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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 402

१५० भारत में अंगरेज़ी राज
अब मीर क़ासिम ने यह तमाम इलाक़ा हमेशा के लिए कम्पनी
को सौंप दिया और वहाँ के ज़मींदार को अंगरेज़ों के अधीन कर
दिया। जब यह नया परवाना राजा तिलकचन्द के पास पहुँचा
तो उसे दुख होना स्वाभाविक था। उसने गवर्नर वन्सीटार्ट को
अपनी ज़मींदारी की शोचनीय अवस्था की फिर से इत्तला दी और
अपने यहाँ की मालगुज़ारी का सब हिसाब भेज दिया।
वन्सीटार्ट ने किसी तरह उसकी मदद न की और न कम्पनी
[हाशिया: वर्धमान और बीर] के सिपाहियों के अत्याचार बन्द हुए। मजबूर
[हाशिया: भूम पर कम्पनी] होकर कहा जाता है राजा तिलकचन्द ने बीरभूम
[हाशिया: का क़ब्ज़ा] के राजा के साथ मिलकर अंगरेज़ों और मीर
क़ासिम दोनों से लड़ने के लिए फ़ौज जमा करना
शुरू किया। इस पर कलकत्ते की कौंसिल ने “वर्धमान और मेदनीपुर
के इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करने के लिए” कप्तान व्हाइट के अधीन कुछ
सेना बर्धमान भेजी। राजा तिलकचन्द के एक पत्र से मालूम होता
है कि इस सेना ने भी मार्ग भर में असहाय ग्रामवासियों पर तरह
तरह के ज़ुलम किए, उन्हें खूब लूटा और खूब खून बहाया।
२८ दिसम्बर सन् १७६० को कप्तान व्हाइट की सेना और
बर्धमान के राजा की सेना में लड़ाई हुई, जिसमें राजा की सेना
हार गई। अंगरेज़ी सेना का एक हिस्सा बीरभूम की राजधानी
नागौर पर क़ब्ज़ा करने के लिए भेज दिया गया। वहाँ का राजा
अपनी राजधानी छोड़कर पहाड़ों की ओर भाग गया और बर्धमान
तथा नागौर दोनों पर कम्पनी का क़ब्ज़ा हो गया।