भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमीर क़ासिम १८१
अपनी स्वाधीनता और प्रजा के सुख इन दोनों का नाश किए बिना
और किसी भी क़ीमत पर अंगरेज़ों के साथ अमन से रहने को
उत्सुक था।"*
किन्तु मीर क़ासिम के विरुद्ध साज़िश अभी पूरी तरह पकने न
पाई थी, इसलिए उसके अन्तिम पत्र के उत्तर में वन्सीटॉर्ट ने मीर
क़ासिम को लिख दिया—"यह क़िस्सा कि अंगरेज़ दूसरा नाज़िम
खड़ा करना चाहते हैं, चालबाज़ लोगों की मनगढ़न्त है x x x।"
इसके बाद जब वन्सीटॉर्ट ने मीर क़ासिम को लिखा कि
[हाशिया: मीर क़ासिम से नई नई माँगें] ऐमयाट और हे एक नई सन्धि करने के लिए
मुंगेर भेजे गए हैं तो मीर क़ासिम ने उत्तर में
लिखा कि—"हर साल नई सन्धि करना क़ायदे
के ख़िलाफ़ है, क्योंकि इनसानों की सन्धियों की कुछ उमरें होती
हैं।" उसने यह भी लिखा कि—"एक ओर आप चारों तरफ़ फ़ौजें
भेज रहे हैं और दूसरी ओर मुझसे बातचीत करने के लिए आदमी
भेज रहे हैं।"
ऐमयाट और हे का मुंगेर भेजना केवल एक चाल थी। बंगाल
के अंदर इस तीसरी बग़ावत के लिए अंगरेज़ों की तैयारी जोरों के
साथ जारी थी।
मीर क़ासिम को इतने में पता चला कि मेरे विरुद्ध साज़िशों
का जाल स्वयं मेरी राजधानी के अंदर पूरा फैल चुका है। वही
- "Mir Kassim, still anxious for peace at any price short of sacrificing
his own independence and the happiness of his people."—Ibid p. 140.