भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर मीर जाफ़र २१५
करोड़ रुपये नादिरशाह को नज़र करके अपनी नवाबी क़ायम
रक्खी । सफ़दरजंग ही को पहली बार दिल्ली सम्राट ने साम्राज्य के
वज़ीर की पदवी प्रदान की और तभी से अवध के नवाब 'नवाब
वज़ीर' कहलाने लगे । शुजाउद्दौला सफ़दरजंग का बेटा था ।
निस्सन्देह नवाब शुजाउद्दौला ने अंगरेज़ों का ख़ासा मुक़ाबला
किया और इसमें भी सन्देह नहीं कि यदि स्वयं शाहआलम और
उसके अन्य साथी अंगरेज़ों के हाथों में न खेल जाते, तो बक्सर
के मैदान में ही शुजाउद्दौला अंगरेज़ों की उभरती हुई ताक़त को
सदा के लिए अन्त कर देता । शाहआलम की अयोग्यता ने
शुजाउद्दौला को पंगुल कर दिया । किन्तु शुजाउद्दौला के बाद से
सन् १८५६ तक अंगरेज़ कम्पनी और भारतीय नरेशों के परस्पर
संग्रामों में भारतवासियों को अवध के नवाबों से कभी विशेष
फ़ायदा नहीं पहुँचा । इसके विपरीत ब्रिटिश सत्ता के क़ायम करने
में अवध के निर्बल नवाब अक्सर कम्पनी की साज़िशों में एक
उपयोगी साधन साबित हुए । कम्पनी की भारतीय सेना के अधि-
कांश सिपाही सदा अवध से ही आते रहे और कम्पनी के अफ़सरों
को जब जब रुपये की ज़रूरत पड़ी, तो डर कर या मूर्खतावश,
उन्हें धन देने में अवध के ख़ज़ाने ने सदा कामधेनु का काम दिया ।
मीर जाफ़र को भी अंगरेज़ों ने अपनी महत्वाकांक्षा की शिखर
[हाशिया: मीर जाफ़र का] तक पहुँचने के लिए बतौर एक सीढ़ी के इस्तेमाल
[हाशिया: अन्त] किया और ज्योंही वे ऊपर तक पहुँच गए
उन्होंने बिना सङ्कोच उसे लात मार कर अलग