भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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जिस समय का हाल हम लिख रहे हैं उस समय दक्खिन
महारानी मालवे का शासन उस प्रातःस्मरणीया महारानी
अहिल्याबाई अहिल्याबाई के हाथों में था, जिसकी बुद्धिमत्ता,
योग्यता, न्यायशासन, सच्चरित्र और आदर्श
राजप्रबन्ध की प्रशंसा अनेक भारतीय और विदेशी इतिहास लेखकों
ने मुक्तकण्ठ से की है; जिसकी गाढ़ धार्मिकता के कारण उत्तर से
दक्खिन तक हिन्दू और मुसलमान समस्त भारतीय नरेश उसे
अपनी श्रद्धा और आदर का पात्र स्वीकार करते थे; और जिसका
नाम आज तक भारत के एक एक गांव और एक एक झोपड़े में,
श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता है। अहिल्याबाई इन विदेशियों
के साथ मेल या अपने यहाँ उनका हस्तक्षेप पसन्द न करती थी,
इसलिए वारन हेस्टिंग्स को पेशवा के ख़िलाफ़ सींधिया कुल के
साथ साज़िश करनी पड़ी ।
माधोजी सींधिया उस समय पेशवा के अत्यन्त योग्य और
माधोजी सींधिया विश्वस्त सेनापतियों में से था । वारन हेस्टिंग्स ने
के साथ झूठा वादा देख लिया कि नाना को पंगुल कर देने का सबसे
अच्छा तरीक़ा माधोजी को अपनी ओर फोड़
लेना है । अदूरदर्शी माधोजी विदेशियों की बातों में आकर पेशवा
दरबार के साथ विश्वासघात करने को राज़ी हो गया । तालेगांव
ही में अंगरेज़ों और माधोजी के बीच गुप्त बातचीत शुरू होगई ।
माधोजी को ख़ास लालच यह दिया गया कि यूरोपियन अफ़सरों
और यूरोपियन ढंग के शस्त्र ढालने वालों की मदद से तुम्हारे पास