विदेशियों की बातों में आकर पेशवा
दरबार के साथ विश्वासघात करने को राज़ी हो गया । तालेगांव
ही में अंगरेज़ों और माधोजी के बीच गुप्त बातचीत शुरू होगई ।
माधोजी को ख़ास लालच यह दिया गया कि यूरोपियन अफ़सरों
और यूरोपियन ढंग के शस्त्र ढालने वालों की मदद से तुम्हारे पास

महारानी अहल्याबाई होलकर
[ चित्रशाला प्रेस पूना की कृपा द्वारा ]

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पहला मराठा युद्ध २६५
एक ज़बरदस्त सेना तैयार कर दी जावेगी, जिसके द्वारा महाराष्ट्र,
बल्कि सारे भारत में तुम्हारा प्रभाव थोड़े ही दिनों के अन्दर
सर्वोपरि हो जावेगा। इस चाल के ज़रिये अंगरेज़ उससे राघोबा
और अपने दोनों बन्धकों को छुड़ा लेना चाहते थे ।
अन्त में माधोजी, राघोबा और अंगरेज़ों के बीच गुप्त सन्धि
[हाशिया: सींधिया और राघोबा के साथ गुप्त सन्धि] होगई, जिसमें तय हुआ कि बालक माधोराव
नारायन जिसकी आयु उस समय पाँच साल की
थी, पेशवा की मसनद पर क़ायम रहे, उसी के
नाम के सिक्के ढलते रहें, राघोबा का बेटा
बाजीराव जिसकी आयु चार साल की थी, पेशवा का दीवान
नियुक्त हो, माधोजी नाबालिग दीवान के नाम से शासन का सारा
काम करे और राघोबा को पेशवा दरबार से बारह लाख सालाना
पेन्शन पर झाँसी भेज दिया जावे । इसके अलावा अंगरेज़ों ने
भड़ोच का ज़िला माधोजी को और ४१,००० रुपए नक़द उसके
आदमियों को देने का वादा किया । स्वार्थान्ध माधोजी ने अपने
स्वामी पेशवा के साथ विश्वासघात करके राघोबा और दोनों
अंगरेज़ बन्धकों को चुपके से छोड़ दिया । राघोबा फिर अंगरेज़ों
से जा मिला । इसके थोड़े ही दिनों के अन्दर अंगरेज़ों ने माधोजी
सींधिया के साथ ठीक वैसा ही बर्ताव किया, जैसा वे बंगाल में
अमींचन्द से लेकर मीर जाफ़र तक एक एक देशघातक के साथ
कर चुके थे; फिर भी उस समय भारत के अन्दर कम्पनी की सत्ता
के जमने में माधोजी ने ज़बरदस्त मदद दी ।

२६६ भारत में अंगरेज़ी राज
नाना फड़नवीस को जब अंगरेज़ों के इरादों का पता चला
और मालूम हुआ कि गॉडर्ड की सेना गुजरात पहुँच गई है, तो
उसने एक ओर माधोजी सींधिया को सेना देकर गुजरात भेजा
ताकि वह गुजरात से अंगरेज़ों को बाहर निकाल दे और दूसरी
ओर मूदाजी भोंसले को आज्ञा दी कि तुम फ़ौरन तीस हज़ार सेना
लेकर बंगाल पर चढ़ाई कर दो । नाना की तजवीज़ें काफ़ो ज़बरदस्त
थीं; किन्तु नाना को उस समय पता न था कि माधोजी और
अंगरेज़ों में पहले ही गुप्त सन्धि हो चुकी थी और मूदाजी भोंसले
भी भीतर से वारन हेस्टिंग्स के साथ मिला हुआ था। माधोजी
का बाक़ी हाल आगे चल कर दिया जावेगा । मूदाजी ने नाना को
धोखे में रखने के लिए ३०,००० सेना लेकर बंगाल पर चढ़ाई
अवश्य की, किन्तु उसने पहले हो से वारन हेस्टिंग्स को एक गुप्त
पत्र लिख दिया कि—"मैं यह चढ़ाई केवल नाना फड़नवीस और
दूसरे मराठों को खुश करने के लिए कर रहा हूँ, यह केवल दिखावा
है। मैं मार्ग में जानकर इतनी देर लगा दूँगा कि बरसात से पहले
बंगाल की सरहद पर न पहुँच सकूँ और फिर बरसात का बहाना
लेकर बरार वापस लौट आऊँगा।" मूदाजी भोंसले ने हेस्टिंग्स के
' साथ अपने वचन का पालन किया। सारांश यह कि इन दोनों
मराठा सेनापतियों ने अपने स्वामी और देश दोनों के साथ
विश्वासघात किया ।
कर्नल गॉडर्ड अब सूरत में बैठा हुआ एक ओर नाना फड़नवीस
के पास सुलह के पत्र भेज रहा था और दूसरी ओर पूना पर

पहला मराठा युद्ध २६७
चढ़ाई करने की ज़ोरदार तैयारी कर रहा था। नाना फड़नवीस ने
गॉडर्ड के पत्रों के उत्तर में स्पष्ट लिख भेजा कि
[हाशिया: अंग्रेज़ों का] सुलह की बातचीत के लिए सबसे पहली शर्त
[हाशिया: सींधिया के साथ] यह है कि पिछली सन्धि के अनुसार साष्टी का
[हाशिया: विश्वासघात] टापू और विद्रोही राघोबा दोनों पेशवा दरबार
के हवाले कर दिए जावें। किन्तु साष्टी पर अंगरेज़ों के शुरू से
दाँत थे और राघोबा इस तमाम खेल में उनके हाथ का तुरुप था।
इस दरमियान गॉडर्ड ने गुजरात में पेशवा के इलाक़ों पर धावे
मारने शुरू किए और वहाँ की प्रजा को ख़ूब लूटा और तबाह
किया। माधोजी सींधिया नाना को दिखाने के लिए सेना लेकर
गुजरात पहुँच गया था और इस समय गुजरात में मौजूद था।
किन्तु अंगरेज़ों ने बड़ी सफलता के साथ उसे झूठी आशाओं के
नशे में सुला रक्खा था। नाना फड़नवीस ने प्रजा की बरबादी
और माधोजी की नाफ़रमानी का हाल सुनकर अब होलकर को
सेना सहित गुजरात भेजा। किन्तु गायकवाड़ इस समय तक
मराठा मण्डल से पृथक हो चुका था। माधोजी सींधिया विदेशियों
के हाथों में खेल रहा था। मूदाजी भोंसले वारन हेस्टिंग्स की
चालों में आकर पेशवा के साथ विश्वासघात कर चुका था। इन
हालतों में अकेला होलकर गॉडर्ड की सेना के हाथों गुजरात की
प्रजा की बरबादी को न रोक सका।
१६ मार्च सन् १७८० को माधोजी सींधिया ने अपना एक
वकील गॉडर्ड के पास भेजा और प्रार्थना की कि तालेगाँव की गुप्त

२६८ भारत में अंग्रेज़ी राज
सन्धि के अनुसार राघोबा को झाँसी की ओर भेज दिया जाय,
ताकि मैं राघोबा के पुत्र बाजीराव को साथ लेकर पूना के लिए
रवाना हो जाऊँ । किन्तु गॉडर्ड का मतलब निकल चुका था। वह
राघोबा को इस तरह हाथ से छोड़ देने के लिए तैयार न था। उसने
अब तालेगाँव की गुप्त सन्धि को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
माधोजी को ज़बरदस्त नैराश्य और दुख हुआ। गॉडर्ड ने इस
हालत में उसे देर तक गुजरात में रहने देना ठीक न समझा। चन्द
रोज़ के अन्दर ही उसने बिल्कुल अचानक माधोजी की सेना पर
हमला कर दिया। माधोजी की सेना को तैयार होने का समय भी
न मिल सका। जिस तरह पेशवा के दल में माधोजी अंग्रेज़ों से
मिल गया था, उसी प्रकार माधोजी की सेना में न मालूम कितने
इस समय गॉडर्ड से मिले हुए होंगे। अन्त में गॉडर्ड ने कर्त्तव्य
विमूढ़ माधोजी और उसकी सेना को गुजरात से खदेड़कर बाहर
कर दिया। कर्नल गॉडर्ड के लिए अब केवल पूना पर हमला करना
बाक़ी था।
दूरदर्शी नाना को जब माधोजी की कर्त्तव्य विमुखता, होलकर
[पार्श्व: समस्त भारतीय] की असफलता और अंग्रेज़ों के इरादों का पता
[पार्श्व: नरेशों को मिलाने] चला, तो उसने फ़ौरन हिन्दोस्तान के क़रीब
[पार्श्व: की नाना की] क़रीब सब मुख्य मुख्य नरेशों को इन विदेशियों
[पार्श्व: कोशिश] के ख़िलाफ़ अपने साथ मिलाने के ज़ोरदार प्रयत्न
शुरू किए। हैदराबाद के निज़ाम, अरकाट के
नवाब, मैसूर के सुलतान हैदरअली और दक्खिन के अन्य कई

पहला मराठा युद्ध २६६
छोटे छोटे हिन्दू और मुसलमान नरेशों को उसने इस विषय के पत्र
लिखे। नाना, निज़ाम और हैदरअली में तय हो गया कि तीनों एक
साथ अपने अपने पास के अंगरेज़ी इलाक़ों पर हमला करके अंगरेज़ों
को हिन्दोस्तान से बाहर निकाल दें। नाना की ओर से मूदाजी
भोंसले तीस हज़ार सेना सहित अंगरेज़ों को बंगाल से निकालने
के लिए भेजा जा चुका था। निज़ाम और हैदरअली की कोशिशों
का ज़िक्र और आगे चल कर किया जावेगा। इसके अलावा जैसा
ऊपर लिखा जा चुका है, कम से कम उपचार के लिए पूना के पेशवा
दिल्ली के सम्राट को सारे भारत का अधिराज स्वीकार करते थे
और पेशवा का एक वकील सम्राट के दरबार में रहा करता था।
नाना को मालूम हुआ कि वारन हेस्टिंग्स दिल्ली सम्राट को अपनी
ओर करने की कोशिशों में लगा हुआ है।
नाना ने ६ मई सन् १७८० को अपने दिल्ली के वकील पुरुषोत्तम
महादेव हिङ्गने के नाम इस मज़मून का एक पत्र
[हाशिया: दिल्ली सम्राट के नाम] लिखा :—
[हाशिया: नाना का पत्र]
“यहाँ पर समाचार मिला है कि कलकत्ते के अंगरेज़
दिल्ली के सम्राट के साथ पत्र व्यवहार करके सम्राट को अपनी ओर करने
वाले हैं। इसलिए आप सम्राट और नज़फ़ ख़ाँ दोनों को इस तरह साफ़ साफ़
समझा दीजिये।
“इन टोपी वालों (यूरोप निवासियों) के तरीक़े बेईमानी और चाल
बाज़ी के हैं। इनकी आदत यह है कि पहले तो किसी हिन्दोस्तानी नरेश
को ख़ुश करते हैं, उसे अपने साथ सन्धि करने के फ़ायदे दिखलाते हैं

इस पत्र को पढ़कर ऐसा मालूम होने लगता है मानों वह सन् १८५७

  • "मानों": मानों.
  • "१८५७": १८५७.

के प्रसिद्ध नाना धोरडुपन्त के हाथ का लिखा हुआ हो । नाना

  • As analyzed, "धोरडुपन्त".
    Wait, could it be "धोण्डुपन्त"?
    Let's look at the transcription conventions: if a letter is clearly a printing error or intended as something, usually in transcription we reproduce what is printed, or note it. Let's look very carefully at "धोरडुपन्त". Yes, it is typed धोरडुपन्त.

फड़नवीस जो बात चाहता था वह न हो सकी । किन्तु उसके

  • "फड़नवीस जो बात चाहता था वह न हो सकी । किन्तु उसके"

प्रयत्न बिल्कुल निष्फल नहीं गए ।

  • "प्रयत्न बिल्कुल निष्फल नहीं गए ।"

Everything is verified and clear. Output clean markdown with to .३०० भारत में अंगरेज़ी राज
और फिर उसे क़ैद करके स्वयम् उसके राज पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं। मिसाल
के तौर पर शुजाउद्दौला, मोहम्मदअली ख़ाँ, अरकाट के सूबे और तञोर के
नरेश इत्यादि की हालत देख लीजिये । इसलिए आपका इन टोपी वालों को
[L5

पहला मराठा युद्ध ३०१
करनल गॉडर्ड अपनी विशाल सेना सहित पूना की ओर बढ़ा।
[हाशिया: तीसरी बार अंग्रेज़ों] रास्ते में कल्यान, बसई और कोकन प्रान्त के अन्य
[हाशिया: की हार] कई स्थानों को उसकी सेना ने खूब रौंदा और
बरबाद किया। किन्तु अभी वह मराठा साम्राज्य
के केन्द्र पूना के निकट भी न पहुँच पाया था कि भोरघाट के ऊपर
हरिपन्त फड़के, परशुराम भाऊ और होलकर के अधीन पेशवा की
सेना ने उसे रास्ते ही में घेर लिया। मैदान खूब गरम हुआ, किन्तु
फिर तीसरी बार विजय मराठों ही की ओर रही और अप्रेल
सन् १७८१ के आख़ीर में जान और माल दोनों की भारी हानि
उठाकर पूना के दर्शन किए बिना ही कम्पनी की इस विशाल सेना
को उसी तरह ज़िल्लत के साथ पीछे भागना पड़ा जिस तरह जनवरी
सन् १७७६ में बम्बई की सेना को भागना पड़ा था। बचे खुचे
आदमी जान बचाकर बम्बई पहुँच गए, किन्तु इस दूसरी लज्जा
जनक हार से अंग्रेज़ों को मराठों की वीरता और युद्ध कौशल का
खूब पता चल गया और उनकी हिम्मत कुछ अर्से के लिए टूट गई।
इस दरमियान भारत के दूसरे हिस्सों में भी वारन हेस्टिंग्स की
[हाशिया: अंग्रेज़ों का गोहद] साज़िशें जारी थीं। माधोजी सींधिया को अंग्र-
[हाशिया: के राना को अपनी] रेज़ों की दग़ाबाज़ी का काफ़ी तजरुबा हो चुका
[हाशिया: ओर फोड़ना] था। उसकी हालत इस समय अधमरे साँप की
सी थी। वारन हेस्टिंग्स ने सबसे पहले उसे पूरी
तरह कुचल डालना ज़रूरी समझा। सींधिया का मुख्य गढ़ ग्वालियर
था। वारन हेस्टिंग्स ने सींधिया के एक बाजगुज़ार गोहद नरेश

३०२ भारत में अंगरेज़ी राज
को ग्वालियर का लालच देकर सींधिया के ख़िलाफ़ अपनी ओर
फोड़ लिया। कप्तान पोफ़म के अधीन कम्पनी की एक सेना
ग्वालियर भेजी गई और गोहद के राना की सहायता से ४ अगस्त
सन् १७८० को ग्वालियर का क़िला माधोजी सींधिया से जीत कर
गोहद के राना को दे दिया गया। आज कल के धौलपुर के जाट
राना उसी गोहद के राना की औलाद हैं। इसके बाद करनल
कारनक ने वारन हेस्टिंग्स की आज्ञा से फ़रवरी और मार्च सन्
१७८१ में सींधिया के अनेक स्थानों को रौंदा, उन्हें लूटा और
तबाह किया।
माधोजी को अपने विश्वासघात की काफ़ी सज़ा मिल चुकी
थी। वारन हेस्टिंग्स ने इसके बाद माधोजी का सर्वनाश करने के
लिए राजपूताने के नरेशों को उसके विरुद्ध भड़काना चाहा, किन्तु
माधोजी के सौभाग्य से इसमें हेस्टिंग्स को सफलता न हो सकी।
इतने में हेस्टिंग्स को मालूम हुआ कि अंगरेज़ों के विरुद्ध नाना
फ़ड़नवीस, निज़ाम और हैदरअली में सलाह होगई है। मूदाजी
भोंसले का बंगाल पर हमला हेस्टिंग्स की चालों और मूदाजी के
विश्वासघात द्वारा विफल हो ही चुका था। केवल दो प्रबल शक्तियाँ
मैदान में बाक़ी थीं, निज़ाम और हैदरअली। हेस्टिंग्स ने इन दोनों
को अपनी ओर फोड़ने के भरसक यत्न किए। निज़ाम के साथ
उसे पूरी सफलता हुई, किन्तु हैदरअली को वह अपनी ओर न
फोड़ सका। वास्तव में हैदरअलो और निज़ाम के चरित्र में बहुत
बड़ा अन्तर था।

पहला मराठा युद्ध ३०३
हैदरअली एक निर्धन घराने में पैदा हुआ था। केवल अपनी
[हैदरअली और] वीरता और योग्यता के बल वह एक मामूली
[निज़ाम में तुलना] सिपाही से बढ़ते बढ़ते एक विशाल राज का
स्वामी बन गया था। वह प्रजापालक था और
उसकी प्रजा उससे प्रेम करती थी। अपने देश या देशवासियों के
साथ उसने कभी भी दग़ा नहीं की। हैदरअली के चरित्र, अंगरेज़ों
के साथ उसके युद्ध और उसके अद्भुत पराक्रम का बयान अगले
अध्याय में किया जायगा। इसके ख़िलाफ़ हैदराबाद के राजकुल
का संस्थापक निज़ामुलमुल्क दिल्ली का एक चलता हुआ दरबारी
था, जो केवल चालबाज़ियों से बढ़ा और जिसने अपने स्वामी
दिल्ली सम्राट के साथ विश्वासघात करके अपने लिए एक स्वतन्त्र
राज क़ायम किया। जिस समय दोनों प्रसिद्ध भाई सय्यद अब्दुल्ला
और सय्यद हुसेनअली उस 'जज़िये' को, जिसे अकबर ने रद्द कर
दिया था और जिसे औरङ्गज़ेब ने दोबारा जारी किया था, फिर से
रद्द करवा कर तथा अन्य अनेक उपायों से मुग़ल साम्राज्य के नाश
को रोकने के प्रयत्न कर रहे थे, उस समय निज़ामुलमुल्क ने इन
दोनों दूरदर्शी भाइयों के ख़िलाफ़ साज़िशें करके उनकी सत्ता को
नष्ट किया। निज़ामुलमुल्क ने ही मराठों को उकसाकर मुग़ल
साम्राज्य पर उनसे हमले करवाए। निज़ामुलमुल्क ही ने नादिरशाह
को ईरान से बुलवा कर भारत तथा भारत सम्राट दोनों को अपमा-
नित करवाया। निज़ामुलमुल्क ही सम्राट का पहला सूबेदार था,
जिसने अपने सूबे को साम्राज्य से पृथक करके साम्राज्य के अंगभंग

३०४ भारत में अंगरेज़ी राज
की नींव रक्खी और दूसरे सूबेदारों के लिए एक बुरी मिसाल
क़ायम की। अंगरेज़ों को भारत के अन्दर अपना राज जमाने में भी
समय समय पर निज़ाम कुल से काफ़ी सहायता मिली।
वारन हेस्टिंग्स ने उस समय के निज़ाम को बहकाया कि दिल्ली
[हाशिया: निज़ाम का विश्वासघात और हैदरअली के अंगरेज़ों पर हमले] सम्राट् तुम्हें दक्खिन की सूबेदारी से हटाकर
हैदरअली को तुम्हारी जगह देना चाहता है।
गुण्टूर का इलाक़ा कुछ समय पहले अंगरेज़ों ही
ने निज़ाम से छीन कर अपने मित्र करनाटक के
नवाब मोहम्मदअली को दे दिया था। हेस्टिंग्स
ने अब वह इलाक़ा निज़ाम को वापस दिलवा दिया। इस तरह
हेस्टिंग्स ने नाना और हैदरअली दोनों के ख़िलाफ़ निज़ाम को
अपनी ओर फोड़ लिया, किन्तु हैदरअली पर वारन हेस्टिंग्स की
चालों का कोई असर नहीं हुआ। उसने नाना का सन्देशा पाते ही
अपने पास के अंगरेज़ों इलाक़ों पर हमला कर दिया। उसकी
विजयों का हाल अगले अध्याय में दिया जायगा। इधर हेस्टिंग्स
को करनल गॉडर्ड की हार का समाचार मिला। इस समाचार को
सुनकर हेस्टिंग्स का साहस एकदम टूट गया। एक ओर हैदरअली
के भयंकर हमले और दूसरी ओर गॉडर्ड की लज्जाजनक हार।
दोनों से घबराकर हेस्टिंग्स ने पेशवा दरबार के साथ तुरन्त सन्धि
कर लेने ही में अपनी ख़ैरियत देखी।
वारन हेस्टिंग्स ने अब नागपुर के मूदाजी भोंसले से प्रार्थना
की कि आप मध्यस्थ बनकर नाना फड़नवीस और अंगरेज़ों में

पहला मराठा युद्ध ३०५
सुलह करवा दें। किन्तु मूदाजी नाना के साथ विश्वासघात कर
अंगरेज़ों की ओर चुका था, उसे फिर नाना के सामने जाने का
से सन्धि की साहस न हो सका। मजबूर होकर हेस्टिंग्स ने
कोशिशें १३ अक्तूबर सन् १७८१ को फिर माधोजी
सींधिया के साथ एक गुप्त सन्धि की और उसी माधोजी द्वारा
नाना फड़नवीस से सन्धि की बातचीत शुरू की।
११ सितम्बर सन् १७८१ को मद्रास की अंगरेज़ कौन्सिल ने
भी हैदर से हार पर हार खाकर एक पत्र द्वारा बड़ी नम्रता के
साथ नाना से सुलह की प्रार्थना की, जिसमें उन्होंने खुदा और
ईसा मसीह के अलावा इंगलिस्तान के बादशाह, अंगरेज़ क़ौम और
कम्पनी तीनों की क़समें खाईं कि हम लोग अब जो सन्धि होगी
उस पर सदा क़ायम रहेंगे।
कई महीने तक पत्र व्यवहार जारी रहा। अन्त में १७ मई
सन् १७८२ को सालबाई नामक स्थान पर पूना
सालबाई की दरबार और कम्पनी के बीच तीसरी बार सन्धि
सन्धि हुई। इस सन्धि के अनुसार—
१—शुरू से अब तक छल से या बल से पेशवा के जितने
इलाक़ों पर अंगरेज़ों ने क़ब्ज़ा कर लिया था वे सब पेशवा दरबार
को वापस दे दिए गए।
२—गायकवाड़ के इलाक़ों और तमाम गुजरात की ठीक वही
स्थिति रही, जो सन् १७७५ से यानी अंगरेज़ों के दख़ल देने से
पहले थी।
२०

३०६ भारत में अंगरेज़ी राज
३—राघोबा को २५,०००) रुपए मासिक पेन्शन पर एक जगह
रहने की इजाज़त दी गई।
४—जो सन्धि वारन हेस्टिंग्स ने गोहद के राजा के साथ की
थी वह रद्द ठहराई गई, ग्वालियर माधोजी सींधिया को वापस
मिल गया और गोहद का राना, जिसे अंगरेज़ों ही ने माधोजी के
खिलाफ़ भड़काया था, जिसकी सहायता के बिना कप्तान पोफ़म
माधोजी को कभी भी वश में न कर पाता और बिना माधोजी को
वश में किए पेशवा दरबार के साथ इतनी आसानी से सुलह भी
न हो सकती, अब दण्ड भोगने के लिए अपने शत्रु माधोजी के
हवाले कर दिया गया।
सन्धि पत्र १७ मई को लिखा गया, किन्तु नाना फड़नवीस ने
सात महीने बाद तक उस पर दस्तख़त न किए, क्योंकि नाना का
सच्चा मित्र और अंगरेज़ों का जानी दुशमन हैदरअली अभी तक
अंगरेज़ों से लड़ रहा था। नाना की आशाएँ अभी टूटी न थीं।
इसके अलावा जब तक हैदरअली मैदान में था, नाना का अंगरेज़ों
के साथ सन्धि कर लेना हैदरअली के साथ विश्वासघात करना
होता। अन्त में दिसम्बर महीने में नाना को हैदरअली की मृत्यु
का समाचार मिला। अंगरेज़ों को भारत से निकालने की उसकी
आशाएँ टूट गईं। नाना ने अब सालबाई के सन्धि पत्र पर
दस्तख़त कर दिए
इस तरह ले दे कर पहले मराठा युद्ध का अन्त हुआ। इस
युद्ध से भारत के अन्दर न अंगरेज़ों का ज़रा सा भी इलाक़ा बढ़ा;

पहला मराठा युद्ध ३०७
न वीरता, युद्धकौशल या ईमानदारी के लिए उनकी कीर्ति बढ़ी।
इसके ख़िलाफ़ मराठों की वीरता, उनका युद्ध
पहले मराठा युद्ध कौशल और नाना फड़नवीस की नीतिज्ञता तीनों
का अन्त इस युद्ध में अत्यन्त उच्च कोटि की साबित
हुईं। इसमें सन्देह नहीं कि यदि गायकवाड़, सींधिया और भोंसले
तीन तीन मराठा नरेशों ने पेशवा दरबार के साथ विश्वासघात न
किया होता, या यदि ऐन मौक़े पर हैदरअली की ज़िन्दगी ने धोखा
न दिया होता, तो हिन्दोस्तान से विदेशी सत्ता, जिसे जड़ पकड़े
श्रभी २० साल भी न हुए थे, उसी समय समूल उखड़ कर फिक
गई होती। किन्तु नाना फड़नवीस की उच्च नीति और दूरदर्शिता
उस समय के दूसरे मराठा नरेशों में मौजूद न थी और इस देश-
को पुनर्जन्म की प्रसव वेदना में से निकलना आवश्यक था।

नवाँ अध्याय
हैदरअली
पिछले अध्याय में हम हैदरअली और अंगरेज़ों की लड़ाइयों
की ओर इशारा कर चुके हैं। सच यह है कि
हैदरअली का हैदरअली से बढ़कर बहादुर, होशियार और
जन्म ख़ौफ़नाक शत्रु अंगरेज़ों को भारत के अन्दर
दूसरा नहीं मिला। जिस तरह नाना फड़नवीस ने अपनी नीतिज्ञता
द्वारा उसी तरह हैदरअली ने जीवन भर अपनी तलवार द्वारा अंग-
रेज़ों को भारत से निकालने का प्रयत्न किया। इसलिए अंगरेज़ों
और हैदरअली की लड़ाइयों का बयान करने से पहले हैदरअली के
जीवन और उसके अद्भुत चरित्र को संक्षेप में बयान करना ज़रूरी है।
हैदरअली का जन्म किसी राजघराने में न हुआ था। उसका
प्रपितामह वली मोहम्मद एक मामूली मुसलमान फ़क़ीर था, जो

गुलबर्गा में दक्खिन के मशहूर मुसलमान सन्त हज़रत बन्दा नवाज़
गेसूदराज़ की दरगाह में रहा करता था। वली मोहम्मद के ख़र्च
के लिए दरगाह से एक छोटी सी माहवारी रक़म बँधी हुई थी।
प्राचीन भारतीय ऋषियों के समान उस समय के अनेक मुसलमान
फ़क़ीर अत्यन्त सरल, किन्तु कौटुम्बिक जीवन व्यतीत किया करते
थे। वली मोहम्मद के एक बेटा था, जिसका नाम शेख़ मोहम्मद
अली था। उसे शेख़ अली भी कहते थे। शेख़ अली अपने बाप के
समान पहुँचा हुआ फ़क़ीर माना जाता था। वह कुछ दिन बीजापुर
में रहा, फिर कर्नाटक के कोलार स्थान में आकर ठहरा। कोलार
का हाकिम शाह मोहम्मद दक्खिनी शेख़ अली का बड़ा भक्त था।
शेख़ अली के चार बेटे थे। ख़र्च की तङ्गी के सबब बेटों ने बाप से
प्रार्थना की कि हमें इजाज़त दीजिये कि हम कहीं और जाकर
नौकरी कर लें, धन और इज़्ज़त हासिल करें। किन्तु शेख़ अली ने
बेटों को समझाया :-
"हमारे बाप दादा ख़ुदातरस और परहेज़गार लोग थे। वे इस क़ाबिल
थे कि दुनिया में नाम हासिल करते, फिर भी दुनिया के बन्धनों और उसके
संसर्ग से वे अपने को सदा अलग रखने की कोशिश करते रहे; क्योंकि
दुनिया की लालसा से रूहानी शान्ति जाती रहती है और सच्चे सुख की
खोज का शौक़ मिट जाता है; इसलिए तुम्हें उचित है कि अपने पूर्वजों
के क़दम ब क़दम चलो और इस चन्दरोज़ा हस्ती के फन्दों में न आओ
× × × इसके अलावा मनस्वी और आज़ाद तबीयत के लोग अपनी
सांसारिक हाजत के तङ्ग होने से कभी दुखी नहीं होते और यदि उनके

३१० भारत में अंगरेज़ी राज
दुनिया से सम्बन्ध हों तो भी वे उन सम्बन्धों को छोड़ देने और दुनिया से
तश्रल्लुक़ तोड़ लेने में ही फ़ख़ करते हैं।"*
निस्सन्देह हैदरअली के पितामह और प्रपितामह दोनों सच्चे
फ़क़ीर थे । जब तक शेख़ अली ज़िन्दा रहा उसके बेटे उसके साथ
रहे। सन् १६९५ ईसवी में शेख़ अली की मृत्यु हुई। बड़ा बेटा शेख़
इलियास बाप का उत्तराधिकारी हुआ। सबसे छोटे बेटे का नाम
फ़तह मोहम्मद था। फ़तह मोहम्मद अपने बड़े भाई की इच्छा के
खिलाफ़ अरकाट के नवाब सआदतउल्ला ख़ाँ की फ़ौज में जमादार
हो गया। फ़तह मोहम्मद ने एक दूसरे मुसलमान फ़क़ीर तंजोर के
पीरज़ादा बुरहानुद्दीन की लड़की के साथ विवाह कर लिया। इस
स्त्री से फ़तह मोहम्मद के दो लड़के हुए। एक का नाम शहबाज़
और दूसरे का हैदरअली था। हैदरअली का जन्म सन् १७२०
ईसवी के क़रीब हुआ।
आज से दो सौ साल पहले अधिकांश भारत में हिन्दू और
मुसलमानों का सामाजिक जीवन एक विचित्र ढंग से परस्पर गुथा
हुआ था। हैदरअली की एक फ़ारसी जीवनी से पता चलता है
कि हैदर के जन्म के समय हिन्दू ज्योतिषियों ने उसकी जन्मपत्री
तैयार की। हैदर 'सिंह' राशि में पैदा हुआ था, इसलिए
ज्योतिषियों ही की राय से उसका नाम हैदर (शेर) अली रक्खा
गया। ज्योतिषियों ही ने पेशीनगोई की कि नवजात बालक एक
* History of Hyder Naik—by Mir Hussen Ali Khan Kirmani, translated
by Col. W. Miles, p. 5.