भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहला मराठा युद्ध २६३
२६ फ़रवरी सन् १७७६ को वह अपनी विशाल सेना सहित सूरत
पहुँच गया।
वारन हेस्टिंग्स को जिस समय बम्बई की सेना की इस
अपमानजनक हार और नई सन्धि का पता लगा तो उसने फ़ौरन
करनल गॉडर्ड को लिख भेजा कि आप उस सन्धि की बिलकुल
परवा न करें, और आगे बढ़ते जावें।
मराठा मण्डल के पाँच मुख्य स्तम्भों में से एक महाराजा
[हाशिया: सींधिया और होलकर कुलों की उत्पत्ति] गायकवाड़ को अंगरेज़ अपनी ओर फोड़ चुके थे।
बरार के महाराजा भोंसले ने वारन हेस्टिंग्स की
सलाह न मानी थी, फिर भी वारन हेस्टिंग्स ने
अपनी चालों द्वारा उसे इस संग्राम से तटस्थ
कर रक्खा था। पेशवा की मदद के लिए अब केवल होलकर और
सींधिया दो नरेश बाक़ी रह गए थे।
मालवा का प्रान्त जिसे मध्यभारत कहते हैं, १८ वीं सदी के
प्रारम्भ तक मुग़ल साम्राज्य का एक भाग था और निज़ाम की
सूबेदारी में था। सन् १७२१ में निज़ाम के बग़ावत करने पर दिल्ली
सम्राट ने निज़ाम की जगह एक हिन्दू राजा गिरधरराय को
मालवे का सूबेदार नियुक्त कर दिया। कुछ समय बाद पेशवा ने
राजा गिरधरराय से मालवा विजय करके उत्तरीय भाग अपने एक
अनुचर रानोजी सींधिया को और दक्षिणी भाग एक दूसरे
अनुचर मलहरराव होलकर को दे दिया। यही इन दोनों राजकुलों
का प्रारम्भ था।