भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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जाफ़र के साथ जो संधि की, उसमें कम्पनी के हर तरह के हरजाने
का हिसाब लगाया गया है, किन्तु इन १२३ मनुष्यों के कुटुम्बियों
को मुश्रावज़ा दिलवाने का कहीं ज़िक्र नहीं। जो विदेशी लोग जहाज़ों
में बैठकर भाग निकले थे, उनके बाद १२३ शायद क़िले के अन्दर
बचे भी न थे। कुछ लोगों ने बाद में कुल ऐसे यूरोपनिवासियों
की सूची तैयार करने को कोशिश की, जो उस समय कलकत्ते के
क़िले के अन्दर मरे श्रौर उसे १२३ तक लाने का प्रयत्न भी किया,
फिर भी यह सूची ५६ से ऊपर न पहुंच सकी श्रौर ये ५६ भी किसी
कोठरी में दम घुटकर नहीं मरे, बल्कि लड़ाई के ज़ख़्मों श्रौर मामूली
रोगों के शिकार हुए। फिर बाक़ी ६७ कौन थे ? इत्यादि ।
वास्तव में इस झूठे क़िस्से को फ़रवरी सन् १७५७ ई० में
कलकत्ते के अंगरेज़ मुखिया हॉलवेल ने भारत से विलायत जाते
समय जहाज़ के ऊपर बैठकर गढ़ा था। यह वही हॉलवेल है जिसको
सिराजुद्दौला ने हथकड़ी खुलवा दी थी। अपने झूठों और जाल-
साज़ियों के लिए यह अंगरेज़ काफ़ी मशहूर था।
मिसाल के तौर पर हॉलवेल के अन्य कारनामों में से केवल एक
को यहाँ बयान कर देना काफ़ी होगा। यह घटना कुछ दिनों
बाद की है, किन्तु इस स्थान पर बेमौक़े न होगी। सिराजुद्दौला
के बाद मीर जाफ़र को मसनद पर बैठाने के लिए उसने मीर जाफ़र
से एक लाख रुपए रिश्वत के ले लिए और मीर जाफ़र की खूब
तारीफ़ की। बाद में जब मीर क़ासिम को मसनद पर बैठाने
की ज़रूरत हुई तो उसने तीन लाख रुपए मीर क़ासिम से लेकर