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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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सिराजुद्दौला ४६
सैनिकों ने “पराजित अंगरेज़ों के साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं किया।”
और उनके साथ के “मुसलमान मुल्ला ख़ुदा की बंदगी में लगे
रहे।” क़िले और कोठी के अंदर का गोला बारूद सब नवाब ने
हटवा लिया, किन्तु जितना तिजारती माल कोठी के अंदर भरा
हुआ था उसे सिराजुद्दौला या उसके सैनिकों ने हाथ तक नहीं
लगाया, सिराजुद्दौला की आज्ञा से उसे हिफ़ाज़त के साथ ज्यों का
त्यों रहने दिया गया। यही व्यवहार सिराजुद्दौला ने अंगरेज़ों
की दूसरी कोठियों में किया ।
कलकत्ते के बहुत से अंगरेज़ सिराजुद्दौला की सेना के क़िले में
दाख़िल होने से पहले ही पीछे की ओर से अपने जहाज़ों में बैठकर
भाग गए थे। जो रह गए थे उन्होंने अब सिराजुद्दौला से प्रार्थना
की कि हमारी जान बख़्शी जाय और हमें बंगाल छोड़ कर अपने
साथियों के पास मद्रास चले जाने की इजाज़त दी जाय। सिरा-
जुद्दौला ने सहर्ष उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। अनेक यूरोपियन
इतिहास लेखक इस बात की शहादत देते हैं कि इस अवसर पर
सिराजुद्दौला की शक्ति को देख कर अधिकांश यूरोपियन चकित
और भयभीत हो गए।
जॉन कुक लिखता है कि सिराजुद्दौला की मुसलमान सेना का
नियम था कि वे रात को कभी न लड़ते थे और शाम होते ही
गोलाबारी बंद् कर देते थे। कुक यह भी लिखता है कि यदि ऐसा
न होता तो २० तारीख़ से पहले ही अंगरेज़ों की बुरी हालत हो
गई होती।
४

५० भारत में अंगरेज़ी राज
इस प्रकार कम्पनी के अंगरेज़ व्यापारी सन् १७५६ में भारत
अंगरेज़ों का बंगाल के सब से अधिक उपजाऊ और समृद्ध प्रान्त
से निकाला जाना बंगाल से निकाल बाहर किए गए। हॉलवेल ने
कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम अपनी ३० नवम्बर
१७५६ की चिट्ठी में लिखा :—
“इतनी घातक और शोकजनक आपत्ति बाबा आदम के समय से लेकर
आज तक किसी भी क़ौम या उसके उपनिवेश के इतिहास में न आई होगी।”
सिराजुद्दौला ने ‘कलकत्ते’ का नाम बदलकर ‘अलीनगर’ रक्खा
और अपने एक दीवान राजा मानिकचंद को अलीनगर और उसके
आसपास के इलाक़े का हाकिम नियुक्त किया।
प्रायः समस्त अंगरेज़ इतिहास लेखक अपनी क़ौम की इस हार
के साथ एक भयंकर हत्याकाण्ड का ज़िक्र करते
“ब्लैक होल” का हैं, जिसे “ब्लैक होल” हत्याकाण्ड, या बंगाल में
क़िस्सा “अंधकूप हत्या”, कहा जाता है। ब्लैक होल
कलकत्ते की अंगरेज़ी कोठी के अंदर एक अँधेरी कोठरी या काल-
कोठरी थी, जो अंगरेज़ व्यापारियों ही की बनाई हुई थी और
जिसमें कम्पनी के अफ़सर अपने हिन्दोस्तानी अपराधियों या
क़र्ज़दारों को बंद कर दिया करते थे। इन अंगरेज़ लेखकों का बयान
है कि २० जून की रात को इस १८ फुट लम्बी और कुछ कम चौड़ी
कोठरी में सिराजुद्दौला के हुकुम से १४६ यूरोपियन क़ैदी बंद कर
दिए गए। जून का महीना, जगह की तंगी और ताज़ी हवा न मिल
सकने के कारण अनेक तीव्र यातनाओं के बाद सुबह तक इन १४६

में से केवल २३ ज़िन्दा बचे, और वह भी भयंकर अधमरी
हालत में।
किन्तु उस समय के इतिहास की खोज करने वालों पर अब
यह बात अच्छी तरह प्रकट हो चुकी है कि ब्लैक होल का यह
सारा क़िस्सा बिलकुल झूठा है और केवल सिराजुद्दौला के चरित्र
को कलंकित करने और अंगरेज़ों के बाद के कुचक्रों को जायज़
क़रार देने के लिए गढ़ा गया था।
विद्वान इतिहासलेखक अक्षयकुमार मैत्र ने अपने बंगला ग्रंथ
“सिराजुद्दोला” में इस क़िस्से के विरुद्ध अनेक अकाट्य युक्तियाँ
संग्रह की हैं। अव्वल तो इतनी छोटी (२६७ वर्ग फुट) जगह
में १४६ मनुष्य चावलों के बोरों की तरह भी नहीं भरे जा
सकते। इसके अलावा सैयद गुलाम हुसैन की “सियरउल-
मुताख़रीन” में या उस समय के किसी भी प्रामाणिक इतिहास में,
या कम्पनी के रोज़नामचों, “काररवाई के रजिस्टरों” या मद्रास
कौन्सिल की बहसों में इस घटना का कहीं ज़िक्र नहीं आता।
क्लाइव और वाट्सन ने कुछ समय बाद नवाब की ज़्यादतियों और
कम्पनी की हानियों को दर्शाते हुए नवाब के नाम जो पत्र लिखे,
उनमें इस घटना का कहीं ज़िक्र नहीं आता, न अलीनगर के संधिपत्र
में उसका कहीं नाम है। बहुत समय बाद क्लाइव ने कम्पनी के डाइ-
रेक्टरों के नाम एक लम्बा पत्र लिखा, जिसमें उसने सिराजुद्दौला के
साथ कम्पनी के क्रूर व्यवहार के अनेक सबब गिनवाए हैं। उनमें
इस घटना का कहीं इशारा भी नहीं मिलता। अंगरेज़ों ने अंत में मीर

५२ भारत में अंगरेज़ी राज
जाफ़र के साथ जो संधि की, उसमें कम्पनी के हर तरह के हरजाने
का हिसाब लगाया गया है, किन्तु इन १२३ मनुष्यों के कुटुम्बियों
को मुश्रावज़ा दिलवाने का कहीं ज़िक्र नहीं। जो विदेशी लोग जहाज़ों
में बैठकर भाग निकले थे, उनके बाद १२३ शायद क़िले के अन्दर
बचे भी न थे। कुछ लोगों ने बाद में कुल ऐसे यूरोपनिवासियों
की सूची तैयार करने को कोशिश की, जो उस समय कलकत्ते के
क़िले के अन्दर मरे श्रौर उसे १२३ तक लाने का प्रयत्न भी किया,
फिर भी यह सूची ५६ से ऊपर न पहुंच सकी श्रौर ये ५६ भी किसी
कोठरी में दम घुटकर नहीं मरे, बल्कि लड़ाई के ज़ख़्मों श्रौर मामूली
रोगों के शिकार हुए। फिर बाक़ी ६७ कौन थे ? इत्यादि ।
वास्तव में इस झूठे क़िस्से को फ़रवरी सन् १७५७ ई० में
कलकत्ते के अंगरेज़ मुखिया हॉलवेल ने भारत से विलायत जाते
समय जहाज़ के ऊपर बैठकर गढ़ा था। यह वही हॉलवेल है जिसको
सिराजुद्दौला ने हथकड़ी खुलवा दी थी। अपने झूठों और जाल-
साज़ियों के लिए यह अंगरेज़ काफ़ी मशहूर था।
मिसाल के तौर पर हॉलवेल के अन्य कारनामों में से केवल एक
को यहाँ बयान कर देना काफ़ी होगा। यह घटना कुछ दिनों
बाद की है, किन्तु इस स्थान पर बेमौक़े न होगी। सिराजुद्दौला
के बाद मीर जाफ़र को मसनद पर बैठाने के लिए उसने मीर जाफ़र
से एक लाख रुपए रिश्वत के ले लिए और मीर जाफ़र की खूब
तारीफ़ की। बाद में जब मीर क़ासिम को मसनद पर बैठाने
की ज़रूरत हुई तो उसने तीन लाख रुपए मीर क़ासिम से लेकर

सिराजुद्दौला ५३
चट कर लिए। अब मीर जाफ़र को बदनाम करना उसके लिए
ज़रूरी हो गया। इसलिए कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम उसने एक
लम्बा पत्र लिखा, जिसमें मीर जाफ़र को उसने घोर अन्यायी और
हत्यारा बयान किया और अनेक ऐसे पुरुषों और स्त्रियों की एक
सूची साथ में दी, जिन्हें वह लिखता है कि मीर जाफ़र ने बेक़सूर
मार डाला। प्रत्येक पुरुष के पिता का नाम और प्रत्येक स्त्री के
पति का नाम सूची में दिया गया। छोटी से छोटी तफ़सील तक
इन हत्याओं की हॉलवेल के पत्र में मौजूद है। इसके कई साल बाद
क्लाइव और उसके साथियों ने डाइरेक्टरों को एक और पत्र भेजा
जिसमें उन्होंने बताया कि मीर जाफ़र पर जितने इलज़ाम हॉलवेल
ने लगाए हैं वे सब सर से पाँव तक झूठे हैं और जिन पुरुष स्त्रियों
की सूची हॉलवेल ने अपने पत्र में दी है यह कह कर कि मीर जाफ़र
ने इन लोगों को बेक़सूर मारडाला उनमें से दो को छोड़कर बाक़ी
सब अभी तक ज़िंदा हैं।*
फिर भी सिराजुद्दौला को बदनाम करने और अपने देशवासियों
के काले कारनामों पर मुलम्मा फेरने के लिए उस समय से आज
तक अंग्रेज़ इतिहास लेखकों ने हॉलवेल की ब्लैक होल नामक
कल्पना से पूरा फ़ायदा उठाया है। अंग्रेज़ी स्कूलों की समस्त
पाठ्य पुस्तकों में, जिनमें कि अंग्रेज़ों के ऊपर सिराजुद्दौला के
बेशुमार अहसानों का कहीं ज़िक्र नहीं, उनमें यह क़िस्सा सच्चा
कह कर बयान किया जाता है।

  • Letter to the Directors, dated 1st October, 1765, by Clive and others.

५४ भारत में अंगरेज़ी राज
अपनी वीरता और उदारता दोनों का सबूत देने के बाद
[हाशिया: सिराजुद्दौला की] विजयी सिराजुद्दौला २४ जून को कलकत्ते से
[हाशिया: कलकत्ते से वापसी] अपनी राजधानी की ओर लौटा। मार्ग में हुगली
के ऊपर उसने एक दरबार किया, जिसमें फ्रांसीसी
कोठी के वकील ने साढ़े तीन लाख रुपए और डच कोठी के वकील
ने साढ़े चार लाख रुपए अपनी अपनी राजभक्ति दर्शाने के लिए
सिराजुद्दौला की नज़र किए। सिराजुद्दौला ने उन्हें अपना व्यापार
जारी रखने की इजाज़त दे दी। सिराजुद्दौला को अभी तक आशा
थी कि इसी तरह का समझौता अङ्गरेज़ों के साथ भी हो जायगा।
११ जुलाई सन् १७५६ ई० को सिराजुद्दौला मुर्शिदाबाद पहुँच गया।
थोड़े ही दिनों बाद पूर्णिया के नवाब शौकतजंग ने फिर
बग़ावत का झंडा ऊँचा किया। १६ अक्तूबर सन् १७५६ को राज-
महल नामक स्थान पर सिराजुद्दौला और शौकतजंग की सेनाओं
में मुक़ाबला हुआ, जिसमें शौकतजंग काम आया और सिराजुद्दौला
ने विजय प्राप्त की। सिराजुद्दौला अब शौकतजंग की जगह राजा
युगलसिंह नामक एक हिन्दू को पूर्णिया की गद्दी पर बैठाकर
मुर्शिदाबाद लौट आया। इस बार सिराजुद्दौला की प्रजा ने उसे
बधाइयाँ दीं और दिल्ली के सम्राट ने एक नए फ़रमान के ज़रिये
उसे बंगाल, बिहार और उड़ीसा तीनों प्रान्तों की सूबेदारी की
मसनद पर फिर से पक्का किया। यह बात याद रखने योग्य है कि
सिराजुद्दौला आरम्भ से जो कुछ करता था दिल्ली सम्राट के नाम
पर और सम्राट एक सेवक की हैसियत से ही करता था।

सिराजुद्दौला ५५
कलकत्ते से भागे हुए अंगरेज़ कलकत्ते से कुछ नीचे बंगाल
[हाशिया: फल्ता में] की खाड़ी के ऊपर फल्ता नामक स्थान पर जाकर
[हाशिया: अंगरेज़] ठहर गए और क़रीब छै महीने वहीं ठहरे रहे ।
कम्पनी के कारबार की दृष्टि से उस ज़माने में
कलकत्ते की निस्बत मद्रास अधिक महत्व की जगह थी। फल्ता
से इन अंगरेज़ों ने एक ओर तो मद्रास की कोठी के अंगरेज़ों को यह
लिखा कि मद्रास से नई सेना जमा करके बंगाल भेजी जाय और
दूसरी ओर—क्योंकि केवल सेना के बल सिराजुद्दौला से जीतना
वे असम्भव समझ चुके थे—उन्होंने अपने गुप्तचरों के ज़रिये झूठे
सच्चे लोभ दिखलाकर कलकत्ते के राजा मानिकचंद को और
सिराजुद्दौला के अन्य सेनापतियों, दरबारियों और सामन्तों को
अपनी ओर फोड़ने के प्रयत्न शुरू किए । निस्संदेह भेद नीति का
यह विस्तृत जाल ही वह मुख्य उपाय था जिसके द्वारा ये मुट्ठी
भर निर्बल किन्तु चालाक विदेशी बलवान किन्तु अनुभवशून्य
भारतीय नवाब को गिराने की आशा कर रहे थे । स्क्रैफ़टन नामक
अंगरेज़ लिखता है :—
“यह एक बड़े भारी आश्चर्य की बात मालूम होगी कि सूबेदार (नवाब)
ने इतने दिनों इतनी शान्ति से हमें फल्ता में क्यों पड़े रहने दिया । × × ×
इसकी वजह मैं केवल यह बता सकता हूँ कि वह हमें एक बहुत ही तुच्छ
चीज़ समझता था । × × × और उसे इस बात का गुमान भी न था कि
हम सैन्यबल के सहारे फिर बंगाल लौटने की हिम्मत करेंगे ।” ꕤ

  • "Reflections" by Scrafton p. 58.

५६ भारत में अंग्रेज़ो राज
इस पर जीन लॉ लिखता है :-
“सिराजुद्दौला यूरोपनिवासियों को बहुत ही ज़्यादा हक़ीर और तुच्छ
समझता था । वह कहा करता था कि इन्हें ठिकाने रखने के लिये केवल एक
जोड़ी चप्पल की ज़रूरत है । × × × इसलिए वह यह सोच ही न सकता
था कि अंग्रेज़ सैन्यबल द्वारा फिर से बंगाल में पैर जमाने का विचार कर
सकते हैं । यदि वह यह अनुमान भी कर सकता था कि अंग्रेज़ कोई नई
तरकीब सोच रहे होंगे तो केवल यह अनुमान कर सकता था कि वे विनम्र
होकर एक हाथ से मेरे सामने नज़र पेश करेंगे और दूसरे हाथ से फिर
अपनी तिजारत शुरू करने के लिए खुशी के साथ मेरा फ़रमान हासिल
करेंगे । निस्संदेह इसी ख़याल से सिराजुद्दौला ने अंग्रेज़ों को शांतिपूर्वक
फलता में पड़े रहने दिया ।”*
फलता में अंग्रेज़ों ने नवाब के अफ़सरों से यह कहा कि हमें
मौसम ख़राब होने की वजह से यहाँ रुकना पड़
सिराजुद्दौला के रहा है और ज्योंही मौसम समुद्र यात्रा के
साथ छल क़ाबिल हुआ हम मद्रास चले जायँगे । दूसरी
ओर उन्होंने “नवाब को धोखा देने के स्पष्ट उद्देश से”† अत्यन्त
दीन और नम्र शब्दों में इस मज़मून की अर्ज़ियाँ सिराजुद्दौला
के पास भेजनी शुरू कर दीं कि हमें फिर से बंगाल में व्यापार करने
की इजाज़त दी जाय ।

  • Bengal in 1756—57, vol. iii. p. 176.
    † “To deceive the Nawab…………” S. C. Hill in Bengal in 1756—57.
    vol. i, pp. cxi, cxv.

सिराजुद्दौला ५७
सिराजुद्दौला ने बजाय किसी तरह की सख़्ती के इस समय भी
सिराजुद्दौला की उनके साथ दया का व्यवहार किया । जब उसे
दयालुता यह मालूम हुआ कि अंगरेज़ों के फल्ता पहुँचने
पर वहाँ के लोगों ने बाज़ार बंद कर दिए थे
जिसकी वजह से अगरेज़ों को रसद की दिक़्क़त हो रही थी, तो
उसने फ़ौरन हुकुम भेज दिया कि बाज़ार खोल दिए जायँ और
“बेचारे परदेसियों को खाने पीने के सामान की कोई दिक़्क़त न
होने पाए ।” सिराजुद्दौला दिल से चाहता था कि अंगरेज़ अपनी
शरारतें छोड़कर फिर से बंगाल में तिजारत करने लगें । इसीलिए
उसने अपनी विजय के बाद भी क़ासिमबाज़ार, कलकत्ते इत्यादि
की कोठियों में उनके तिजारती माल को हाथ न लगाया था ।
सिराजुद्दौला की नीयत यदि कुछ और होती तो कलकत्ते या
फल्ता में से कहीं भी इन विदेशी व्यापारियों का एक एक कर
ख़ात्मा कर डालना और साथ ही उनके समस्त षड़यंत्रों का अंत
कर देना उसके लिए एक बहुत ही आसान काम था । यदि वह
ऐसा कर डालता तो कोई निष्पक्ष इतिहास लेखक उसे दोषी भी न
ठहरा सकता था । किन्तु उस भोले एशियाई नरेश को इन विदेशियों
के चरित्र और उनकी चालों का अभी तक भी पता न था । इस
भोलेपन का मूल्य सिराजुद्दौला और उसके देश दोनों को बहुत
ज़बरदस्त चुकाना पड़ा ।
२० जून सन् १७५६ को अंगरेज़ कलकत्ते से निकाले गए । १६
अगस्त को कलकत्ते के छिन जाने का समाचार मद्रास पहुँचा ।

५८ भारत में अंगरेज़ी राज
अक्तूबर के मध्य में ८०० यूरोपियन और १३०० हिन्दोस्तानी
[हाशिया: बंगाल में अंगरेज़ों का फिर से प्रवेश] सिपाही मद्रास से रवाना किए गए। जल सेना
का अधिकार ऐडमिरल वाट्सन को और स्थल
सेना का सुप्रसिद्ध करनल क्लाइव को दिया
गया। मद्रास की अंगरेज़ कौंसिल के मेम्बरों ने १३ अक्तूबर के एक
पत्र में इस सेना के अफ़सरों को खुले आदेश दिया कि आप लोग
बंगाल पहुँच कर नवाब के आदमियों को अपनी ओर फोड़कर
किसी दूसरे को नवाबी का हक़दार खड़ा करके और अन्य हर
तरह के उपायों और षड्यन्त्रों द्वारा नवाबी को पलट देने का प्रयत्न
करें।* इस प्रकार बंगाल में ग़दर करवाने के इरादे से दिसम्बर
सन् १७५६ के मध्य में यह सेना फल्ता पहुँच गई ।
यह सैन्यबल भी बहुत दरजे तक केवल एक दिखावे की चीज़
थी। असली चीज़ साज़िशों का वह जाल था जो
[हाशिया: साज़िशों का जाल] बंगाल में पूरी तरह फैल चुका था। कलकत्ते का
राजा मानिकचंद भी किसी न किसी लालच में
फंस कर अपने स्वामी और देश दोनों के साथ विश्वासघात करने
को राज़ी हो गया। फल्ता पहुँचते ही क्लाइव और वाट्सन दोनों ने
नवाब के नाम अलग अलग दो लम्बे पत्र लिखे, जिनमें सिवाय
धमकियों, छल और बदतमीज़ी के और कुछ न था। सिराजुद्दौला
इन पत्रों का क्या उत्तर दे सकता था ? और अंगरेज़ों को भी
सिराजुद्दौला के जवाब का कहाँ इन्तज़ार था ?

  • Letter dated 13th October 1756. Bengal in 1756-57, vol. i, pp. 239, 240.

सिराजुद्दौला ५६
कलकत्ते से कुछ नीचे बजबज में एक अत्यन्त मज़बूत पुराना
[बजबज में दिखा- क़िला था, जिसके चारों ओर एक गहरी खाई
वटी लड़ाई] थी। यह क़िला राजा मानिकचंद के सुपुर्द था।
२६ दिसम्बर को क्लाइव के अधीन थोड़ी सी
अंगरेज़ी सेना जहाज़ से उतर कर बजबज पहुँची। अंगरेज़ों और
मानिकचंद के बीच पहले से तय हो चुका था कि मानिकचंद केवल
दिखाने के लिए एक बार अंगरेज़ों का मुक़ाबला करे। चुनाँचे
मानिकचंद दो हज़ार सैनिक लेकर क्लाइव के २६० सैनिकों का
मुक़ाबला करने के लिए क़िले से बाहर निकला। केवल आध घंटे की
झूठी फटफट के बाद मानिकचंद ने क़िले के दरवाज़े खोल दिए और
बिना किसी रुकावट के २६ दिसम्बर की रात को अंगरेज़ी सेना ने
बजबज के ज़बरदस्त क़िले में प्रवेश किया। मानिकचंद अपनी सेना
लिए पीछे की ओर हटता चला गया। मानिकचंद कायर न था।
छै साल बाद कम्पनी ने राजा मानिकचंद के एक बेटे को अपने
यहाँ तनख़्वाह देकर नौकर रखा, जिसकी वजह सरकारी काग़ज़ात
में इन साफ़ शब्दों में दी हुई है—"क्योंकि पिछले ३० साल के
अंदर मानिकचंद कई तरह से हमारे लिए उपयोगी साबित हो
चुका था।"*
बजबज के क़िले के अंदर जितने मामूली ग़ैर फ़ौजी हिन्दुस्तानी
थे, उनमें से कुछ भाग निकले और जो रहे उनको अंगरेज़ों ने क़त्ल
कर दिया ?

  • Rev. Long's Selections from the Government Records.

६० भारत में अंगरेज़ी राज
इसके बाद दूसरी जगह, जहाँ मानिकचंद अंगरेज़ों का मुक़ा-
कलकत्ते पर अंग- बला कर सकता था, कलकत्ता थी। किन्तु यहाँ
रेज़ों का फिर से पर उसने या उसके विदेशी दोस्तों ने दिखावे की
क़ब्ज़ा। भी ज़रूरत न समझी। बजबज से भागकर मानिक-
चंद सीधा हुगली पहुँचा। वहाँ से उसने सिराजु-
दौला को कहला भेजा कि “अंगरेज़ों की विशाल ( ? ) सेना के
सामने मैं ठहर न सका।” २ जनवरी सन् १७५७ को मानिकचंद
की ग़ैरहाज़िरी में बहुत आसानी से कलकत्ता फिर से अंगरेज़ों के
हाथों में आगया। इसके बाद तान्नाह का क़िला भी अंगरेज़ी
सेना को पहले ही से खुला हुआ और ख़ाली मिला। ३ जनवरी
सन् १७५७ को कलकत्ते का क़िला ड्रेक और उसकी एक कौंसिल
के हवाले कर दिया गया।
अंगरेज़ इतिहास लेखक एस० सी० हिल लिखता है कि इस
समय सिराजुद्दौला पर हमला करने से पहले अंगरेज़ों के सामने
एक ख़ास सवाल यह था कि सिराजुद्दौला की जगह सूबेदारी का
हक़दार किसको खड़ा किया जाय। कुछ की सलाह थी कि
“सरफ़राज़ ख़ाँ के उन बेटों में से एक को, जो इस समय ढाका में
क़ैद थे, सिराजुद्दौला के ख़िलाफ़ सूबेदारी का हक़दार खड़ा कर
दिया जाय।”* किन्तु यह मामला अभी तय नहीं किया गया।
कलकत्ते के आस पास केवल एक हुगली का क़िला और बाक़ी रह

  • Bengal in 1756—57, vol. i. p. cxxxviii.

गया था। अंगरेज़ों को मालूम था कि सिराजुद्दौला ने हुगली के
पास नाज की बड़ी बड़ी कोठियाँ भर रक्खी हैं। तय हुआ कि सब
से पहले इन तमाम कोठियों को जाकर आग लगा दी जाय। †

हुगली का क़िला अरक्षित पड़ा हुआ था और माल भी वहाँ बहुत
[मार्जिंन नोट: हुगली की लूट और क़त्ले आम] था। क़िला आसानी से अंगरेज़ों के हाथों में
आ गया। ११ जनवरी का दिन क़िले के नज़दीक
के मकानों को लूटने में ख़र्च हुआ। इसके बाद
फिर १२ से १८ तक पूरे सात दिन हुगली नगर
और उसके आस पास की तमाम हिन्दोस्तानी रिआया के घरों को
लूटने में ख़र्च किए गए। इस लूट के साथ साथ हुगली के बेशुमार
निहत्थे और निरपराध हिन्दोस्तानी बाशिन्दे क़त्ल कर डाले गए।

सिराजुद्दौला को मालूम हो गया कि मेरे आदमियों में विश्वास
[मार्जिंन नोट: सिराजुद्दौला का आगे बढ़ना और वाटसन के नाम पत्र] घात के बीज बोकर अंगरेज़ों ने बजबज, तान्नाह,
कलकत्ता और हुगली के क़िले मुफ़्त ही में ले
लिए हैं। एस० सी० हिल लिखता है कि मुर्शिदा-
बाद के मुख्य मुख्य दरबारियों को अपनी ओर
मिलाने के लिए उनके साथ क्लाइव का गुप्त पत्र व्यवहार बराबर
जारी था। बहुत सम्भव है इस पत्र व्यवहार की भी कुछ भनक
सिराजुद्दौला के कानों तक पहुँच गई हो। इसके बाद हुगली की
निरपराध प्रजा के ऊपर अंगरेज़ों के जुल्मों की ख़बर सिराजुद्दौला


† Bengal in 1756–57, vol. i. p. cxxxviii.

६२ भारत में अंग्रेज़ी राज
को मिली । सिराजुद्दौला सेना लेकर मुर्शिदाबाद से बढ़ा और हुगली
के निकट आकर उसने अंगरेज़ सेनापति वाट्सन को इस मज़मून
का एक पत्र लिखा :—
“तुम लोगों ने हुगली का नगर ले लिया, उसे लूटा और मेरी प्रजा
के साथ युद्ध किया, इस तरह के काम व्यापारियों को शोभा नहीं देते,
इसलिए मैं मुर्शिदाबाद से चलकर हुगली के निकट आ गया हूँ। इसी
तरह मैं अपनी सेना सहित नदी को पार कर रहा हूँ और मेरी सेना का एक
भाग तुम्हारे पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। फिर भी यदि तुम चाहते हो कि
कम्पनी का कारबार पहले की तरह फिर से जम जाय और कम्पनी का व्यापार
चलने लगे, तो किसी बाअख्तियार आदमी को मेरे पास भेज दो। जो
अपनी इच्छाएं और आवश्यकताएं मुझे बता सके और इस मामले में
मुझसे पूरी तरह बातचीत कर सके। इस बात का परवाना जारी करने में
मुझे कोई संकोच न होगा कि कम्पनी की तमाम कोठियाँ उन्हें वापस दे
दी जायँ और जिन शर्तों पर वे इस मुल्क में पहले तिजारत करते थे उन्हीं
शर्तों पर आइन्दा करते रहें। जो अंगरेज़ इन सूबों में बसे हुए हैं वे यदि
व्यापारियों का सा बर्ताव करेंगे, मेरी आज्ञाओं का पालन करेंगे और मुझे
किसी तरह दिक़्क़ न करेंगे, तो तुम विश्वास रखो मैं उनके नुक़सानों का
ख़याल करूँगा और इस बारे में उनकी तसल्ली कर दूँगा ।
“तुम जानते हो, जंग में सिपाहियों को लूटने से रोकना कितना मुश्किल
काम है। इसलिए यदि मेरी सेना की लूट द्वारा तुम लोगों का कुछ नुक़-
सान हुआ है और उसमें से कुछ यदि तुम लोग अपनी ओर से छोड़ दोगे
तो तुम्हारी दोस्ती लाभ करने के लिए और भविष्य में तुम्हारी क़ौम के साथ

सिराजुद्दौला ६३
अच्छा सम्बंध क़ायम रखने के लिए मैं इस ख़ास विषय में भी तुम लोगों
की तसल्ली कर देने की कोशिश करूँगा।
"तुम ईसाई हो और जानते हो कि किसी झगड़े को बनाए रखने की
निस्बत उसे आपस में तय कर डालना कितना ज़्यादा अच्छा है। किन्तु
यदि तुम यह सङ्कल्प ही कर चुके हो कि अपनी लड़ाई की इच्छा के सामने
अपनी कम्पनी के हित और अलग अलग व्यापारियों के फ़ायदे दोनों को
क़ुरबान कर दो, तो इसमें मेरी कोई ज़िम्मेदारी न होगी। इस तरह की लड़ाई
बरबाद कर देने वाली होती है, उसके नतीजे घातक होते हैं, इन घातक
नतीजों को रोकने के लिए ही मैं यह पत्र लिख रहा हूँ।"*
निस्संदेह यह पत्र सिराजुद्दौला की दूरदर्शिता, उसकी शांति-
प्रियता, उसकी बरदाश्त, उसकी उदारता और उसकी प्रजापालकता,
इन सब का पूरी तरह द्योतक है। किन्तु अभी तक उसे इस बात
का काफ़ी तजरुबा न हुआ था कि इन विदेशी व्यापारियों के साथ
किसी तरह का भी समझौता कहाँ तक टिक सकता है।
अंग्रेज़ों ने जब नवाब को सुलह के लिए उत्सुक पाया तो नीचे
[छल से सिराजुद्दौला] लिखी शर्तें पेश कीं :—
[का कलकत्ते] ( १ ) अंग्रेज़ों का जितना नुक़सान हुआ है
[बुलाया जाना] उस सब का पूरा पूरा हरजाना दिया जाय।
( २ ) कम्पनी को बंगाल में जितनी रिआयतें
मिली हुई थीं वे सब पूरी तरह फिर से दे दी जावें।
* Ive's Voyages, p. 109.

६४ भारत में अंगरेज़ी राज
( ३ ) अंगरेज़ों को अधिकार हो कि जिस तरह वे चाहें अपनी
आबादियों की क़िलेबंदी कर सकें।
( ४ ) कलकत्ते में कम्पनी की एक अपनी टकसाल क़ायम हो।
चौथी शर्त को स्वीकार करना सिराजुद्दौला के अधिकार से
बाहर था। साम्राज्य भर में कहीं भी टकसाल क़ायम करना या
किसी को टकसाल क़ायम करने की इजाज़त देना केवल दिल्ली
सम्राट के अधिकार में था। पहली तीनों शर्तें सिराजुद्दौला ने मंजूर
कर लीं और चौथी के विषय में पत्र व्यवहार होता रहा। इस पत्र
व्यवहार में अंगरेजों ने और नई नई शर्तें नवाब के सामने पेश करनी
शुरू कीं। उनका असली उद्देश सिराजुद्दौला के साथ सुलह
करना नहीं था। उनका उद्देश सिराजुद्दौला को धोखा देकर बंगाल
में एक ज़बरस्त बग़ावत खड़ी करना था। इन लोगों ने सिराजुद्दौला
से कलकत्ते चलने की प्रार्थना की और उसे यह आशा दिलाई कि
कलकत्ते पहुँच कर सुलह की शर्तें तय हो जायँगी।
अंगरेज़ इस समय सिराजुद्दौला को धोखे से कलकत्ते लाकर
अचानक उस पर हमला करना चाहते थे। सुप्रसिद्ध
विश्वासघात मीर जाफ़र इस समय सिराजुद्दौला के साथ और
'उसके मुख्य सेनापतियों में से था। एस० सी० हिल लिखता है कि
सिराजुद्दौला को "अपनी इस यात्रा में मालूम हो गया था कि
मेरे अनेक सिपाही और कई अफ़सर तक मेरा साथ देने के लिए
तैयार नहीं हैं।"*

  • Ibid, vol. i. p. cxlvii.

सिराजुद्दौला ६५
इतिहास लेखक स्क्रैफ़टन लिखता है कि सिराजुद्दौला को “अपने
मुख्य मुख्य अफ़सरों और ख़ासकर मीरजाफ़र में, जिसका
व्यवहार इस मामले में बड़ा रहस्यपूर्ण मालूम होता था, विद्रोह
के लच्छन दिखाई दे गए थे।”*
४ फ़रवरी सन् १७५७ ई० को सिराजुद्दौला कलकत्ते पहुंचा।
कलकत्ते में अंगरेज़ों ने उसे बड़े आदर के साथ अमींचंद के बाग़
में ठहराया। सुलह की बातचीत बराबर जारी रही। अंगरेज़ों की
गुप्त तजवीज़ थी कि ५ को सबेरे सूर्योदय से पहले सिराजुद्दौला
पर चुपके से हमला कर दिया जाय। इतिहास लेखक जीन लॉ
लिखता है :—
“जिस दिन अंगरेज़ हमला करने वाले थे उससे एक दिन पहले सिरा-
जुद्दौला को और अधिक पूरी तरह धोखे में रखने की ग़रज़ से और उसके
ख़ेमे की जगह को अच्छी तरह देख लेने के लिए उन्होंने उसके पास अपने
दो वकील भेजे। इन वकीलों को हुकुम था कि वे नवाब से सुलह की तजवीज़ें
करें, किन्तु सुलह की जो शर्तें उन्होंने पेश कीं उन्हीं से नवाब को ज़ाहिर हो
जाना चाहिये था कि यह सब उसके शत्रुओं की केवल एक चाल थी।”†

  • Sirajuddaula " discovered some appearance of disaffection in some of
    his principal officers, particularly in Mir Jaffar, whose conduct in this affair
    had been very mysterious."—Reflections p. 66.
    † " To deceive him (Siraj) more completely and examine the position
    of his camp the English sent deputies the day before the attack they medita-
    ted. These deputies were ordered to propose an accommodation, but the
    very conditions must have shown the Nawab this was only a ruse on the part
    of his enemy."—Jean Law, Ibid vol. iii. p. 182.

६६ भारत में अंगरेज़ी राज
जो दो अंगरेज़ वकील क्लाइव ने इस अवसर पर नवाब के
पास भेजे और जो वास्तव में जासूसों का काम कर रहे थे, उनके
नाम वाल्श और स्क्रैफ़टन थे। एक और हिन्दोस्तानी देशद्रोही
राजा नवकृष्ण इस समय सिराजुद्दौला के दल में अंगरेज़ों के
जासूस का काम कर रहा था और उन्हें पल पल पर नवाब की
सब काररवाइयों की ख़बर देता रहता था।
नवाब के ख़ेमे के पास ही अंगरेज़ वकीलों के ख़ेमे डाल दिए
गए। पहले से जो हिदायतें उन्हें दे दी गई थीं उनके अनुसार
४ तारीख़ की रात को ये दोनों दूत सिराजुद्दौला से बातचीत करके
अपने ख़ेमे में आगए, इसके बाद सोने के बहाने उन्होंने ख़ेमों की
रोशनी बुझा दी और फिर अँधेरे में वहाँ से निकल कर ये लोग
अंगरेज़ों की ओर भाग आए। इसके बाद की घटना के विषय में
जीन लॉ लिखता है:—
“अगले दिन ५ फ़रवरी को सुबह ४ या ५ बजे गहरे कोहरे में करनल
क्लाइव ने अपनी सेना सहित नवाब के दल पर हमला किया और ये लोग
ठीक उस ख़ेमे पर आकर गिरे जिसमें पहले दिन शाम को अंगरेज़ वकील
नवाब से मुलाक़ात कर चुके थे। × × × सौभाग्य से नवाब उस समय
उस ख़ेमे में मौजूद न था। उसके एक दीवान को अंगरेज़ वकीलों पर पहले
ही कुछ संदेह हो चुका था और उसने नवाब को सलाह दी थी कि आप ज़रा
दूर एक दूसरे ख़ेमे में रात गुज़ारें।”
सिराजुद्दौला को, ऐसे समय में जब कि सुलह की बातचीत
जारी थी, इस विश्वासघात की कोई आशा न थी। जो लड़ाई इस

सिराजुद्दौला ६७
समय सिराजुद्दौला और अंगरेज़ों के बीच हुई उसके विषय में
रेनाल्ट अपने ४ सितम्बर के एक पत्र में लिखता है :—
"अंगरेज़ों ने अपनी सारी स्थल सेना और उसके साथ अपने जहाज़ों
के तमाम सिपाही लड़ने को भेज दिए। वे सोते हुए मुसलमानों के ऊपर
धोखा देकर अचानक टूट पड़े, फिर भी इस लड़ाई से जितने लाभ की
उन्हें आशा थी उतना न हो सका। शुरू में वे शत्रु को थोड़ा सा पीछे हटा
पाए, किन्तु फिर ज्योंही सिराजुद्दौला ने अपनी सेना का एक भाग जमा कर
लिया, त्योंही अंगरेज़ों को ख़ुद पीछे हट जाना पड़ा। अँगरेज़ी सेना बेतरतीबी
के साथ पीछे को भागी और यह उनकी बड़ी खुशक़िस्मती थी कि वे अपने
क़िले की दीवारों के नीचे तोपों के सुरक्षित साए में पहुँच सके । इस लड़ाई
में अँगरेज़ों के क़रीब २०० आदमी काम आए ।”*
निस्सन्देह अंगरेज़ों को इस विश्वासघात का बदला देने के
योग्य नवाब के पास अब भी काफ़ी सेना थी, किन्तु और आगे
चल कर रेनाल्ट लिखता है :—
‘“नवाब के मंत्रियों ने जो प्रायः सभी अंगरेज़ों के तरफ़दार थे और
केवल सुलह कर लेना चाहते थे, इस मौक़े से फ़ायदा उठाकर नवाब को
सुलह के लिए मजबूर किया। दूसरी तरफ़ अपने सेनापतियों की बग़ावत से
लाचार होकर × × × नवाब ने देखा कि सुलह के लिए राज़ी हो जाने के
सिवा उसके पास और कोई चारा न था। उसे अत्यन्त कड़ी शर्तें स्वीकार
करनी पड़ीं।”

  • Ibid, vol. iii. p. 246.