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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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मीर क़ासिम १५१
आए दिन के राज परिवर्तन की वजह से बंगाल के शासन की
अवस्था अत्यन्त अस्तव्यस्त हो रही थी। कम्पनी की व्यापार
सम्बन्धी ज़बरदस्तियाँ बंगाल भर में ज़ोरों के साथ बढ़ रही थीं।
अंगरेज़ों ने जो क़रीब तीस हज़ार नई सेना मीर क़ासिम और
सम्राट की सहायता के नाम पर और साम्राज्य की रक्षा के लिए
कहकर जमा कर रक्खी थी, जिसके ख़र्च के लिए मीर क़ासिम
से तीन बड़े बड़े ज़िले लिए गए थे, वह सब अब सूबे भर में इन
ज़बरदस्तियों को जारी रखने के लिए काम में लाई जा रही थी।
प्राचीन भारतीय नरेशों के अधीन राज की आमदनी का एक
[हाशिया: महसूल की माफ़ी] बहुत बड़ा ज़रिया तिजारती माल का महसूल
[हाशिया: और उसका] था। मुग़ल सम्राटों के अधीन ईरान, अरब,
[हाशिया: दुरुपयोग] मिश्र, इतालिया, स्पेन, पुर्तगाल, इङ्गलिस्तान,
बर्मा, चीन, जापान इत्यादि अनेक बाहर के मुल्कों
के साथ और स्वयं भारत के अन्दर भारतीय तिजारत बेहद बढ़ी
हुई थी, जिसमें हज़ारों भारतीय जहाज़ हर साल लगे रहते थे और
हर व्यापारी को अपना माल एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में
सरकारी महसूल देना पड़ता था। केवल ईस्ट इण्डिया कम्पनी के
लिए मुग़ल सम्राट ने खुश होकर यह महसूल माफ़ कर दिया था।
इस माफ़ी का मतलब यह था कि कम्पनी अगर विलायत से कोई
माल लाकर हिन्दोस्तान में बेचना चाहे या हिन्दोस्तान का बना
माल ख़रीद कर विलायत ले जाना चाहे तो उस माल पर कोई
महसूल न लिया जावे। शाही फ़रमान में कम्पनी के मुलाज़िमों या