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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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१५४ भारत में अंगरेज़ी राज
न कर लिया गया हो, मुझे विश्वास है कि जगह जगह इन झंडों की
मौजूदगी से नवाब की आमदनी, देश के अमन या हमारी क़ौम की इज़्ज़त
तीनों में से किसी को भी लाभ नहीं पहुँच सकता। × × × रास्ते में हमारे
सिपाहियों के व्यवहार के ख़िलाफ़ मुझसे अनेक शिकायतें की गईं। हम
लोगों के पहुँचते ही लोग अधिकांश छोटे क़स्बों और सरायों को ख़ाली छोड़
कर भाग जाते थे और दुकानों को बन्द कर देते थे, क्योंकि उन्हें हमसे भी
उसी तरह के व्यवहार का डर था।"*
वेरैल्स्ट नामक अंगरेज़ इस सम्बन्ध में हमें एक और नई बात
बताता है। वह लिखता है :—
"उन दिनों बहुत से काले (हिन्दोस्तानी) व्यापारी अपनी सुविधा के
लिए कम्पनी के किसी नौजवान मुहर्रिर को धन देकर उसका नाम ख़रीद
लेते थे और उसके नाम के 'दस्तक' के ज़रिए देश के लोगों को तंग करते
और उन पर ज़ुल्म करते थे। इस ज़रिए से इतनी ज़्यादा आमदनी होने लगी
कि कई नौजवान (अंगरेज़) मुहर्रिर १५ हज़ार और २० हज़ार रुपए साल
ख़र्च कर सकते थे, नफ़ीस कपड़े पहनते थे और रोज़ अच्छे से अच्छा खाना
उड़ाते थे।"
वह आगे चल कर लिखता है :—
*"I have been surprised to meet with several English flags flying in
places which I have passed: . . . . By whatever title they have been
assumed, I am sure their frequency can bode no good to the Navab's reve-
nues, the quiet of the country, or the honor of our nation . . . Many
complaints against them (Sepoys) were made me on the road; and most of
the petty towns and serais were deserted at our approach and the shops
shut up from the apprehensions of the same treatment from us." - Warren
Hastings in a letter to the President, dated Bhagalpur 25th April, 1762.