भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 305, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिराजुद्दौला ५५
कलकत्ते से भागे हुए अंगरेज़ कलकत्ते से कुछ नीचे बंगाल
[हाशिया: फल्ता में] की खाड़ी के ऊपर फल्ता नामक स्थान पर जाकर
[हाशिया: अंगरेज़] ठहर गए और क़रीब छै महीने वहीं ठहरे रहे ।
कम्पनी के कारबार की दृष्टि से उस ज़माने में
कलकत्ते की निस्बत मद्रास अधिक महत्व की जगह थी। फल्ता
से इन अंगरेज़ों ने एक ओर तो मद्रास की कोठी के अंगरेज़ों को यह
लिखा कि मद्रास से नई सेना जमा करके बंगाल भेजी जाय और
दूसरी ओर—क्योंकि केवल सेना के बल सिराजुद्दौला से जीतना
वे असम्भव समझ चुके थे—उन्होंने अपने गुप्तचरों के ज़रिये झूठे
सच्चे लोभ दिखलाकर कलकत्ते के राजा मानिकचंद को और
सिराजुद्दौला के अन्य सेनापतियों, दरबारियों और सामन्तों को
अपनी ओर फोड़ने के प्रयत्न शुरू किए । निस्संदेह भेद नीति का
यह विस्तृत जाल ही वह मुख्य उपाय था जिसके द्वारा ये मुट्ठी
भर निर्बल किन्तु चालाक विदेशी बलवान किन्तु अनुभवशून्य
भारतीय नवाब को गिराने की आशा कर रहे थे । स्क्रैफ़टन नामक
अंगरेज़ लिखता है :—
“यह एक बड़े भारी आश्चर्य की बात मालूम होगी कि सूबेदार (नवाब)
ने इतने दिनों इतनी शान्ति से हमें फल्ता में क्यों पड़े रहने दिया । × × ×
इसकी वजह मैं केवल यह बता सकता हूँ कि वह हमें एक बहुत ही तुच्छ
चीज़ समझता था । × × × और उसे इस बात का गुमान भी न था कि
हम सैन्यबल के सहारे फिर बंगाल लौटने की हिम्मत करेंगे ।” ꕤ
- "Reflections" by Scrafton p. 58.