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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 322

७२ भारत में अंगरेज़ी राज
की शांति भंग न करोगे; किन्तु अब मालूम होता है कि तुम हुगली के
पास की फ़्रांसीसी कोठी का मोहासरा करने और फ़्रांसीसियों से लड़ाई शुरू
करने की तजवीज़ कर रहे हो। यह बात हर क़ायदे और रिवाज के ख़िलाफ़
है कि तुम लोग अपने यहाँ के आपसी झगड़ों और दुश्मनियों को मेरे देश
में लाओ x x x अगर तुमने फ़्रांसीसी कोठियों का मोहासरा करने की ठान
ही ली है, तो मेरी अपनी आन और अपने बादशाह की ओर मेरा फ़र्ज़ दोनों
मुझे मजबूर करेंगे कि मैं अपनी फ़ौज से फ़्रांसीसियों की मदद करूँ। मालूम
होता है अभी हाल में जो सन्धि मेरे तुम्हारे बीच हुई है उसे तुम तोड़ना
चाहते हो। इससे पहले मराठों ने इस राज पर हमला किया था और बरसों
इस देश में लड़ाइयाँ जारी रक्खीं। किन्तु जब एक बार झगड़ा तय हो गया
और उनके साथ संधि हो गई, तो उन्होंने कभी सन्धि की शर्तों का उल्लङ्घन
नहीं किया और न वे कभी आइन्दा उन शर्तों से हटेंगे। जो सन्धियाँ निहायत
सञ्जीदगी के साथ की जाती हैं उनकी क़तई परवा न करना और उन्हें तोड़
देना ग़लत और बुरा तरीक़ा है। निस्सन्देह तुम्हारा फ़र्ज़ है कि तुम अपनी
ओर की शर्तों पर ठीक ठीक क़ायम रहो और आइन्दा मेरे मातहत सूबों में, न
कभी किसी तरह के झगड़ों या छेड़ छाड़ की अपनी तरफ़ से कोशिश करो और
न अपने सबब कोई झगड़ा खड़ा होने का मौक़ा दो। दूसरी ओर से जो कुछ
मैने वादा किया है और मंजूर कर लिया है उसे मैं बिलकुल ठीक ठीक समय
पर पूरा करूँगा x x x ।"१
इस पत्र की भाषा बिलकुल सरल और निष्कपट है, किन्तु दूसरे ही
दिन सिराजुद्दौला को फिर एक पत्र इस मज़मून का लिखना पड़ा:—
¹ Ive's Voyages, pp. 119, 120.