भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 405, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंमीर क़ासिम १५३
सब जगह आता जाता था, जब कि और सब व्यापारियों का अपने माल पर
भारी महसूल देना पड़ता था। नतीजा यह हुआ कि देश का सारा व्यापार
तेज़ी के साथ कम्पनी के मुलाज़िमों के हाथों में आने लगा और सरकारी
आमदनी का एक स्रोत बिलकुल सूखने लगा । जब महसूल जमा करने वाला
कोई सरकारी कर्मचारी कम्पनी के दस्तक के इस दुरुपयोग पर एतराज़ करता
और माल को रोकता था तो उसे गिरफ़्तार करके पास की अंगरेज़ी कोठी में
पहुंचा देने के लिए सिपाहियों का एक दस्ता भेज दिया जाता था ।”*
अंगरेज़ों की इस नाजायज़ तिजारत के साथ जो जो ज़ुल्म
[व्यापार सम्बन्धी] और ज़बरदस्तियाँ होती थीं उनकी गवाही
[अत्याचार] अनेक अंगरेज़ लेखकों के बयानों से मिलती है।
जहाँ जहाँ कोई अंगरेज़ बैठकर इस तरह व्यापार
करता था, वहाँ वहाँ ही अंगरेज़ी झंडा और कम्पनी के कुछ
सिपाही उसके साथ रहते थे। वारन हेस्टिंग्स २५ अप्रैल सन्
१७६२ के एक पत्र में लिखता है :—
“जहाँ जहाँ मैं गया हूँ वहाँ वहाँ अनेक अंगरेज़ी झंडे लहराते हुए
देखकर मैं चकित रह गया हूँ × × × चाहे किसी भी अधिकार से ऐसा क्यों
- "The Company's servants, whose goods were thus conveyed entirely
free from duty, while those of all other merchants were heavily burdened,
were rapidly getting into their own hands the whole trade of the country, and
thus drying up one of the sources of the public revenue, When the Collec-
tors of these tolls, or transit duties, questioned the power of the Dustuck,
and stopped the goods, it was customary to send a party of Sepoys to seize
the offender and carry him prisoner to the nearest factory." Mill's History
of India, vol. iii, pp. 229, 230.