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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

२०४ भारत में अंग्रेज़ी राज
और जिसे चाहा बैठा दिया । आप लोगों ने दरबार के आदमियों को अपने
यहाँ क़ैद कर लिया और शहनशाह की हुकूमत को तौहीन और उसकी
बेइज़्ज़ती की, आपने देश के व्यापारियों की तिजारत को बरबाद कर दिया,
बादशाह के बाग़ियों को अपने यहाँ पनाह दी, दरबार की आमदनी को
नुक़सान पहुँचाया और अपने ज़ुल्म से मुल्क के बाशिन्दों को पामाल किया ।
आप लोग अभी तक कलकत्ते से नई नई फ़ौजें भेज कर शाही इलाक़ों पर
लगातार हमले करते रहते हैं, यहाँ तक कि इलाहाबाद के सूबे के कई गांव
और परगनों को भी आप लोगों ने लूट लिया है; इन सब नाजायज़ हरकतों
की क्या वजह समझी जा सकती है, सिवाय इसके कि आपको दरबार की
क़तई परवा नहीं और आप खुद मुल्क पर क़ब्ज़ा करने की बेजा कोशिशों में
लगे हुए हैं ?
"अगर आपने यह सब अपने बादशाह के हुकुम या कम्पनी की हिदायत
से किया है, तो मेहरबानी करके मुझे पूरा पूरा हाल बताइए, ताकि मैं उसका
मुनासिब इलाज कर सकूँ, लेकिन अगर इन शरारतों की वजह आपकी
अपनी ही बेजा ख़्वाहिशें हैं, तो आइन्दा ऐसी हरकतों से बाज़ रहिए; हुकूमत
के कामों में दख़ल न दीजिए, हर जगह से अपने आदमियों को हटा कर उन्हें
अपने मुल्क को वापस भेज दीजिए, पहले की तरह कम्पनी की तिजारत जारी
रखिए और महज़ तिजारती कारबार तक ही अपने तईं महदूद रखिए ।
अगर आप इस तरह रहना चाहें तो शाही दरबार हमेशा से ज़्यादा आपकी
तिजारत में मदद देगा और आपके साथ रिआयतें करेगा । किसी ऊँचे दरजे
के ओहदेदार को बतौर अपने वकील के यहाँ भेज दीजिए, जो तमाम हालात
की मुझे ठीक ठीक इत्तला दे, ताकि मैं उसके मुताबिक़ अमल कर सकूँ ।

नवाब वज़ीर शुजाउद्दौला
[ श्री वासुदेव राव सूबेदार, सागर, की कृपा द्वारा, एक प्राचीन चित्र से ]

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अगर ( खुदा न करे ) आप सरकशी और नाफ़रमानी करते रहे तो इन्साफ़
की तलवार बग़ावत करने वालों के सरों को खा जायगी और आप शाहन-
शाह की ख़फ़गी के भार को महसूस करेंगे, जो खुदा के क़हर का एक नमूना
है; फिर बाद में आपके अपनी ग़लती मानने या दरख़्वास्तें देने से भी काम
न चलेगा, क्योंकि शुरू ज़माने से बादशाह आपकी कम्पनी के साथ काफ़ी
रिआयतें करते रहे हैं। इसलिए मैंने आपको लिख दिया है, आप जैसा
मुनासिब समझिए वैसा कीजिए और मुझे जल्दी जवाब दीजिए।”
निस्सन्देह मुग़ल साम्राज्य के वज़ीर की हैसियत से शुजाउद्दौला
का पत्र उचित, उदार और न्यायानुकूल था। किन्तु इस पत्र से
यह भी ज़ाहिर है कि उस समय के भारतीय शासकों को पाश्चात्य
कूटनीति का पूरा पता न था।
इस पत्र को पाते ही और यह सुनते ही कि सम्राट और शुजा-
उद्दौला को साथ लेकर मीर क़ासिम बिहार लौटने वाला है, अंगरेज़
डर गए। ‘सीअरुल मुताख़रीन' में लिखा है :—
“शुजाउद्दौला के बल की ख्याति और उसकी सेना की अधिकता और
वीरता का हाल सुनकर वे डर गए और उन्होंने अपने आपको मैदान में
शुजाउद्दौला का मुक़ाबला कर सकने के नाक़ाबिल समझा।”
मीर क़ासिम के प्रान्त छोड़ने के समय अंगरेज़ों ने अज़ीमाबाद
( पटना ) से आगे बढ़कर सोन नदी को पार कर बक्सर में अपनी
छावनी डाल ली थी। अब फिर फुर्ती के साथ बक्सर की छावनी
को छोड़ कर सोन पार कर वे अज़ीमाबाद की चहारदीवारी के
अन्दर आ गए।

[Page Header]
२०६ भारत में अंगरेज़ी राज


जब इस पत्र का कोई सन्तोषजनक उत्तर न मिला तो शुजाउद्दौला
ने सम्राट् और मीर क़ासिम के साथ आकर अपनी फ़ौज से पटने
को घेर लिया।
बंगाल के अंगरेज़ इस समय ज़बरदस्त संकट में थे, किन्तु
[हाशिया: सम्राट् को शुजा-] उनकी पुरानी कूटनीति ने इस अवसर पर भी
[हाशिया: उद्दौला से फोड़ने] उनका पूरा साथ दिया। सबसे पहले उन्होंने
[हाशिया: की कोशिश] सम्राट् और शुजाउद्दौला को एक दूसरे से फोड़ने
की कोशिश की। "सीअरुल मुताख़रीन" का
विद्वान लेखक सय्यद गुलामहुसेन, जो अपने पिता के साथ इस
अवसर पर सम्राट् की सेना में मौजूद था, अपनी पुस्तक में स्वीकार
करता है कि लोभवश वह खुद इस समय अंगरेज़ों से मिल गया।
उसी की मारफ़त अंगरेज़ों ने शाहआलम को विश्वास दिलाया कि
हम आपके सच्चे "वफ़ादार और ख़ैरख़ाह" हैं। उन्होंने सम्राट् से
यह वादा किया कि हम शुजाउद्दौला को ज़ेर करके उसका सारा
सूबा आपके हाथों में दे देंगे। सम्राट् शाहआलम को इस समय
दिल्ली में अपने विपत्तियों के विरुद्ध चारों ओर से मदद की ज़रूरत
थी और उसकी इस कमज़ोरी तथा अदूरदर्शिता से अंगरेज़ों को
अपनी कूटनीति के लिए काफ़ी मदद मिली। भारत सम्राट् का इस
समय का भोलापन भी दर्दनाक और हैरतअंगेज़ था। अंगरेज़ों
ने अपनी चालों द्वारा सम्राट् को अपने पक्ष में तो नहीं कर लिया
किन्तु संग्राम से उदासीन अवश्य कर दिया।
एक दूसरा विश्वासघातक महाराजा शिताबराय का बेटा महा-

फिर मीर जाफ़र २०७
राजा कल्यानसिंह शुजाउद्दौला की सेना में एक ऊँचा ओहदेदार था
[हाशिया: शुजाउद्दौला की सेना में विश्वास-घातक] और अपने यहाँ की सेना की संख्या, सामान,
इरादों इत्यादि की पूरी सूचना अंगरेज़ कम्पनी
के अफ़सरों को देता रहता था। उसने अपने
एक लेख में स्वीकार किया है :—
“महाराजा शिताबराय उस समय अज़ीमाबाद में थे, उनका एक मुन्शी
राय साधोराम फुलवाड़ी में मुझसे मिलने के लिए आया x x x मैंने उससे
यह कहा कि अंगरेज़ अफ़सरों को और मीर मोहम्मद जाफ़र ख़ाँ को विश्वास
दिला दो कि मैं उनके साथ हूँ और इस बात के इन्तज़ार में बैठा हूँ कि
मौक़ा मिले और मैं लड़ाई का सारा रुख़ उनके पक्ष में मोड़ दूँ। राय साधो
राम ने मेरा सन्देश पहुंचा दिया और वापस आकर मुझे इत्तला दी कि
आपके सहानुभूति और आशा से भरे संदेश को पाकर अंगरेज़ और नवाब
दोनों खुश हुए और उन्हें आप पर पूरा भरोसा है।”*
एक तीसरे देशघातक और विश्वास घातक ज़ैनुल आबदीन का
एक पत्र अंगरेज़ सेनापति मेजर मनरो के नाम २२ सितम्बर सन्
१७६४ को कलकत्ते पहुँचा। इस पत्र में लिखा है :—
“असद ख़ाँ बहादुर की मारफ़त आपका मित्रता सूचक पत्र मेरे पास
पहुँचा, जिससे मेरी इज़्ज़त बढ़ी। उस पत्र में आपने इच्छा प्रकट की है कि
जितने अधिक मज़बूत और हथियारबन्द मुग़ल, तूरानी और अन्य सवारों
को हो सके, साथ लेकर मैं आपसे आ मिलूँ।
“जनाबमन, हर आदमी के लिए और ख़ासकर ख़ानदानी लोगों के

  • J. B. & O. R. S. vi, pp. 148, 149.

२०८ भारत में अंग्रेज़ी राज
लिए अपनी वक़्त की मुलाज़मत को छोड़कर अपने मालिक के दुश्मनों से जा
मिलना बड़ी ज़िल्लत की बात है, फिर भी कुछ हालात ऐसे हैं जिनसे हम
लोगों के लिए ऐसा करना जायज़ है × × ×"*
निस्सन्देह भारतीय नरेशों में परस्पर ईर्ष्या इस समय हद को
पहुँची हुई थी।
इस दरमियान बरसात शुरू हो गई और मौसम ख़राब होने
की वजह से या इन सब बातों से विवश होकर शुजाउद्दौला पटने
का मोहासरा छोड़कर बक्सर लौट आया। बक्सर ही में उसने
बरसात गुज़ारने का निश्चय किया।
उधर मीर जाफ़र ने मसनद पर दोबारा बैठते ही महाराजा
[हाशिया: दीवान नन्दकुमार] नन्दकुमार को अपना दीवान नियुक्त किया।
[हाशिया: के साथ ज़बरदस्ती] नन्दकुमार सच्चा और वफ़ादार साबित हुआ।
अंग्रेज़ों की चालों को वह ख़ासा समझ गया
था। नन्दकुमार की सलाह से मीर जाफ़र ने अब यह कोशिश की
कि मैं सम्राट शाहआलम और वज़ीर शुजाउद्दौला को खुश करके
अपनी सूबेदारी के लिए बाज़ाब्ता शाही फ़रमान हासिल करलूं।
निस्सन्देह मीर जाफ़र की यह इच्छा हर तरह उचित और नियमा-
नुकूल थी। किन्तु सम्राट और मीर जाफ़र का मेल अंग्रेज़ों के
लिए हितकर न हो सकता था। इसलिए ख़बर पाते ही अंग्रेज़ों ने
फ़ौरन निर्दोष नन्दकुमार को ज़बरदस्ती दीवानी से अलग कर

  • Long's Selections, pp. 358, 359.

फिर मीर जाफ़र २०६
दिया और मीर जाफ़र को पटने से कलकत्ते बुलवा लिया। कठ-
पुतली तथा बेबस मीर जाफ़र को अंगरेज़ों की आज्ञा माननी पड़ी।
मेजर कारनक की जगह मेजर मनरो अब पटने की सेना का
[हाशिया: मनरो का रोहतास के क़िले पर क़ब्ज़ा] प्रधान सेनापति नियुक्त हुआ। जुलाई मास में
वह पटने पहुँचा। अंगरेज़ों को डर था कि यदि
लड़ाई देर तक चली तो सम्भव है मराठों और
अफ़ग़ानों की सेनाएँ शुजाउद्दौला की मदद के लिए आ जावें।
इसलिए मेजर मनरो को आज्ञा दी गई कि तुम शुजाउद्दौला की
सेना पर हमला करके लड़ाई का शीघ्र अन्त कर डालो। मालूम
होता है मेजर मनरो के आते ही कम्पनी के कुछ हिन्दोस्तानी
सिपाही मीर जाफ़र के साथ अंगरेज़ों के इस अन्याय को देखकर
या किसी दूसरी वजह से अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत कर बैठे।
मेजर मनरो ने फ़ौरन बिना किसी तहक़ीक़ात या पूछ ताछ के तमाम
बाग़ियों को तोप के मुंह से उड़वा दिया।
इसके बाद मेजर मनरो ने रोहिताश्व (रोहतास) के क़िले
पर क़ब्ज़ा किया। इस क़िले के विषय में, सय्यद ग़ुलामहुसेन
लिखता है कि मेजर मनरो ने आते ही डॉक्टर फुलरटन की मारफ़त
सय्यद ग़ुलामहुसेन को पत्र लिखा कि—"यदि आप रोहिताश्व
का क़िला अंगरेज़ों के हवाले करने की तदबीर कर सकें तो आप
अंगरेज़ों की मित्रता और कृतज्ञता के हक़दार होंगे।" सय्यद
ग़ुलामहुसेन लिखता है कि—"इस सूचना के मिलने पर मैंने राजा
साहूमल से बातचीत की।" राजा साहूमल रोहिताश्व के क़िले का
१४

२१० भारत में अंगरेज़ो राज
क़िलेदार था। वह गुलामहुसेन की बातों में आ गया। उसने
अपनी शर्तें पेश कीं। अंगरेज़ों ने उसकी शर्तें मंजूर करलीं और
चुपचाप उसकी मदद से क़िले पर कब्ज़ा कर लिया। बाद में
अंगरेज़ों ने राजा साहूमल के साथ एक भी शर्त का पालन नहीं
किया। राजा साहूमल ने गुलामहुसेन से शिकायत की, किन्तु व्यर्थ।
यह भी कहा जाता है कि इस समय मीर क़ासिम के साथ
शुजाउद्दौला का व्यवहार जैसा चाहिए वैसा न रहा था।
१५ सितम्बर सन् १७६४ को बक्सर में दोनों ओर की सेनाओं
[बक्सर की मशहूर] में संग्राम हुआ। शाहआलम के दिल और दिमाग़
[लड़ाई] पर अंगरेज़ों की चालों का काफ़ी असर हो चुका
था। "सीअरुल-मुताख़रीन" का रचयिता, जो
इस काम में अंगरेज़ों का ख़ास मददगार था, लिखता है :—
"किन्तु शाहआलम ने जो भीतर से वज़ीर (शुजाउद्दौला) से असन्तुष्ट
था × × × कई तरह के बहाने करके समय टालना उचित समझा। वजह
यह थी कि वह कुछ पहले ही से अंगरेज़ों से मिल जाने की तदबीर सोच
चुका था। अंगरेज़ क़ौम इस विषय का कुछ सन्देशा उसके पास भेज चुकी
थी, जिससे वह उनसे मिल जाने का इच्छुक हा गया था और उनकी सहायता
से लाभ उठाने का भी निश्चय कर चुका था।"
जब कि स्वयं भारत सम्राट की यह हालत थी तो न जाने उस
दिन और कितने भारतीय सेनानियों ने सक्रिय या निष्क्रिय रूप में
शत्रु का साथ दिया होगा। नतीजा यह हुआ कि दिन भर के
घमासान में क़रीब पाँच छै हज़ार आदमी काम आए और असहाय

फिर मीर जाफ़र २११
शुजाउद्दौला को अपनी सेना सहित मैदान से पीछे हट जाना पड़ा,
जिसमें कहा जाता है उसके हज़ारों सैनिक गंगा की दलदल में फँस
कर रह गए ।
मीर क़ासिम जानता था कि यदि मैं अंगरेज़ों के हाथों में पड़
गया तो जो व्यवहार उन्होंने सिराजुद्दौला के
मीर क़ासिम की साथ किया उससे बेहतर सलूक की मुझे अंगरेज़ों
मृत्यु से आशा नहीं हो सकती । इसलिए वह बक्सर से
भाग कर सीधा इलाहाबाद पहुँचा । वहाँ से चल कर उसने बरेली
में दम लिया और अन्त को १२ साल से ऊपर एक गृहविहीन
जलावतन की तरह जगह जगह मुसीबतें उठाकर सन् १७७७ ई० में
दिल्ली में उसकी मृत्यु हुई । निस्सन्देह भारत की स्वाधीनता के
लिए अपने आप को मिटा देने वालों में मीर क़ासिम का नाम सदा
के लिए स्मरणीय रहेगा ।
सम्राट शाहआलम ने लड़ाई के समाप्त होते ही शुजाउद्दौला
का साथ छोड़कर अंगरेज़ी सेना के साथ डेरा डाला । अंगरेज़ों ने
फ़ौरन उसके सामने हाज़िर होकर उसका बाक़ायदा आदर मान
किया और उसे अपना सम्राट कह कर सलाम किया । सम्राट ही
के साथ अंगरेज़ों ने गंगा को पार किया और वहाँ से शुजाउद्दौला
के दीवान बेनीबहादुर को बुलवाकर शुजाउद्दौला के साथ सुलह की
बातचीत शुरू की । अंगरेज़ों ने दीवान बेनीबहादुर को यह विश्वास
दिलाने की कोशिश की कि कम्पनी ने अपने मुलाज़िमों को आज्ञा
दे दी है कि हिन्दोस्तान के अन्दर अब और नए इलाक़े फ़तह न

२१२ भारत में अंगरेजी राज
किए जायँ । इस पर भी शुजाउद्दौला और अंगरेज़ों में इस समय
सुलह न हो सकी।
मालूम होता है कि सम्राट बक्सर से इलाहाबाद की ओर चल
दिया। शुजाउद्दौला फिर से मुक़ाबला करने की तैयारी के इरादे
से पीछे हटा और अंगरेज़ शुजाउद्दौला का पीछा करने के लिए
आगे बढ़े।
मार्ग में अंगरेज़ों ने चुनार के क़िले का मोहासरा किया।
[चुनारगढ़ में] "सीअरुल-मुताख़रीन" में लिखा है कि अंगरेज़
[अंगरेज़ों की हार] सेनापति ने कम्पनी के नाम सम्राट का एक
दस्तख़ती परवाना क़िलेदार मोहम्मद बशीर ख़ाँ
के सामने पेश किया, किन्तु क़िले के भीतर की भारतीय सेना ने
इस परवाने की ख़ाक परवा न की। इस सेना ने जब यह देखा कि
हमारा क़िलेदार भी डाँवाडोल हो रहा है तो उन्होंने उसे क़िले से
बाहर निकाल कर उस सड़क पर छोड़ दिया, जो नवाब शुजाउद्दौला
के ख़ेमों की ओर जाती थी और स्वयं वीरता के साथ विदेशियों
से क़िले की रक्षा शुरू की। अंगरेज़ों ने अपनी तोपें सामने कीं।
कई दिन की गोलेबारी के बाद वे केवल क़िले की दीवार का एक
थोड़ा सा टुकड़ा गिरा पाए, किन्तु ज्योंही एक दिन अँधेरी रात में
अंगरेज़ी सेना ने इस रास्ते से क़िले के भीतर प्रवेश करना चाहा,
भीतर की भारतीय सेना ने अपनी बन्दूकों से उनमें से अधिकांश
का वहीं दीवार के ऊपर काम तमाम कर दिया। लाचार होकर
और बुरी तरह हार कर अंगरेज़ों को चुनार का मोहासरा छोड़

फिर मीर जाफ़र २१३
इलाहाबाद का रास्ता लेना पड़ा। वास्तव में बिना रिशवत, दग़ा
या इसी तरह के दूसरे उपायों के अंगरेज़ों ने कभी कहीं किसी एक
लड़ाई में भी किसी भारतीय सेना के ऊपर विजय प्राप्त नहीं की।
इलाहाबाद के क़िले की संरक्षक सेना ने भी अंगरेज़ी सेना का
इलाहाबाद पर खासा मुक़ाबला किया। किन्तु अंगरेज़ों के
अंगरेज़ों का क़ब्ज़ा सौभाग्य से वही नजफ़ ख़ाँ जिसने ऊदवानाला
पर अंगरेज़ों को बुरी तरह दिक़ किया था और
जो बहुत अरसे तक इलाहाबाद के क़िले में रह चुका था और
उसके रहस्यों से परिचित था, इस मौक़े पर अंगरेज़ों से मिल
गया। क़िले की दीवारों को गिराने के लिए अंगरेज़ी सेना के पास
इस समय जो एक सबसे अच्छी तोप थी वह हिन्दोस्तान ही की
बनी हुई थी और शुजाउद्दौला के ख़ेमों की लूट में उन्हें मिली थी।
नजफ़ ख़ाँ ने अंगरेज़ों को क़िले के सब गुप्त रास्ते बतला दिए और
इस तोप ने भी उन्हें ख़ासी मदद दी। अन्त में थोड़ी सी लड़ाई
के बाद अंगरेज़ी सेना ने इलाहाबाद के क़िले में प्रवेश किया।
क़िले पर हमला करने और भीतर वालों से शर्तें तय करने में
महाराजा शिताबराय की फ़ौज आगे थी, किन्तु क़ब्ज़ा करते समय
कम्पनी की अपनी सेना आगे थी।
शुजाउद्दौला अब भाग कर बरेली पहुँचा। वहाँ से लौट कर
कम्पनी और नवाब मलहरराव होलकर की कुछ मराठा सेना की
शुजाउद्दौला में सहायता से उसने कड़ा में अंगरेज़ी सेना पर
संधि फिर हमला किया। एक दो छोटी मोटी लड़ाइयाँ

२१४ भारत में अंगरेज़ी राज
भी हुईं। अन्त में महाराजा शिताबराय ने बीच में पड़ कर नीचे
लिखी शर्तों पर कम्पनी और शुजाउद्दौला में सुलह करवा दी :—
१—युद्ध में कम्पनी का जो ख़र्च हुआ है उसके लिए शुजाउद्दौला
पचास लाख रुपए कम्पनी को दे। पच्चीस लाख फ़ौरन् और पच्चीस
लाख सालाना क़िस्तों में।
२—इलाहाबाद के आस पास का प्रान्त जो इससे पहले अवध
के सूबे में शामिल था, सम्राट के उपयोग के लिए अलग कर दिया
जाय। इलाहाबाद का शहर और क़िला सम्राट के रहने के लिए
नियुक्त हो और इलाहाबाद के क़िले में सम्राट की रक्षा के लिए
कम्पनी की एक सेना रहे।
३—ग़ाज़ीपुर और उसके आस पास का इलाक़ा कम्पनी को
दे दिया जाय।
४—अंगरेज़ों का एक वकील शुजाउद्दौला के दरबार में रहा
करे, किन्तु नवाब शुजाउद्दौला के राज प्रबन्ध में वह किसी तरह
का दख़ल न दे।
५—आइन्दा हर पक्ष दूसरे पक्ष के शत्रु या मित्र को अपना
शत्रु या मित्र समझे।
अवध के नवाब वज़ीर के साथ अंगरेज़ों की यह पहली सन्धि
थी। अवध की नवाबी का प्रारम्भ सन् १७२० के क़रीब दिल्ली
दरबार की निर्बलता के दिनों में हुआ था। दिल्ली के सम्राट ने पहले
नवाब सआदत ख़ाँ को अवध का सूबेदार नियुक्त करके भेजा था।
उसके बाद सआदत ख़ाँ के भतीजे दूसरे नवाब सफ़दरजंग ने दो

फिर मीर जाफ़र २१५
करोड़ रुपये नादिरशाह को नज़र करके अपनी नवाबी क़ायम
रक्खी । सफ़दरजंग ही को पहली बार दिल्ली सम्राट ने साम्राज्य के
वज़ीर की पदवी प्रदान की और तभी से अवध के नवाब 'नवाब
वज़ीर' कहलाने लगे । शुजाउद्दौला सफ़दरजंग का बेटा था ।
निस्सन्देह नवाब शुजाउद्दौला ने अंगरेज़ों का ख़ासा मुक़ाबला
किया और इसमें भी सन्देह नहीं कि यदि स्वयं शाहआलम और
उसके अन्य साथी अंगरेज़ों के हाथों में न खेल जाते, तो बक्सर
के मैदान में ही शुजाउद्दौला अंगरेज़ों की उभरती हुई ताक़त को
सदा के लिए अन्त कर देता । शाहआलम की अयोग्यता ने
शुजाउद्दौला को पंगुल कर दिया । किन्तु शुजाउद्दौला के बाद से
सन् १८५६ तक अंगरेज़ कम्पनी और भारतीय नरेशों के परस्पर
संग्रामों में भारतवासियों को अवध के नवाबों से कभी विशेष
फ़ायदा नहीं पहुँचा । इसके विपरीत ब्रिटिश सत्ता के क़ायम करने
में अवध के निर्बल नवाब अक्सर कम्पनी की साज़िशों में एक
उपयोगी साधन साबित हुए । कम्पनी की भारतीय सेना के अधि-
कांश सिपाही सदा अवध से ही आते रहे और कम्पनी के अफ़सरों
को जब जब रुपये की ज़रूरत पड़ी, तो डर कर या मूर्खतावश,
उन्हें धन देने में अवध के ख़ज़ाने ने सदा कामधेनु का काम दिया ।
मीर जाफ़र को भी अंगरेज़ों ने अपनी महत्वाकांक्षा की शिखर
[हाशिया: मीर जाफ़र का] तक पहुँचने के लिए बतौर एक सीढ़ी के इस्तेमाल
[हाशिया: अन्त] किया और ज्योंही वे ऊपर तक पहुँच गए
उन्होंने बिना सङ्कोच उसे लात मार कर अलग

२१६ भारत में अंगरेज़ी राज
कर दिया। उसकी ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों को उन्होंने अत्यन्त
दुखमय बना दिया। अक्तूबर सन् १७६४ में उससे पाँच लाख रुपए
माहवार कम्पनी को देने का वादा करा लिया, जिससे वह अन्त
तक बहुत तङ्ग रहा और सदा शिकायत करता रहा। सन्धि से
बाहर नित्य नई और बढ़ बढ़ कर माँगें उससे की जाती रहीं।
आए दिन की इन ज़बरदस्तियों ने उसके स्वास्थ्य और आयु
दोनों पर असर डाला। प्रसिद्ध इतिहास लेखक सर विलियम
हण्टर लिखता है :—
"मीर जाफ़र जनवरी सन् १७६५ में मरा और कहा जाता है कि जिस
बेजा तरीक़े से कलकत्ते के अंगरेज़ों ने अपने व्यक्तिगत नुक़सानों के हरजाने
की अदायगी के लिए उससे तक़ाज़े शुरू किए, उनसे उसकी मौत और
जल्दी हुई।"*
वास्तव में मीर जाफ़र की मृत्यु फ़रवरी सन् १७६५ के आरम्भ
में मुर्शिदाबाद के महल में हुई। उसकी आयु उस समय ६५ वर्ष
की थी। अन्त समय में मीर जाफ़र की इच्छा के अनुसार उसके
अनेक सम्बन्धियों और बेटों के रहते हुए उसके चिर मित्र महाराजा
नन्दकुमार ने एक हिन्दू मन्दिर से गंगाजल लाकर मीर जाफ़र के
मुंह में डाला और उसी जल से अपने हाथों से उसने मीर जाफ़र
को आख़िरी स्नान कराया।

  • "His death took place in January 1765, and is said to have been
    hastened by the unseemly importunity with which the English at Calcutta
    pressed upon him their private claims to restitution."—Sir W. W. Hunter,
    in Statistical Account of Bengal vol. ix, p. 191.

छठा अध्याय
मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद
मीर जाफ़र के बड़े बेटे मीरन की हत्या का हाल ऊपर आ चुका
[हाशिया: नवाब नजमुद्दौला] है। मीर जाफ़र का दूसरा बेटा नजमुद्दौला अब
[हाशिया: और उसके साथ] मुर्शिदाबाद की मसनद पर बैठा, किन्तु असम्भव
[हाशिया: नई सन्धि] था कि अंगरेज़ हर ऐसे अवसर से पूरा लाभ न
उठाते। कलकत्ते का अंगरेज़ गवर्नर उन दिनों
“बंगाल में फ़ोर्ट विलियम क़िले का गवर्नर” कहलाता था।
अंगरेज़ ‘गवर्नर और कौन्सिल’ के पास मुर्शिदाबाद की सरकारी
सेना से कहीं अधिक सेना थी। बिना इस ‘गवर्नर और
कौन्सिल’ की रज़ामन्दी के मुर्शिदाबाद का कोई सूबेदार अब अपने
आप को क्रियात्मक सूबेदार न समझ सकता था। उस समय
के गवर्नर स्पेन्सर ने जो बन्सीटार्ट का उत्तराधिकारी था और
उसकी अंगरेज़ कौन्सिल ने नजमुद्दौला को उस समय तक

२१= भारत में अंगरेज़ी राज
सूबेदार मानने से इनकार किया, जब तक कि उससे एक नई सन्धि
पर दस्तख़त न करा लिए । इस नई सन्धि की मुख्य शर्तें ये थीं :—
( १ ) नवाब नजमुद्दौला 'नायब सूबेदार' का एक नया ओहदा
क़ायम करे, नायब सूबेदार नवाब के नाम पर शासन का सारा
काम करे, और अंगरेज़ों का एक ख़ास आदमी मोहम्मद रज़ा ख़ाँ
इस नए ओहदे पर नियुक्त किया जावे ।
( २ ) माल के महकमे में बिना कलकत्ते की अंगरेज़ कौन्सिल
की रज़ामन्दी के नवाब न किसी को बरख़ास्त करे और न कोई
नया आदमी नियुक्त करे ।
( ३ ) कम्पनी को फ़ौज के ख़र्च के लिए पाँच लाख रुपए
माहवार बराबर मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने से मिलते रहें ।
( ४ ) सिवाय इतनी फ़ौज के जो सरकारी मालगुज़ारी वसूल
करने और दरबार की इज़्ज़त क़ायम रखने के लिए ज़रूरी हो,
नवाब और अधिक फ़ौज अपने पास न रक्खे । और
( ५ ) देश भर में हर तरह के व्यापार पर अंगरेज़ों के लिए
महसूल माफ़ रहे ।
इन शर्तों के बाद बंगाल के सूबेदार की सत्ता केवल छाया मात्र
रह गई । किन्तु नजमुद्दौला को ये सब शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं,
और इनके अलावा बीस लाख रुपये नक़द बतौर दोस्ताने या रिश्वत
के स्पेन्सर और उसके साथियों की नज़र करने पड़े । यह बीस लाख
की रक़म गवर्नर और उसकी कौन्सिल के मेम्बरों ने आपस में
बाँट ली ।

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २१६
नए नवाब ने महाराजा नन्दकुमार को अपना दीवान नियुक्त
करना चाहा। अंगरेज़ नन्दकुमार से काफ़ी
[हाशिया: नन्दकुमार की गिरफ़्तारी] सावधान हो चुके थे। उन्होंने इजाज़त न दी
और नवाब पर उसकी बेबसी प्रकट कर देने के
लिए वे महाराजा नन्दकुमार को क़ैद करके ज़बरदस्ती मुर्शिदाबाद
से कलकत्ते ले आए।
कम्पनी का कारबार अब काफ़ी बढ़ गया था। उसकी आकां-
क्षाएँ बहुत ऊँची हो गई थीं। अपने कारबार की
[हाशिया: क्लाइव का दोबारा भारत आना] ठीक व्यवस्था करने और इन आकांक्षाओं को
पूरा करने के लिए डाइरेक्टरों ने क्लाइव को, जो
अब 'लॉर्ड क्लाइव' था, दोबारा भारत भेजना आवश्यक समझा।
क्लाइव फिर एक बार 'फोर्ट विलियम का गवर्नर' नियुक्त हुआ
जिस समय क्लाइव इंगलिस्तान से कलकत्ते आ रहा था मद्रास में
उसने मीर जाफ़र की मृत्यु का समाचार सुना । उसका ख़ास
उद्देश इस समय बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दिवानी के अधि-
कार शाह आलम से प्राप्त करना था। इतिहास लेखक होलर
लिखता है:—
"मीर जाफ़र की मृत्यु की ख़बर सुनकर क्लाइव बहुत खुश हुआ । वह
अब बंगाल प्रान्तों के राज्य शासन में उस नई पद्धति को जारी करने के लिए
उत्सुक था, जिसका सात साल से अधिक हुए वह इंगलिस्तान के प्रधान मंत्री
पिट से ज़िक्र कर चुका था। वह चाहता था कि एक ऐसे नए आदमी को
नवाब बना दिया जाय जो केवल शून्य मात्र हो, सारा शासन प्रबन्ध

२२० भारत में अंगरेज़ी राज
हिन्दोस्तानी कर्मचारियों के हाथों में रहे, असली मालिक अंगरेज़ रहे। वे ही
मालगुज़ारी वसूल करें, वे ही बाहर के हमलों और भीतर के विद्रोहों
से तीनों प्रान्तों की रक्षा करें, जंग करें और सन्धियाँ करें; किन्तु अंगरेज़ों
की यह बादशाइत जन सामान्य की आँखों से छिपी रहे, अंगरेज़ इस
तरह नवाब के नाम पर और मुग़ल सम्राट के दिए हुए अधिकार से शासन
करते रहें।" *
क्लाइव को उस समय तक यह मालूम न था कि अंगरेज़ों ने
नजमुद्दौला को नवाब मान लिया है। उसकी
क्लाइव की तजवीज़ यह थी कि मीर जाफ़र के छै साल के
तजवीज़ एक पोते को मुर्शिदाबाद की मसनद पर बैठाकर
उसके नाम पर अपनी यह सारी योजना पूरी की जावे।
मई सन् १७६५ में क्लाइव कलकत्ते पहुँचा। यहाँ आकर जब
उसने सुना कि स्पेन्सर और उसके साथियों ने नजमुद्दौला को
नवाब स्वीकार कर लिया और इस सौदे में बीस लाख रुपए नक़द
अपनी जेबों में भर लिए, तो क्लाइव को बड़ा क्रोध आया। किन्तु

  • ". . . was delighted at the news. He was anxious to introduce
    the new system for the Government of the Bengal provinces, which he had
    unfolded to Pitt more than seven years before. He would set up a new
    Nawab who should be only a cypher. He would leave the administration in
    the hands of native officials. The English were to be the real masters ; they
    were to take over the revenues, defend the three provinces from invasion
    and insurrection, make war and conclude peace. But the sovereignty of the
    English was to be hidden from the public eye. They were to rule only in
    the name of the Nawab and under the authority of the Moghul Emperor."—
    Wheeler's Early Records of British India, pp. 329, 330.

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