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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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मीर क़ासिम १७६
हज़ारों हिन्दोस्तानी व्यापारियों को इस एलान से लाभ हुआ।
[बंगाल में फिर से खुशहाली] वे अंगरेज़ों से कम ख़र्च में ज़िन्दगी बसर कर
सकते थे और अपना माल सस्ता बेचकर भी
लाभ कमा सकते थे। तिजारत का दरवाज़ा
एक बार फिर बिल्कुल खुल गया, फिर चारों ओर से आ आकर
बंगाल में व्यापारियों की संख्या बढ़ने लगी और देश की तिजारत
और कृषि दोनों फिर ज़ोरों के साथ उन्नति करने लगीं। अंगरेज़ों
को यह कब गवारा हो सकता था। फ़ौरन कलकत्ते में फिर
कौन्सिल का इजलास हुआ। तय हुआ कि नवाब की नई आज्ञा
नाजायज़ है और नवाब को मजबूर किया जाय कि अपनी इस
आज्ञा को वापस लेकर देशी व्यापारियों से पहले की तरह महसूल
वसूल करे। ऐमयाट और हे नाम के दो अंगरेज़ मुंगेर जाकर नवाब
से मिलने और सब बातें नए सिरे से तय करने के लिए नियुक्त हुए।
बंगाल की प्रजा के साथ अत्याचारों और बंगाल के शासक
[दूसरा सूबेदार खड़ा करने की तजवीज़] के साथ ज़बरदस्तियों का प्याला अब लबालब
भर चुका था। मीर क़ासिम को यह भी मालूम
था कि बंगाल के तीनों प्रान्तों की दीवानी के
अधिकार प्राप्त करने के लिए दिल्ली सम्राट के साथ अंगरेज़ों का
गुप्त पत्र व्यवहार बराबर जारी है। मीर क़ासिम और वन्सीटॉर्ट के
दरमियान इस समय जो पत्र व्यवहार हुआ वह पढ़ने के योग्य है।
मीर क़ासिम ने बार बार अपने कर्मचारियों और अपनी प्रजा के
ऊपर अंगरेज़ों के अत्याचारों की शिकायतें कीं। अत्यन्त दर्द भरे