भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 430, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ भारत में अंगरेज़ी राज
बोलते थे या महसूल माँगते थे तो पहले की तरह उन पर मार
पड़ती थी। मीर क़ासिम ने वन्सीटॉर्ट को ५ मार्च सन् १७६३ के पत्र
में फिर लिखा कि :—
“तीन साल से सरकार को अंगरेज़ों से एक भी पाई या एक भी चीज़
नहीं मिली, इसके ख़िलाफ़ सरकार के कर्मचारियों से अंगरेज़ बराबर जुर्माने
और हरजाने वसूल कर रहे हैं।”
मीर क़ासिम ने बार बार शिकायत की किन्तु कोई फल न
[हाशिया: मीर क़ासिम का] हुआ। विदेशी व्यापारियों का बिना महसूल
[हाशिया: चुंगी उठवा देना] व्यापार करना और देशी व्यापारियों से भारी
महसूल वसूल किया जाना दोनों बराबर जारी
रहे। इस अन्याय द्वारा देशी व्यापारियों का अस्तित्व ही मिटता
जा रहा था। अन्त को मजबूर होकर और देशी व्यापारियों को
जीवित रखने का और कोई उपाय न देख २२ मार्च सन् १७६३
को मीर क़ासिम ने अपनी सूबेदारी भर में चुंगी की तमाम चौकियों
के उठवा दिए जाने का हुकुम दे दिया और सूबे भर में एलान कर
दिया कि आज से दो साल तक किसी तरह के तिजारती माल पर
किसी से किसी तरह का भी महसूल न लिया जाय। मीर क़ासिम
की सालाना आमदनी को इससे ज़बरदस्त धक्का पहुँचा, किन्तु
देशी व्यापारियों को अन्याय से बचाने और उन्हें ज़िन्दा रखने का
मीर क़ासिम को और कोई उपाय न सूझ सकता था। इस आज्ञा
से मीर क़ासिम की बेबसी और उसकी प्रजा पालकता दोनों प्रकट
होती हैं।