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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

सिराजुद्दौला ६३
अच्छा सम्बंध क़ायम रखने के लिए मैं इस ख़ास विषय में भी तुम लोगों
की तसल्ली कर देने की कोशिश करूँगा।
"तुम ईसाई हो और जानते हो कि किसी झगड़े को बनाए रखने की
निस्बत उसे आपस में तय कर डालना कितना ज़्यादा अच्छा है। किन्तु
यदि तुम यह सङ्कल्प ही कर चुके हो कि अपनी लड़ाई की इच्छा के सामने
अपनी कम्पनी के हित और अलग अलग व्यापारियों के फ़ायदे दोनों को
क़ुरबान कर दो, तो इसमें मेरी कोई ज़िम्मेदारी न होगी। इस तरह की लड़ाई
बरबाद कर देने वाली होती है, उसके नतीजे घातक होते हैं, इन घातक
नतीजों को रोकने के लिए ही मैं यह पत्र लिख रहा हूँ।"*
निस्संदेह यह पत्र सिराजुद्दौला की दूरदर्शिता, उसकी शांति-
प्रियता, उसकी बरदाश्त, उसकी उदारता और उसकी प्रजापालकता,
इन सब का पूरी तरह द्योतक है। किन्तु अभी तक उसे इस बात
का काफ़ी तजरुबा न हुआ था कि इन विदेशी व्यापारियों के साथ
किसी तरह का भी समझौता कहाँ तक टिक सकता है।
अंग्रेज़ों ने जब नवाब को सुलह के लिए उत्सुक पाया तो नीचे
[छल से सिराजुद्दौला] लिखी शर्तें पेश कीं :—
[का कलकत्ते] ( १ ) अंग्रेज़ों का जितना नुक़सान हुआ है
[बुलाया जाना] उस सब का पूरा पूरा हरजाना दिया जाय।
( २ ) कम्पनी को बंगाल में जितनी रिआयतें
मिली हुई थीं वे सब पूरी तरह फिर से दे दी जावें।
* Ive's Voyages, p. 109.

६४ भारत में अंगरेज़ी राज
( ३ ) अंगरेज़ों को अधिकार हो कि जिस तरह वे चाहें अपनी
आबादियों की क़िलेबंदी कर सकें।
( ४ ) कलकत्ते में कम्पनी की एक अपनी टकसाल क़ायम हो।
चौथी शर्त को स्वीकार करना सिराजुद्दौला के अधिकार से
बाहर था। साम्राज्य भर में कहीं भी टकसाल क़ायम करना या
किसी को टकसाल क़ायम करने की इजाज़त देना केवल दिल्ली
सम्राट के अधिकार में था। पहली तीनों शर्तें सिराजुद्दौला ने मंजूर
कर लीं और चौथी के विषय में पत्र व्यवहार होता रहा। इस पत्र
व्यवहार में अंगरेजों ने और नई नई शर्तें नवाब के सामने पेश करनी
शुरू कीं। उनका असली उद्देश सिराजुद्दौला के साथ सुलह
करना नहीं था। उनका उद्देश सिराजुद्दौला को धोखा देकर बंगाल
में एक ज़बरस्त बग़ावत खड़ी करना था। इन लोगों ने सिराजुद्दौला
से कलकत्ते चलने की प्रार्थना की और उसे यह आशा दिलाई कि
कलकत्ते पहुँच कर सुलह की शर्तें तय हो जायँगी।
अंगरेज़ इस समय सिराजुद्दौला को धोखे से कलकत्ते लाकर
अचानक उस पर हमला करना चाहते थे। सुप्रसिद्ध
विश्वासघात मीर जाफ़र इस समय सिराजुद्दौला के साथ और
'उसके मुख्य सेनापतियों में से था। एस० सी० हिल लिखता है कि
सिराजुद्दौला को "अपनी इस यात्रा में मालूम हो गया था कि
मेरे अनेक सिपाही और कई अफ़सर तक मेरा साथ देने के लिए
तैयार नहीं हैं।"*

  • Ibid, vol. i. p. cxlvii.

सिराजुद्दौला ६५
इतिहास लेखक स्क्रैफ़टन लिखता है कि सिराजुद्दौला को “अपने
मुख्य मुख्य अफ़सरों और ख़ासकर मीरजाफ़र में, जिसका
व्यवहार इस मामले में बड़ा रहस्यपूर्ण मालूम होता था, विद्रोह
के लच्छन दिखाई दे गए थे।”*
४ फ़रवरी सन् १७५७ ई० को सिराजुद्दौला कलकत्ते पहुंचा।
कलकत्ते में अंगरेज़ों ने उसे बड़े आदर के साथ अमींचंद के बाग़
में ठहराया। सुलह की बातचीत बराबर जारी रही। अंगरेज़ों की
गुप्त तजवीज़ थी कि ५ को सबेरे सूर्योदय से पहले सिराजुद्दौला
पर चुपके से हमला कर दिया जाय। इतिहास लेखक जीन लॉ
लिखता है :—
“जिस दिन अंगरेज़ हमला करने वाले थे उससे एक दिन पहले सिरा-
जुद्दौला को और अधिक पूरी तरह धोखे में रखने की ग़रज़ से और उसके
ख़ेमे की जगह को अच्छी तरह देख लेने के लिए उन्होंने उसके पास अपने
दो वकील भेजे। इन वकीलों को हुकुम था कि वे नवाब से सुलह की तजवीज़ें
करें, किन्तु सुलह की जो शर्तें उन्होंने पेश कीं उन्हीं से नवाब को ज़ाहिर हो
जाना चाहिये था कि यह सब उसके शत्रुओं की केवल एक चाल थी।”†

  • Sirajuddaula " discovered some appearance of disaffection in some of
    his principal officers, particularly in Mir Jaffar, whose conduct in this affair
    had been very mysterious."—Reflections p. 66.
    † " To deceive him (Siraj) more completely and examine the position
    of his camp the English sent deputies the day before the attack they medita-
    ted. These deputies were ordered to propose an accommodation, but the
    very conditions must have shown the Nawab this was only a ruse on the part
    of his enemy."—Jean Law, Ibid vol. iii. p. 182.

६६ भारत में अंगरेज़ी राज
जो दो अंगरेज़ वकील क्लाइव ने इस अवसर पर नवाब के
पास भेजे और जो वास्तव में जासूसों का काम कर रहे थे, उनके
नाम वाल्श और स्क्रैफ़टन थे। एक और हिन्दोस्तानी देशद्रोही
राजा नवकृष्ण इस समय सिराजुद्दौला के दल में अंगरेज़ों के
जासूस का काम कर रहा था और उन्हें पल पल पर नवाब की
सब काररवाइयों की ख़बर देता रहता था।
नवाब के ख़ेमे के पास ही अंगरेज़ वकीलों के ख़ेमे डाल दिए
गए। पहले से जो हिदायतें उन्हें दे दी गई थीं उनके अनुसार
४ तारीख़ की रात को ये दोनों दूत सिराजुद्दौला से बातचीत करके
अपने ख़ेमे में आगए, इसके बाद सोने के बहाने उन्होंने ख़ेमों की
रोशनी बुझा दी और फिर अँधेरे में वहाँ से निकल कर ये लोग
अंगरेज़ों की ओर भाग आए। इसके बाद की घटना के विषय में
जीन लॉ लिखता है:—
“अगले दिन ५ फ़रवरी को सुबह ४ या ५ बजे गहरे कोहरे में करनल
क्लाइव ने अपनी सेना सहित नवाब के दल पर हमला किया और ये लोग
ठीक उस ख़ेमे पर आकर गिरे जिसमें पहले दिन शाम को अंगरेज़ वकील
नवाब से मुलाक़ात कर चुके थे। × × × सौभाग्य से नवाब उस समय
उस ख़ेमे में मौजूद न था। उसके एक दीवान को अंगरेज़ वकीलों पर पहले
ही कुछ संदेह हो चुका था और उसने नवाब को सलाह दी थी कि आप ज़रा
दूर एक दूसरे ख़ेमे में रात गुज़ारें।”
सिराजुद्दौला को, ऐसे समय में जब कि सुलह की बातचीत
जारी थी, इस विश्वासघात की कोई आशा न थी। जो लड़ाई इस

सिराजुद्दौला ६७
समय सिराजुद्दौला और अंगरेज़ों के बीच हुई उसके विषय में
रेनाल्ट अपने ४ सितम्बर के एक पत्र में लिखता है :—
"अंगरेज़ों ने अपनी सारी स्थल सेना और उसके साथ अपने जहाज़ों
के तमाम सिपाही लड़ने को भेज दिए। वे सोते हुए मुसलमानों के ऊपर
धोखा देकर अचानक टूट पड़े, फिर भी इस लड़ाई से जितने लाभ की
उन्हें आशा थी उतना न हो सका। शुरू में वे शत्रु को थोड़ा सा पीछे हटा
पाए, किन्तु फिर ज्योंही सिराजुद्दौला ने अपनी सेना का एक भाग जमा कर
लिया, त्योंही अंगरेज़ों को ख़ुद पीछे हट जाना पड़ा। अँगरेज़ी सेना बेतरतीबी
के साथ पीछे को भागी और यह उनकी बड़ी खुशक़िस्मती थी कि वे अपने
क़िले की दीवारों के नीचे तोपों के सुरक्षित साए में पहुँच सके । इस लड़ाई
में अँगरेज़ों के क़रीब २०० आदमी काम आए ।”*
निस्सन्देह अंगरेज़ों को इस विश्वासघात का बदला देने के
योग्य नवाब के पास अब भी काफ़ी सेना थी, किन्तु और आगे
चल कर रेनाल्ट लिखता है :—
‘“नवाब के मंत्रियों ने जो प्रायः सभी अंगरेज़ों के तरफ़दार थे और
केवल सुलह कर लेना चाहते थे, इस मौक़े से फ़ायदा उठाकर नवाब को
सुलह के लिए मजबूर किया। दूसरी तरफ़ अपने सेनापतियों की बग़ावत से
लाचार होकर × × × नवाब ने देखा कि सुलह के लिए राज़ी हो जाने के
सिवा उसके पास और कोई चारा न था। उसे अत्यन्त कड़ी शर्तें स्वीकार
करनी पड़ीं।”

  • Ibid, vol. iii. p. 246.

६८ भारत में अंगरेज़ी राज
इस हालत में नवाब सिराजुद्दौला ने ६ फ़रवरी सन् १७५७ ई०
[अलीनगर की] को अंगरेज़ों के साथ वह सन्धि स्वीकार की जो
[सन्धि] 'अलीनगर की सन्धि' के नाम से प्रसिद्ध है।
इस सन्धि की सात शर्तें ये थीं :—
( १ ) जितनी रिआयतें दिल्ली सम्राट ने अंगरेज़ों के साथ कर
रक्खी थीं वे सब फिर से मंज़ूर कर ली जावें।
( २ ) बंगाल, बिहार और उड़ीसा भर में जिस किसी माल के
साथ अंगरेज़ों का 'दस्तक' हो वह सब बिना महसूल आने जाने
दिया जावे।
( ३ ) कम्पनी की कोठियाँ और कम्पनी या उसके नौकरों या
असामियों का वह तमाम माल असबाब, जो नवाब ने ज़ब्त कर
लिया था वापस दे दिया जावे, और नवाब के आदमियों ने जो
कुछ माल लूट लिया था उसके बदले में एक नक़द रक़म दी जावे।
( ४ ) अंगरेज़ जिस तरह उचित समझें उस तरह कलकत्ते
की क़िलेबंदी कर लें।
( ५ ) अंगरेज़ों को सिके ढालने का अधिकार रहे।
( ६ ) नवाब और उसके मुख्य पदाधिकारी और मंत्री इस
सुलहनामे पर दस्तख़त करें।
( ७ ) अंगरेज़ क़ौम और अंगरेज़ कम्पनी की तरफ़ से ऐड-
मिरल वाटसन और करनल क्लाइव दोनों इस बात का वादा करें
कि जब तक नवाब की ओर से सन्धि का उल्लंघन न हो, तब तक
हम नवाब के राज में अमन से रहेंगे।

सिराजुद्दौला ६६
भारत में अंगरेज़ों और फ़्रांसीसियों के दरमियान प्रतिस्पर्द्धा
इस समय ज़ोरों पर थी। इसलिए अंगरेज़ों ने इस बात पर ज़ोर
दिया कि सुलहनामे में एक शर्त यह भी रक्खी जावे कि सिराजु-
द्दौला निरपराध फ़्रांसीसियों पर चढ़ाई करके उन्हें इस मुल्क से
बाहर निकाल दे। किन्तु सिराजुद्दौला ने इस शर्त को मानने से
इनकार कर दिया।
इस सन्धि के साथ साथ अंगरेज़ों ने नवाब से यह इजाज़त
ले ली कि मुर्शिदाबाद के दरबार में अंगरेज़ों का एक एलची रहा
करे। यह भी तय हो गया कि जब कभी युद्ध इत्यादि के समय
नवाब को ज़रूरत हो और नवाब आज्ञा दे तो अंगरेज़ अपनी सेना
और धन दोनों से नवाब की मदद करें।
इस सुलहनामे की स्याही अभी सूखने भी न पाई थी कि
सन्धि तोड़ने अंगरेज़ों ने, जिनका असली उद्देश बग़ावत था,
के प्रयत्न फ़ौरन उसे तोड़ने के उपाय सोचने शुरू किए।
दरबार में एक अंगरेज़ एलची को रहने की
इजाज़त देकर सिराजुद्दौला ने एक नई बला अपने सर ले ली।
६ फ़रवरी को सुलहनामे पर दस्तख़त हुए और १२ को क्लाइव और
उसके साथियों ने सिलेक्ट कमेटी के नाम अपने एक पत्र में खुले
तौर पर यह राय प्रकट की :—
"और भी नई रियायतें नवाब से माँगी जा सकती हैं × × × और
यदि एक ऐसा आदमी नवाब के दरबार में एलची नियुक्त करके भेजा जाय जो

७० भारत में श्रंगरेजी राज
देश की ज़बान और रिवाजों को समझता हो, तो न केवल उसके ज़रिए ये
नई शर्तें ही मंज़ूर कराई जा सकती हैं, बल्कि और बहुत से इस तरह के
प्रकट या गुप्त कामों में भी, जो पत्र व्यवहार द्वारा इतनी अच्छी तरह नहीं हो
सकते, वह मनुष्य बहुत उपयोगी साबित हो सकता है।"
मुर्शिदाबाद के दरबार में साज़िशों का जाल पूरना श्रंगरेजों
के लिए अब और अधिक आसान हो गया और इन कामों के लिए
क़ासिम बाज़ार की कोठी का श्रंगरेज़ अफ़सर वाट्स, जिसकी
एक बार सिराजुद्दौला जान बख़्श चुका था एलची नियुक्त करके
भेजा गया । १६ फ़रवरी के एक पत्र में वाट्स को कम्पनी की ओर
से यह हिदायत की गई कि तुम ६ तारीख़ के सुलहनामे से बाहर
दस और नई शर्तें सिराजुद्दौला के सामने पेश करो । इन नई शर्तों
में इस तरह की शर्तें भी शामिल थीं, मसलन :-
नवाब के महकमें चुंगी का कोई मुलाज़िम श्रंगरेज़ों के किसी
दस्तख़ती माल पर यदि किसी तरह का महसूल मांग बैठे तो बिना
नवाब से शिकायत किए या सरकारी अदालतों तक पहुँचे
श्रंगरेज़ों को उसे स्वयं दंड देने का अधिकार हो । कम्पनी के
ज़िम्मे या किसी भी श्रंगरेज़ के ज़िम्मे यदि किसी भारतवासी का
कोई क़र्ज़ निकलता हो तो नवाब उसे अपने पास से अदा कर दे ।
जो अदालतें श्रंगरेज़ अपनी ओर से क़ायम करें उन्हें भारत-
वासियों को मुजरिम क़रार देने और उन्हें फाँसी देने तक का
अधिकार मिल जावे । नवाब से भेंट करने के समय श्रंगरेज़ों को
रिवाज के श्रनुसार किसी तरह की नज़र पेश न करनी पड़े ।

सिराजुद्दौला ७१
कलकत्ते के नीचे नदी से एक मील के अंदर नवाब कभी किसी
तरह की क़िलेबंदी न करे। इत्यादि, इत्यादि ।
अंगरेज़ ख़ूब जानते थे कि सिराजुद्दौला इस तरह की नई शर्तें,
जिनका साफ़ मतलब उससे शासन अधिकार छीनना था, स्वीकार
न कर सकता था। असली मतलब सिद्ध करने के लिए सुप्रसिद्ध
अमींचंद अपनी थैलियों सहित वाट्स का सलाहकार नियुक्त होकर
उसके साथ मुर्शिदाबाद भेजा गया। वाट्स अपने “मैमॉयर्स आफ़
दी रेवोल्यूशन” में स्वीकार करता है कि अपनी साज़िशों को सफल
बनाने के लिए उसने मुर्शिदाबाद के दरबार में रिश्वतों का
बाज़ार ख़ूब गरम कर रक्खा था।
दूसरी ओर अलीनगर की सन्धि के विरुद्ध और उसकी ख़ाक
सिराजुद्दौला और परवा न करते हुए अंगरेज़ों ने फ़ौरन सबसे
वाट्सन में पत्र- पहले फ़्रांसीसियों की चन्दरनगर वाली कोठी
व्यवहार पर हमला करने की ठानी। सिराजुद्दौला अभी
कलकत्ते से लौटकर अपनी राजधानी तक पहुँचा भी न था कि
मार्ग ही में उसे अंगरेज़ों के इस इरादे का समाचार मिला। उसने
तुरन्त १६ फ़रवरी को ऐडमिरल वाट्सन के नाम इस मज़मून का
एक पत्र लिखा:—
“अपने देश और अपने राज के अंदर लड़ाइयाँ बंद करने के उद्देश से
मैंने अंगरेज़ों के साथ सुलह मंजूर की थी, ताकि तिजारत पहले की तरह जारी
रह सके × × × इसी तरह तुम ने भी अपने दस्तख़त से और अपनी मोहर
लगाकर इस मज़मून का इक़रारनामा मेरे पास भेज दिया है कि तुम मेरे देश

७२ भारत में अंगरेज़ी राज
की शांति भंग न करोगे; किन्तु अब मालूम होता है कि तुम हुगली के
पास की फ़्रांसीसी कोठी का मोहासरा करने और फ़्रांसीसियों से लड़ाई शुरू
करने की तजवीज़ कर रहे हो। यह बात हर क़ायदे और रिवाज के ख़िलाफ़
है कि तुम लोग अपने यहाँ के आपसी झगड़ों और दुश्मनियों को मेरे देश
में लाओ x x x अगर तुमने फ़्रांसीसी कोठियों का मोहासरा करने की ठान
ही ली है, तो मेरी अपनी आन और अपने बादशाह की ओर मेरा फ़र्ज़ दोनों
मुझे मजबूर करेंगे कि मैं अपनी फ़ौज से फ़्रांसीसियों की मदद करूँ। मालूम
होता है अभी हाल में जो सन्धि मेरे तुम्हारे बीच हुई है उसे तुम तोड़ना
चाहते हो। इससे पहले मराठों ने इस राज पर हमला किया था और बरसों
इस देश में लड़ाइयाँ जारी रक्खीं। किन्तु जब एक बार झगड़ा तय हो गया
और उनके साथ संधि हो गई, तो उन्होंने कभी सन्धि की शर्तों का उल्लङ्घन
नहीं किया और न वे कभी आइन्दा उन शर्तों से हटेंगे। जो सन्धियाँ निहायत
सञ्जीदगी के साथ की जाती हैं उनकी क़तई परवा न करना और उन्हें तोड़
देना ग़लत और बुरा तरीक़ा है। निस्सन्देह तुम्हारा फ़र्ज़ है कि तुम अपनी
ओर की शर्तों पर ठीक ठीक क़ायम रहो और आइन्दा मेरे मातहत सूबों में, न
कभी किसी तरह के झगड़ों या छेड़ छाड़ की अपनी तरफ़ से कोशिश करो और
न अपने सबब कोई झगड़ा खड़ा होने का मौक़ा दो। दूसरी ओर से जो कुछ
मैने वादा किया है और मंजूर कर लिया है उसे मैं बिलकुल ठीक ठीक समय
पर पूरा करूँगा x x x ।"१
इस पत्र की भाषा बिलकुल सरल और निष्कपट है, किन्तु दूसरे ही
दिन सिराजुद्दौला को फिर एक पत्र इस मज़मून का लिखना पड़ा:—
¹ Ive's Voyages, pp. 119, 120.

सिराजुद्दौला ७३
"मैं अनुमान करता हूँ कि जो पत्र कल मैंने तुम्हें लिखा है वह
मिला होगा। उसके बाद फ़्रांसीसी वकील ने मुझे इत्तला दी है कि
तुम्हारे पाँच या छै नए जंगी जहाज़ हुगली में आ गए हैं और औरों के आने
की आशा है। फ़्रांसीसी वकील यह भी कहता है कि बारिश ख़तम होते
ही तुम मेरे और मेरी प्रजा के साथ फिर से लड़ाई शुरू करने की तजवीज़ें कर
रहे हो। यह व्यवहार एक सच्चे सिपाही को और एक ऐसे आन वाले मनुष्य
को जो अपने वादे का पक्का है शोभा नहीं देता। यदि तुम उस सन्धि की
ओर सच्चे हो जो तुमने मेरे साथ की है, तो अपने जंगी जहाज़ नदी से
बाहर भेज दो और अपने अहदनामे पर पूरी तरह क़ायम रहो, मैं अपनी
ओर से सन्धि का पालन करने में न चूकूँगा। इतनी सञ्जीदगी के साथ
सन्धि करने के फ़ौरन ही बाद फिर जंग शुरू कर देना क्या उचित या
ईमानदारी है ? मराठे किसी इलहामी किताब से बँधे हुए नहीं हैं, तो भी वे
अपनी सन्धियों का बिलकुल ठीक ठीक पालन करते हैं। इसलिए यह बड़े
आश्चर्य की और विश्वास के अयोग्य बात होगी, यदि ईसाई लोग जिन्हें
इंजील की रोशनी हासिल है, उस सन्धि पर क़ायम और पक्के न रहें जिसे
उन्होंने ख़ुदा और ईसामसीह के सामने क़बूल किया है।"
२३ फ़रवरी को यह पत्र वाटसन को मिला। २५ को उसने
सिराजुद्दौला के नाम इस प्रकार उत्तर लिखा :-
"× × × मैं नहीं जानता कि आप पर उस हैरानी को किस तरह
ज़ाहिर करूँ जो मुझे यह देखकर हुई है कि महज़ इस हल्की सी बिना पर
"कि किसी कमीने शख़्स ने आपसे यह कह देने का साहस किया कि मैं
शान्ति भंग करने की तजवीज़ में हूँ, आपने सचमुच मुझ पर यह इलज़ाम

७४ भारत में अंग्रेज़ी राज
लगा दिया। × × × जनाब, आपसे मैं यह उम्मीद करता हूँ कि आप उस
कमीने शख़्स को जिसने मुझ पर झूठा इलज़ाम लगाने और आपको धोखा
देने का साहस किया मुनासिब दंड देंगे। इस बीच मैंने फ़्रांसीसियों से
उनके वकील के व्यवहार की शिकायत की है और उन्होंने मुझसे वादा
किया है कि 'हम ख़ुद नवाब को लिखेंगे कि जो इलज़ाम हमारे वकील ने
आप पर लगाया है वह हमें मालूम है कि झूठा है।' आप विश्वास रखिए कि
मैं सदा अपना धर्म समझ कर सुलह पर क़ायम रहूँगा × × × ।"
निस्सन्देह यह पत्र कपट और झूठ दोनों से भरा हुआ था।
सिराजुद्दौला की इस सीधी सी बात का कि "पाँच या छै नए जंगी
जहाज़ हुगली में पहुँच चुके हैं" पत्र भर में कहीं उत्तर देने की
चेष्टा नहीं की गई। सच यह है कि अंग्रेज़ इस समय फ़्रांसीसियों
और सिराजुद्दौला दोनों के साथ लड़ने का निश्चय कर चुके थे,
चुपचाप तैयारियाँ हो रही थीं और केवल मौक़े का इन्तज़ार था।
सिराजुद्दौला को वे अंत तक धोखे में रखना चाहते थे।
इसी समय के निकट कहा जाता है कि दिल्ली सम्राट के दरबार
[हाशिया: दिल्ली सम्राट और] और सिराजुद्दौला के बीच कुछ अनबन हो
[हाशिया: सिराजुद्दौला] गई। ख़बर मिली कि सम्राट की सेना बंगाल
की ओर बढ़ी चली आ रही है। सिराजुद्दौला
ने उसके मुक़ाबले के लिए पटने की ओर बढ़ने का निश्चय
किया। ६ फ़रवरी की सन्धि में यह तय हो चुका था कि इस
तरह की कोई आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेज़ धन और फ़ौज
दोनों से नवाब की सहायता करेंगे। सिराजुद्दौला ने वाट्सन को

सिराजुद्दौला ७५
सेना भेजने के लिए लिखा और उसी पत्र में यह भी लिख दिया कि
जब तक अंगरेज़ी सेना मेरे पास रहेगी तब तक मैं एक लाख रुपए
माहवार उसके ख़र्च के लिए दूंगा। सम्भव है इस प्रकार सेना
माँगने में सिराजुद्दौला का एक उद्देश यह भी रहा हो कि इस
बहाने अंगरेज़ कोई और शरारत करने से रुके रहें। इसी बीच
सिराजुद्दौला ने फ़्रान्सीसियों को भी एक पत्र लिखा कि आप लोग
अंगरेज़ों के साथ सुलह करके मेरे राज में शांति और अमन से रहें।
किन्तु अंगरेज़ों से फ़ौज की मदद मांगना सिराजुद्दौला के
लिए एक घातक भूल साबित हुई। वाटसन ने सिराजुद्दौला के पत्र
का अत्यन्त गोलमोल जवाब दिया। उधर इस पत्र ने अंगरेज़ी सेना
को कलकत्ते से बढ़ने का पूरा मौक़ा दे दिया। सेना कलकत्ते से
बढ़ी, किन्तु सिराजुद्दौला की मदद के लिए नहीं, वरन् पहले चन्दर-
नगर की फ्रांसीसी कोठी को विजय करने और फिर सिराजुद्दौला
पर हमला करने के गुप्त उद्देश से।
• इस समय अंगरेज़ों का सब से पहला उद्देश बंगाल के अंदर
चन्दरनगर पर अपने यूरोपियन प्रतिस्पर्धी फ़्रान्सीसियों की ताक़त
हमले का इरादा को ख़त्म करना था। क्लाइव और वाटसन दोनों
इरादा कर चुके थे कि सिराजुद्दौला के साथ लड़ने
से पहले कोई न कोई बहाना निकाल कर फ्रांसीसियों की चन्दर-
नगर वाली कोठी पर हमला करके उस पर क़ब्ज़ा कर लिया
जाय, किन्तु ऐसा करना ६ फ़रवरी वाली सन्धि का उल्लंघन करना
होता। सिराजुद्दौला भी इस विषय में उन्हें आगाह कर चुका था।

[Page Header]
७६ भारत में अंगरेज़ी राज

इसके अलावा फ़्रांसीसी भी अंगरेज़ों से लड़ना न चाहते थे ।
उन्होंने सिराजुद्दौला का पत्र पाते ही सिराजुद्दौला की इच्छा के
अनुसार आपसी समझौते के लिए अपने वकील अंगरेज़ों के पास
भेजे । यहाँ तक कि समझौते की शर्तें भी लिखी गईं, जो दोनों पक्षों
ने स्वीकार कर लीं । नवाब भी समझौते को पालन कराने की
ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेने के लिए राज़ी हो गया । केवल
समझौते के काग़ज़ पर वाट्सन के हस्ताक्षर होना बाक़ी रह
गया था ।
किन्तु अंगरेज़ों का असली मतलब इस तरह के समझौते से
सिद्ध न हो सकता था । क्लाइव और वाट्सन दोनों ने फ़्रांसीसियों
पर हमला करने का निश्चय कर लिया था और ऐन मौक़े पर
वाट्सन ने समझौते के काग़ज़ पर दस्तख़त करने से इनकार कर
दिया । चन्दरनगर पर हमला क्लाइव और वाट्सन दोनों करना
चाहते थे, किन्तु हमले के ढंग के विषय में इन दोनों में एक ख़ास
मतभेद हो गया । वाट्सन की राय थी कि बिना सिराजुद्दौला से
पूछे या बिना उसे सूचना दिए ही चन्दरनगर पर हमला कर
दिया जावे, किन्तु क्लाइव इसके विरुद्ध था । क्लाइव चाहता था कि
पहले रिश्वतें देकर या जालसाज़ी करके किसी तरह सिराजुद्दौला
की ओर से इस मज़मून का एक पत्र, जिससे मालूम हो कि
सिराजुद्दौला हमारे चन्दरनगर पर हमला करने में सहमत है, अपने
पास रख लिया जावे और फिर चन्दरनगर पर हमला किया
जावे । इस सम्बन्ध में क्लाइव ने ४ मार्च सन् १७५७ को सिलेक्ट

सिराजुद्दौला ७७
कमेटी के मेम्बरों के नाम जो पत्र लिखा उससे इस मामले के स्वरूप
का ख़ासा पता चल सकता है। क्लाइव ने लिखा :—
"महाशय ! ज़रा सोचिये कि हमारी इन हाल की काररवाइयों के विषय
में दुनियां क्या राय क़ायम करेगी। चन्दरनगर के (फ़्रांसीसी) गवरनर और
उसकी कौंसिल की तरफ़ से हमारे पास इस मज़मून का पत्र आया कि हम गङ्गा
प्रांत में आपके साथ सुलह से रहने के लिए राज़ी हैं। हमने इसके जवाब में
यह इच्छा प्रकट की कि आप अपने वकील भेजें और उन्हें लिख दिया कि हम
खुशी से आपके साथ समझौता करने को तैयार हैं। तो क्या हमने इस उत्तर
द्वारा एक प्रकार से सुलह स्वीकार नहीं कर ली ? इसके अलावा फ़्रांसीसी वकीलों
के आने के बाद क्या हमने सुलह की इस तरह की शर्तें तैयार नहीं कीं, जो
दोनों पक्षों के लिए सन्तोषजनक हैं और क्या हम इस बात को मंजूर नहीं कर
चुके हैं कि हर शर्त पर दोनों पक्षों के दस्तख़त हों, दोनों की मोहरें लगें और
दोनों उसके पालन की प्रतिज्ञा करें ? फिर अब नवाब क्या सोचेगा ? जब हम
अपनी ओर से नवाब से वादे कर चुके हैं और वह इस सन्धि को पालन कराने
की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेने की रज़ामन्दी तक ज़ाहिर कर चुका है तो
इसके बाद निस्सन्देह नवाब और सारी दुनियां यही समझेगी कि हम हलकी
और ओछी तबीयत के आदमी हैं या हमारा कोई भी सिद्धांत नहीं × × × ।”
वास्तव में क्लाइव वाट्सन की अपेक्षा कहीं अधिक पक्का धूर्त्त
था। वह उस समय चुपचाप वाट्स के ज़रिये,
क्लाइव की धूर्त्तता जो मुर्शिदाबाद के दरबार में एलची था, जाल-
साज़ी करवाकर नवाब की अनुमति का परवाना प्राप्त कर लेने की
कोशिश में लगा हुआ था।

७८ भारत में अंगरेज़ी राज
वाट्स ने १० मार्च को नवाब के मंत्रियों को रिश्वत देकर
नवाब की ओर से वाट्सन के नाम एक पत्र भिजवाया जिसके अंत
में यह वाक्य था :—
“आप समझदार और उदार हैं, यदि आपका शत्रु शुद्ध हृदय से
आपकी शरण चाहे तो आप उसकी जान बख़्श दें, किन्तु आपको उसके
इरादों की पवित्रता के विषय में पूरी तसल्ली होनी चाहिये, यदि ऐसा न हो
तो जो कुछ आप ठीक समझें करें।”
इस पत्र की मूल फ़ारसी प्रति कहीं नहीं मिलती और अंगरेज़ी
तरजुमा जिसका ऊपर हिन्दी तरजुमा दिया गया है वाट्स का
किया हुआ है।
वाट्स का दूसरा साथी स्क्रैफ़टन साफ़ लिखता है कि इस पत्र
को लिखाने के लिए अंगरेज़ों ने नवाब के मंत्रियों को रिश्वतें देने में
काफ़ी रुपया ख़र्च किया।* इतिहास लेखक जीन लॉ लिखता है
कि वाट्स ने मुर्शिदाबाद में रिश्वतों और झूठे वादों का बाज़ार
इतना गरम कर रक्खा था कि :—
“नवाब की सेना के सब मुख्य मुख्य अफ़सर मीर जाफ़रअली ख़ाँ,
ख़ुदादाद ख़ाँ लट्टी और कई और × × × पुराने दरबार के सब वज़ीर × × ×
क़रीब क़रीब सब मंत्री, दरबार के मुहर्रिर, यहाँ तक कि हरमसरा के ख़ोजे
तक अंगरेज़ों की ओर थे। × × ×”†
इस पत्र के सम्बन्ध में जीन लॉ को विश्वास है कि वाट्स ने

  • Reflections, p. 70.
    † Bengal Records, vol. iii, p. 191.

सिराजुद्दौला ७६
उसे लिखाने के लिए नवाब के मंत्री को रिशवत दी।* वह यह भी
लिखता है कि :-
“नवाब जिन पत्रों को अपने हुकुम से लिखवाता था उन्हें कभी पढ़ता
न था, इसके अलावा मुसलमान ( शासक ) कभी अपने हाथ से दस्तख़त
नहीं करते। जब लिफ़ाफ़ा बंद करके अच्छी तरह कस दिया जाता है तब
मंत्री नवाब से उसकी मोहर माँगता है और नवाब के सामने लिफ़ाफ़े पर
. मोहर लगाता है, कभी कभी एक नक़ली मोहर भी होती है।”†
इन सब कामों में मुर्शिदाबाद के दो जैन जगतसेठों का प्रभाव
और अर्मींचंद का धन, इन दोनों से अंगरेज़ों को काफ़ी मदद मिल
रही थी।
३ मार्च को क्लाइव ने सिराजुद्दौला को सहायता पहुँचाने के
बहाने अपनी सेना की बाग सँभाली। ७ मार्च को
चन्दरनगर पर उसने सिराजुद्दौला को लिख भेजा कि मैं सहायता
अंगरेज़ों का के लिए आता हूँ। अंगरेज़ों की तैयारी पूरी थी।
क़ब्ज़ा इस बीच बम्बई से भी कुछ सेना क्लाइव

८० भारत में अंग्रेज़ी राज
का वह जाली ख़त मुर्शिदाबाद से चला, जिसमें कहा जाता है कि
नवाब ने अंगरेज़ों को चन्दरनगर का मोहासरा करने की इजाज़त
दे दी। ११ को एक दूसरे पत्र द्वारा क्लाइव ने फ़्रांसीसियों पर यह
एक नया इलज़ाम लगाया कि आप लोगों ने अंगरेज़ी सेना से भागे
हुए कुछ बाग़ियों को अपने यहाँ छिपा रक्खा है। युद्ध के लिए
बस यह बहाना काफ़ी था। १२ को चन्दरनगर से दो मील की दूरी
पर क्लाइव की सेना आ पहुँची। इसी समय वाट्सन भी अपनी
सेना लेकर पहुँच गया। १४ मार्च को चन्दरनगर का मोहासरा
शुरू हुआ और २३ मार्च को चन्दरनगर अंगरेज़ों के हाथों में आ
गया। बंगाल के अंदर फ़्रांसीसियों की दूसरी कोठियों के विषय में
अंगरेज़ों और फ़्रांसीसियों के दरमियान एक सन्धि हो गई।
चन्दरनगर की इस सरल विजय में भी युद्ध कौशल या वीरता
[हाशिया: चन्दरनगर के दो] ने अंगरेज़ों का इतना साथ नहीं दिया जितना
[हाशिया: मुख्य विश्वास-] कूट नीति ने। दो बड़े विश्वासघातकों के
[हाशिया: घातक] नाम इस मोहासरे के इतिहास में मिलते हैं।
पहला एक फ़्रांसीसी अफ़सर लैफ़्टेनेन्ट दी तेरानो, जिसने रुपए
लेकर दरिया की ओर का मार्ग अंगरेज़ों के लिए खोल दिया और
दूसरा हुगली का हिन्दुस्तानी फ़ौजदार, महाराजा नन्दकुमार,
जिसे सिराजुद्दौला ने समाचार पाते ही एक बहुत बड़ी सेना सहित
फ़्रांसीसियों की सहायता और चन्दरनगर की भारतीय प्रजा की
रक्षा के लिए पहले से चन्दरनगर भेज दिया था, किन्तु जिसे ऐन
मौक़े पर अमींचंद के धन ने अंगरेज़ों की ओर खींच लिया।

सिराजुद्दौला ८१
फ्रांसीसी विश्वास घातक के विषय में एक यूरोपियन लेखक
ब्लौकमैन लिखता है :-
"तेरानो को, जोकि इस विश्वासघात के सबब बदनाम और 'रू-स्याह'
हो गया था, अपनी कृतघ्नता के बदले में अंगरेज़ों से बहुत बड़ी रक़म प्राप्त
हुई । उसने इस धन का एक भाग अपने घर फ्रांस में अपने बूढ़े कमज़ोर
बाप के पास भेजा, किन्तु बाप ने जब अपने बेटे के इस लज्जास्पद व्यवहार
का हाल सुना तो उसने धन वापस कर दिया । इस पर तेरानो को बड़ी ग़ैरत
आई । शर्म ने 'उसका पल्ला पकड़ लिया', उसने अपने तईं मकान के अंदर
बन्द कर लिया; चन्द रोज़ के बाद उसका शरीर मकान के दरवाज़े पर
एक तौलिए से लटका हुआ मिला । ज़ाहिर था कि उसने आत्महत्या कर
ली है ।"*
दूसरे यानी भारतीय विश्वासघातक के विषय में स्क्रैफ़टन और
थॉर्नटन दोनों ने अपने ग्रन्थों में साफ़ लिखा है कि अंगरेज़ों ने
अमींचन्द की मार्फ़त नन्दकुमार को रिश्वत दी और अंगरेज़ी
सेना के पहुँचने पर फ्रांसीसियों और भारतीय प्रजा दोनों को
अरक्षित छोड़ कर नन्दकुमार अपनी तमाम सेना सहित चन्दर-
नगर से हट गया । सिलेक्ट कमेटी की १० अप्रैल सन् १७५७ की
रिपोर्ट में अमींचन्द और नन्दकुमार दोनों को धन्यवाद देते हुए
यह भी साफ़ लिखा है कि—"यदि दीवान नन्दकुमार की सेना न
हटा ली गई होती तो हमारे लिए विजय प्राप्त कर सकना असम्भव
ही होता ।"

  • Notes on Sirajuddowla, Journal of the Asiatic Society, 1867.

८२ भारत में अंग्रेज़ी राज
चन्दरनगर की विजय अंगरेज़ों के लिए अत्यन्त उपयोगी
साबित हुई। इससे बंगाल के अंदर फ़्रांसीसियों का बल टूट गया
और नवाब से अंतिम निबटारा करने के लिए अंगरेज़ों के सामने
का मार्ग अधिक साफ़ हो गया।
वाट्सन ने अपने २५ फ़रवरी के उस पत्र में जिसका ऊपर
[हाशिया: सिराज़ुद्दौला को] ज़िक्र आ चुका है, सिराज़ुद्दौला को लिखा था
[हाशिया: धमकी] कि—"आप ख़ातिरज़मा रखिए, मैं सदा अपना
धर्म समझ कर शान्ति क़ायम रक्खूँगा।" इसी
पत्र में उसने लिखा था कि यह अफ़वाह कि अंगरेज़ फ़्रांसीसियों
पर हमला करने वाले हैं बिलकुल झूठ है। किन्तु इसके चंद रोज़
बाद ही जब सिराज़ुद्दौला ने ६ फ़रवरी की सन्धि के अनुसार
वाट्सन से सेना की सहायता माँगी तो उत्तर में वाट्सन ने तैयारी
करके और मौक़ा देखकर सिराज़ुद्दौला को लिखा कि :—
“कुछ दिन हुए मैंने पिछले महीने की २० तारीख़ को आपके पत्र का
उत्तर दे दिया है। मैं समझता हूँ वह अब तक आपको मिल गया होगा।
उसे पढ़कर आपको पूरी तरह विश्वास हो गया होगा कि फ़्रांसीसी वकील का
यह कहना, कि मेरा इरादा शान्ति भंग करने का है झूठ है × × × ।
“× × × किन्तु अब साफ़ कहने का समय आगया है। यदि आप
वास्तव में अपने देश में शान्ति बनाए रखना चाहते हैं और अपनी प्रजा को
आपत्ति और बरबादी से बचाना चाहते हैं, तो आज से दस दिन के अंदर
अपनी ओर से सन्धि की हरेक शर्त को पूरा कर दीजिये, ताकि मुझे शिकायत
का ज़रा भी मौक़ा न मिल सके, नहीं तो याद रहे नतीजों के लिए आप