भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिराजुद्दौला ७३
"मैं अनुमान करता हूँ कि जो पत्र कल मैंने तुम्हें लिखा है वह
मिला होगा। उसके बाद फ़्रांसीसी वकील ने मुझे इत्तला दी है कि
तुम्हारे पाँच या छै नए जंगी जहाज़ हुगली में आ गए हैं और औरों के आने
की आशा है। फ़्रांसीसी वकील यह भी कहता है कि बारिश ख़तम होते
ही तुम मेरे और मेरी प्रजा के साथ फिर से लड़ाई शुरू करने की तजवीज़ें कर
रहे हो। यह व्यवहार एक सच्चे सिपाही को और एक ऐसे आन वाले मनुष्य
को जो अपने वादे का पक्का है शोभा नहीं देता। यदि तुम उस सन्धि की
ओर सच्चे हो जो तुमने मेरे साथ की है, तो अपने जंगी जहाज़ नदी से
बाहर भेज दो और अपने अहदनामे पर पूरी तरह क़ायम रहो, मैं अपनी
ओर से सन्धि का पालन करने में न चूकूँगा। इतनी सञ्जीदगी के साथ
सन्धि करने के फ़ौरन ही बाद फिर जंग शुरू कर देना क्या उचित या
ईमानदारी है ? मराठे किसी इलहामी किताब से बँधे हुए नहीं हैं, तो भी वे
अपनी सन्धियों का बिलकुल ठीक ठीक पालन करते हैं। इसलिए यह बड़े
आश्चर्य की और विश्वास के अयोग्य बात होगी, यदि ईसाई लोग जिन्हें
इंजील की रोशनी हासिल है, उस सन्धि पर क़ायम और पक्के न रहें जिसे
उन्होंने ख़ुदा और ईसामसीह के सामने क़बूल किया है।"
२३ फ़रवरी को यह पत्र वाटसन को मिला। २५ को उसने
सिराजुद्दौला के नाम इस प्रकार उत्तर लिखा :-
"× × × मैं नहीं जानता कि आप पर उस हैरानी को किस तरह
ज़ाहिर करूँ जो मुझे यह देखकर हुई है कि महज़ इस हल्की सी बिना पर
"कि किसी कमीने शख़्स ने आपसे यह कह देने का साहस किया कि मैं
शान्ति भंग करने की तजवीज़ में हूँ, आपने सचमुच मुझ पर यह इलज़ाम