भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१= भारत में अंगरेज़ी राज
सूबेदार मानने से इनकार किया, जब तक कि उससे एक नई सन्धि
पर दस्तख़त न करा लिए । इस नई सन्धि की मुख्य शर्तें ये थीं :—
( १ ) नवाब नजमुद्दौला 'नायब सूबेदार' का एक नया ओहदा
क़ायम करे, नायब सूबेदार नवाब के नाम पर शासन का सारा
काम करे, और अंगरेज़ों का एक ख़ास आदमी मोहम्मद रज़ा ख़ाँ
इस नए ओहदे पर नियुक्त किया जावे ।
( २ ) माल के महकमे में बिना कलकत्ते की अंगरेज़ कौन्सिल
की रज़ामन्दी के नवाब न किसी को बरख़ास्त करे और न कोई
नया आदमी नियुक्त करे ।
( ३ ) कम्पनी को फ़ौज के ख़र्च के लिए पाँच लाख रुपए
माहवार बराबर मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने से मिलते रहें ।
( ४ ) सिवाय इतनी फ़ौज के जो सरकारी मालगुज़ारी वसूल
करने और दरबार की इज़्ज़त क़ायम रखने के लिए ज़रूरी हो,
नवाब और अधिक फ़ौज अपने पास न रक्खे । और
( ५ ) देश भर में हर तरह के व्यापार पर अंगरेज़ों के लिए
महसूल माफ़ रहे ।
इन शर्तों के बाद बंगाल के सूबेदार की सत्ता केवल छाया मात्र
रह गई । किन्तु नजमुद्दौला को ये सब शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं,
और इनके अलावा बीस लाख रुपये नक़द बतौर दोस्ताने या रिश्वत
के स्पेन्सर और उसके साथियों की नज़र करने पड़े । यह बीस लाख
की रक़म गवर्नर और उसकी कौन्सिल के मेम्बरों ने आपस में
बाँट ली ।