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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

सिराजुद्दौला ६३
अच्छा सम्बंध क़ायम रखने के लिए मैं इस ख़ास विषय में भी तुम लोगों
की तसल्ली कर देने की कोशिश करूँगा।
"तुम ईसाई हो और जानते हो कि किसी झगड़े को बनाए रखने की
निस्बत उसे आपस में तय कर डालना कितना ज़्यादा अच्छा है। किन्तु
यदि तुम यह सङ्कल्प ही कर चुके हो कि अपनी लड़ाई की इच्छा के सामने
अपनी कम्पनी के हित और अलग अलग व्यापारियों के फ़ायदे दोनों को
क़ुरबान कर दो, तो इसमें मेरी कोई ज़िम्मेदारी न होगी। इस तरह की लड़ाई
बरबाद कर देने वाली होती है, उसके नतीजे घातक होते हैं, इन घातक
नतीजों को रोकने के लिए ही मैं यह पत्र लिख रहा हूँ।"*
निस्संदेह यह पत्र सिराजुद्दौला की दूरदर्शिता, उसकी शांति-
प्रियता, उसकी बरदाश्त, उसकी उदारता और उसकी प्रजापालकता,
इन सब का पूरी तरह द्योतक है। किन्तु अभी तक उसे इस बात
का काफ़ी तजरुबा न हुआ था कि इन विदेशी व्यापारियों के साथ
किसी तरह का भी समझौता कहाँ तक टिक सकता है।
अंग्रेज़ों ने जब नवाब को सुलह के लिए उत्सुक पाया तो नीचे
[छल से सिराजुद्दौला] लिखी शर्तें पेश कीं :—
[का कलकत्ते] ( १ ) अंग्रेज़ों का जितना नुक़सान हुआ है
[बुलाया जाना] उस सब का पूरा पूरा हरजाना दिया जाय।
( २ ) कम्पनी को बंगाल में जितनी रिआयतें
मिली हुई थीं वे सब पूरी तरह फिर से दे दी जावें।
* Ive's Voyages, p. 109.