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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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मीर क़ासिम १७७

६ फ़ीसदी महसूल दिया करें और हिन्दोस्तानी व्यापारी इन्हीं तमाम
चीज़ों पर २५ फ़ीसदी महसूल दिया करें। भारतीय व्यापारियों के
साथ यह घोर अन्याय था, फिर भी मीर क़ासिम ने शान्ति
बनाए रखने की इच्छा से उसे स्वीकार कर लिया।
वन्सीडॉर्ट और हेस्टिंग्स दोनों ने सन्धिपत्र पर हस्ताक्षर किए
और दोनों ने कलकत्ता कौन्सिल के नाम अपने १५ दिसम्बर के पत्र
में इस सन्धि की 'न्याय्यता' और 'उदारता' और मीर क़ासिम की
'सच्चाई' तीनों की साफ़ शब्दों में तारीफ़ की है। वन्सीटॉर्ट ने
मीर क़ासिम से वादा किया कि कलकत्ते पहुंच कर मैं कम्पनी
और सरकार के बीच के सब मामले तय कर दूँगा। किन्तु कलकत्ते
वापस पहुँचते ही बजाय 'सब मामला तय' करने के गवरनर
वन्सीडॉर्ट ने कम्पनी और उसके आदमियों की धींगाधींगी को
पहले की तरह जारी रखने के लिए जगह जगह नई फ़ौजें रवाना
कर दीं। इसके साथ साथ कलकत्ते की अंगरेज़ कौन्सिल ने
अपना बाज़ाब्ता इजलास करके फ़ौरन तमाम अंगरेज़ी कोठियों
और उनके गुमाश्तों के पास यह खुली हिदायतें भेज दीं कि मुंगेर
की शर्तों पर हरगिज़ कोई अमल न करे और यदि नवाब के कर्म-
चारी अमल कराने पर ज़ोर दें तो उनकी खूब गत बनाई जावे।
इसी इजलास में यह भी कहा गया कि मुंगेर की सन्धि पर हस्ताक्षर
करने के लिए वन्सीटाँर्ट ने नवाब मीर क़ासिम से सात लाख रुपए
रिश्वत ली थी। जो हो, सन्धि पत्र की स्याही अभी सूखने भी न
पाई थी कि सन्धि तोड़ दी गई। नवाब के कर्मचारी यदि कोई
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