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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 572

पहला मराठा युद्ध ३०१
करनल गॉडर्ड अपनी विशाल सेना सहित पूना की ओर बढ़ा।
[हाशिया: तीसरी बार अंग्रेज़ों] रास्ते में कल्यान, बसई और कोकन प्रान्त के अन्य
[हाशिया: की हार] कई स्थानों को उसकी सेना ने खूब रौंदा और
बरबाद किया। किन्तु अभी वह मराठा साम्राज्य
के केन्द्र पूना के निकट भी न पहुँच पाया था कि भोरघाट के ऊपर
हरिपन्त फड़के, परशुराम भाऊ और होलकर के अधीन पेशवा की
सेना ने उसे रास्ते ही में घेर लिया। मैदान खूब गरम हुआ, किन्तु
फिर तीसरी बार विजय मराठों ही की ओर रही और अप्रेल
सन् १७८१ के आख़ीर में जान और माल दोनों की भारी हानि
उठाकर पूना के दर्शन किए बिना ही कम्पनी की इस विशाल सेना
को उसी तरह ज़िल्लत के साथ पीछे भागना पड़ा जिस तरह जनवरी
सन् १७७६ में बम्बई की सेना को भागना पड़ा था। बचे खुचे
आदमी जान बचाकर बम्बई पहुँच गए, किन्तु इस दूसरी लज्जा
जनक हार से अंग्रेज़ों को मराठों की वीरता और युद्ध कौशल का
खूब पता चल गया और उनकी हिम्मत कुछ अर्से के लिए टूट गई।
इस दरमियान भारत के दूसरे हिस्सों में भी वारन हेस्टिंग्स की
[हाशिया: अंग्रेज़ों का गोहद] साज़िशें जारी थीं। माधोजी सींधिया को अंग्र-
[हाशिया: के राना को अपनी] रेज़ों की दग़ाबाज़ी का काफ़ी तजरुबा हो चुका
[हाशिया: ओर फोड़ना] था। उसकी हालत इस समय अधमरे साँप की
सी थी। वारन हेस्टिंग्स ने सबसे पहले उसे पूरी
तरह कुचल डालना ज़रूरी समझा। सींधिया का मुख्य गढ़ ग्वालियर
था। वारन हेस्टिंग्स ने सींधिया के एक बाजगुज़ार गोहद नरेश