भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 501, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुनाई हुई । राजा नन्दकुमार ने अपने बयान में लिखा है कि इन
दोनों से कई कई लाख रुपए रिश्वत लेकर अन्त में वारन हेस्टिंग्स
ने दोनों को निर्दोष कह कर छोड़ दिया, किन्तु उन दोनों का काफ़ी
अपमान किया जा चुका था। उनके अधिकार छीन कर कम्पनी
को दे दिए गए । मुर्शिदाबाद के नवाब के सालाना ख़र्च की रक़म
को वारन हेस्टिंग्स ने और अधिक कम कर दिया और दीवानी तथा
फ़ौजदारी दोनों की सदर अदालतों को मुर्शिदाबाद से कलकत्ते हटा
लिया। इस प्रकार दो-अमली का भी अब अन्त हो चला और तीनों
प्रान्तों के ऊपर कम्पनी की राज्य-सत्ता और साफ़ साफ़ चमकने
लगी । मुक़दमा समाप्त होने के बाद नन्दकुमार को मालूम हुआ
कि मुझे बंगाल की नायबी का झूठा लालच केवल काम निकालने
के लिए ही दिया गया था ।
अभी तक क्लाइव के समय की सन्धि के अनुसार कम्पनी
सम्राट् शाहआलम को २६ लाख रुपए वार्षिक ख़िराज भेजती थी ।
सन् १७७१ में सम्राट् शाहआलम इलाहाबाद से दिल्ली चला गया ।
वारन हेस्टिंग्स ने गवरनर नियुक्त होते ही सम्राट् को ख़िराज भेजना
बन्द कर दिया । इलाहाबाद और कड़ा का इलाक़ा क्लाइव ने शुजा-
उद्दौला से सम्राट् के लिए कह कर लिया था । अब हेस्टिंग्स ने यह
इलाक़ा पचास लाख रुपए के बदले में फिर शुजाउद्दौला के हाथ
बेच दिया । किन्तु इलाहाबाद के क़िले में सेना बराबर कम्पनी ही
की रहती रही ।
वारन हेस्टिंग्स के इन समस्त कार्यों को "सुधार" का नाम
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