भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ भारत में अंग्रेज़ी राज
पैदावार पर फूलते फलते थे। उनकी संख्या पाँच लाख से ऊपर
अनुमान की जाती थी।"*
किन्तु महाराजा बनारस आस पास के राजाओं में सब से
अधिक धनवान मशहूर था।
सन् १७७६ में अवध के नवाब ने बनारस का इलाक़ा कम्पनी
के नाम कर दिया। कम्पनी ने अपनी ओर से एक नई सनद जारी
करके बलवन्तसिंह के पुत्र चेतसिंह को पिता के तमाम अधिकार दे
दिए। एक अंग्रेज़ रेज़ीडेन्ट बनारस के दरबार में रहने लगा
और महाराजा चेतसिंह की शुमार अंग्रेज़ कम्पनी के मित्रों में
होने लगी।
अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों में लड़ाई छिड़ी। वारन हेस्टिंग्स ने
[हाशिया: वारन हेस्टिंग्स की] महाराजा चेतसिंह को पाँच लाख रुपए सालाना
[हाशिया: महाराजा बनारस] खर्च पर अपने यहाँ तीन पलटनें रखने का हुकुम
[हाशिया: से छेड़ छाड़] दिया। चेतसिंह की प्रजा उससे सन्तुष्ट थी।
उसे इस सेना की कोई ज़रूरत न थी। पाँच
लाख सालाना का ख़र्च भी उसके लिए बहुत अधिक था। उसने
एतराज़ किया, किन्तु कोई सुनाई न हुई। अन्त में उसे वारन
हेस्टिंग्स की आज्ञा माननी पड़ी। तारीफ़ यह कि इन पलटनों के
- "Bulwant Singh was an excellent ruler; . . . his people were
happy, and the country prosperous, . . . the peasantry fearless of unjust
exaction or personal wrong, cultivated their fields like gardens, and throve
on the fruits of their unwearied industry. Their numbers were estimated at
more than half a million, . . ."—Torrens' Empire in Asia, p. 124.