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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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वारन हेस्टिंग्स २३६
इस समय तक बंगाल के अन्दर कुछ इलाक़ा, बंगाल, बिहार
और उड़ीसा तीनों प्रान्तों की दीवानी, और थोड़े थोड़े इलाक़े
मद्रास और बम्बई की ओर कम्पनी को मिल चुके थे । मुर्शिदाबाद
का मसनद-नशीन नवाब केवल एक अधिकार शून्य खिलौना था,
और तीनों प्रान्तों का सारा शासन पटने में महाराजा शिताबराय,
मुर्शिदाबाद में मोहम्मद रज़ा ख़ाँ और उड़ीसा में जसारत ख़ाँ इन
तीन नायबों के हाथों में था, जो हर तरह अंगरेज़ों के हाथों की
कठपुतली थे ।
निस्सन्देह इन दोनों नायबों ने कम्पनी के ऊपर बेशुमार उपकार
किए । अंगरेज़ों और शुजाउद्दौला के युद्ध के समय शिताबराय ने
क़दम क़दम पर अंगरेज़ों का साथ दिया था और उसी से अंगरेज़ों
का अधिकांश काम निकला ।
'सीअरुल-मुताख़रीन' में लिखा है कि आए दिन कम्पनी के
कर्मचारी एक न एक अंगरेज़ को शिताबराय के पास भेजते रहते थे
और बिना किसी वजह यह लिख भेजते थे कि इसे इतनी रक़म दे
दी जावे । शिताबराय ने इन अंगरेज़ों को देने के लिए रुपए वसूल
करने के अनेक उपाय निकाल रक्खे थे, जिनमें से एक उपाय यह था
कि ऐसे मौक़ों पर वह अपने ख़ास ख़ास जागीरदारों, माफ़ीदारों
इत्यादि को उनके पट्टों और सनदों सहित बुलवा भेजता था; फिर
इस बहाने से कि अमुक अंगरेज़ आपके काग़ज़ देखना चाहता है,
उनसे काग़ज़ लेकर अपने किसी कर्मचारी को दे देता था और जब
तक एक ख़ास रक़म उनसे वसूल न कर लेता था, काग़ज़ वापस न