भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 470, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ें२१४ भारत में अंगरेज़ी राज
भी हुईं। अन्त में महाराजा शिताबराय ने बीच में पड़ कर नीचे
लिखी शर्तों पर कम्पनी और शुजाउद्दौला में सुलह करवा दी :—
१—युद्ध में कम्पनी का जो ख़र्च हुआ है उसके लिए शुजाउद्दौला
पचास लाख रुपए कम्पनी को दे। पच्चीस लाख फ़ौरन् और पच्चीस
लाख सालाना क़िस्तों में।
२—इलाहाबाद के आस पास का प्रान्त जो इससे पहले अवध
के सूबे में शामिल था, सम्राट के उपयोग के लिए अलग कर दिया
जाय। इलाहाबाद का शहर और क़िला सम्राट के रहने के लिए
नियुक्त हो और इलाहाबाद के क़िले में सम्राट की रक्षा के लिए
कम्पनी की एक सेना रहे।
३—ग़ाज़ीपुर और उसके आस पास का इलाक़ा कम्पनी को
दे दिया जाय।
४—अंगरेज़ों का एक वकील शुजाउद्दौला के दरबार में रहा
करे, किन्तु नवाब शुजाउद्दौला के राज प्रबन्ध में वह किसी तरह
का दख़ल न दे।
५—आइन्दा हर पक्ष दूसरे पक्ष के शत्रु या मित्र को अपना
शत्रु या मित्र समझे।
अवध के नवाब वज़ीर के साथ अंगरेज़ों की यह पहली सन्धि
थी। अवध की नवाबी का प्रारम्भ सन् १७२० के क़रीब दिल्ली
दरबार की निर्बलता के दिनों में हुआ था। दिल्ली के सम्राट ने पहले
नवाब सआदत ख़ाँ को अवध का सूबेदार नियुक्त करके भेजा था।
उसके बाद सआदत ख़ाँ के भतीजे दूसरे नवाब सफ़दरजंग ने दो