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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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सिराजुद्दौला ७१
कलकत्ते के नीचे नदी से एक मील के अंदर नवाब कभी किसी
तरह की क़िलेबंदी न करे। इत्यादि, इत्यादि ।
अंगरेज़ ख़ूब जानते थे कि सिराजुद्दौला इस तरह की नई शर्तें,
जिनका साफ़ मतलब उससे शासन अधिकार छीनना था, स्वीकार
न कर सकता था। असली मतलब सिद्ध करने के लिए सुप्रसिद्ध
अमींचंद अपनी थैलियों सहित वाट्स का सलाहकार नियुक्त होकर
उसके साथ मुर्शिदाबाद भेजा गया। वाट्स अपने “मैमॉयर्स आफ़
दी रेवोल्यूशन” में स्वीकार करता है कि अपनी साज़िशों को सफल
बनाने के लिए उसने मुर्शिदाबाद के दरबार में रिश्वतों का
बाज़ार ख़ूब गरम कर रक्खा था।
दूसरी ओर अलीनगर की सन्धि के विरुद्ध और उसकी ख़ाक
सिराजुद्दौला और परवा न करते हुए अंगरेज़ों ने फ़ौरन सबसे
वाट्सन में पत्र- पहले फ़्रांसीसियों की चन्दरनगर वाली कोठी
व्यवहार पर हमला करने की ठानी। सिराजुद्दौला अभी
कलकत्ते से लौटकर अपनी राजधानी तक पहुँचा भी न था कि
मार्ग ही में उसे अंगरेज़ों के इस इरादे का समाचार मिला। उसने
तुरन्त १६ फ़रवरी को ऐडमिरल वाट्सन के नाम इस मज़मून का
एक पत्र लिखा:—
“अपने देश और अपने राज के अंदर लड़ाइयाँ बंद करने के उद्देश से
मैंने अंगरेज़ों के साथ सुलह मंजूर की थी, ताकि तिजारत पहले की तरह जारी
रह सके × × × इसी तरह तुम ने भी अपने दस्तख़त से और अपनी मोहर
लगाकर इस मज़मून का इक़रारनामा मेरे पास भेज दिया है कि तुम मेरे देश