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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

१४६ भारत में अंगरेज़ी राज
जो कम्पनी को मिले इन लोगों ने अपने ऐसे मित्र और सहायक को बेच
दिया जो इन पर हद से ज़्यादा विश्वास करता था ।”*

  • "The iniquity of this transaction finds few apologists even among
    those who have taken upon themselves to dress and to enamel Oriental deeds
    for European view. The treaty with Mir Jaffir still subsisted ; . . . He
    was the sworn and bloodknit ally of the Company ; and if ever men were
    bound by decency to maintain at least the forms of good faith, the Governor
    and Council of Calcutta were so bound. Yet, being so, for the sum of
    £s. 200,000 to them privately paid, and for the cession of three rich and
    populous provinces, they sold their too confiding friend and ally "—Empire
    in Asia, by W. M. Torrens M. P. p. 42.

चौथा अध्याय
———
मीर क़ासिम
मुर्शिदाबाद के दरबार और बंगाल की प्रजा दोनों की हालत
मीर क़ासिम के मसनद पर बैठते ही और अधिक
[हाशिया: बंगाल की हालत] शोचनीय होती गई। सब से पहले मीर क़ासिम
ने देखा कि राज की आर्थिक अवस्था अत्यन्त
बिगड़ी हुई थी। सरकारी मालगुज़ारी ठीक तौर पर वसूल न हो
रही थी। खज़ाना क़रीब क़रीब खाली था। सालाना खर्च आमद
से बढ़ गया था, और फ़ौज की कई महीने की तनख़ाहें चढ़ी हुई
थीं। इसके अलावा ठीक मीर जाफ़र के समान मीर क़ासिम ने
अब महसूस किया कि जो बड़े बड़े वादे उसने अंगरेज़ों के साथ
कर रक्खे थे उन्हें पूरा करना इतना आसान न था। इन वादों और
दूसरी नई नई माँगों को पूरा करने के लिए मीर क़ासिम ने अपने
यहाँ के ज़मींदारों और रईसों को अंगरेज़ों ही के सिपाहियों की

१४८ भारत में अंगरेज़ी राज
मारफ़त बुला बुला कर ज़बरदस्ती उनसे रक़में वसूल करना शुरू
किया। जब इससे भी काम न चल सका तो उसे जगतसेठ से क़र्ज़
लेना पड़ा और अन्त में अंगरेज़ों को रक़में देने के लिए रियासत के
जवाहरात बेचकर और महल के सोने चाँदी के बरतन गलवा कर
सिक्के ढलवाने पड़े।
कम्पनी की टकसाल कलकत्ते में क़ायम हो चुकी थी। किन्तु
कम्पनी के खोटे अंगरेज़ों ने मीर क़ासिम की इस शर्त की बिल्कुल
सिक्के परवाह न की कि जो सिक्के कलकत्ते में ढाले
जावें वह मुर्शिदाबाद की सरकारी टकसाल के
सिक्कों के समान वज़न और समान धातु के हों। अंगरेज़
बराबर अपनी टकसाल में घटिया सिक्के ढालते रहे। नतीजा
यह हुआ कि बावजूद मीर क़ासिम की कड़ी आज्ञाओं के प्रजा ने
कलकत्ते के सिक्कों को बिना बट्टे के लेने से इनकार किया। इस
पर अंगरेज़ों ने मीर क़ासिम से प्रार्थना की कि जो सिक्के हम
कलकत्ते में ढालें उन पर भी हमें मुर्शिदाबाद का नाम और मुर्शिदा-
बाद ही की छाप रखने की इजाज़त दी जावे। मीर क़ासिम ने इस
जाली काररवाई को तो मंज़ूर न किया, किन्तु उसने अंगरेज़ों को
सन्तुष्ट करने के लिए कलकत्ते के सिक्कों को लेने से इनकार करने
वाले या उन पर बट्टा माँगने वाले ज़मींदारों और अन्य लोगों को
सज़ाएं देना शुरू कर दिया। इन सख्तियों की वजह से अनेक
ज़मींदार मीर क़ासिम से असन्तुष्ट हो गए, यहाँ तक कि कई जगह
नए नवाब के ख़िलाफ़ बगावत की तैयारियाँ होने लगीं।

मीर क़ासिम १४६
कुछ साल पहले कम्पनी का क़र्ज़ चुकाने के लिए मीर जाफ़र
ने बर्धमान के इलाक़े की मालगुज़ारी कम्पनी
[margin: बर्धमान में कम्पनी के अत्याचार] के नाम कर दी थी। उस समय से बर्धमान
का इलाक़ा अंगरेज़ों के इन्तज़ाम में था और
कम्पनी के सिपाहियों ने, जिनमें अधिकांश मद्रास से लाए गए थे,
उस इलाके भर में लूट मार जारी कर रक्खी थी। इन तिलंगे
सिपाहियों के अत्याचारों की शिकायत करते हुए सितम्बर सन्
१७६० में वर्धमान के ज़मींदार राजा तिलकचन्द ने कलकत्ते की
अंगरेज़ कमेटी को लिखा :—
"अनेक तिलंगों ने मण्डलघाट, मानकर, जहानाबाद, चितवर, बरसात,
बलगुरी और चोमहैन के परगनों और दूसरे स्थानों में घुसकर वहाँ के
बाशिंदों को लूट लिया है और उनके साथ इस तरह के ज़ुल्म किए हैं
जिनसे लोगों की जान तक ख़तरे में पड़ गई है। इन ज़ुल्मों से मजबूर होकर
वहाँ के बाशिंदे गाँव छोड़ कर भाग गए हैं और उन मौज़ों की मालगुज़ारी में
दो या तीन लाख रुपए का नुक़सान हुआ है।"*
इस पर भी इन तिलंगों की लूट मार जारी रही और राजा
तिलकचन्द को कुछ समय बाद फिर लिखना पड़ा :—
"तिलंगों के व्यवहार से रय्यत को ज़बरदस्त कष्ट हो रहा है और मजबूर
होकर रय्यत अपने घर बार छोड़ छोड़ कर भाग रही है।"*
किन्तु कम्पनी ने इन शिकायतों की ओर कुछ भी ध्यान न दिया।
लिखा है कि बर्धमान के कई परगने इस समय वीरान पड़े हुए थे।

  • Long's Records p. 236.

१५० भारत में अंगरेज़ी राज
अब मीर क़ासिम ने यह तमाम इलाक़ा हमेशा के लिए कम्पनी
को सौंप दिया और वहाँ के ज़मींदार को अंगरेज़ों के अधीन कर
दिया। जब यह नया परवाना राजा तिलकचन्द के पास पहुँचा
तो उसे दुख होना स्वाभाविक था। उसने गवर्नर वन्सीटार्ट को
अपनी ज़मींदारी की शोचनीय अवस्था की फिर से इत्तला दी और
अपने यहाँ की मालगुज़ारी का सब हिसाब भेज दिया।
वन्सीटार्ट ने किसी तरह उसकी मदद न की और न कम्पनी
[हाशिया: वर्धमान और बीर] के सिपाहियों के अत्याचार बन्द हुए। मजबूर
[हाशिया: भूम पर कम्पनी] होकर कहा जाता है राजा तिलकचन्द ने बीरभूम
[हाशिया: का क़ब्ज़ा] के राजा के साथ मिलकर अंगरेज़ों और मीर
क़ासिम दोनों से लड़ने के लिए फ़ौज जमा करना
शुरू किया। इस पर कलकत्ते की कौंसिल ने “वर्धमान और मेदनीपुर
के इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करने के लिए” कप्तान व्हाइट के अधीन कुछ
सेना बर्धमान भेजी। राजा तिलकचन्द के एक पत्र से मालूम होता
है कि इस सेना ने भी मार्ग भर में असहाय ग्रामवासियों पर तरह
तरह के ज़ुलम किए, उन्हें खूब लूटा और खूब खून बहाया।
२८ दिसम्बर सन् १७६० को कप्तान व्हाइट की सेना और
बर्धमान के राजा की सेना में लड़ाई हुई, जिसमें राजा की सेना
हार गई। अंगरेज़ी सेना का एक हिस्सा बीरभूम की राजधानी
नागौर पर क़ब्ज़ा करने के लिए भेज दिया गया। वहाँ का राजा
अपनी राजधानी छोड़कर पहाड़ों की ओर भाग गया और बर्धमान
तथा नागौर दोनों पर कम्पनी का क़ब्ज़ा हो गया।

मीर क़ासिम १५१
आए दिन के राज परिवर्तन की वजह से बंगाल के शासन की
अवस्था अत्यन्त अस्तव्यस्त हो रही थी। कम्पनी की व्यापार
सम्बन्धी ज़बरदस्तियाँ बंगाल भर में ज़ोरों के साथ बढ़ रही थीं।
अंगरेज़ों ने जो क़रीब तीस हज़ार नई सेना मीर क़ासिम और
सम्राट की सहायता के नाम पर और साम्राज्य की रक्षा के लिए
कहकर जमा कर रक्खी थी, जिसके ख़र्च के लिए मीर क़ासिम
से तीन बड़े बड़े ज़िले लिए गए थे, वह सब अब सूबे भर में इन
ज़बरदस्तियों को जारी रखने के लिए काम में लाई जा रही थी।
प्राचीन भारतीय नरेशों के अधीन राज की आमदनी का एक
[हाशिया: महसूल की माफ़ी] बहुत बड़ा ज़रिया तिजारती माल का महसूल
[हाशिया: और उसका] था। मुग़ल सम्राटों के अधीन ईरान, अरब,
[हाशिया: दुरुपयोग] मिश्र, इतालिया, स्पेन, पुर्तगाल, इङ्गलिस्तान,
बर्मा, चीन, जापान इत्यादि अनेक बाहर के मुल्कों
के साथ और स्वयं भारत के अन्दर भारतीय तिजारत बेहद बढ़ी
हुई थी, जिसमें हज़ारों भारतीय जहाज़ हर साल लगे रहते थे और
हर व्यापारी को अपना माल एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में
सरकारी महसूल देना पड़ता था। केवल ईस्ट इण्डिया कम्पनी के
लिए मुग़ल सम्राट ने खुश होकर यह महसूल माफ़ कर दिया था।
इस माफ़ी का मतलब यह था कि कम्पनी अगर विलायत से कोई
माल लाकर हिन्दोस्तान में बेचना चाहे या हिन्दोस्तान का बना
माल ख़रीद कर विलायत ले जाना चाहे तो उस माल पर कोई
महसूल न लिया जावे। शाही फ़रमान में कम्पनी के मुलाज़िमों या

१५२ भारत में अंगरेज़ी राज
दूसरे अंगरेज़ों को निजी तौर पर बिना सरकारी महसूल दिए
तिजारत करने की इजाज़त कहीं न थी और न कम्पनी को ही देश
के भीतर की मामूली तिजारत में बिना महसूल दिए हिस्सा लेने
का अधिकार दिया गया था। इतना ही नहीं, बल्कि जैसा पिछले
अध्याय में कहा जा चुका है, नमक, छालिया, तम्बाकू, इमारती
लकड़ी, सूखी मछली इत्यादि बहुत सी चीज़ों में शुरू से ही बंगाल
भर के अन्दर यूरोपनिवासियों को तिजारत करने की मनाही थी।
सब से पहले मीर जाफ़र के समय में अंगरेज़ों ने ज़बरदस्ती
इस नियम को तोड़ा और नमक वग़ैरह की तिजारत शुरू कर दी,
जिसका ज़िक्र ऊपर किया जा चुका है। मीर जाफ़र ने बहुतेरा
एतराज़ किया, किन्तु उसकी एक न चल सकी। अंगरेज़ों का यह
तमाम व्यापार शाही फ़रमान के विरुद्ध था, किन्तु कम से कम
कुछ दिनों तक अंगरेज़ व्यापारी अपनी इस नाजायज़ तिजारत के
माल पर महसूल उसी तरह अदा करते रहे, जिस तरह तमाम देशी
व्यापारी अपने माल पर करते थे।
अब मीर क़ासिम को नवाब बनाने के बाद कम्पनी के मुलाज़िम
और दूसरे अंगरेज़, कम्पनी का पास (दस्तक) लेकर, बिना किसी
तरह का महसूल दिए, देश भर में हर चीज़ का व्यापार करने लगे
और जब नवाब के कर्मचारी एतराज़ करते थे या महसूल माँगते
थे तो उन्हें कम्पनी के नए सिपाहियों के हाथों दुरुस्त कर दिया
जाता था। इतिहास लेखक मिल लिखता है :—
"इस तरह कम्पनी के मुलाजिमों का माल बिलकुल बिला महसूल

मीर क़ासिम १५३
सब जगह आता जाता था, जब कि और सब व्यापारियों का अपने माल पर
भारी महसूल देना पड़ता था। नतीजा यह हुआ कि देश का सारा व्यापार
तेज़ी के साथ कम्पनी के मुलाज़िमों के हाथों में आने लगा और सरकारी
आमदनी का एक स्रोत बिलकुल सूखने लगा । जब महसूल जमा करने वाला
कोई सरकारी कर्मचारी कम्पनी के दस्तक के इस दुरुपयोग पर एतराज़ करता
और माल को रोकता था तो उसे गिरफ़्तार करके पास की अंगरेज़ी कोठी में
पहुंचा देने के लिए सिपाहियों का एक दस्ता भेज दिया जाता था ।”*
अंगरेज़ों की इस नाजायज़ तिजारत के साथ जो जो ज़ुल्म
[व्यापार सम्बन्धी] और ज़बरदस्तियाँ होती थीं उनकी गवाही
[अत्याचार] अनेक अंगरेज़ लेखकों के बयानों से मिलती है।
जहाँ जहाँ कोई अंगरेज़ बैठकर इस तरह व्यापार
करता था, वहाँ वहाँ ही अंगरेज़ी झंडा और कम्पनी के कुछ
सिपाही उसके साथ रहते थे। वारन हेस्टिंग्स २५ अप्रैल सन्
१७६२ के एक पत्र में लिखता है :—
“जहाँ जहाँ मैं गया हूँ वहाँ वहाँ अनेक अंगरेज़ी झंडे लहराते हुए
देखकर मैं चकित रह गया हूँ × × × चाहे किसी भी अधिकार से ऐसा क्यों

  • "The Company's servants, whose goods were thus conveyed entirely
    free from duty, while those of all other merchants were heavily burdened,
    were rapidly getting into their own hands the whole trade of the country, and
    thus drying up one of the sources of the public revenue, When the Collec-
    tors of these tolls, or transit duties, questioned the power of the Dustuck,
    and stopped the goods, it was customary to send a party of Sepoys to seize
    the offender and carry him prisoner to the nearest factory." Mill's History
    of India, vol. iii, pp. 229, 230.

१५४ भारत में अंगरेज़ी राज
न कर लिया गया हो, मुझे विश्वास है कि जगह जगह इन झंडों की
मौजूदगी से नवाब की आमदनी, देश के अमन या हमारी क़ौम की इज़्ज़त
तीनों में से किसी को भी लाभ नहीं पहुँच सकता। × × × रास्ते में हमारे
सिपाहियों के व्यवहार के ख़िलाफ़ मुझसे अनेक शिकायतें की गईं। हम
लोगों के पहुँचते ही लोग अधिकांश छोटे क़स्बों और सरायों को ख़ाली छोड़
कर भाग जाते थे और दुकानों को बन्द कर देते थे, क्योंकि उन्हें हमसे भी
उसी तरह के व्यवहार का डर था।"*
वेरैल्स्ट नामक अंगरेज़ इस सम्बन्ध में हमें एक और नई बात
बताता है। वह लिखता है :—
"उन दिनों बहुत से काले (हिन्दोस्तानी) व्यापारी अपनी सुविधा के
लिए कम्पनी के किसी नौजवान मुहर्रिर को धन देकर उसका नाम ख़रीद
लेते थे और उसके नाम के 'दस्तक' के ज़रिए देश के लोगों को तंग करते
और उन पर ज़ुल्म करते थे। इस ज़रिए से इतनी ज़्यादा आमदनी होने लगी
कि कई नौजवान (अंगरेज़) मुहर्रिर १५ हज़ार और २० हज़ार रुपए साल
ख़र्च कर सकते थे, नफ़ीस कपड़े पहनते थे और रोज़ अच्छे से अच्छा खाना
उड़ाते थे।"
वह आगे चल कर लिखता है :—
*"I have been surprised to meet with several English flags flying in
places which I have passed: . . . . By whatever title they have been
assumed, I am sure their frequency can bode no good to the Navab's reve-
nues, the quiet of the country, or the honor of our nation . . . Many
complaints against them (Sepoys) were made me on the road; and most of
the petty towns and serais were deserted at our approach and the shops
shut up from the apprehensions of the same treatment from us." - Warren
Hastings in a letter to the President, dated Bhagalpur 25th April, 1762.

मीर क़ासिम १५५
"बिना महसूल दिए तिजारत की जाती थी और उसके जारी रखने में
बेहद ज़ुल्म किए जाते थे । × × × मीर क़ासिम के साथ लड़ाई की यही
उस समय वजह हुई ।"*
कम्पनी के डाइरेक्टरों तक ने ८ फ़रवरी सन् १७६४ के एक
पत्र में स्वीकार किया है कि "कम्पनी के नौकरों, गुमाश्तों, एजन्टों
और दूसरों की यह निजी तिजारत" "नाजायज़" थी, "दस्तक का
लज्जाजनक दुरुपयोग" थी, "हर तरह से अनधिकार युक्त" थी,
और नवाब और उसकी "क़ुदरती प्रजा" दोनों के साथ यह "दोहरा
अन्याय" था । किन्तु डाइरेक्टरों के इस पत्र के बाद भी इस
अन्याय में कोई कमी न पड़ी ।
उन सिपाहियों के ज़रिए, जो नवाब के पैसे से नियुक्त किए
गए थे, नवाब ही की प्रजा के ऊपर जिस जिस तरह के ज़ुल्म
किए जाते थे उनका कुछ अनुमान मीर क़ासिम के नाम बाकरगंज
के एक सरकारी कर्मचारी के २५ मई सन् १७६२ के पत्र से किया
जा सकता है । उसमें लिखा है :—

  • "... At this time many black merchants found it expedient to purchase
    the name of any young writer, in the Company's Service, by loans of money,
    and under this sanction harassed and oppressed the natives. So plentiful a
    supply was derived from this source that many young writers were enabled
    to spend £s, 1,500 and £s. 2,000 per annum, were clothed in fine linen, and
    fared sumptuously every day."

A trade was carried on without payment of duties, in the prosecution
of which infinite oppressions were committed. . . . This was the immediate
cause of the war with Mir Cassim."—Verelst's View of Bengal, pp. 8 and 46.

१५६ भारत में अंगरेज़ी राज
" x x x यह जगह पहले बड़ी तिजारत की जगह थी, किन्तु अब
नीचे लिखी काररवाइयों की वजह से बरबाद हो गई । कोई अंगरेज़ माल
ख़रीदने या बेचने के लिए यहाँ किसी गुमाश्ते को भेजता है फ़ौरन् वह गुमाश्ता
यह फ़र्ज़ कर लेता है कि यहाँ के किसी भी आदमी के हाथ ज़बरदस्ती अपना
माल बेचने या उसका माल ज़बरदस्ती ख़रीदने का मुझे पूरा अधिकार है
और यदि वह आदमी ख़रीदने या बेचने की सामर्थ्य न रखता हो और इनकार
करे तो फ़ौरन् या तो उस पर कोड़े बरसाए जाते हैं और या उसे क़ैद कर
लिया जाता है । यदि वह राज़ी हो जावे तब भी केवल इतना ही काफ़ी नहीं
समझा जाता, बल्कि एक दूसरी ज़बरदस्ती यह की जाती है कि अनेक चीज़ों
की तिजारत का ठेका अपने ही हाथों में ले लिया जाता है, यानी जिन जिन
चीज़ों की तिजारत अंगरेज़ करते हैं उनकी तिजारत किसी दूसरे को करने नहीं
दी जाती और न किसी दूसरे के पास से किसी को ख़रीदने दिया जाता है ।
x x x और फिर अंगरेज़ समझते हैं कि कम से कम जो हम कर सकते
हैं वह यह है कि दूसरा सौदागर जिस दाम पर कोई चीज़ ख़रीदता है, हम
उसी चीज़ को उससे बहुत कम दाम पर ख़रीदें । अक्सर ये लोग दाम देने से
इनकार कर देते हैं और मैं दखल देता हूँ तो फ़ौरन् मेरी शिकायत होती है ।”*
१८ वीं सदी के पिछले पचास साल में बंगाल भर के अन्दर
यह ज़बरदस्त ज़ुल्म सब जगह फैला हुआ था ।
[तिजारत के बहाने लूट] अब हम इंगलिस्तान के प्रसिद्ध नीतिज्ञ और वक्ता
एडमंड बर्क के कुछ वाक्य इसके विषय में देते
हैं। बर्क ने इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के सामने कहा था :—

  • Vansittart's Narrative, vol. ii. p. 112.

मीर क़ासिम १५७
“तिजारत जो दुनिया के हर मुल्क को धनवान बनाती है, बंगाल
को सर्वनाश की ओर ले जा रही थी। इससे पहले, जब कि कम्पनी को देश
में कहीं भी हुकूमत करने का हक़ हासिल न था, अपने दस्तक या पास के
ऊपर उन्हें बड़े बड़े अधिकार मिले हुए थे, कम्पनी का माल बिना महसूल
दिए देश भर में आ जा सकता था। (धीरे धीरे) कम्पनी के नौकर अपनी
अपनी निजी तिजारत के लिए इस पास का उपयोग करने लगे। यह मामला
जब तक कि थोड़ा थोड़ा होता रहा, देश की सरकार ने कुछ हद तक इसे
गवारा कर लिया, किन्तु जब सभी लोग ऐसा करने लगे तब तिजारत की
जगह उसे डकैती कहना ज़्यादा ठीक मालूम होता था।
“ये व्यापारी हर जगह पहुँचते थे, अपने ही दामों पर माल बेचते थे
और दूसरे लोगों को ज़बरदस्ती मजबूर करके उनका माल अपने ही दामों पर
ख़रीदते थे। बिलकुल ऐसा मालूम होता था कि तिजारत के बहाने एक फ़ौज
लोगों को लूटने जा रही है। लोग अपनी देशी अदालतों से रक्षा की आशा
करते थे, किन्तु व्यर्थ। अंगरेज़ व्यापारियों की यह सेना जिधर जाती थी उधर
ही तातारी विजेताओं से बढ़कर लूट मार और बरबादी करती थी। × × ×
इस तरह इस अभागे देश पर दोहरा अन्याय जारी था, जिसकी भयंकर लूट
द्वारा देश चूर चूर हो रहा था।”*

  • "Commerce, which enriches every other country in the world, was
    bringing Bengal to total ruin. The Company, in former times, when it had
    no sovereignty or power in the country, had large privileges under their
    Dustuck or permit; their goods passed witout paying duties through the
    country. The servants of the Company made use of this dustuck for their
    own private trade, which, while it was used with moderation, the native
    Government winked at in some degree; but when it got wholly into private

१५८ भारत में अंगरेज़ी राज
सन्देह होने लगता है कि उन दिनों बंगाल में किसका राज
था। वास्तव में राज न मुग़ल सम्राट का था, न मुर्शिदाबाद के
सूबेदार का; राज था विदेशियों की कूट नीति, अराजकता और
इस देश के दुर्भाग्य का, और यह सब नतीजा था थोड़े से भारत-
वासियों की लज्जाजनक देशघातकता का। हम ऊपर कह चुके हैं कि
बर्धमान, मेदिनीपुर और चट्टग्राम की आमदनी से वे सब फ़ौजें
रक्खी गई थीं, जिनके हाथों बंगाल भर में यह भयंकर नादिरशाही
चलाई जा रही थी। सच यह है कि इसे नादिरशाही कहना भी
नादिरशाह के साथ अन्याय करना है। नादिरशाह यदि ग़ैर मुल्क
में पहुँच कर अपने सिपाहियों की शान क़ायम रखने के लिए
चन्द घड़ी के लिए क़त्लआम का हुकुम दे सकता था तो वह
अपनी एक आवाज़ पर अमन क़ायम करना भी जानता था और
क्षमा और उदारता की शक्ति भी उसमें अपार थी। वास्तव में
अठारवीं सदी के उत्तरार्ध में बंगाल के अंदर अंगरेज़ों के अत्याचारों
की तुलना संसार के इतिहास के किसी दूसरे पन्ने पर मिलना
कठिन है।
hands, it was more like robbery than trade. These traders appeared every
where; they sold at their own prices, and forced the people to sell to them
at their own prices also. It appeared more like an army going to pillage the
people, under pretence of commerce, than anything else. In vain the people
claimed the protection of their own Country Courts. This English army of
traders, intheir march, ravaged worse than a Tartarian Conqueror. . . .
Thus this miserable country was torn to pieces by the horrible rapaciousness
of a double tyranny."--Burke in his impeachment of Warren Hastings.

मीर क़ासिम १५६
बंगाल और बिहार भर में इस समय कम्पनी की कोठियाँ
फैली हुई थीं। नमक से लेकर इमारती लकड़ी
मीर क़ासिम की तक अनेक चीज़ों का सारा व्यापार अंगरेज़ों के
शिकायतें हाथों में आ गया था। किसानों की खड़ी खेती
कम्पनी के अंगरेज़ नौकर जिस भाव चाहे ख़रीद लेते थे। देश के
हज़ारों लाखों व्यापारियों की रोज़ी छिन चुकी थी और किसानों
की हालत इससे भी अधिक करुणाजनक थी। नवाब के मुलाज़िमों
के साथ कम्पनी के गुमाश्तों और एजन्टों के रोज़ाना जगह जगह
झगड़े होते रहते थे। कम्पनी के गुमाश्ते अनेक झूठी सच्ची शिकायतें
रोज़ाना कलकत्ते भेजते रहते थे और वहाँ से वही फ़ौजी सिपाही
नवाब के मुलाज़िमों या स्वाभिमानी प्रजा को दुरुस्त करने के लिए
जगह जगह भेज दिए जाते थे। नवाब की सरकारी चौकियों में
बंगाल भर के अंदर कहीं पर एक पाई महसूल की वसूली न होती
थी। मीर क़ासिम ने अनेक बार पत्रों द्वारा दर्दनाक शब्दों में
गवरनर वन्सीटार्ट से इन तमाम बातों की शिकायत की, किन्तु
इन शिकायतों और मीर क़ासिम के प्रयत्नों का ज़िक्र और आगे
चलकर किया जावेगा।
इस सब अपमान से बंगाल को सचमुच रक्षा करने और देश
को आइन्दा की आफ़तों से बचाने का केवल
राजा नन्दकुमार एक ही तरीक़ा हो सकता था। देश में उस
का देशप्रेम समय केवल एक ही शक्ति थी, जिसके झंडे के
नीचे और तमाम शक्तियों का मिलना मुमकिन हो सकता था। वह

१६० भारत में अंग्रेज़ी राज
शक्ति दिल्ली के मुग़ल सम्राट की रही सही शक्ति थी। उपाय केवल
यह था कि विदेशियों के मुक़ाबले के लिए दिल्ली सम्राट के झंडे
के नीचे देश की सारी हिन्दू और मुसलमान राज शक्तियों को
एकत्रित किया जावे और उनके सम्मिलित प्रयत्नों द्वारा विदेशियों
को बंगाल तथा भारत से निकाल कर बाहर कर दिया जावे।
यह एक आश्चर्य की बात है कि यह उपाय उस समय उसी
राजा नन्दकुमार को सूझा जिसने सन् १७५७ में अमींचन्द के धन
के लोभ में आकर अपने स्वामी सिराजुद्दौला, भारतीय प्रजा और
फ्रांसीसियों तीनों के साथ विश्वासघात किया था। मालूम होता है
नंदकुमार अब अपने देश को अंगरेज़ों के हाथों बिकते हुए देखकर
और प्रजा के ऊपर उनके अन्यायों को देखकर अपनी ग़लती पर
पछता रहा था। राजा नंदकुमार ने जी तोड़ प्रयत्न शुरू किए।
सम्राट शाह आलम अभी तक बिहार में था। सम्राट और मराठों
से उसने पत्र व्यवहार शुरू किया। उसकी कोशिशों से मराठों ने
मीर क़ासिम और अंगरेज़ों दोनों के ख़िलाफ़ सम्राट की ओर से
बंगाल पर हमला करने का वादा किया। वर्धमान, बीरभूम
और अन्य अनेक स्थानों के राजा और ज़मींदार इस काम के लिए
सम्राट के झंडे के नीचे आ आकर जमा होने लगे।
ये सब प्रयत्न अभी चल ही रहे थे, इतने में एक ऐसी घटना
हुई जिसका भारत के अंदर ब्रिटिश राज के क़ायम होने पर
बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा, किन्तु जिसके इस गम्भीर प्रभाव पर
भारतीय इतिहास लेखकों ने अभी तक उचित ध्यान नहीं दिया।

मीर क़ासिम
१६१

यह घटना ६ जनवरी सन् १७६१ ई० की पानीपत की तीसरी
लड़ाई थी।
भारत का राजशासन उस समय ख़ासी बिगड़ी हुई हालत में
[हाशिया: मुग़ल साम्राज्य की] था। औरंगज़ेब की संकीर्ण नीति और उसके
[हाशिया: निर्बलता] अविश्वासी स्वभाव तथा बाद के दिल्ली के सम्राटों
की विलासप्रियता और अयोग्यता ने मुग़ल
साम्राज्य को अंग भंग और खोखला कर दिया था। अनेक छोटे
बड़े नरेशों के अलावा अवध के नवाब और दक्खिन के निज़ाम
अपने अपने सूबों के स्वच्छन्द शासक बन बैठे थे। बंगाल अभी तक
नाम मात्र को दिल्ली के अधीन था। किन्तु बंगाल से भी दिल्ली
ख़िराज जाना कई साल से बंद हो गया था, जिसकी वजह से शाह
आलम दूसरे को बिहार पर चढ़ाई करनी पड़ी थी। स्वयं राजधानी
के पास भरतपुर के जाट राजा और रामपुर के रुहेला नवाब दोनों
अपने अपने स्वाधीन राज क़ायम कर रहे थे। मराठों की शक्ति
दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। दिल्ली के सम्राट अभी तक भारत के
सम्राट कहलाते थे, किन्तु बहुत दर्जे तक केवल नाम के लिए।
पच्छिम में सिन्ध और पंजाब के सूबे अफ़ग़ानिस्तान के शासक
अहमदशाह अब्दाली के अधीन हो चुके थे और पूरब में बंगाल
और बिहार दोनों के अंदर अंगरेज़ों की साज़िशें सफल हो रही थीं।
वास्तव में सारे भारत पर अपनी हुकूमत जमा लेने के लिए
उस समय अफ़ग़ानों, मराठों और अंगरेज़ों के बीच एक प्रकार का
तिकोनिया संग्राम जारी था, जिसमें अफ़ग़ान और मराठे अपने
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१६२ भारत में अंगरेज़ी राज
युद्ध बल पर और अंगरेज़ अपनी कूटनीति के बल पर कामयाबी की
उम्मीद कर रहे थे। उस समय देश को इस विपज्जाल से निकालने
का केवल एक ही उपाय हो सकता था। वही उपाय राजा नन्दकुमार
को सूझा और ज़ाहिर है कि दिल्ली और पूना के कुछ नीतिज्ञ भी
नन्दकुमार के इस विचार से पूरी सहानुभूति रखते थे।
सम्राट आलमगीर दूसरे के समय में वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन ने
मराठों को सम्राट की सहायता के लिए दिल्ली
[पानीपत की तीसरी] बुलवाया। उस समय के पेशवा ने अपने भाई
[लड़ाई में मराठों] रघुनाथ राव ( राघोबा ) को सम्राट के आज्ञा
[का नेतृत्व] पालन के लिए एक बड़ी सेना सहित दिल्ली
भेजा। सम्राट और पेशवा के बीच प्रेम का सम्बन्ध क़ायम हो गया।
रघुनाथ राव ने अपनी सेना सहित और आगे बढ़कर अहमदशाह
अब्दाली के नायब के हाथों से पञ्जाब विजय कर लिया और एक
मराठा सरदार को दिल्ली सम्राट के अधीन वहाँ का सूबेदार नियुक्त
कर दिया। राघोबा दक्खिन लौट आया। मराठों की शक्ति इस
समय शिखर पर पहुँची हुई थी। किन्तु इस अन्तिम घटना ने उनके
विरुद्ध अहमदशाह अब्दाली का क्रोध भड़का दिया और सन् १७५९
ई० में एक ज़बरदस्त सेना लेकर वह पंजाब पर फिर से अपना राज
क़ायम करने और मराठों का विध्वन्स करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान
से निकल पड़ा।
सदाशिव भाऊ २० हज़ार सवार, १० हज़ार पैदल और तोप
ख़ाना लेकर अहमदशाह के मुक़ाबले के लिए पूना से रवाना हुआ।

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मीर क़ासिम १६३

पेशवा का पुत्र विश्वासराव भी सदाशिव के साथ था। मार्ग में
होलकर और सींधिया की सेनाएँ सदाशिव से आ मिलीं। राजपूत
राजाओं ने सहायता के लिये अपने सवार भेजे। भरतपुर का जाट
राजा ३०,००० सेना लेकर स्वयं सदाशिव से आ मिला। साम्राज्य
की राजधानी दिल्ली में सदाशिव का खूब स्वागत हुआ। अवध का
नवाब शुजाउद्दौला अपनी सेना और सम्राट की सेना दोनों को
लेकर सदाशिव की मदद के लिये तैयार हो गया। एक बार मालूम
होता था कि भारत के सब हिन्दू और मुसलमान विदेशियों से
अपने देश की रक्षा करने के लिए कमर कसके मैदान में उतर आए।
किन्तु सदाशिव भाऊ उस ऐन परीक्षा के समय सच्चा नीतिज्ञ
[पार्श्व टिप्पणी: मराठा सेनापति की] साबित न हो सका। गर्व ने उसकी दूरदर्शिता
[पार्श्व टिप्पणी: अदूरदर्शिता और] पर परदा डाल दिया। मार्ग में ही उसने कई
मराठा सरदारों को अपने अनुचित व्यवहार से
[पार्श्व टिप्पणी: पराजय] नाराज़ कर लिया। राजा भरतपुर को भी वह
सन्तुष्ट न रख सका। दिल्ली के अंदर उसका बर्त्ताव और भी बुरा
रहा। क़िले में घुसते ही बहुत सा शाही सामान उसने अपने क़ब्ज़े
में कर लिया। दीवान ख़ास की सुन्दर क़ीमती चाँदी की छत को
उखड़वा कर और गलवा कर उसने उससे १७ लाख रुपये ढलवा
लिए। यह भी कहा जाता है कि वह इस समय विश्वासराव को
दिल्ली के तख़्त पर बैठाना चाहता था। सदाशिव भाऊ की इस
संकीर्ण और घातक नीति का नतीजा यह हुआ कि उसके मुसलमान
मित्रों के दिल उसकी ओर से फिर गए। अवध का नवाब वज़ीर

१६४ भारत में अंगरेज़ी राज
उसकी ओर से सशंक हो गया और जिस उत्साह के साथ वह
आक्रामक अहमदशाह के विरुद्ध मराठों की सहायता करना चाहता
था, न कर सका।
६ जनवरी सन् १७६१ को पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में
एक अत्यन्त घमासान संग्राम हुआ, जिसमें दोनों ओर के हताहतों
की संख्या लाखों तक पहुँच गई। ऐन मौक़े पर सदाशिव के व्यवहार
से बेज़ार होकर भरतपुर का राजा अपनी सेना सहित मैदान से
हट गया। होलकर तटस्थ रहा। सदाशिव और विश्वासराव
दोनों मैदान में काम आए। विजय अहमदशाह की ओर रही।
नवाब शुजाउद्दौला ने मजबूर होकर विजयी अहमदशाह के साथ
मेल कर लिया। किन्तु अहमदशाह को भी अपनी इस विजय की
बहुत ज़बरदस्त क़ीमत देनी पड़ी। उसके इतने अधिक आदमी
लड़ाई में काम आए और घायल हुए कि आगे बढ़ने का इरादा छोड़
कर उसे फ़ौरन अफ़ग़ानिस्तान लौट जाना पड़ा। लौटने से पहले
उसने शाहआलम दूसरे को भारत का सम्राट स्वीकार किया और
ग़ाज़ीउद्दीन को हटाकर उसकी जगह नवाब शुजाउद्दौला को दिल्ली
की सल्तनत का वज़ीर क़रार दिया। निस्सन्देह सदाशिव राव की
संकीर्णता और अदूरदर्शिता की वजह से पानीपत के मैदान में मराठों
की बढ़ती हुई शक्ति चकनाचूर हो गई और उसके साथ ही साथ
दिल्ली के साम्राज्य और भारत की राष्ट्रीय स्वाधीनता दोनों की
—आशाएँ कुछ समय के लिए ख़ाक में मिल गईं।
प्रोफ़ेसर सिडनी ओवन ने सच कहा है :—

मीर क़ासिम १६५
"कहा जा सकता है कि पानीपत की लड़ाई के साथ साथ भारतीय
इतिहास का भारतीय युग समाप्त हो गया। इतिहास के पढ़ने वाले को इसके
बाद से दूरवर्ती पच्छिम से आए हुए व्यापारी शासकों की उन्नति से ही
सरोकार रह जाता है। "✡
निस्सन्देह जिस तिकोनिया संग्राम का हम ऊपर ज़िक्र कर चुके
पानीपत का परिणाम हैं, उसकी तीन शक्तियों में से अफ़ग़ानों को अब
और आगे बढ़कर दिल्ली सम्राट के निर्बल हाथों
से भारतीय साम्राज्य की बाग छीनने का साहस
न हो सकता था। मराठों की कमर टूट चुकी थी और वे अंगरेज़ों
के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने के लिए अब बंगाल तक पहुँचने के
नाक़ाबिल थे। इस तरह नन्दकुमार और उसके साथियों की
आशाओं पर पानीपत ने पानी फेर दिया।
एक अंगरेज़ लेखक साफ़ लिखता है :—
"पानीपत की लड़ाई से मराठा संघ को जो थोड़ी देर के लिए धक्का
पहुँचा उसकी वजह से मराठे बंगाल पर हमला करने से रुक गए। इस हमले
में शायद शुजाउद्दौला और शाह आलम मराठों के साथ मिल जाते और
मुमकिन है कि ये लोग अंगरेज़ कम्पनी की उस सत्ता को, जो अभी उस
समय तक कमज़ोर थी और अनेक कठिनाइयों से घिरी हुई थी, सफलता के
साथ उखाड़ कर फेंक देते।"†

  • "With the battle of Panipat, the native period of Indian History may
    be said to end. Henceforth the interest gathers round the progress of the
    Merchant Princes from the far west."—India on the Eve of the British
    Conquest, by Professor Sydney Owen.
    † H. G. Keene's Madhava Rao Scindhia, p. 46.