भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
८६ भारत में अंगरेज़ी राज
उसने दुखी होकर २२ मार्च सन् १७५७ को ऐडमिरल वाट्सन के
नाम यह पत्र भेजा :—
"मैंने जो कुछ वादा किया है और दस्तख़त किए हैं उस पर मैं पक्का
[मार्जिन: सिराजुद्दौला की] रहूँगा और किसी तरह भी उससे न हटूंगा । वाट्स
[मार्जिन: सद्आशाएं] साहब की सब इच्छाएँ और जो कुछ उन्होंने मुझसे
कहा मैंने सब पूरा कर दिया और जो कुछ बाक़ी
है वह भी इस चाँद की पन्द्रह तारीख़ तक दे दिया जायगा । वाट्स
साहब ने ये सब बातें मुफ़स्सिल तौर पर आपको लिखी होंगी । किन्तु
बावजूद इस सब के मुझे अनेक बातों से मालूम होता है कि आप मेरे साथ
अपनी सन्धि को मिटा देना चाहते हैं । हुगली, इंगली, बर्धमान और नदिया
के इलाक़ों को आपकी सेना ने वीरान कर डाला है । यह क्यों ? इसके
अलावा गोविन्दराम मित्र ने रामदीन घोष के लड़के की मार्फ़त (हुगली के
फ़ौजदार) नन्दकुमार को लिख भेजा है कि कालीघाट का इलाक़ा कलकत्ते
के ज़िले में शामिल है इसलिए वह गोविन्दराम के हवाले कर दिया जाय ।
इसका क्या अर्थ है ? × × × आपके वादों पर विश्वास करके मैंने सुलह
की थी ताकि देश का भला हो और दोनों ओर की सेनाओं द्वारा शाही
इलाक़ों की बरबादी न हो, न कि इसलिए कि प्रजा को पाँव तले कुचला
जावे और सरकारी मालगुज़ारी में बाधा पड़े ।
“आपकी कोशिश यह होनी चाहिये कि जो मित्रता हमारे आपके बीच
जड़ पकड़ गई है वह दिन प्रतिदिन मज़बूत होती जावे × × × ।"
एक ओर भोला सिराजुद्दौला अभी तक इन विदेशियों के साथ,
अमन से रहने के स्वप्न देख रहा था, दूसरी ओर क्लाइव और
सिराजुद्दौला ८७
वाट्सन की सलाह से मुर्शिदाबाद के दरबार में बैठा हुआ वाट्स
[मुर्शिदाबाद में] सिराजुद्दौला को बंगाल की मसनद से उतार
[वाट्स की] कर किसी दूसरे को उसकी जगह बैठाने और देश
[साज़िशें] में ग़दर करा देने की साज़िशों में लगा हुआ था।
इतिहास लेखक एस० सी० हिल लिखता है :—
“अंगरेज़ एलची की थैली अधिक लम्बी थी, इसलिए वह न केवल
दरबार के ख़ास ख़ास आदमियों बल्कि नवाब के मंत्रियों पर भी प्रभाव जमा
सका। चतुर तथा दूरन्देश श्रमींचन्द से उसे खूब सहायता मिली।”*
किन्तु वाट्स कोई थैली अपने साथ यूरोप से न लाया था।
वास्तव में श्रमींचन्द की थैली ही इस समय अंगरेज़ों की थैली
थी। जिन भारतीय देशद्रोहियों ने इस साज़िश में अंगरेज़ों का साथ
दिया उनमें मुख्य राजा मानिकचन्द, राजा राजवल्लभ, राजा दुर्लभ-
राम, मीर जाफ़र और दो जैन सेठ थे। इनमें से हरएक अपना
अपना स्वार्थ पूरा करना चाहता था। जैन सेठ दो भाई थे जो शाही
ख़ज़ाञ्ची, तमाम सूबे के सरकारी साहूकार और शाही टकसालों के
ठेकेदार थे। ये लोग अपने किसी नीच स्वार्थ के लिए सिराजुद्दौला
के एक मुलाज़िम यारलुत्फ़ ख़ाँ को मसनद पर बैठाना चाहते थे।
किन्तु मीर जाफ़र सिराजुद्दौला के नाना अलीवर्दी ख़ाँ का बहनोई
था, उसका प्रभाव अधिक था, इसलिए अंगरेज़ उसे नवाब बनाना
- "The British agent, having the deeper purse, was able to influence not
only the leading men at court, but also the secretaries, and was much assisted
by the foresighted cunning of Aminchand. . . ."-Bengal Records, vol. i.
p. clxxvii.
८८ भारत में अंगरेज़ी राज
चाहते थे। २६ अप्रैल तक वाट्स ने मीर जाफ़र को राज़ी करके
क्लाइव को पत्र लिखा कि—"मीर जाफ़र और उसके साथी नवाब
को मसनद से उतारने में अंगरेज़ों को मदद देने के लिए तैयार हैं"
और यह भी लिखा :—
"यदि आप इस दूसरी तरकीब को पसन्द करें जो उस तरकीब की
निसबत जो मैं इससे पहले लिख चुका हूं ज़्यादा आसान है, तो मीर जाफ़र
चाहता है कि आप अपनी तजवीज़ें लिख भेजें कि आप कितना धन और
कितनी ज़मीन चाहते हैं और सन्धि की क्या शर्तें होंगी।" *
क्लाइव ने इस समय फिर दोरुख़ी चाल चली। एक ओर उसने
सिराजुद्दौला को धोखे में रखने के लिए उसे एक
[हाशिया: क्लाइव के दो रुख़े] अत्यन्त प्रेम भरा पत्र लिखा और दूसरी ओर
[हाशिया: पत्र] मीर जाफ़र के लिए वाट्स की असली बात का
जवाब दिया। प्रसिद्ध इतिहास लेखक मैकॉले लिखता है :—
"क्लाइव ने सिराजुद्दौला को इतने प्रेमभरे शब्दों में पत्र लिखा कि उन
शब्दों के धोखे में आकर वह निर्बल नरेश फिर कुछ समय के लिए अपने तईं
पूरी तरह सुरक्षित समझने लगा। क्लाइव अपने इस पत्र को 'सान्त्वना देने
वाला पत्र' कहता है। जो हरकारा इस पत्र को लेकर गया वही एक दूसरा पत्र
वाट्स साहब के नाम लेकर गया, जिसमें लिखा था—'मीर जाफ़र से कह
दो कि किसी बात से न डरे। मैं पाँच हज़ार ऐसे सिपाही लेकर जिन्होंने
- "If you approve of this scheme, which is more feasible than the other,
I wrote about, he (Mir Jaffir) requests you will write your proposals of what
money, what land you want or what treaties you will engage in."—Watts'
letter to Calcutta dated 26th April, 1757.
सिराजुद्दौला =६
कभी पीठ नही दिखाई उससे जा मिलूँगा। उसे विश्वास दिला दो कि मैं
दिन दिन भर और रात रात भर चल कर उसकी मदद के लिए पहुँचूँगा और
जब तक मेरे पास एक आदमी भी बचेगा तब तक उसका साथ न छोडूंगा' ।"†
किन्तु चन्दरनगर अंगरेज़ों के हाथों में जाने के समय से
[हाशिया: फ्रांसीसियों के साथ] सिराजुद्दौला का हृदय बहुत कुछ सशंक हो गया
[हाशिया: . सन्धि का उल्लंघन] था। चन्दरनगर की विजय के बाद अंगरेज़ों
और फ्रांसीसियों के दरमियान जो सन्धि हुई
थी उसके विरुद्ध अंगरेज़ों ने सिराजुद्दौला के सामने अब यह एक
और नई माँग पेश की कि क़ासिमबाज़ार, ढाका, पटना, जूदा,
बालेश्वर इत्यादि में फ्रांसीसियों की जितनी कोठियाँ हैं और जितने
फ्रांसीसी आपके राज में हैं उन सबको आप हमारे सुपुर्द कर दें ।
फ्रांसीसियों को बंगाल के अंदर कोठियाँ बनाने और व्यापार करने
की इजाज़त ठीक उसी तरह दिल्ली सम्राट से मिली हुई थी जिस
तरह अंगरेज़ों को । अभी तक फ्रांसीसियों ने न कभी सम्राट या
उसके सूबेदार की किसी आज्ञा को भंग किया था और न उन्हें किसी
तरह का कष्ट पहुँचाया था। इसलिए अंगरेज़ों की इस बेजा माँग के
उत्तर में सिराजुद्दौला ने १४ अप्रैल को वाटसन को लिख दिया :—
† "He (Clive) wrote to Sirajuddowla in terms so affectionate that they
for a time lulled that weak prince into perfect security. The same courier
who carried this 'Soothing letter,' as Clive calls it, carried to Mr. Watts a
letter in the following terms : 'Tell Mir Jaffir to fear nothing. I will join him
with five thousand men who never turned their backs. Assure him, I will
march night and day to his assistance, and stand by him as long as I have a
man left.' "—Macaulay's Essay on Clive.
६० \qquad\qquad\qquad\qquad भारत में अंगरेज़ी राज
"मैं पहले भी लिख चुका हूँ और फिर लिखता हूँ कि यदि अंगरेज़
कम्पनी अपना व्यापार क़ायम करना चाहती है तो मुझे कोई ऐसी बात न
लिखी जावे जो हमारी सन्धि के अनुकूल न हो, × × × अगर आप मुझसे
लड़ाई करना नहीं चाहते तो मेरी मोहर लगी हुई और मेरी दस्तख़ती सन्धि
आप के पास है, जब कभी पत्र लिखना हो तो उसे देख कर उसके अनुसार
लिखिए × × × ।
"यदि आप शान्ति क़ायम रखना चाहते हैं तो सन्धिपत्र के विरुद्ध
कोई बात न लिखिए।"*
किन्तु इस दरमियान वाट्सन, क्लाइव, वाट्स और मीर जाफ़र
के बीच साज़िश क़रीब क़रीब पक चुकी थी।
[हाशिया: मीरजाफ़र के साथ] ४ जून सन् १७५७ ई० को आधी रात के बाद एक
[हाशिया: गुप्त सन्धि] ज़नानी पालकी में बैठ कर चोरी चोरी वाट्स ने
मीर जाफ़र के महल में प्रवेश किया। उसी रात को मीर जाफ़र ने
अंगरेज़ों के साथ एक गुप्त सन्धिपत्र पर दस्तख़त कर दिए।
इस सन्धिपत्र की १३ शर्तों का सार इस प्रकार है :—
जितने अधिकार सिराजुद्दौला ने अंगरेज़ों को दे रक्खे थे, मीर
जाफ़र सूबेदार बनने पर उन सबको क़ायम रक्खे। अंगरेज़ और
मीर जाफ़र दोनों में से किसी की जब कभी किसी तीसरे के साथ
लड़ाई हो तो दूसरा उसकी मदद करे। तमाम फ़्रांसीसी और
उनकी कोठियाँ अंगरेज़ों के हवाले कर दी जायँ और फ़्रांसीसियों
को बंगाल में न रहने दिया जाय। कलकत्ते की तबाही के हरजाने
- Ive's Voyages, p. 142.
सिराजुद्दौला ६१
में और लड़ाई के ख़र्च के लिए मीर जाफ़र कम्पनी को एक करोड़
रुपए दे। इसके अलावा अलग अलग लोगों के नुक़सानों के लिए
कलकत्ते के अंगरेज़ बाशिंदों को ५० लाख, हिन्दू बाशिंदों को २०
लाख और आरमीनियन बाशिंदों को ७ लाख रुपए दिए जायँ।
कलकत्ते की खंदक़ के अंदर और बाहर चारों ओर ६०० गज़ तक
की ज़मीन अंगरेज़ों को दे दी जाय, साथ ही कलकत्ते के दक्खिन में
हुगली नदी और नमक की झीलों के दरमियान कालपी (बंगाल)
तक तमाम इलाक़े की ज़मींदारी अंगरेज़ों को दे दी जाय। जब कभी
अपनी रक्षा के लिए नवाब को अंगरेज़ी सेना की ज़रूरत हो, नवाब
उसका ख़र्च अदा करे। हुगली के नीचे दरिया के ऊपर नवाब
किसी तरह की क़िले बंदी न करे। मसनद पर बैठने के तीस दिन के
अंदर मीर जाफ़र इन शर्तों को पूरा कर दे और जब तक वह इस
सन्धि के अनुसार चलता रहेगा, कम्पनी उसे उसके शत्रुओं को
दमन करने में मदद देती रहेगी।
साज़िश अब पूरी तरह पक चुकी थी, किन्तु वाट्स और कई
[पार्श्व टिप्पणी: दोनों ओर से सेनाओ का कूच] अंगरेज़ अभी तक मुर्शिदाबाद में मौजूद थे।
लड़ाई का खुला एलान करने से पहले उन्हें वहाँ
से हटा लेना ज़रूरी था।
१२ जून की शाम को 'बाग़ों में हवा ख़ोरी
करने'* के लिए वाट्स और उसके अंगरेज़ साथियों ने नवाब से
इजाज़त ली और इस बहाने रातों रात वे मुर्शिदाबाद से भाग
- Ive's Voyages, p. 145.
६२ भारत में अंगरेज़ी राज
निकले। अगले दिन जब सिराजुद्दौला को इस छल का पता चला,
तो उसने क्लाइव और वाट्सन को इस घटना की सूचना देते हुए
दुख के साथ लिखा :-
" x x x इससे साफ़ धोखा साबित होता है और सन्धि तोड़ने का
इरादा ज़ाहिर होता है x x x ।
"खुदा का शुक्र है कि सन्धि मेरी ओर से भंग नहीं की गई, ख़ुदा
और रसूल के सामने हमने आपस में सुलह की थी और जो कोई पहले
उसका उल्लङ्घन करेगा अपने किए की सज़ा पावेगा।"
निस्सन्देह सिराजुद्दौला और उसके विपक्षियों के चरित्र में
आकाश पाताल का अंतर था। भोले सिराजुद्दौला ने क्लाइव के
'प्रेम भरे पत्रों' पर विश्वास करके हाल ही में अपनी आधी सेना
तक बरखास्त कर दी थी।
१२ जून को मीर जाफ़र की ओर से कलकत्ते पत्र पहुँचा, जिसमें
लिखा था कि "यहाँ सब काम तैयार है"। अगले दिन १३ जून
को अंगरेज़ी सेना ने कलकत्ते से कूच किया।
सिराजुद्दौला को भी अब मजबूर होकर अपनी सेना मैदान
में निकालनी पड़ी। सिराजुद्दौला की इतनी बेपरवाही और
उसका आत्मविश्वास झूठा न था। सिराजुद्दौला की सेना अब
भी क्लाइव और उसकी समस्त सेना को थोड़े से समय के अंदर
निर्मूल कर देने के लिए काफ़ी थी। किन्तु वही मीर जाफ़र इस
समय सिराजुद्दौला का प्रधान सेनापति था। पुराने हिन्दोस्तानी
रिवाज के अनुसार सिराजुद्दौला स्वयं मीर जाफ़र के महल में
सिराजुद्दौला ६३
पहुँचा और उससे अपनी पिछली तमाम भूलों के लिए क्षमा माँग
कर प्रेम की प्रार्थना की। मीर जाफ़र ने कुरान हाथ में लेकर सिरा-
जुद्दौला के सामने वफ़ादारी की क़सम खाई। सिराजुद्दौला को
अविश्वास का कोई सबब न हो सकता था।
मुर्शिदाबाद से २० मील दूर पलाश वृक्षों का एक बन था, जिसे
पलाशी बाग़ भी कहते थे। उसी बन के पास (हाशिया: प्लासी की लड़ाई)
प्लासी नामक गाँव में बृहस्पतिवार २३ जून
सन् १७५७ ईसवी को दोनों सेनाओं का
आमना सामना हुआ। प्रधान सेनापति मीर जाफ़र के अलावा
सिराजुद्दौला की सेना में तीन और मुख्य सेनापति थे यारलुत्फ़
ख़ाँ, राजा दुर्लभराम और मीर मुउद्दीन जिसे मीर मदन भी
कहते थे। ४५००० सेना मीर जाफ़र, यारलुत्फ़ ख़ाँ और राजा
दुर्लभराम के अधीन थी। १२००० मीर मदन के अधीन थी।
सिराजुद्दौला का एक ख़ास प्रेमपात्र मोहनलाल भी मीर मदन के
साथ था। थोड़ी ही देर के युद्ध में क्लाइव की कायरता और
अकुशलता दोनों साफ़ चमकने लगीं। विजय साफ़ सिराजुद्दौला
की ओर नज़र आती थी। ऐन मौक़े पर मीर जाफ़र का रुख़
बदलता हुआ दिखाई दिया। कर्नल मालेसन लिखता है कि
ख़बर पाते ही सिराजुद्दौला ने अपना सन्देह दूर करने के लिए
मीर जाफ़र को अपने पास बुलवाया। उसने मीर जाफ़र को अपने
और मीर जाफ़र के सम्बन्ध और अपने नाना अलीवर्दी ख़ाँ की
याद दिलाई। इसके बाद अपनी पगड़ी सर से उतार कर सिरा-
६४ भारत में अंगरेजी राज
जुद्दौला ने मीरजाफ़र के सामने ज़मीन पर फेंक दी और कहा—
“मीर जाफ़र इस पगड़ी की लाज तुम्हारे हाथों में है !” मीर
जाफ़र ने बड़े आदर के साथ पगड़ी उठाकर सिराजुद्दौला के हाथों
में दी और अपने दोनों हाथ छाती पर रख कर बड़ी गम्भीरता के
साथ फिर एक बार झुक कर सिराजुद्दौला की वफ़ादारी की क़सम
खाई। निस्सन्देह मीर जाफ़र उस समय अपनी आत्मा और
सिराजुद्दौला दोनों को जान बूझकर धोखा दे रहा था। वह
विश्वासघात पर कमर कस चुका था। सिराजुद्दौला के सामने से
हटते ही उसने फ़ौरन एक पत्र द्वारा क्लाइव को इस तमाम घटना
की सूचना दी।
सिराजुद्दौला की सेना में मीर जाफ़र ही अकेला विश्वास-
घातक न था। वास्तव में उसकी अधिकांश सेना विश्वासघातकों
से छलनी छलनी हो चुकी थी। राजा दुर्लभराम और यारलुत्फ़ ख़ाँ
भी अपने तईं शत्रु के हाथ बेच चुके थे। ऐन मौक़े पर जब कि
विजय सिराजुद्दौला के पैरों के पास खेलती दिखाई देती थी। मीर
जाफ़र, राजा दुर्लभराम और यारलुत्फ़ ख़ाँ तीनों अपनी ४५०००
सेना सहित मुड़ कर अंगरेज़ों की ओर जा मिले। थोड़ी देर बाद
सिराजुद्दौला का एक मात्र वफ़ादार सेनापति मीर मदन भी मैदान
में काम आया। करनल मालेसन लिखता है कि जब तक वीर मीर
मदन ज़िन्दा रहा वह अपनी केवल १२००० सेना से तीनों विश्वास-
घातकों के प्रयत्नों को निष्फल करता रहा। उसके जीते जी अंगरेज़ी
सेना के लिए अपने पैर जमा सकना सर्वथा असम्भव था। किन्तु
सिराजुद्दौला ६५
मीर मदन की मृत्यु से सिराजुद्दौला लाचार हो गया। उसका
दिल टूट गया। आज तक प्लासी गाँव के लोग मीर जाफ़र की दग़ा
और मीर मदन की वफ़ादारी दोनों का अत्यन्त करुणा भरे शब्दों
में ज़िक्र करते हैं।
थोड़े से रक्तपात के बाद २३ तारीख़ की शाम तक असहाय
सिराजुद्दौला को अपने हाथी पर सवार होकर मुर्शिदाबाद की
ओर भागना पड़ा। मैदान क्लाइव और मीर जाफ़र के हाथों में रहा।
सुप्रसिद्ध अंग्रेज़ इतिहास लेखक कर्नल मालेसन उस दिन की
लड़ाई के विषय में लिखता है :—
"केवल उस समय जब कि विश्वासघातकता अपना काम कर चुकी,
जब कि विश्वासघातकता ने नवाब को मैदान से बाहर निकाल दिया, जबकि
विश्वासघातकता नवाब की सेना को ऊँचे और दुर्जेय स्थान से हटा चुकी,
केवल उस समय क्लाइव आगे बढ़ सका, इससे पहले क्लाइव के आगे बढ़ने
में उसका (और उसकी सेना का) नेस्त नाबूद हो जाना असन्दिग्ध था।"*
क्लाइव ने अपनी सेना सहित पास के गाँव दादपुर में रात
गुज़ारी। शुक्रवार २४ ता० को सवेरे क्लाइव ने
मीर जाफ़र मीर जाफ़र को अपने ख़ेमे में बुलाया। मीर
का पाप जाफ़र अपने बेटे मीरन को लेकर क्लाइव के
ख़ेमे में पहुँचा। मालूम होता है मीर जाफ़र का पाप इस समय
- "It was only when treason had done her work, when treason had
driven the Nawab from the field, when treason had removed his army from its
commanding position, that Clive was able to advance without the certainty
of being annihilated."—Colonel Malleson in Decisive Battles of India, p. 73.
६६ भारत में अंगरेजी राज
उसकी छाती पर सवार था। सम्भव है क्लाइव की ओर से भी
मीर जाफ़र के दिल में दग़ा का डर रहा हो। क्लाइव के सामने
पहुँचते ही ठीक उस समय जब कि गारद उसकी पेशवाई के लिए
आगे बढ़ी, मीर जाफ़र घबराकर चौंक पड़ा। उसका चेहरा एक
दम स्याह पड़ गया। क्लाइव ने फ़ौरन उसे गले लगाकर 'तीनों
प्रान्तों का सूबा' कह कर सलाम किया। मीर जाफ़र सँभला।
क्लाइव ने उसे विश्वास दिलाया कि अंगरेज़ धर्म्म समझ कर अपने
वादों को पूरा करेंगे। इसके बाद क्लाइव ने उसे सिराजुद्दौला का
पीछा करने की सलाह दी। फ़ौरन वहाँ से कूच कर २५ तारीख़
को सबेरे मीर जाफ़र मुर्शिदाबाद पहुँचा।
एक दिन पहले यानी २४ को सबेरे सिराजुद्दौला मुर्शिदाबाद
[सिराजुद्दौला फ़क़ीरी] पहुँचा चुका था। सिराजुद्दौला का ख़ज़ाना
[भेष में] लबालब भरा हुआ था। धन को पानी की तरह
बहाकर उसने फिर एक बार फ़ौज खड़ी करने
और अपनी क़िस्मत आज़माने का प्रयत्न किया। किन्तु प्लासी
की पराजय की ख़बर सारे देश में बिजली की तरह फैल चुकी थी।
सिराजुद्दौला के इक़बाल का सूर्य्य अब अस्त हो रहा था और अस्त
होने वाले सूर्य्य की पूजा कोई नहीं करता। सिराजुद्दौला ने देख लिया
कि अब कोई मेरा साथ देने के लिए तैयार नहीं है। उसके कुछ
दरबारियों ने उसे सलाह दी कि आप हार मानकर विदेशियों के
साथ सन्धि कर लें, किन्तु उस वीर ने अत्यन्त तिरस्कार के साथ
इस सलाह को ठुकरा दिया। अंत में देशद्रोही मीर जाफ़र के आने
सिराजुद्दौला ६७
की ख़बर सुनकर और कोई चारा न देख २४ जून की आधी रात
को सिराजुद्दौला केवल अपने तीन अनुचरों सहित महल की
एक खिड़की से होकर फ़क़ीर के वेष में भगवान गोला नामक नगर
की ओर निकल गया।
२५ जून को सबेरे मीर जाफ़र मुर्शिदाबाद पहुँचा, उसके पीछे
पीछे २६ को क्लाइव अपनी सेना सहित मुर्शिदाबाद आया। किन्तु
तीन दिन तक क्लाइव मुर्शिदाबाद से लगभग छै मील बाहर
सय्यदाबाद की फ्रांसीसी कोठी में ठहरा रहा। उसके अपने पत्र
से ज़ाहिर है कि वह इस समय एकाएक मुर्शिदाबाद के शहर में
प्रवेश करने से डरता था।
२६ ता० को मीर जाफ़र से समय निश्चित करके २०० गोरे
और ५०० हिन्दोस्तानी सिपाहियों सहित विजयी क्लाइव ने मुर्शिदा-
बाद के शहर में प्रवेश किया। कुछ दिनों बाद क्लाइव ने पार्लिमेण्ट
की कमेटी के सामने गवाही देते हुए कहा :—
"नगर के लोग, जो उस अवसर पर तमाशा देख रहे थे, कई लाख
अवश्य रहे होंगे; और यदि वे चाहते तो लकड़ियों और पत्थरों से हम
यूरोपियन लोगों को वहीं ख़तम कर सकते थे।"*
यह अनुमान करना अब निरर्थक है कि यदि मुर्शिदाबाद के
बाशिन्दे उस समय ऐसा कर बैठते तो भारत के बाद के इतिहास
- "That the inhabitants, who were spectators upon that occasion,
must have amounted to some hundred thousands ; and if they had an inclina-
tion to have destroyed the Europeans, they might have done it with sticks
and stones."—Clive's Evidence Before the Parliamentary Committee.
७
६८ भारत में अंग्रेज़ी राज
ने किस ओर पलटा खाया होता। इसमें सन्देह नहीं कि उस समय
क्लाइव ने नवाब मीर जाफ़र के एक पक्ष-समर्थक की हैसियत से
मुर्शिदाबाद में प्रवेश किया। बहुत सम्भव है कि यदि नगर निवासियों
को उस समय क्लाइव के वास्तविक रूप का पता होता, यदि
उन्हें मालूम होता कि क्लाइव और उसके साथी इन चालों से अन्दर
ही अन्दर भारत की आज़ादी छीनने की कोशिशें कर रहे हैं, तो
बहुत सम्भव है नगर निवासियों का व्यवहार क्लाइव के साथ कुछ
दूसरा ही होता। किन्तु अभी तो विश्वासघातक मीर जाफ़र की
आँखें खुलने में भी कुछ समय बाक़ी था।
मुर्शिदाबाद की उस समय की अवस्था के विषय में क्लाइव
लिखता है :—
मुर्शिदाबाद उस “मुर्शिदाबाद का शहर उतना ही लम्बा, चौड़ा,
समय और आज आबाद और धनवान है जितना कि लंदन शहर ; फ़र्क़
इतना है कि लंदन के धनाढ्य से धनाढ्य मनुष्य के पास जितनी सम्पत्ति हो
सकती है, उससे बेइन्तहा ज़्यादा सम्पत्ति मुर्शिदाबाद में अनेकों के पास
मौजूद है।”
आज मुर्शिदाबाद भागीरथी नदी के तट पर ३५००० मनुष्यों की
एक छोटी सी बस्ती है, जिसकी आबादी प्रति वर्ष घटती जा रही है
और जिसमें यात्रियों के देखने के लिए पुराने महलों के खंडहर और
कुछ क़बरें मौजूद हैं। उद्योग धन्धों में वहाँ पर रेशमी वस्त्रों की बुनाई,
हाथी दाँत का काम और कपड़े पर सोने चाँदी के काम अभी तक
प्रसिद्ध हैं, किन्तु अब असें से ये सब धन्धे भी मृतप्राय हो रहे हैं।
सिराजुद्दौला ६६
२६ ता० का तीसरा पहर मीर जाफ़र के मसनद पर बैठाए
जाने के लिए नियत था । मालूम होता है उसकी
[हाशिया: मीर जाफ़र का] आत्मा भीतर से अशान्त थी । ऐन मौक़े पर
[हाशिया: मसनद पर बैठाया] उसने सिराजुद्दौला की मसनद पर बैठने से
[हाशिया: जाना] इनकार कर दिया । क्लाइव को उसका हाथ
पकड़ कर उसे मसनद पर बैठाना पड़ा । पहले क्लाइव नए नवाब के
सामने आकर आदाब बजा लाया और फिर बाक़ी दरबारियों ने
दरजा बदरजा सलामियाँ दीं ।*
कम्पनी और उसके मददगारों के लिए अब मुर्शिदाबाद के
[हाशिया: मुर्शिदाबाद की] ख़ज़ाने से अपनी अपनी जेबें भरने का समय
[हाशिया: लूट] आया । ख़ज़ाने की जाँच पड़ताल के लिए एक
दिन नियत किया गया । यह कार्य दोनों जैन
जगतसेठों के सुपुर्द किया गया। क्लाइव और उसके साथियों ने जब
देखा कि मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने की हालत, जो उन्होंने सुन रक्खी
थी वह अब न थी, तो वे इस बात पर राज़ी होगए कि मीरजाफ़र
ने जितना धन उन्हें देने का वादा किया था उसमें आधा फ़ौरन
अदा कर दे और आधा तीन साल के अन्दर तीन क़िस्तों में दे दे ।
क्लाइव का परम मित्र अंगरेज़ इतिहास लेखक और्म लिखता है :—
“ × × × ६ जुलाई सन् १७५७ ईसवी तक ( कलकत्ते की अंगरेज़ )
कमेटी के पास चाँदी के सिक्कों में ७२,७१,६६६ रुपये पहुँच गए । यह
ख़ज़ाना सात सौ सन्दूक़ों में भर कर सौ किश्तियों पर लादा गया । सैनिकों
- Clive's Letter to the Select Committee, dated 30th June 1757.
१०० भारत में अंगरेज़ी राज
की निगरानी में यह किश्तियाँ नदियां गईं। वहां से (अंगरेज़ी) जंगी
जहाज़ों की तमाम किश्तियों और अन्य किश्तियों को साथ लेकर, झंडे
फहराते हुए और विजय का बाजा बजाते हुए आगे बढ़ीं x x x इससे
पहले कभी भी अंगरेज़ क़ौम को एक साथ इतना अधिक नक़द धन कहीं
किसी लड़ाई में न मिला था।"*
बटवारे के समय छोटे से छोटे अंगरेज़ अफ़सर को कम से कम
[अमींचन्द के साथ] ४५,००० रु० दिए गए; किन्तु अपने हिन्दो-
[दग़ा] स्तानी मददगारों के साथ क्लाइव और उसके
साथियों ने फिर एक बार दग़ा की। इस तमाम
साज़िश में आदि से अन्त तक मुख्यतम हिस्सा अमींचन्द का था।
निस्सन्देह बिना अमींचन्द की सहायता के न बंगाल में अंगरेज़ों
का व्यापार इतना बढ़ पाता, न वे चन्दरनगर विजय कर सकते,
और न सिराजुद्दौला सूबेदारी की मसनद से उतारा जा सकता।
आज ही के दिन की आशा में अमींचन्द ने सिराजुद्दौला के भारतीय
दरबारियों और मुलाज़िमों को विदेशी अंगरेज़ों की ओर से रिश्वतें
देने में अपने धन को पानी की तरह बहाया था। अमींचन्द ने
- " . . . The committee by the 6th of July 1757 received, in coined
silver, 72,71,666 rupees. This treasure was packed up in 700 chests and
laden in 100 boats, which proceeded under the care of soldiers to Nadiya ;
from whence they were escorted by all the boats of the squadron and many
others, proceeding with banners displayed and music sounding, of a trium-
phal procession. . . . Never before did the English nation at one time
obtain such a prize in solid money."—Orme's History of Indostan, vol. ii.
pp. 187, 188.
सिराजुद्दौला १०१
अपनी आत्मा के साथ, अपने राजा और मालिक के साथ और
अपनी क़ौम के साथ दग़ा की, किन्तु अंगरेज़ों के साथ उसका
व्यवहार बराबर सच्चा रहा। कहते हैं कि चोर चोर आपस में एक
दूसरे के साथ बड़ा सच्चा व्यवहार करते हैं; किन्तु क्लाइव, वाट्सन
इत्यादि का व्यवहार अमींचन्द के साथ इसके विपरीत रहा।
जो सन्धि अंगरेज़ों ने मीर जाफ़र के साथ की उसमें १३ शर्तें
थीं। अमींचन्द का उनमें कहीं ज़िक्र न था। यह सन्धि सफ़ेद
काग़ज़ पर लिखी हुई थी। उसी के साथ एक दूसरी जाली सन्धि
१४ शर्तों की लाल काग़ज़ पर लिख कर अमींचन्द को दिखाई गई थी,
जिसमें एक १४ वीं शर्त यह भी थी कि मीर जाफ़र को गद्दी दिए
जाने के समय अमींचन्द को ३० लाख नक़द और उसके अलावा
नवाब के तमाम ख़ज़ाने का पाँच फ़ी सैकड़ा दिया जायगा। वाट्सन
ने इस जाली सन्धि पर दस्तख़त करने से इनकार कर दिया था,
किन्तु क्लाइव ने लुशिङ्गटन नामक एक शख़्स के हाथ से वाट्सन के
जाली दस्तख़त उस पर बनवा दिए थे।
मीर जाफ़र के नवाब बन जाने के बाद एक दिन जगतसेठ के
मकान पर जब पहली बार सन्धिपत्र पढ़कर सुनाया गया तो अमीं-
चन्द चकित होकर चिल्ला पड़ा—"यह वह सन्धि नहीं हो सकती,
जो मैंने देखी थी—वह लाल काग़ज़ पर थी।" इस पर क्लाइव ने
शान्ति के साथ उत्तर दिया—"ठीक है अमींचन्द, किन्तु यह सन्धि
सफ़ेद काग़ज़ पर लिखी हुई है।""*
- Clive's evidence before the Parliamentary Committee.
१७२ भारत में अंगरेज़ी राज
अमींचन्द के दिल पर इस का ज़बरदस्त सदमा हुआ।
बाद में स्वास्थ्य ठीक करने के लिए क्लाइव ने उसे तीर्थयात्रा की
सलाह दी। वह तीर्थयात्रा के लिए गया, किन्तु इसी सदमे से डेढ़
साल के अन्दर अमींचन्द की मृत्यु हो गई।
उन दिनों इंग्लिस्तान में जालसाज़ी की सज़ा मौत थी। किन्तु
क्लाइव ने पालिमेण्ट की कमेटी के सामने बड़े गर्व के साथ अपनी
इस जालसाज़ी का ज़िक्र किया और उसके बदले में क्लाइव को
“लॉर्ड” की उपाधि दी गई, इंग्लिस्तान में क्लाइव का बुत खड़ा
किया गया और उसके सम्मान तथा प्लासी की लड़ाई की यादगार
में तमगे ढाले गए।
चन्द रोज़ के अन्दर सिराजुद्दौला राजमहल नामक स्थान पर
[हाशिया: सिराजुद्दौला की] गिरफ़्तार कर लिया गया। अपने उस वीर तथा
[हाशिया: हत्या] शाही शत्रु के साथ कम्पनी का व्यवहार अत्यन्त
लज्जाजनक रहा। २ जुलाई को वह मुर्शिदाबाद
लाया गया। कहा जाता है कि मीर जाफ़र उसे आदर के साथ
मुर्शिदाबाद में नज़रबन्द रखना चाहता था। किन्तु उसी रात को
एक मनुष्य मोहम्मद बेग ने सिराजुद्दौला को क़त्ल कर डाला।
अगले दिन सिराजुद्दौला का कटा हुआ शरीर हाथी पर रखकर
मुर्शिदाबाद की गलियों में घुमाया गया।
फ़ारसी पुस्तक “रियाज़ुस्सलातीन” का मुसलमान रचयिता
लिखता है :—
सिराजुद्दौला १०३
“अंगरेज़ सरदारों और जगत सेठ की साज़िश से सिराजुद्दौला को क़त्ल
किया गया।”
सिराजुद्दौला की हत्या के दो दिन बाद क्लाइव ने सिलेक्ट कमेटी
के नाम एक पत्र में बड़े गर्व के साथ अपने अंगरेज़ मालिकों को
सूचना दी—
"महाशयगण, सिराजुद्दौला ख़तम हो चुका। नवाब उसकी जान
बख़्शना चाहता था, किन्तु नवाब के पुत्र मीरन और 'बड़े लोगों' ने देश के
अमन के लिए उसे मार डालना ज़रूरी समझा, क्योंकि उसके शहर के पास
आते ही ज़मींदार लोग बलवा करने लगे थे।”
निस्सन्देह इन 'बड़े लोगों' में सब से मुख्य क्लाइव था !
क्लाइव और उसके साथियों के दुष्कृत्यों पर परदा डालने के
[हाशिया: सिराजुद्दौला का] लिए अंगरेज़ इतिहास लेखकों ने आमतौर पर
[हाशिया: चरित्र] झूठे इलज़ामों और नई नई जालसाज़ियों द्वारा
सिराजुद्दौला के चरित्र को कलंकित करने का
पूरा पूरा प्रयत्न किया है। किन्तु सिराजुद्दौला की सच्चाई, उसकी
वीरता, उसके सौजन्य, उसकी योग्यता, उसकी दयानतदारी और
उसकी ईमानदारी में किसी तरह का भी सन्देह नहीं हो सकता ।
वास्तव में उसकी योग्यता के कारण ही इंगलिस्तान के ईसाई
'व्यापारियों' ने अपने और अपनी क़ौम के भावी हित के लिए उसका
नाश करना आवश्यक समझा। उसका वह ख़ज़ाना भी जो चाँदी,
सोने और जवाहरात से लबरेज़ था, इन विदेशियों के लिए काफ़ी
लालच की चीज़ थी। उसमें दोष भी थे और वे दोष थे—विदेशियों
१०४ भारत में अंगरेज़ी राज
की चालों को न समझ सकना, उन पर विश्वास और दया करना
और बार बार उनके साथ अमन से रहने की आशा करना। एक
ओर सिराजुद्दौला के ये व्यक्तिगत दोष, दूसरी ओर भारतीय जनता
में राजनैतिक जागृति और उससे उत्पन्न होने वाले राष्ट्रीयता के
भावों की कमी और तीसरी ओर उच्च श्रेणी के भारतवासियों के
चरित्र की लज्जास्पद स्वार्थपरायणता और विश्वासघातकता—इन
तीनों ने मिलकर न केवल सिराजुद्दौला का ही अंत कर दिया वरन्
सिराजुद्दौला की लाश के साथ साथ भारत की आज़ादी को भी
सदियों के लिए दफ़न कर दिया ।
क़त्ल के समय सिराजुद्दौला की आयु २५ साल की भी न थी ।
समस्त अंगरेज़ इतिहास लेखकों में शायद कर्नल मालेसन ही एक
ऐसा है जिसने सिराजुद्दौला के साथ इन्साफ़ करने की कोशिश
की है । वह लिखता है :—
“सिराजुद्दौला में और चाहे कोई भी दोष क्यों न रहा हो, उसने न
अपने मालिक के साथ विश्वासघात किया और न अपने मुल्क को बेचा।
इतना ही नहीं, वरन् कोई निष्पक्ष अंगरेज़ ६ फ़रवरी और २३ जून के बीच
की घटनाओं पर इन्साफ़ से राय क़ायम करते हुए इस बात से इनकार नहीं
कर सकता कि शराफ़त के पैमाने पर सिराजुद्दौला का नाम क्लाइव के नाम
से ऊँचा नज़र आता है । उस शोकान्त नाटक के प्रधान पात्रों में अकेला एक
सिराजुद्दौला ही ऐसा था जिसने किसी को धोखा देने की कोशिश
नहीं की ।"*
- "Whatever may have been his faults, Sirajuddowla had neither
सिराजुद्दौला १०५
इस परिस्थिति में और इस तरह के उपायों द्वारा प्लासी के
[हाशिया: पलाशी बाग़ का] सुप्रसिद्ध मैदान में हिन्दोस्तान के अंदर अंगरेज़ी
[हाशिया: अन्त] राज की नींव रक्खी गई, जिसका मुख्य श्रेय
निस्सन्देह क्लाइव ही को मिलना चाहिये ।
सम्भवतः उस दिन की लज्जास्पद स्मृति को मिटाने के लिए कुछ
दिनों बाद प्लासी "पलाशी बाग़" के एक एक वृक्ष का ठूंठ और
उनकी जड़ें तक खोदकर इंगलिस्तान पहुँचा दी गईं।
betrayed his master nor sold his country. Nay more, no unbiassed English-
man, sitting in Judgment on the events which passed in the interval between
the 9th February and the 23rd June can deny that the name of Sirajuddowla
stands higher in the scale of honor than does the name of Clive. He was
the only one of the principal actors in that tragic drama who did not attempt
to deceive."—Decisive Battles of India, p. 71.