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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

२३० भारत में अंगरेज़ी राज
सच यह है कि क्लाइव के जीवन का कोई भी काम ऐसा न था
जिससे भारतवासी उसे कृतज्ञता के साथ याद कर सकें।
उसका व्यक्तिगत चरित्र भी अत्यन्त पतित था। कैरेकोली ने
क्लाइव का अपनी 'क्लाइव की जीवनी' में उसके पापमय
व्यक्तिगत चरित्र कृत्यों की अनेक मिसालें दी हैं, जिन्हें इस पुस्तक
में उद्धृत करना व्यर्थ और शिष्टता के विरुद्ध
होगा। कैरेकोली ने लिखा है:—
“बंगाल भर में यूरोपियन और हिन्दोस्तानी दोनों तरह की स्त्रियों की
ऐसी अनेक मिसालें थीं, जिन्होंने नफ़रत के साथ उसके प्रेम प्रदर्शन को
अस्वीकार किया और उसे संसार के सामने हास्यास्पद बना दिया।”*
इनमें से अनेक स्त्रियाँ विवाहित थीं।
सन् १७६७ में क्लाइव ने सदा के लिए भारत छोड़ा और
इंगलिस्तान में एक भारतीय 'नवाब' के ठाट से रहना शुरू कर
दिया। अन्त में उसने आत्महत्या कर ली। इंगलिस्तान के अनेक
सरल-विश्वासी लोगों ने उसकी आत्महत्या का सबब यह बतलाया
कि अमींचन्द के साथ जालसाज़ी करके ब्रिटिश राज क़ायम करने,
सिराजुद्दौला और नजमुद्दौला की हत्याएँ कराने और अपने अनेक
ईसाई मित्रों की पत्नियों को बहकाकर उनके घरों का सुख नाश
करने, इत्यादि पापों की याद ने क्लाइव की आत्मा को चैन से रहने
न दिया।

  • "There were several instances of both white and black women in
    Bengal who rejected his offer with disdain and exposed him to the ridicule
    of the world." - Life of Clive, by Caraccioli, vol. i.

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २३१
क्लाइव के बाद वेरेल्स्ट बंगाल का गवरनर नियुक्त हुआ ।
[पार्श्व-शीर्षक: क्लाइव के] वेरेल्स्ट के एक ख़त से मालूम होता है कि सम्राट
[पार्श्व-शीर्षक: बाद] शाहआलम को दिल्ली जाने से रोकने और उसे
इतनी देर तक इलाहाबाद में ठहराए रखने में
अंगरेज़ों का काफ़ी हाथ था। वेरेल्स्ट कम्पनी के हित में सम्राट को
बंगाल लाना चाहता था, किन्तु वह चाहता यह था कि कोई ऐसी
तरकीब की जावे, जिससे अंगरेज़ों को उसे बंगाल बुलाना न पड़े,
बल्कि शाहआलम स्वयं उनके साथ बंगाल चलने की इच्छा प्रकट
करे। अगस्त सन् १७६६ में वेरेल्स्ट की जगह कारटियर गवरनर
नियुक्त हुआ। स्कॉलफ़ील्ड इस अंगरेज़ गवरनर के विषय में
लिखता है:—
“इस जिल्द के अधिकांश पत्र या तो बंगाल फ़ोर्ट विलियम क़िले के
गवरनर के नाम भेजे गए थे या उसकी ओर से दूसरों को भेजे गए थे;
किन्तु इन सब चालों और चालों के जवाब में चालों, साज़िशों और आशं-
काओं के जंजाल में से इस गवरनर का व्यक्तित्व कुछ बहुत चमकता हुआ
नज़र नहीं आता ।”*
उस समय के अंगरेज़ गवरनरों के मुख्य कार्य का यह ख़ासा
सार है। सन् १७७२ में कारटियर की जगह वारन् हेस्टिंग्स गवरनर

  • "From the tangle of plot and counterplot, of intrigue and suspicion,
    the personality of the Governor of Fort William in Bengal, to whom most of
    the letters in this volume are addressed or in whose name they were issued,
    does not emerge with any great distinctness."-A. F. Scholfield, in the
    preface to the Third Volume of Calendar of Persian Correspondence.

२३२ भारत में अंग्रेज़ी राज
नियुक्त हुआ। किन्तु क्लाइव के जाने के समय से वारन् हेस्टिंग्स
की नियुक्ति के समय तक उत्तरीय भारत में कोई भी महत्त्व की
राजनैतिक घटना नहीं हुई।
‘सीअरुल-मुताख़रीन’ में विस्तार के साथ बयान किया गया
है कि किस तरह उन दिनों बंगाल के तीनों प्रान्तों में अलग अलग
शिताबराय, मोहम्मद रज़ा ख़ाँ और जसारत ख़ाँ कम्पनी के नायबों
की हैसियत से सारा काम करते थे, उनके साथ बैठकर और हर
ज़िले में छोटे से छोटे देशी अफ़सरों के पास बैठकर अंग्रेज़
माल के महकमे का सारा काम सीखते थे और देश के रस्म
रिवाज की जानकारी प्राप्त करते थे और फिर उन्हीं से सीखकर
उन्हीं पर हावी रहते थे, या उन्हें निकाल कर उनकी जगह ले
लेते थे।
इस दो अमली ने तीनों प्रान्तों का सत्यानाश कर डाला। चारों
[हाशिया: दो अमली द्वारा] ओर अराजकता थी। हर समय हर एक को जान
[हाशिया: बंगाल का नाश] और माल का ख़तरा था। हर तरह की तिजारत
पर अंग्रेज़ों का अनन्य अधिकार था। देश के
समस्त उद्योग धन्धे, जिन्हें कुछ ही वर्ष पहले संसार चकित होकर
देखता था, कुचल कर मटियामेट कर दिए गए थे सोना, चाँदी,
जवाहरात, रुपए और अशर्फ़ियाँ लद लद कर देश से बाहर जाने
लगीं, यहाँ तक कि देश में रुपया दिखाई देना तक कठिन हो गया।
बोल्ड्स नामक अंग्रेज़ ने विस्तार के साथ बयान किया है कि किस
प्रकार अंग्रेज़ दलालों ने बंगाल की फली फूली कारीगरियों का

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २३३

नाश कर डाला।* इसी अपराध के दंड में बोल्ट्स को भारत से
देश निकाला दे दिया गया।
गवरनर वेरैलस्ट के एक पत्र से मालूम होता है कि अंगरेज़ों के
अधिकार से पहले बंगाल की बनी हुई चीजें हिन्दोस्तान के कोने
कोने में और पच्छिम में ईरान और अरब की खाड़ियों और पूरब
में चीन इत्यादि के समुद्रों में होकर दूर दूर के देशों में पहुँचती थीं
और "हज़ारों रास्तों से धन बह बह कर" बंगाल में आता था,
किन्तु अब वह सब रास्ते बन्द हो गए। यूरोप की कम्पनियाँ जो
भारतीय माल हर साल जहाज़ों में भर कर अपने देशों को ले जाती
थीं उस माल के बदले में एक पैसा यूरोप से भारत न आता था।
इस माल की पूरी क़ीमत बंगाल ही से वसूल की जाती थी।
अपना भारत के दूसरे प्रान्तों का ख़र्च यहाँ तक कि अपनी चीन
की बस्तियों तक का ख़र्च अंगरेज़ बंगाल ही से वसूल करते थे।
व्हीलर नामक अंगरेज़ लिखता है :—
"तीन साल के अन्दर पचास लाख पाउण्ड (पाँच करोड़ रुपए) से ऊपर
का सोना चाँदी बंगाल से विदेशों को गया, जबकि क़रीब पाँच लाख
पाउण्ड (पचास लाख रुपए) का सोना चाँदी बाहर से बंगाल आया। इसी
समय के अन्दर एक रुपए की क़ीमत दो शिलिंग छै पेन्स हो गई।"*

  • Consideration of the Affairs of the East India Company, by Bolts.
  • "During three years the exports of bullion from Bengal exceeded
    five millions sterling, whilst the imports of bullion were little more than half
    a million. Meantime the rupee rose to an exchange'value of two and six
    pence." Early Records of British India, by Wheeler, p. 375.

२३४ भारत में अंगरेज़ी राज
'सीअरुल-मुताख़रीन' का बयान है :—
“इस समय यह देखा गया कि बंगाल में रुपया
दरिद्रता, दुष्काल कम होता जा रहा था। X X X हर साल बेशुमार
और महामारी नक़दी लाद कर इंगलिस्तान भेजी जाती थी। यह एक
मामूली बात थी कि हर साल पाँच छै या इससे भी अधिक अंगरेज़ बड़ी
बड़ी पूँजियों साथ लेकर अपने वतन को लौटते हुए दिखाई देते थे। इस
लिए लाखों के ऊपर लाखों चिन चिन कर इस देश से निकल गए। X X X
सरकारी फ़ौज, ज़मींदारों की फ़ौजें, उम्मेदवार और उनके नौकर—सब
मिलाकर कम से कम ७० या ८० हज़ार हिन्दोस्तानी सवार पहले बंगाल
और बिहार के मैदानों में भरे रहते थे; और अब बंगाल के अन्दर एक सवार
ऐसा ही अलभ्य है, जैसा दुनिया में 'उनक़ा' पक्षी। हर ज़िले में पैदावार
कम होती जा रही है और असंख्य जनता दुष्काल और महामारी से मिटती
जा रही है, जिससे देश बराबर उजड़ता चला जा रहा है। नतीजा यह है कि
बेहद ज़मीन बिना जोती बोई पड़ी हुई है और जो हम लोगों ने जोती है,
उसकी भी पैदावार की निकासी के लिए हमें बाज़ार नहीं मिल सकता। यह
बात यहाँ तक सच है कि यदि अंगरेज़ हर साल बंगाल और बिहार भर से
शोरा, अफ़ीम, कच्चा रेशम और सफ़ेद कपड़े के थान न ख़रीदते होते तो
शायद बहुत से हाथों में एक रुपया या अशरफ़ी वैसी ही अलभ्य हो जाती,
जैसी पारस पथरी। और वह समय आने वाला है, जब बहुत से नए पैदा
हुए आदमी यह न समझ सकेंगे कि लोग पहले रुपया किस चीज़ को कहा
करते थे और अशरफ़ी शब्द के क्या अर्थ होते थे।”*

  • Searul-Mutakherin, vol. iii, p. 32, Calcutta Reprint

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २३५
दुर्भाग्य से इसी मौक़े पर बंगाल में सूखा पड़ा। फिर भी यदि
कम्पनी के आदमियों की अनीति जारी न होती तो इस सूखे के
होते हुए भी बंगाल में दुष्काल न पड़ सकता।
कम्पनी के सरकारी काग़ज़ों में लिखा है कि इस सूखे के
दिनों में—
“कुछ एजण्टों ने चावलों की कोठियाँ भर लेने का अच्छा मौक़ा देखा।
उन्होंने अपनी कोठियाँ भर लीं, वे जानते थे कि हिन्दू मर जायेंगे, लेकिन
मांस खाकर अपने धर्म से भ्रष्ट न होंगे। इस लिए मरने से बचने के लिए
अपना सर्वस्व देकर चावल ख़रीदने के सिवा उनके पास और कोई चारा न
रहेगा। देश के बाशिन्दे मर मिटे। ज़मीन उन्होंने खुद जोती थी और देखा
कि पैदावार दूसरों के हाथों में चली गई। उन्होंने सशंक हृदय से बीज
बोया—काल पड़ा। फिर (चावल के व्यापार पर) अपना ठेका जमाए
रखना (अंगरेज़ों के लिए) और अधिक आसान होगया—महामारी फैली।
बाज़ ज़िलों में जीवित, किन्तु अधमरे लोग अपने बेशुमार मरे हुए रिश्तेदारों
के शरीरों को बिना दफ़नाए छोड़कर चल दिए।”*

  • "Some of the agents saw themselves well situated for collecting the
    rice into stores; they did so. They knew the gentoos (Hindoos) would
    rather die than violate the principles of their religion by eating flesh. The
    alternative would therefore be between giving what they had or dying. The
    inhabitants sunk; they had cultivated the land, and saw the harvest at the
    disposal of others; planted in doubt- scarcity ensued. Then the monopoly
    was easier managed -sickness ensued. In some districts the languid living
    left the bodies of their numerous dead unburied."—Short History of the
    English Transactions in the East Indies, p. 145.

२३६ भारत में अंगरेज़ी राज
अन्न के काल और महामारी में घनिष्ट सम्बन्ध है। इसी समय
बंगाल भर में चेचक की महामारी फैली, जिससे न बच्चा बच
सका और न बूढ़ा, न पुरुष बच सके और न स्त्री, किन्तु अंगरेज़ों ने
न चावल के व्यापार का ठेका अपने हाथों से छोड़ा और न मुँह
माँगी क़ीमतों में कमी की।
कम्पनी के डायरेक्टरों ने १८ दिसम्बर सन् १७७१ के पत्र में
स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि इस अवसर पर कम्पनी के
मुलाज़िमों ने चावल और दूसरे अनाज के व्यापार पर अपना
अनन्य अधिकार जमा रक्खा था, जिसके सबब से देश भर में चारों
ओर अन्न का अभाव दिखाई देता था।
बंगाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सत्ता का इस प्रकार प्रारम्भ
खून के आँसू हुआ। कलकत्ते के विक्टोरिया मेमोरियल में १७वीं
सदी के शुरू का बना हुआ संगमूसा का वह
सुन्दर तख़्त अभी तक रक्खा है, जिस पर मुर्शिदाबाद के सूबेदार
बैठा करते थे। इसी तख़्त पर बैठकर अलीवर्दी ख़ाँ और सिराजुद्दौला
ने बंगाल पर शासन किया। इसी तख़्त पर प्लासी के संग्राम के
बाद क्लाइव ने मीर जाफ़र को बैठाकर तीनों प्रान्तों का सूबा कह कर
सलाम किया। इसी तख़्त पर बैठकर मीर क़ासिम ने बंगाल की
स्वाधीनता की रक्षा के अन्तिम प्रयत्न किए।
विक्टोरिया मेमोरियल के सूची पत्र में पृष्ठ ४० पर लिखा है
कि अभी तक ख़ून के से रंग की लाल बूँदें इस तख़्त के कई हिस्सों

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २३७
से समय समय पर टपकती रहती हैं। वैज्ञानिकों की राय है कि
इन लाल बूँदों के टपकने की वजह पत्थर के अन्दर की कुछ
रासायनिक विशेषता है। किन्तु बंगाल में यह एक आम किम्ब-
दन्ती है कि भारतीय नवाबी के पतन और अंगरेज़ कम्पनी की
सत्ता के प्रारम्भ पर मुर्शिदाबाद का सूना और निर्जीव तख़्त
अभी तक खून के आँसू बहाता रहता है। जो हो, नवाबी के पतन के
साथ साथ बंगाल और वहाँ की प्रजा की इस हृदय विदारक
अवस्था को देखते हुए पूर्वोक्त किम्बदन्ती आश्चर्यजनक प्रतीत
नहीं होती।

सातवाँ अध्याय
वारन हेस्टिंग्स
[१७७२—१७८५]
सन् १७७२ ई० में वारन हेस्टिंग्स कम्पनी की ओर से कलकत्ते
के फ़ोर्ट विलियम क़िले का गवरनर नियुक्त हुआ।
दो अमली का वारन हेस्टिंग्स की शिक्षा बहुत हो कम थी।
अन्त सन् १७५० के क़रीब वह एक मामूली क्लर्क की
हैसियत से हिन्दोस्तान आया और बहुत दिनों तक चालीस रुपए
मासिक पर मुर्शिदाबाद दरबार के अंगरेज़ वकील के पास काम
करता रहा। मुर्शिदाबाद में रह कर वह क्लाइव की देख रेख में भारत-
वासियों के रस्म रिवाज और कूट नीति के दाव पेंच सीखता रहा।
धीरे धीरे वह क्लाइव से बढ़कर चतुर साबित हुआ और न्याय
अन्याय या पाप पुण्य की उससे भी कम परवा करता था।

वारन हेस्टिंग्स २३६
इस समय तक बंगाल के अन्दर कुछ इलाक़ा, बंगाल, बिहार
और उड़ीसा तीनों प्रान्तों की दीवानी, और थोड़े थोड़े इलाक़े
मद्रास और बम्बई की ओर कम्पनी को मिल चुके थे । मुर्शिदाबाद
का मसनद-नशीन नवाब केवल एक अधिकार शून्य खिलौना था,
और तीनों प्रान्तों का सारा शासन पटने में महाराजा शिताबराय,
मुर्शिदाबाद में मोहम्मद रज़ा ख़ाँ और उड़ीसा में जसारत ख़ाँ इन
तीन नायबों के हाथों में था, जो हर तरह अंगरेज़ों के हाथों की
कठपुतली थे ।
निस्सन्देह इन दोनों नायबों ने कम्पनी के ऊपर बेशुमार उपकार
किए । अंगरेज़ों और शुजाउद्दौला के युद्ध के समय शिताबराय ने
क़दम क़दम पर अंगरेज़ों का साथ दिया था और उसी से अंगरेज़ों
का अधिकांश काम निकला ।
'सीअरुल-मुताख़रीन' में लिखा है कि आए दिन कम्पनी के
कर्मचारी एक न एक अंगरेज़ को शिताबराय के पास भेजते रहते थे
और बिना किसी वजह यह लिख भेजते थे कि इसे इतनी रक़म दे
दी जावे । शिताबराय ने इन अंगरेज़ों को देने के लिए रुपए वसूल
करने के अनेक उपाय निकाल रक्खे थे, जिनमें से एक उपाय यह था
कि ऐसे मौक़ों पर वह अपने ख़ास ख़ास जागीरदारों, माफ़ीदारों
इत्यादि को उनके पट्टों और सनदों सहित बुलवा भेजता था; फिर
इस बहाने से कि अमुक अंगरेज़ आपके काग़ज़ देखना चाहता है,
उनसे काग़ज़ लेकर अपने किसी कर्मचारी को दे देता था और जब
तक एक ख़ास रक़म उनसे वसूल न कर लेता था, काग़ज़ वापस न

२४० भारत में अंगरेज़ी राज
देता। अन्त में ये रक़में जमा करके उस अंगरेज़ को दे दी जाती
थीं। *
वारन हेस्टिंग्स के समय में हिन्दोस्तान के अन्दर कम्पनी का
इलाक़ा नहीं बढ़ा। फिर भी वारन हेस्टिंग्स का शासन काल ब्रिटिश
भारत के इतिहास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। क्लाइव ने
इस देश के अन्दर अंगरेज़ी शासन की जो बुनियाद डाली थी,
वारन हेस्टिंग्स ने भारत की राज शक्तियों को और अधिक कमज़ोर
करके उस बुनियाद को पक्का कर दिया।
मालूम होता है कि इस समय तक अंगरेज़ भारतीय शासन का
सब कारबार सीख चुके थे। वारन हेस्टिंग्स ने सब से पहला काम
यह किया कि क्लाइव की क़ायम की हुई दो अमली का अन्त करने
के लिए उसने मोहम्मद रज़ा ख़ाँ और शिताबराय दोनों नायबों पर
ग़बन और ख़यानत के इलज़ाम लगाकर उन्हें क़ैद कर लिया।
मोहम्मद रज़ा ख़ाँ को फँसाने के लिए वारन हेस्टिंग्स ने राजा नन्द-
कुमार को अपनी ओर फोड़ा। नन्दकुमार को यह लालच दिया
गया कि रज़ा ख़ाँ की जगह तुम्हें बंगाल का नायब बना दिया
जावेगा। इस लालच में आकर नन्दकुमार ने मोहम्मद रज़ा ख़ाँ
को दोषी साबित करने में अंगरेज़ों को काफ़ी मदद दी। "सीअरुल-
मुताख़रीन" में लिखा है कि महाराजा शिताबराय को भी धोखा
देकर गिरफ़्तार किया गया।
कलकत्ते लाकर इन दोनों हिन्दोस्तानी शासकों के मुक़दमों की


  • Seir, vol. iii, pp. 65, 66, Calcutta Reprint.

सुनाई हुई । राजा नन्दकुमार ने अपने बयान में लिखा है कि इन
दोनों से कई कई लाख रुपए रिश्वत लेकर अन्त में वारन हेस्टिंग्स
ने दोनों को निर्दोष कह कर छोड़ दिया, किन्तु उन दोनों का काफ़ी
अपमान किया जा चुका था। उनके अधिकार छीन कर कम्पनी
को दे दिए गए । मुर्शिदाबाद के नवाब के सालाना ख़र्च की रक़म
को वारन हेस्टिंग्स ने और अधिक कम कर दिया और दीवानी तथा
फ़ौजदारी दोनों की सदर अदालतों को मुर्शिदाबाद से कलकत्ते हटा
लिया। इस प्रकार दो-अमली का भी अब अन्त हो चला और तीनों
प्रान्तों के ऊपर कम्पनी की राज्य-सत्ता और साफ़ साफ़ चमकने
लगी । मुक़दमा समाप्त होने के बाद नन्दकुमार को मालूम हुआ
कि मुझे बंगाल की नायबी का झूठा लालच केवल काम निकालने
के लिए ही दिया गया था ।
अभी तक क्लाइव के समय की सन्धि के अनुसार कम्पनी
सम्राट् शाहआलम को २६ लाख रुपए वार्षिक ख़िराज भेजती थी ।
सन् १७७१ में सम्राट् शाहआलम इलाहाबाद से दिल्ली चला गया ।
वारन हेस्टिंग्स ने गवरनर नियुक्त होते ही सम्राट् को ख़िराज भेजना
बन्द कर दिया । इलाहाबाद और कड़ा का इलाक़ा क्लाइव ने शुजा-
उद्दौला से सम्राट् के लिए कह कर लिया था । अब हेस्टिंग्स ने यह
इलाक़ा पचास लाख रुपए के बदले में फिर शुजाउद्दौला के हाथ
बेच दिया । किन्तु इलाहाबाद के क़िले में सेना बराबर कम्पनी ही
की रहती रही ।
वारन हेस्टिंग्स के इन समस्त कार्यों को "सुधार" का नाम
१६

२४२ भारत में अंगरेज़ी राज
दिया जाता है। इनका उद्देश था बंगाल के राज शासन से धीरे
धीरे भारतीय अंश को मिटा देना।
कम्पनी के डायरेक्टर अब वारन हेस्टिंग्स पर बार बार ज़ोर दे
[निरपराध रुहेलों] रहे थे कि जिस तरह हो सके अधिक से अधिक
[का संहार] धन भारत से वसूल करके इंगलिस्तान भेजा जावे।
वारन हेस्टिंग्स ने भी, लार्ड मैकॉले के शब्दों में
—"चाहे ईमानदारी से हो और चाहे बेईमानी से, जिस तरह हो
सके, धन बटोरने का निश्चय कर लिया।"* देश की स्थिति का
उसे पूरा ज्ञान था और सूझ की भी उसमें कमी न थी।
सब से पहले वारन हेस्टिंग्स की नज़र रुहेलखण्ड की ओर
गई। अवध की उत्तर-पश्चिम सरहद पर रुहेले पठानों का स्वतन्त्र
राज था। इतिहास लेखक मिल लिखता है :—
"एशिया भर में जिन देशों का शासन सबसे अच्छा था, उनमें से एक
रुहेलखण्ड का इलाक़ा था। वहाँ की प्रजा सुरक्षित थी, उनके उद्योग धन्धों
को राज की ओर से सहायता दी जाती थी और देश में बराबर खुशहाली
बढ़ती जाती थी। इन उपायों द्वारा और अपने पड़ोसियों का देश विजय
करने के स्थान पर यत्नपूर्वक सबके साथ मेल जोल बनाए रख कर उन
लोगों ने अपनी स्वाधीनता को क़ायम रक्खा था।"†

  • "The object of Mr. Hastings' diplomacy was at this time simply to
    get money . . . by some means, fair or foul."—Critical and Historical
    Essays
    by Lord Macaulay, vol. iii, p. 244.
    † "Their territory was one of the best governed in Asia; the people
    were protected, their industry encouraged, and the country flourished steadily.

वारन हेस्टिंग्स २४३
अवध के नवाब के साथ रुहेलों की सन्धि हो चुकी थी, जिसका
ये लोग सदा ईमानदारी के साथ पालन करते थे। अंगरेज़ों के
साथ रुहेलों का कोई किसी तरह का झगड़ा न था और न "झगड़े
का कोई छोटे से छोटा बहाना ही अंगरेज़ों को मिल सकता था।"*
फिर भी वारन हेस्टिंग्स ने सन् १७७३ ई० में रुहेलों के विरुद्ध
नवाब शुजाउद्दौला के साथ एक गुप्त सन्धि कर डाली। इस सन्धि
में यह तय हो गया कि कोई मुनासिब बहाना मिलते ही कम्पनी
और नवाब की सेनाएँ मिलकर रुहेलखंड पर चढ़ाई करेंगी। रुहेला
जाति को "निर्मूल" † कर उनका देश शुजाउद्दौला के हवाले कर
दिया जावेगा। और इस उपकार के बदले में शुजाउद्दौला चालीस
लाख रुपए नक़द और युद्ध का सारा ख़र्च कम्पनी को अदा करेगा।
मिल के इतिहास से मालूम होता है कि शुजाउद्दौला ने अपनी इच्छा
के विरुद्ध विवश होकर इस सन्धि को स्वीकार किया। इतिहास
लेखक टॉरेन्स लिखता है कि—"१७ अप्रैल सन् १७७४ को इस
ज़बरदस्त अन्याय में एक दूसरे को मदद देने वाली दोनों सेनाओं
ने रुहेलखंड में प्रवेश किया। रुहेले वीर थे, किन्तु उनकी संख्या
बहुत कम थी। उन्होंने रहम की प्रार्थना की, किन्तु व्यर्थ।" मजबूर
होकर उन्होंने वीरता के साथ मुक़ाबला किया, किन्तु क्या हो
By these cares, and by cultivating diligently the arts of neutrality, and not
by conquering from their neigbours, they provided for their independence."—
Mill's History of India, Book v. Chap. i.

  • "We had not the slightest pretence of quarrel with the Rohillas." -
    Torrens' Empire in Asia, p. 111.
    † "The Rohillas should be exterminated." — Warren Hastings' letters.

२४४ भारत में अंगरेज़ी राज
सकता था। अन्त में २३ अप्रैल को रामपुर की मशहूर लड़ाई में
उनकी क़िस्मत का फ़ैसला हो गया। उनका नेता नवाब फ़ैजुल्ला
ख़ाँ पहाड़ों की ओर भाग गया। "एक एक आदमी जो रुहेला
कहलाता था या तो अपना देश छोड़कर भाग गया या चुन चुन
कर मार डाला गया।"* सारा हरा भरा देश लूट खसोट कर
उजाड़ कर दिया गया। रुहेलखंड की लूट से चालीस लाख रुपए
नक़द कम्पनी को मिले और दो लाख नक़द वारन हेस्टिंग्स की
जेब में गए।
रामपुर और उसके आस पास का थोड़ा सा इलाक़ा बतौर
जागीर नवाब फ़ैजुल्ला ख़ाँ को वापस दे दिया गया। रुहेलखंड का
बाक़ी इलाक़ा शुजाउद्दौला को मिल गया। किन्तु वीर रुहेला जाति
और उसकी स्वाधीनता का सदा के लिए अन्त हो गया।
इससे पहले वारन हेस्टिंग्स केवल फ़ोर्ट विलियम क़िले और
बंगाल के इलाक़ों का गवर्नर कहलाता था।
वारन हेस्टिंग्स को मद्रास और बम्बई, दोनों प्रान्तों के अंगरेज़ी
इनाम इलाक़ों का प्रबन्ध दो अलग गवर्नरों के सुपुर्द
था, जिनकी दो अलग अलग कौन्सिलें थीं। रुहेला युद्ध के अगले
साल मद्रास और बम्बई के गवर्नर और उनकी कौन्सिलें बंगाल
* "On the 17th April the allies in iniquity entered Rohilkhund. In
vain the brave but out-numbered people sued for mercy . . . Seldom,
if ever, have what are calculated the rights of victory been more inhumanly
abused. Every man who bore the name of Rohilla was either put to death
or forced to seek safety in exile."—Torrens' Empire in Asia, p. 110.

वारन हेस्टिंग्स २४५
के गवरनर के अधीन कर दी गई और वारन हेस्टिंग्स कम्पनी के
समूचे भारतीय राज का पहला 'गवरनर-जनरल' नियुक्त हुआ ।
ऊपर लिखा जा चुका है कि मोहम्मद रज़ा ख़ाँ के विरुद्ध काम
[हाशिया: वारन हेस्टिंग्स पर इलज़ाम] निकालने के लिए वारन हेस्टिंग्स ने महाराजा
नन्दकुमार से बंगाल की नायबी का झूठा वादा
कर दिया था। किन्तु नन्दकुमार भी एक अर्से
से अंगरेज़ों की आँखों में खटक रहा था। उस झगड़े के बाद
नन्दकुमार ने एक लम्बी अर्ज़ी लिखकर कलकत्ते की कौन्सिल के
सामने पेश की, जिसमें उसने वारन हेस्टिंग्स पर बंगाल के रईसों
और ज़मींदारों से रिश्वतें लेने, ज़बरदस्ती धन वसूल करने, यहाँ
तक कि मुर्शिदाबाद के नवाब की माँ मुन्नी बेगम से रक़में वसूल
करने, लोगों को धोखा देने इत्यादि के अनेक इलज़ाम लगाए।
नन्दकुमार की अर्ज़ी में ठीक ठीक रक़में और पूरे नाम और पते
मौजूद थे। उसने शहादतें पेश करके अपने तमाम दावों को सच्चा
साबित कर दिया।
कौन्सिल के मेम्बरों ने नन्दकुमार के इलज़ामों को सच्चा
[हाशिया: महाराजा नन्दकुमार को फाँसी] स्वीकार किया।* किन्तु हेस्टिंग्स को कोई दंड
न मिल सका। उसने इस बात से ही इनकार
किया कि कौन्सिल को गवरनर के विरुद्ध
शिकायत सुनने का अधिकार है। हेस्टिंग्स ने नन्दकुमार के इलज़ामों
का जवाब देने के बजाय उलटा नन्दकुमार पर अब यह जुर्म लगाया

  • Minute of Council, 11th April, 1775.

२४६ भारत में अंग्रेज़ी राज
कि पाँच साल पहले यानी सन् १७७० ई० में नन्दकुमार ने किसी
काग़ज़ पर जाली दस्तख़त किए थे। सन् १७७३ ई० में कम्पनी की
ओर से कलकत्ते में एक नई अदालत 'सुप्रीम कोर्ट' के नाम से
क़ायम हुई थी। वारन हेस्टिंग्स का एक लड़कपन का दोस्त सर
एलाइजाह इम्पे उसका चीफ़ जस्टिस था। सर एलाइजाह इम्पे के
सामने महाराजा नन्दकुमार पर जालसाज़ी का मुक़दमा चलाया
गया। मिल की पुस्तक और उस समय के अन्य इतिहासों से
साफ़ ज़ाहिर है कि नन्दकुमार पर जालसाज़ी का इलज़ाम बिलकुल
झूठा था। फिर भी कई झूठे गवाह खड़े कर दिए गए। दूसरे पक्ष
की सफ़ाई के सबूत की ख़ाक परवा नहीं की गई। भारत में उस
समय देशी या अंग्रेज़ी कोई क़ानून भी इस तरह का न था जिससे
जालसाज़ी के जुर्म में मौत की सज़ा दी जा सके। किन्तु हेस्टिंग्स
के दोस्त सर एलाइजाह इम्पे ने फ़ौरन महाराजा नन्दकुमार को
मुजरिम क़रार देकर हज़ारों भारतवासियों की आँखों के सामने
५ अगस्त सन् १७७६ को कलकत्ते में फाँसी पर चढ़वा दिया।
मिल लिखता है कि महाराजा नन्दकुमार ने अपूर्व शान्ति और धैर्य
के साथ मौत का सामना किया और अपने हज़ारों देशवासियों
को फाँसी के चारों ओर ज़ार ज़ार रोता और चीख़ता छोड़कर
इस दुनिया से कूच किया।
जालसाज़ी ही के ऊपर क्लाइव ने भारत के अन्दर ब्रिटिश राज
की नींव रक्खी। और खुले शब्दों में उसने अपनी इस जालसाज़ी
को स्वीकार किया। किन्तु उस जालसाज़ी के इनाम में क्लाइव को

वारन हेस्टिंग्स २४७
“लॉर्ड” की उपाधि दी गई। उसी क्लाइव के उत्तराधिकारी के समय
में एक स्वतन्त्र भारतीय शासक को जालसाज़ी के झूठे इलज़ाम में
फाँसी पर लटका दिया गया !
वारन हेस्टिंग्स ३ साल गवरनर और १० साल गवरनर जनरल
रहा। उसका सारा शासन काल भारतीय प्रजा और भारतीय
नरेशों के साथ घोरतम अन्यायों से भरा हुआ था। मराठों और
हैदरअली के साथ उसकी लड़ाइयों का ज़िक्र दूसरे अध्यायों में
किया जायगा। बंगाल और उत्तरीय भारत के उसके समस्त
अत्याचारों को बयान कर सकना भी इस पुस्तक में असम्भव है।
इसलिए उसके उत्तरीय भारत के केवल दो और ज्वलन्त कृत्यों को
यहाँ पर संक्षेप में बयान किया जाता है।
इनमें पहली घटना बनारस की है। बनारस की समृद्ध रियासत
बनारस की समृद्ध उस समय अवध के नवाब के अधीन थी, किन्तु
रियासत अवध के नवाब बनारस के महाराजा से अपना
मामूली वार्षिक ख़िराज वसूल कर लेने के अलावा
और किसी तरह का हस्तक्षेप उस रियासत के आंतरिक शासन में
न करते थे।
इतिहास लेखक टॉरेन्स लिखता है—“बनारस का महाराजा
बलवन्तसिंह बड़ा अच्छा शासक था। × × × उसकी प्रजा सुखी
थी और देश ख़ुशहाल था। × × × किसानों को न बेजा माँग का
डर रहता था और न किसी तरह की ज़बरदस्ती का। वे अपने
खेतों को बाग़ों की तरह जोतते थे और अपने अथक परिश्रम की

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पैदावार पर फूलते फलते थे। उनकी संख्या पाँच लाख से ऊपर
अनुमान की जाती थी।"*
किन्तु महाराजा बनारस आस पास के राजाओं में सब से
अधिक धनवान मशहूर था।
सन् १७७६ में अवध के नवाब ने बनारस का इलाक़ा कम्पनी
के नाम कर दिया। कम्पनी ने अपनी ओर से एक नई सनद जारी
करके बलवन्तसिंह के पुत्र चेतसिंह को पिता के तमाम अधिकार दे
दिए। एक अंग्रेज़ रेज़ीडेन्ट बनारस के दरबार में रहने लगा
और महाराजा चेतसिंह की शुमार अंग्रेज़ कम्पनी के मित्रों में
होने लगी।
अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों में लड़ाई छिड़ी। वारन हेस्टिंग्स ने
[हाशिया: वारन हेस्टिंग्स की] महाराजा चेतसिंह को पाँच लाख रुपए सालाना
[हाशिया: महाराजा बनारस] खर्च पर अपने यहाँ तीन पलटनें रखने का हुकुम
[हाशिया: से छेड़ छाड़] दिया। चेतसिंह की प्रजा उससे सन्तुष्ट थी।
उसे इस सेना की कोई ज़रूरत न थी। पाँच
लाख सालाना का ख़र्च भी उसके लिए बहुत अधिक था। उसने
एतराज़ किया, किन्तु कोई सुनाई न हुई। अन्त में उसे वारन
हेस्टिंग्स की आज्ञा माननी पड़ी। तारीफ़ यह कि इन पलटनों के

  • "Bulwant Singh was an excellent ruler; . . . his people were
    happy, and the country prosperous, . . . the peasantry fearless of unjust
    exaction or personal wrong, cultivated their fields like gardens, and throve
    on the fruits of their unwearied industry. Their numbers were estimated at
    more than half a million, . . ."—Torrens' Empire in Asia, p. 124.

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