भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिराजुद्दौला ६६
भारत में अंगरेज़ों और फ़्रांसीसियों के दरमियान प्रतिस्पर्द्धा
इस समय ज़ोरों पर थी। इसलिए अंगरेज़ों ने इस बात पर ज़ोर
दिया कि सुलहनामे में एक शर्त यह भी रक्खी जावे कि सिराजु-
द्दौला निरपराध फ़्रांसीसियों पर चढ़ाई करके उन्हें इस मुल्क से
बाहर निकाल दे। किन्तु सिराजुद्दौला ने इस शर्त को मानने से
इनकार कर दिया।
इस सन्धि के साथ साथ अंगरेज़ों ने नवाब से यह इजाज़त
ले ली कि मुर्शिदाबाद के दरबार में अंगरेज़ों का एक एलची रहा
करे। यह भी तय हो गया कि जब कभी युद्ध इत्यादि के समय
नवाब को ज़रूरत हो और नवाब आज्ञा दे तो अंगरेज़ अपनी सेना
और धन दोनों से नवाब की मदद करें।
इस सुलहनामे की स्याही अभी सूखने भी न पाई थी कि
सन्धि तोड़ने अंगरेज़ों ने, जिनका असली उद्देश बग़ावत था,
के प्रयत्न फ़ौरन उसे तोड़ने के उपाय सोचने शुरू किए।
दरबार में एक अंगरेज़ एलची को रहने की
इजाज़त देकर सिराजुद्दौला ने एक नई बला अपने सर ले ली।
६ फ़रवरी को सुलहनामे पर दस्तख़त हुए और १२ को क्लाइव और
उसके साथियों ने सिलेक्ट कमेटी के नाम अपने एक पत्र में खुले
तौर पर यह राय प्रकट की :—
"और भी नई रियायतें नवाब से माँगी जा सकती हैं × × × और
यदि एक ऐसा आदमी नवाब के दरबार में एलची नियुक्त करके भेजा जाय जो