भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय
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मीर क़ासिम
मुर्शिदाबाद के दरबार और बंगाल की प्रजा दोनों की हालत
मीर क़ासिम के मसनद पर बैठते ही और अधिक
[हाशिया: बंगाल की हालत] शोचनीय होती गई। सब से पहले मीर क़ासिम
ने देखा कि राज की आर्थिक अवस्था अत्यन्त
बिगड़ी हुई थी। सरकारी मालगुज़ारी ठीक तौर पर वसूल न हो
रही थी। खज़ाना क़रीब क़रीब खाली था। सालाना खर्च आमद
से बढ़ गया था, और फ़ौज की कई महीने की तनख़ाहें चढ़ी हुई
थीं। इसके अलावा ठीक मीर जाफ़र के समान मीर क़ासिम ने
अब महसूस किया कि जो बड़े बड़े वादे उसने अंगरेज़ों के साथ
कर रक्खे थे उन्हें पूरा करना इतना आसान न था। इन वादों और
दूसरी नई नई माँगों को पूरा करने के लिए मीर क़ासिम ने अपने
यहाँ के ज़मींदारों और रईसों को अंगरेज़ों ही के सिपाहियों की