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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

मीर क़ासिम १६६
१७७२ में पार्लिमेण्ट की सिलेक्ट कमेटी के सामने गवाही देते हुए
कहा था कि राजा रामनारायण पर बक़ाया का इलज़ाम “बे बुनि-
याद” था। निस्सन्देह वन्सीटॉर्ट और उसके साथियों का यह
कार्य बिलकुल निस्स्वार्थ न था। १७ जुलाई सन् १७६१ को करनल
कूट ने गवरनर और कौन्सिल के नाम एक पत्र भेजा, जिसमें साफ़
लिखा है कि मीर क़ासिम इस काम के लिए साढ़े सात लाख रुपए
रिशवत देने को तैयार है। गवरनर वन्सीटॉर्ट के इस काम की
निन्दा करते हुए इतिहास लेखक मिल लिखता है :—
“मिस्टर वन्सीटॉर्ट के शासन की यह घातक भूल थी, क्योंकि इसकी
वजह से ऊँचे दरजे के हिन्दोस्तानियों के दिलों से यह निश्वास बिलकुल उठ
गया कि अंगरेज़ कभी उनकी रक्षा करेंगे। इस मामले में जिस घोर अन्याय
का मि० वन्सीटॉर्ट ने साथ दिया, उससे लोगों की यह राय होगई कि वन्सी-
टॉर्ट अपनी कमज़ोरी से या रिशवत लेकर किसी भी पक्ष का समर्थन करने
को तैयार हो सकता है। x x x ”*
मुर्शिदाबाद में निर्दोष रामनारायण को हथकड़ियां डालकर
रक्खा गया, उससे खूब धन वसूल किया गया और पटने में उसकी
जगह दूसरा नायब नियुक्त कर दिया गया।
मीर क़ासिम मामूली चरित्र का मनुष्य न था। मीर जाफ़र

  • "This was the fatal error of Mr. Vansittart's administration; because
    it extinguished among the natives of rank all confidence in the English
    protection; and because the enormity to which, in this instance, he had lent
    his support, created an opinion of a weak or a corrupt partiality. . . ."—
    Mill, vol. iii. p. 224.

१७० भारत में अंगरेज़ी राज
में और उसमें बड़ा अन्तर था। मीर जाफ़र अयोग्य, निर्बल,
स्वार्थी, अदूरदर्शी और भीरु था। इसके विपरीत
[मीर क़ासिम का] मीर क़ासिम की योग्यता, उसके बल, अपनी
[चरित्र और शासन] प्रजा के लिए उसकी हित चिन्ता, उसकी दूर-
दर्शिता, उसकी वीरता और शासक की हैसियत से उसकी कार्य
कुशलता की क़रीब क़रीब सब इतिहास लेखकों ने मुक्तकण्ठ से प्रशंसा
की है। इतिहास लेखक कर्नल मालेसन जगह जगह लिखता है कि
मीर क़ासिम "अत्यन्त योग्य और व्यवहार कुशल मनुष्य था......
अपने इरादों में लोहे की तरह दृढ़ रहता था, हर बात को ठीक ठीक
समझ कर उसका जल्दी से फ़ैसला कर सकता था, उसके विचार उदार
थे......उसका दिमाग़ साफ़ था और उसका चरित्र मज़बूत था।*"
एक दूसरा अंगरेज़ इतिहास लेखक लिखता है—"मीर क़ासिम
के अन्दर एक सिपाही की वीरता और एक राजनीतिज्ञ की दूर-
दर्शिता दोनों मौजूद थीं।”† कर्नल मालेसन लिखता है कि मीर
क़ासिम को मीर जाफ़र के साथ देशघातकों की पंक्ति में रखना
मीर क़ासिम के साथ अन्याय करना है। वह यह भी लिखता है कि
मीर क़ासिम का इरादा मीर जाफ़र के साथ विश्वासघात करने का
न था। मीर क़ासिम ने अपने बूढ़े श्वसुर मीर जाफ़र की निर्बलता,
* "... a man of great tact and ability . . . of iron will,
quick decision, large views . . . of clear head and strong character."--
The Decisive Battles of India, by Colonel Malleson, pp. 127, 145.
† "He united the gallantry of the soldier with the sagacity of the
statesman."--Transactions in India from 1757 to 1784.

[Page Header]
मीर क़ासिम १७१

कायरता और अयोग्यता को अच्छी तरह महसूस कर लिया था।
उसकी आत्मा यह देखकर दुखी थी कि बंगाल का सूबेदार
विदेशियों के हाथों की केवल एक कठपुतली रह गया था। इसीलिए
मीर क़ासिम ने जिस तरह हो सके, सूबेदार की सत्ता को फिर से
क़ायम करने का संकल्प किया।* मीर क़ासिम और अंगरेज़ों में जो
गुप्त समझौता हुआ था वह केवल मीर क़ासिम को मीर जाफ़र का
प्रधान मन्त्री बनाने का हुआ था और मीर क़ासिम को आशा थी
कि प्रधान मंत्री की हैसियत से मैं सूबेदारी की सत्ता को फिर से
क़ायम कर सकूँगा। किन्तु जब एक बार यह सब मामला निर्बल
और सशङ्क मीर जाफ़र पर प्रकट कर दिया गया और मीर जाफ़र को
मीर क़ासिम पर भरोसा न हो सका, तो फिर मीर क़ासिम के लिए
पीछे हट सकना नामुमकिन हो गया था। इसमें भी शक नहीं कि
मीर क़ासिम ने मसनद पर बैठते ही बंगाल की हालत को सुधारने
की जी तोड़ कोशिश की और इस कोशिश में उसे एक दरजे तक
आश्चर्यजनक सफलता मिली।
माल और ख़ज़ाने के महकमों में उसने कई सुधार किए। सन्
१७६२ तक उसने न केवल अपनी फ़ौज की
[साइड-नोट: मीर क़ासिम के सुधार] तमाम पिछली तनख़ाहों को अदा कर दिया और
अंगरेज़ों की एक एक पाई चुकता कर दी, बल्कि
शासन का इतना सुन्दर प्रबन्ध किया कि सूबेदारी की आमदनी
सालाना ख़र्च से बढ़ गई। अंगरेज़ों पर उसे शुरू से ही विश्वास


* The Decisive Battles of India, p. 128.

१७२ भारत में अंग्रेज़ी राज
न था, इस पर भी उसने अंगरेज़ों के साथ अपने वचन का पूरी
तरह पालन किया। मुर्शिदाबाद की राजधानी में विदेशियों का
प्रभाव अधिक बढ़ गया था। इसलिए मीर क़ासिम ने मुंगेर को
अपनी नई राजधानी बनाया। उसने अधिकतर मुंगेर ही में रहना
शुरू कर दिया। मुंगेर की उसने बड़ी सुन्दर और मज़बूत क़िलेबंदी
की। क़रीब चालीस हज़ार फ़ौज वहाँ जमा की। उस फ़ौज को
यूरोपियन ढंग के अस्त्रों की शिक्षा देने के लिए अपने यहाँ कई
योग्य यूरोपियन नौकर रक्खे। एक बहुत बड़ा नया कारख़ाना
तोपें ढालने का उसने क़ायम किया। जिसकी तोपों के विषय में कहा
जाता है कि उस समय की यूरोप की बनी हुई तोपों से हर तरह
बढ़कर थीं। मीर क़ासिम की सारी प्रजा उससे अत्यन्त संतुष्ट थी
और उससे प्रेम करती थी।
किन्तु ज्योंही मीर क़ासिम और उसकी प्रजा के थोड़ा बहुत
[पार्श्व-शीर्षक: मीर क़ासिम के] पनपने का समय आया, त्योंही मीर क़ासिम को
[ख़िलाफ़ अंगरेज़ों] भी मसनद से उतारने की तैयारियाँ शुरू हो
[की साज़िश] गईं। कर्नल मॉलेसन साफ़ लिखता है कि मीर
क़ासिम ने अंगरेज़ों के साथ अपने सब वादे पूरे
कर दिए, “किन्तु लालची अंगरेज़ों को अपनी धन पिपासा के
शान्त करने का सब से अच्छा उपाय यही दिखाई दिया कि मीर
क़ासिम को नाश करके उसके उत्तराधिकारी के साथ नए सिरे से
सौदा किया जावे।”*

  • “Mir Kassim performed his covenant. But . . . . . men greedy of

मीर क़ासिम १७३
जिस तरह मीर जाफ़र के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों ने मीर क़ासिम को
अपनी साज़िशों का केन्द्र बनाया था, उसी तरह अब उलट कर मीर
क़ासिम के ख़िलाफ़ बूढ़े मीर जाफ़र को इन नई साज़िशों का केन्द्र
बनाया गया । मीर क़ासिम के विरुद्ध सामग्री तैयार करने के लिए
कलकत्ते की सिलेक्ट कमेटी के कुछ मेम्बरों ने ११ मार्च सन् १७६२
को कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम एक लम्बा पत्र भेजा, जिसमें
उन्होंने मीर क़ासिम और उसके चरित्र पर अनेक झूठे सच्चे दोष
लगाए, मीर जाफ़र की खूब तारीफें कीं, यह स्वीकार किया कि
मीर जाफ़र के चरित्र पर इससे पहले जो दोष लगाए जा चुके थे
वे सब झूठे थे और मीर जाफ़र को मसनद से उतारना एक भूल
और अन्याय था, और लिखा :—
"जब से वह (मीर क़ासिम) सूबेदार बना है, तब से उसके ज़ुल्मों
और लूट खसोट की बेशुमार मिसालें हम आपको दे सकते हैं । किन्तु उससे
यह पत्र बेहद लम्बा हो जायगा x x x। हम केवल एक रामनारायन का
हाल खास तौर पर देते हैं, जिसे मीर क़ासिम ने पटने की नायबी से अलग कर
दिया । यह बात मानी हुई है कि रामनारायन अपने वचन का सच्चा है, इसी
लिए उसकी नायबी का समर्थन करना हम सदा अपने लिए हितकर समझते
रहे । मीर क़ासिम आजकल रामनारायन को हथकड़ी डालकर रक्खे हुए है
और उस समय तक रक्खेगा जब तक कि वह उससे हद दर्जे धन न चूस ले ।
gain, deeming that the shortest road to their end lay in compassing
the ruin of Mir Kassim, in order to make a market of his successor."—The
Decisive Battles of India, p. 134.

१७४ भारत में अंगरेज़ी राज
इसके बाद कोई सन्देह नहीं कि रामनारायण का काम तमाम कर दिया
जायगा । जिन जिन लोगों ने अंगरेज़ों का साथ दिया था, उनमें से सब नहीं
तो अधिकांश से मीरक़ासिम भारी भारी रक़में वसूल कर चुका है। रुपए
वसूल करने के लिए जो जो तकलीफ़ें उन्हें दी गई हैं, उनसे कई मर चुके ।
बहुतों को या तो कमीनेपन के साथ क़त्ल कर दिया गया और या
(जो हिन्दोस्तानियों में अक्सर होता है) बेइज़्ज़ती से बचने के लिए उन्होंने
स्वयं आत्महत्या कर ली × × × ।”
मीर क़ासिम के चरित्र को कलङ्कित करने में अब इन लोगों ने
कोई कसर उठा न रक्खी । अंगरेज़ों को रुपए
मीर क़ासिम पर देने के लिये ही मीर क़ासिम को अपने अनेक
झूठे इलज़ाम आश्रितों पर ज़ुल्म करने पड़े। इतिहास से
ज़ाहिर है कि ख़ुद अंगरेज़ ही इस तरह के अनेक अभागों को ला
लाकर मीर क़ासिम के हवाले करते थे। अंगरेज़ों ही ने साढ़े
सात लाख रुपए या कुछ अधिक के बदले में अपने सच्चे मित्र
निर्दोष रामनारायण को छल से पकड़ कर मीर क़ासिम के हाथों में
दिया और अब अंगरेज़ ही मीर क़ासिम को इन सब अन्यायों के
लिए ज़िम्मेदार ठहराते थे।
एक इलज़ाम मीर क़ासिम पर यह भी था कि वह अपनी फ़ौज
बढ़ा रहा था, उन्हें यूरोपियन ढङ्ग की क़वायद और यूरोपियन
शस्त्रों का इस्तेमाल सिखा रहा था और नई क़िलेबन्दियाँ करा
रहा था (!) ।
इसी पत्र में इन लोगों ने लिखा कि मीर जाफ़र के चरित्र के

विरुद्ध जितने इलज़ाम गवर्नर वन्सीटार्ट ने लगाए थे वे सब झूठे
हैं, उनका उद्देश्य केवल "लोगों के चित्तों को मीर जाफ़र की ओर से
फेर देना था," और यह कि मीर जाफ़र को मसनद से उतारने
और मीर क़ासिम को उसकी जगह बैठाने से सारी प्रजा अत्यन्त
असन्तुष्ट है। कमेटी के छै मेम्बरों के इस पत्र पर दस्तख़त हैं।
निस्सन्देह इस पत्र को पढ़ने के बाद कम्पनी के उस समय के अंग-
रेज़ मुलाज़िमों के किसी भी पत्र या बयान पर कुछ भी विश्वास
कर सकना क़तई नामुमकिन है।
तिजारत और सरकारी महसूल सम्बन्धी अंगरेज़ों के अत्याचार
इस समय तक समस्त बंगाल में फैल चुके थे और
अंगरेज़ों की लूट बढ़ते जा रहे थे। इन अत्याचारों के विषय में
खसोट कर्नल मॉलेसन लिखता है :—
"इस लज्जास्पद और अन्यायपूर्ण व्यवहार का नतीजा यह हुआ कि
प्रतिष्ठित देशी व्यापारी सब बरबाद हो गए, ज़िले के ज़िले निर्धन हो गए,
देश का सारा व्यापार उलट पुलट हो गया और व्यापार के ज़रिए नवाब को
जो आमदनी होती थी उसमें लगातार और तेज़ी के साथ कमी आती गई।
मीर क़ासिम ने बार बार कलकत्ते की कौन्सिल से इन ज़्यादतियों की
शिकायत की, किन्तु व्यर्थ।"*

  • " The results of this shameful and oppressive system were that the
    respectable class of native merchants were ruined, whole districts became
    impoverished, the entire native trade became disorganised and the Nawab's
    revenue from that source suffered a steady and increasing declension. In

१७६ भारत में अंगरेज़ी राज
अन्त को इन बेशुमार शिकायतों के जवाब में इस सब मामले
का निपटारा करने के लिए ३० नवम्बर सन् १७६२ को गवरनर
वन्सीटार्ट और वारन हेस्टिंग्स नवाब से भेंट करने के लिए मुंगेर
पहुँचे। मीर क़ासिम ने जो शिकायतें इस मौक़े पर वन्सीटार्ट के
सामने पेश कीं उनमें से एक यह भी थी :—
"जब सूबेदार (मीर क़ासिम) बिहार की ओर गया हुआ था और
बंगाल में कोई शासक न रहा, उस समय अंगरेज़ों ने अपने अत्याचारों
द्वारा उस सूबे के हर ज़िले और हर गाँव को तबाह कर डाला था, प्रजा से
उनकी रोज़ की रोटी तक छीन ली गई थी और सरकारी महसूलों और माल-
गुज़ारी का जमा होना बिलकुल बन्द हो गया था। इससे सूबेदार को क़रीब
एक करोड़ रुपए का नुक़सान हुआ x x x ।"*
१५ दिसम्बर सन् १७६२ को वन्सीटार्ट और मीर क़ासिम के
बीच एक सन्धि हुई जो 'मुंगेर की सन्धि' के
मुँगेर की नाम से मशहूर है। और बातों के साथ इस
सन्धि सन्धि में यह भी तय हुआ कि अंगरेज़ व्यापारी
आइन्दा से नमक, तम्बाकू, छालिया इत्यादि सब चीज़ों के ऊपर
vain did Mir Kassim represent, again and again, these evils on the Calcutta
Council."—The Decisive Battles of India, p. 137.

  • "When His Excellency went to Behar, Bengal being left without a
    ruler, every village and district in that province was ruined through the
    oppression of the English, the subjects of the Sarkar were deprived of their
    daily bread, and the collection of the revenues was entirely stopped, so that
    His Excellency lost nearly a crore of rupees . . . ."—Calender of Persian
    Correspondence, p. 194. No. 1695.

मीर क़ासिम १७७

६ फ़ीसदी महसूल दिया करें और हिन्दोस्तानी व्यापारी इन्हीं तमाम
चीज़ों पर २५ फ़ीसदी महसूल दिया करें। भारतीय व्यापारियों के
साथ यह घोर अन्याय था, फिर भी मीर क़ासिम ने शान्ति
बनाए रखने की इच्छा से उसे स्वीकार कर लिया।
वन्सीडॉर्ट और हेस्टिंग्स दोनों ने सन्धिपत्र पर हस्ताक्षर किए
और दोनों ने कलकत्ता कौन्सिल के नाम अपने १५ दिसम्बर के पत्र
में इस सन्धि की 'न्याय्यता' और 'उदारता' और मीर क़ासिम की
'सच्चाई' तीनों की साफ़ शब्दों में तारीफ़ की है। वन्सीटॉर्ट ने
मीर क़ासिम से वादा किया कि कलकत्ते पहुंच कर मैं कम्पनी
और सरकार के बीच के सब मामले तय कर दूँगा। किन्तु कलकत्ते
वापस पहुँचते ही बजाय 'सब मामला तय' करने के गवरनर
वन्सीडॉर्ट ने कम्पनी और उसके आदमियों की धींगाधींगी को
पहले की तरह जारी रखने के लिए जगह जगह नई फ़ौजें रवाना
कर दीं। इसके साथ साथ कलकत्ते की अंगरेज़ कौन्सिल ने
अपना बाज़ाब्ता इजलास करके फ़ौरन तमाम अंगरेज़ी कोठियों
और उनके गुमाश्तों के पास यह खुली हिदायतें भेज दीं कि मुंगेर
की शर्तों पर हरगिज़ कोई अमल न करे और यदि नवाब के कर्म-
चारी अमल कराने पर ज़ोर दें तो उनकी खूब गत बनाई जावे।
इसी इजलास में यह भी कहा गया कि मुंगेर की सन्धि पर हस्ताक्षर
करने के लिए वन्सीटाँर्ट ने नवाब मीर क़ासिम से सात लाख रुपए
रिश्वत ली थी। जो हो, सन्धि पत्र की स्याही अभी सूखने भी न
पाई थी कि सन्धि तोड़ दी गई। नवाब के कर्मचारी यदि कोई
१२

१७८ भारत में अंगरेज़ी राज
बोलते थे या महसूल माँगते थे तो पहले की तरह उन पर मार
पड़ती थी। मीर क़ासिम ने वन्सीटॉर्ट को ५ मार्च सन् १७६३ के पत्र
में फिर लिखा कि :—
“तीन साल से सरकार को अंगरेज़ों से एक भी पाई या एक भी चीज़
नहीं मिली, इसके ख़िलाफ़ सरकार के कर्मचारियों से अंगरेज़ बराबर जुर्माने
और हरजाने वसूल कर रहे हैं।”
मीर क़ासिम ने बार बार शिकायत की किन्तु कोई फल न
[हाशिया: मीर क़ासिम का] हुआ। विदेशी व्यापारियों का बिना महसूल
[हाशिया: चुंगी उठवा देना] व्यापार करना और देशी व्यापारियों से भारी
महसूल वसूल किया जाना दोनों बराबर जारी
रहे। इस अन्याय द्वारा देशी व्यापारियों का अस्तित्व ही मिटता
जा रहा था। अन्त को मजबूर होकर और देशी व्यापारियों को
जीवित रखने का और कोई उपाय न देख २२ मार्च सन् १७६३
को मीर क़ासिम ने अपनी सूबेदारी भर में चुंगी की तमाम चौकियों
के उठवा दिए जाने का हुकुम दे दिया और सूबे भर में एलान कर
दिया कि आज से दो साल तक किसी तरह के तिजारती माल पर
किसी से किसी तरह का भी महसूल न लिया जाय। मीर क़ासिम
की सालाना आमदनी को इससे ज़बरदस्त धक्का पहुँचा, किन्तु
देशी व्यापारियों को अन्याय से बचाने और उन्हें ज़िन्दा रखने का
मीर क़ासिम को और कोई उपाय न सूझ सकता था। इस आज्ञा
से मीर क़ासिम की बेबसी और उसकी प्रजा पालकता दोनों प्रकट
होती हैं।

मीर क़ासिम १७६
हज़ारों हिन्दोस्तानी व्यापारियों को इस एलान से लाभ हुआ।
[बंगाल में फिर से खुशहाली] वे अंगरेज़ों से कम ख़र्च में ज़िन्दगी बसर कर
सकते थे और अपना माल सस्ता बेचकर भी
लाभ कमा सकते थे। तिजारत का दरवाज़ा
एक बार फिर बिल्कुल खुल गया, फिर चारों ओर से आ आकर
बंगाल में व्यापारियों की संख्या बढ़ने लगी और देश की तिजारत
और कृषि दोनों फिर ज़ोरों के साथ उन्नति करने लगीं। अंगरेज़ों
को यह कब गवारा हो सकता था। फ़ौरन कलकत्ते में फिर
कौन्सिल का इजलास हुआ। तय हुआ कि नवाब की नई आज्ञा
नाजायज़ है और नवाब को मजबूर किया जाय कि अपनी इस
आज्ञा को वापस लेकर देशी व्यापारियों से पहले की तरह महसूल
वसूल करे। ऐमयाट और हे नाम के दो अंगरेज़ मुंगेर जाकर नवाब
से मिलने और सब बातें नए सिरे से तय करने के लिए नियुक्त हुए।
बंगाल की प्रजा के साथ अत्याचारों और बंगाल के शासक
[दूसरा सूबेदार खड़ा करने की तजवीज़] के साथ ज़बरदस्तियों का प्याला अब लबालब
भर चुका था। मीर क़ासिम को यह भी मालूम
था कि बंगाल के तीनों प्रान्तों की दीवानी के
अधिकार प्राप्त करने के लिए दिल्ली सम्राट के साथ अंगरेज़ों का
गुप्त पत्र व्यवहार बराबर जारी है। मीर क़ासिम और वन्सीटॉर्ट के
दरमियान इस समय जो पत्र व्यवहार हुआ वह पढ़ने के योग्य है।
मीर क़ासिम ने बार बार अपने कर्मचारियों और अपनी प्रजा के
ऊपर अंगरेज़ों के अत्याचारों की शिकायतें कीं। अत्यन्त दर्द भरे

१८० भारत में अंग्रेज़ी राज
शब्दों में उसने लिखा कि—"कम्पनी के जो तिलंगे सिपाही सम्राट
और सूबेदार की सहायता के लिए कह कर रक्खे गए थे और
जिनके ख़र्च के लिए मैं कम्पनी को पचास लाख रुपए की ज़मींदारी
दे चुका हूँ वे अब देश भर में मेरे और मेरे आदमियों के विरुद्ध
काम में लाए जा रहे हैं।" अन्त को एक पत्र में उसने साफ़ साफ़
लिखा कि—"मुझे मालूम हुआ है कि बहुत से अंगरेज़ एक दूसरा
सूबेदार खड़ा करना चाहते हैं। × × × हर शख़्स पर ज़ाहिर है
कि यूरोपवालों का एतबार नहीं किया जा सकता।"
मीर क़ासिम के साथ अंगरेज़ों के इस समय के व्यवहार की
आलोचना करते हुए मालेसन लिखता है :—
"जो अनुचित, नीच और शर्मनाक कार्रवाइयाँ मीर जाफ़र को मसनद
से हटाने के बाद तीन साल तक कलकत्ते की अंगरेज़ गवरमेण्ट ने कीं उनसे
अधिक अनुचित, अधिक नीच और अधिक शर्मनाक कार्रवाइयों की मिसालें
किसी भी क़ौम के इतिहास में नहीं मिलतीं।"*
मालेसन यह भी लिखता है कि—"मीर क़ासिम का एक मात्र
क़सूर यह था कि उसने यूरोप निवासियों की लूट से अपनी प्रजा
की रक्षा करने की कोशिश की।"† इस पर भी "मीर क़ासिम
*" The annals of no nation contain records of conduct more unworthy,
more mean, and more disgraceful, than that which characterised the English
Government of Calcutta during the three years which followed the removal
of Mir Jaffar."—The Decisive Battles of India, p. 133.
† " Whose only fault . . . was his endeavour to protect his
subjects from European extortion."—Ibid, p. 136.

मीर क़ासिम १८१
अपनी स्वाधीनता और प्रजा के सुख इन दोनों का नाश किए बिना
और किसी भी क़ीमत पर अंगरेज़ों के साथ अमन से रहने को
उत्सुक था।"*
किन्तु मीर क़ासिम के विरुद्ध साज़िश अभी पूरी तरह पकने न
पाई थी, इसलिए उसके अन्तिम पत्र के उत्तर में वन्सीटॉर्ट ने मीर
क़ासिम को लिख दिया—"यह क़िस्सा कि अंगरेज़ दूसरा नाज़िम
खड़ा करना चाहते हैं, चालबाज़ लोगों की मनगढ़न्त है x x x।"
इसके बाद जब वन्सीटॉर्ट ने मीर क़ासिम को लिखा कि
[हाशिया: मीर क़ासिम से नई नई माँगें] ऐमयाट और हे एक नई सन्धि करने के लिए
मुंगेर भेजे गए हैं तो मीर क़ासिम ने उत्तर में
लिखा कि—"हर साल नई सन्धि करना क़ायदे
के ख़िलाफ़ है, क्योंकि इनसानों की सन्धियों की कुछ उमरें होती
हैं।" उसने यह भी लिखा कि—"एक ओर आप चारों तरफ़ फ़ौजें
भेज रहे हैं और दूसरी ओर मुझसे बातचीत करने के लिए आदमी
भेज रहे हैं।"
ऐमयाट और हे का मुंगेर भेजना केवल एक चाल थी। बंगाल
के अंदर इस तीसरी बग़ावत के लिए अंगरेज़ों की तैयारी जोरों के
साथ जारी थी।
मीर क़ासिम को इतने में पता चला कि मेरे विरुद्ध साज़िशों
का जाल स्वयं मेरी राजधानी के अंदर पूरा फैल चुका है। वही

  • "Mir Kassim, still anxious for peace at any price short of sacrificing
    his own independence and the happiness of his people."—Ibid p. 140.

१८२ भारत में अंगरेज़ी राज
जैन जगतसेठ, जो छै साल पहले सिराजुद्दौला के पतन में अंगरेज़ों
का सहायक हुआ था, अब फिर इस नई साज़िश में शामिल था।
पता चलते ही मीर क़ासिम ने जगतसेठ और उसके भाई स्वरूप-
चन्द दोनों को मुंगेर बुलाकर नज़रबन्द कर दिया। ये दोनों भाई
मीर क़ासिम की प्रजा थे। अंगरेज़ों को इस पर एतराज़ करने का
कोई हक़ न था, किन्तु वन्सीटार्ट ने इस पर भी एतराज़ किया।
इस बीच ऐमयाट और हे दोनों दूत मुंगेर पहुँच गए। २५ मई
सन् १७६३ को इन दोनों ने कम्पनी की ओर से ११ नई माँगें लिख
कर मीर क़ासिम के सामने पेश कीं—(१) यह कि अंगरेज़
कौन्सिल ने तिजारती महसूल और एजन्टों के बारे में जो कुछ तय
किया है, नवाब उसे ज्यों का त्यों लिखकर स्वीकार करे, (२) यह
कि नवाब अपनी प्रजा यानी देशी व्यापारियों पर नए सिरे से
महसूल लगावे और अंगरेज़ों की बिना महसूल तिजारत जारी रहे,
(३) यह कि अंगरेज़ों और उनके जिन जिन आदमियों को नई
आज्ञा से व्यापारिक नुक़सान हुआ है, नवाब उन सब का हरजाना
पूरा करे, (४) यह कि नवाब अपने उन सब कर्मचारियों को
जिन्हें अंगरेज़ कहें दंड दे। इत्यादि, इत्यादि।
निस्सन्देह कोई स्वाभिमानी शासक इन शर्तों को स्वीकार न
कर सकता था। ऐमयाट का व्यवहार नवाब के
[हाशिया: हथियारों से भरी] साथ अत्यन्त रूखा और धृष्टतापूर्ण था। यहाँ
[हाशिया: हुई किश्तियाँ] तक कि उसने मीर क़ासिम की शिकायतें सुनने
तक से इनकार कर दिया। वास्तव में अंगरेज़ युद्ध चाहते थे और

मीर क़ासिम १८३

युद्ध की पूरी तैयारी कर चुके थे। १४ अप्रैल सन् १७६३ ही को
अंगरेज़ों ने अपनी सेना को तैयार हो जाने की आज्ञा दे दी थी।
पटने में एलिस नामक एक अंगरेज़ कम्पनी के एजन्ट की हैसियत
से रहता था। एलिस ने वहाँ के नायब नाज़िम को दिक़ करना
और बात बात में उसकी आज्ञाओं का उल्लंघन करना शुरू कर
दिया था। मीर क़ासिम ने अनेक बार वन्सीटॉर्ट से एलिस के
व्यवहार की शिकायत की, किन्तु व्यर्थ। अब कलकत्ते से एलिस
को लिख दिया गया कि तुम आज्ञा पाते ही पटने पर क़ब्ज़ा करने
के लिए तैयार रहो। कम्पनी की काफ़ी सेना पहले ही पटने पहुँचा
दी गई थी। उधर ऐमयाट साहब सुलह के लिए मुंगेर में ठहरे हुए
थे और इधर हथियारों से भर ई कई किश्तियाँ एलिस की मदद
के लिए कलकत्ते से पटने की ओर जा रही थीं। जब ये किश्तियाँ
मुंगेर के पास से निकलीं, नवाब उन्हें देखकर चौंक गया। उसने
किश्तियों को आगे बढ़ने से रोक दिया और २ जून सन् १७६३
को वन्सीटॉर्ट को लिखा कि—"कम्पनी की नई माँगें बेजा और
पहली सन्धियों के विरुद्ध हैं × × × पटने की अंगरेज़ी फ़ौज या
तो कलकत्ते वापस बुला ली जावे और या मुंगेर में रक्खी जावे,
नहीं तो मैं निज़ामत छोड़ दूँगा।"
इसके जवाब में ऐमयाट ने मीर क़ासिम से साफ़ साफ़ कहा
कि बजाय वापस बुलाने के पटने में अंगरेज़ी फ़ौज बढ़ाई जायगी।
हथियारों की किश्तियाँ मुंगेर में रुकते ही कलकत्ते की कौन्सिल ने,
जो केवल एक बहाने के इन्तज़ार में थी, ऐमयाट और हे को वापस

१८४ भारत में अंग्रेज़ी राज
बुला लिया और एलिस को आज्ञा दे दी कि तुम फ़ौरन पटने पर
हमला करके नगर पर क़ब्ज़ा कर लो ।
२४ जून की रात को अचानक हमला करके एलिस ने पटने पर
[पटने पर अचानक] क़ब्ज़ा कर लिया । मीर क़ासिम की बरदाश्त
[रात के समय] की कोई हद न थी। इतिहास लेखक ऐल्फ़िन्स्टन
[हमला] लिखता है कि—"उसे ग़ुस्सा आने के बेशुमार
कारण थे, फिर भी उसने धैर्य और बरदाश्त से
काम लिया ।"* किन्तु अब मजबूर होकर उसे एलिस के विरुद्ध
सेना भेजनी पड़ी। मीर क़ासिम की सेना ने पटने पहुँच कर फिर
से नगर अंग्रेज़ों से विजय कर लिया। इस बार की लड़ाई में
कम्पनी के क़रीब ३०० यूरोपियन और ढाई हज़ार हिन्दोस्तानी
सिपाही काम आए। एलिस और उसके कई यूरोपियन साथी
पहिली जुलाई को क़ैद करके मुंगेर पहुँचा दिए गए।
ऐमयाट चुपके से किश्ती में बैठकर कलकत्ते की ओर भाग
गया। मीर क़ासिम ने हे को मुंगेर में रोक लिया।
[ऐमयाट की] मालूम होता है मीर क़ासिम ने अपने आदमियों
[मृत्यु] को हुकुम भेज दिया कि ऐमयाट को भी रोक कर
वापस मुंगेर भेज दिया जाए। क़ासिमबाज़ार के निकट नवाब के
एक कर्मचारी मोहम्मद तक़ी ख़ाँ ने अपने एक आदमी को भेजकर

  • " . . . He conducted himself under innumerable provocations
    with temper and forbearance, . . ."—Rise of the British power in India
    by Elphinstone, pp. 390, 391.

मीर क़ासिम
[ श्री बहादुर सिंह सिंघी, कलकत्ता, की कृपा द्वारा,
एक प्राचीन चित्र से ]

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मीर क़ासिम १८५

ऐमयाट से खाना खाने के बहाने किनारे पर आने की प्रार्थना की।
ऐमयाट ने इनकार किया और उसकी किश्तियाँ बीच धार से
चलती रहीं। एक दूसरा उच्च कर्मचारी भेजा गया, जिसने किनारे
से फिर कहा कि खाना तैयार है और यदि आप सेनापति मोहम्मद
तक़ी ख़ाँ की प्रार्थना स्वीकार न करेंगे तो उन्हें दुख होगा। ऐमयाट
ने फिर इनकार कर दिया। इसके बाद किनारे के अफ़सरों ने
किश्तियों को रुकने का स्पष्ट हुकुम दिया। जवाब में ऐमगाट ने
वहीं से किनारे की ओर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। नवाब
के आदमियों ने अब ज़बरदस्ती किश्तियों पर पहुँच कर बदला
लिया। उस लड़ाई में ऐमयाट का भी वहीं पर काम तमाम होगया।
२८ जून को मीर क़ासिम ने वन्सीटॉर्ट और उसकी कौन्सिल के
नाम यह पत्र लिखा :—
[हाशिया: मीर क़ासिम की] “ × × × रात को डाकू की तरह मिस्टर एलिस
[हाशिया: प्रजा के साथ ज़ुल्म] ने पटने के क़िले पर हमला किया, वहाँ के बाज़ार को
[हाशिया: और ज़्यादतियाँ] और तमाम व्यापारियों और नगर के लोगों को लूटा
और सुबह से तीसरे पहर तक लूट और क़त्ल जारी रक्खी । × × × चूंकि
आप लोगों ने बेइंसाफ़ी और ज़ुल्म के साथ शहर को रौंद डाला है, लोगों को
बरबाद किया है और कई लाख का माल लूट लिया है, इसलिए अब इंसाफ़
यह है कि कम्पनी ग़रीबों का नुक़सान भर दे, जैसा पहले कलकत्ते में हो
चुका है। आप ईंसाई लोग विचित्र दोस्त निकले। आपने सन्धि की, उस
पर ईसा मसीह के नाम से क़सम खाई। इस शर्त पर कि आपकी सेना सदा
मेरा साथ देगी और मेरी सहायता करेगी, आपने अपनी सेना के ख़र्च के लिए

१८६ भारत में अंगरेज़ी राज
मुझसे इलाक़ा लिया। असलियत में मेरे ही नाश के लिए आप फ़ौज रख
रहे थे, क्योकि उसी फ़ौज के हाथों ये सब कार्य हुए हैं x x x इसके
अलावा कई साल से अंगरेज़ गुमाश्तों ने मेरी निज़ामत के अन्दर जो जो
ज़ुल्म और ज़्यादतियों की हैं, जो बड़ी बड़ी रक़में लोगों से ज़बरदस्ती वसूल
की हैं और जो नुक़सान किए हैं मुनासिब और इंसाफ़ यह है कि कम्पनी इस
समय उस सबका हरजाना दे। आपको सिर्फ़ इतनी ही तकलीफ़ करने की
ज़रूरत है कि जिस तरह से बर्धमान और दूसरे इलाक़े आपने लिए थे उसी
तरह मुझपर इनायत करके आप उन्हें वापस लौटा दीजिए।”*
निस्सन्देह मजबूर होकर मीर क़ासिम ने अब कड़ाई का निश्चय
कर लिया।
७ जुलाई को यह पत्र कलकत्ते पहुँचा। उसी रोज़ कलकत्ते की
[हाशिया: मीरजाफ़र के साथ दोबारा साज़िश] अंगरेज़ कौन्सिल की ओर से मीर क़ासिम के साथ युद्ध का एलान प्रकाशित हुआ, जिसमें प्रजा को
यह सूचना दी गई कि मीर क़ासिम की जगह
मीर जाफ़र को अब फिर से बंगाल की मसनद पर बैठा दिया
गया है। नवाब मीर जाफ़र ही के नाम पर बंगाल भर से सेना
जमा की गई और मीर जाफ़र ही के नाम पर प्रजा से अंगरेज़ी
सेना का साथ देने के लिए कहा गया। किन्तु इस बाक़ायदा
एलान से पहले ही पटना विजय हो चुका था और फिर से छिन
भी चुका था। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि कलकत्ते के
अंगरेज़ व्यापारियों की कौन्सिल को बंगाल के सूबेदार को मसनद


  • Long's Selections, pp. 325, 326.