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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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१४८ भारत में अंगरेज़ी राज
मारफ़त बुला बुला कर ज़बरदस्ती उनसे रक़में वसूल करना शुरू
किया। जब इससे भी काम न चल सका तो उसे जगतसेठ से क़र्ज़
लेना पड़ा और अन्त में अंगरेज़ों को रक़में देने के लिए रियासत के
जवाहरात बेचकर और महल के सोने चाँदी के बरतन गलवा कर
सिक्के ढलवाने पड़े।
कम्पनी की टकसाल कलकत्ते में क़ायम हो चुकी थी। किन्तु
कम्पनी के खोटे अंगरेज़ों ने मीर क़ासिम की इस शर्त की बिल्कुल
सिक्के परवाह न की कि जो सिक्के कलकत्ते में ढाले
जावें वह मुर्शिदाबाद की सरकारी टकसाल के
सिक्कों के समान वज़न और समान धातु के हों। अंगरेज़
बराबर अपनी टकसाल में घटिया सिक्के ढालते रहे। नतीजा
यह हुआ कि बावजूद मीर क़ासिम की कड़ी आज्ञाओं के प्रजा ने
कलकत्ते के सिक्कों को बिना बट्टे के लेने से इनकार किया। इस
पर अंगरेज़ों ने मीर क़ासिम से प्रार्थना की कि जो सिक्के हम
कलकत्ते में ढालें उन पर भी हमें मुर्शिदाबाद का नाम और मुर्शिदा-
बाद ही की छाप रखने की इजाज़त दी जावे। मीर क़ासिम ने इस
जाली काररवाई को तो मंज़ूर न किया, किन्तु उसने अंगरेज़ों को
सन्तुष्ट करने के लिए कलकत्ते के सिक्कों को लेने से इनकार करने
वाले या उन पर बट्टा माँगने वाले ज़मींदारों और अन्य लोगों को
सज़ाएं देना शुरू कर दिया। इन सख्तियों की वजह से अनेक
ज़मींदार मीर क़ासिम से असन्तुष्ट हो गए, यहाँ तक कि कई जगह
नए नवाब के ख़िलाफ़ बगावत की तैयारियाँ होने लगीं।