भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 570, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला मराठा युद्ध २६६
छोटे छोटे हिन्दू और मुसलमान नरेशों को उसने इस विषय के पत्र
लिखे। नाना, निज़ाम और हैदरअली में तय हो गया कि तीनों एक
साथ अपने अपने पास के अंगरेज़ी इलाक़ों पर हमला करके अंगरेज़ों
को हिन्दोस्तान से बाहर निकाल दें। नाना की ओर से मूदाजी
भोंसले तीस हज़ार सेना सहित अंगरेज़ों को बंगाल से निकालने
के लिए भेजा जा चुका था। निज़ाम और हैदरअली की कोशिशों
का ज़िक्र और आगे चल कर किया जावेगा। इसके अलावा जैसा
ऊपर लिखा जा चुका है, कम से कम उपचार के लिए पूना के पेशवा
दिल्ली के सम्राट को सारे भारत का अधिराज स्वीकार करते थे
और पेशवा का एक वकील सम्राट के दरबार में रहा करता था।
नाना को मालूम हुआ कि वारन हेस्टिंग्स दिल्ली सम्राट को अपनी
ओर करने की कोशिशों में लगा हुआ है।
नाना ने ६ मई सन् १७८० को अपने दिल्ली के वकील पुरुषोत्तम
महादेव हिङ्गने के नाम इस मज़मून का एक पत्र
[हाशिया: दिल्ली सम्राट के नाम] लिखा :—
[हाशिया: नाना का पत्र]
“यहाँ पर समाचार मिला है कि कलकत्ते के अंगरेज़
दिल्ली के सम्राट के साथ पत्र व्यवहार करके सम्राट को अपनी ओर करने
वाले हैं। इसलिए आप सम्राट और नज़फ़ ख़ाँ दोनों को इस तरह साफ़ साफ़
समझा दीजिये।
“इन टोपी वालों (यूरोप निवासियों) के तरीक़े बेईमानी और चाल
बाज़ी के हैं। इनकी आदत यह है कि पहले तो किसी हिन्दोस्तानी नरेश
को ख़ुश करते हैं, उसे अपने साथ सन्धि करने के फ़ायदे दिखलाते हैं