भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 476, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० भारत में अंगरेज़ी राज
हिन्दोस्तानी कर्मचारियों के हाथों में रहे, असली मालिक अंगरेज़ रहे। वे ही
मालगुज़ारी वसूल करें, वे ही बाहर के हमलों और भीतर के विद्रोहों
से तीनों प्रान्तों की रक्षा करें, जंग करें और सन्धियाँ करें; किन्तु अंगरेज़ों
की यह बादशाइत जन सामान्य की आँखों से छिपी रहे, अंगरेज़ इस
तरह नवाब के नाम पर और मुग़ल सम्राट के दिए हुए अधिकार से शासन
करते रहें।" *
क्लाइव को उस समय तक यह मालूम न था कि अंगरेज़ों ने
नजमुद्दौला को नवाब मान लिया है। उसकी
क्लाइव की तजवीज़ यह थी कि मीर जाफ़र के छै साल के
तजवीज़ एक पोते को मुर्शिदाबाद की मसनद पर बैठाकर
उसके नाम पर अपनी यह सारी योजना पूरी की जावे।
मई सन् १७६५ में क्लाइव कलकत्ते पहुँचा। यहाँ आकर जब
उसने सुना कि स्पेन्सर और उसके साथियों ने नजमुद्दौला को
नवाब स्वीकार कर लिया और इस सौदे में बीस लाख रुपए नक़द
अपनी जेबों में भर लिए, तो क्लाइव को बड़ा क्रोध आया। किन्तु
- ". . . was delighted at the news. He was anxious to introduce
the new system for the Government of the Bengal provinces, which he had
unfolded to Pitt more than seven years before. He would set up a new
Nawab who should be only a cypher. He would leave the administration in
the hands of native officials. The English were to be the real masters ; they
were to take over the revenues, defend the three provinces from invasion
and insurrection, make war and conclude peace. But the sovereignty of the
English was to be hidden from the public eye. They were to rule only in
the name of the Nawab and under the authority of the Moghul Emperor."—
Wheeler's Early Records of British India, pp. 329, 330.