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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 495

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २३५
दुर्भाग्य से इसी मौक़े पर बंगाल में सूखा पड़ा। फिर भी यदि
कम्पनी के आदमियों की अनीति जारी न होती तो इस सूखे के
होते हुए भी बंगाल में दुष्काल न पड़ सकता।
कम्पनी के सरकारी काग़ज़ों में लिखा है कि इस सूखे के
दिनों में—
“कुछ एजण्टों ने चावलों की कोठियाँ भर लेने का अच्छा मौक़ा देखा।
उन्होंने अपनी कोठियाँ भर लीं, वे जानते थे कि हिन्दू मर जायेंगे, लेकिन
मांस खाकर अपने धर्म से भ्रष्ट न होंगे। इस लिए मरने से बचने के लिए
अपना सर्वस्व देकर चावल ख़रीदने के सिवा उनके पास और कोई चारा न
रहेगा। देश के बाशिन्दे मर मिटे। ज़मीन उन्होंने खुद जोती थी और देखा
कि पैदावार दूसरों के हाथों में चली गई। उन्होंने सशंक हृदय से बीज
बोया—काल पड़ा। फिर (चावल के व्यापार पर) अपना ठेका जमाए
रखना (अंगरेज़ों के लिए) और अधिक आसान होगया—महामारी फैली।
बाज़ ज़िलों में जीवित, किन्तु अधमरे लोग अपने बेशुमार मरे हुए रिश्तेदारों
के शरीरों को बिना दफ़नाए छोड़कर चल दिए।”*

  • "Some of the agents saw themselves well situated for collecting the
    rice into stores; they did so. They knew the gentoos (Hindoos) would
    rather die than violate the principles of their religion by eating flesh. The
    alternative would therefore be between giving what they had or dying. The
    inhabitants sunk; they had cultivated the land, and saw the harvest at the
    disposal of others; planted in doubt- scarcity ensued. Then the monopoly
    was easier managed -sickness ensued. In some districts the languid living
    left the bodies of their numerous dead unburied."—Short History of the
    English Transactions in the East Indies, p. 145.