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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

सिराजुद्दौला ५७
सिराजुद्दौला ने बजाय किसी तरह की सख़्ती के इस समय भी
सिराजुद्दौला की उनके साथ दया का व्यवहार किया । जब उसे
दयालुता यह मालूम हुआ कि अंगरेज़ों के फल्ता पहुँचने
पर वहाँ के लोगों ने बाज़ार बंद कर दिए थे
जिसकी वजह से अगरेज़ों को रसद की दिक़्क़त हो रही थी, तो
उसने फ़ौरन हुकुम भेज दिया कि बाज़ार खोल दिए जायँ और
“बेचारे परदेसियों को खाने पीने के सामान की कोई दिक़्क़त न
होने पाए ।” सिराजुद्दौला दिल से चाहता था कि अंगरेज़ अपनी
शरारतें छोड़कर फिर से बंगाल में तिजारत करने लगें । इसीलिए
उसने अपनी विजय के बाद भी क़ासिमबाज़ार, कलकत्ते इत्यादि
की कोठियों में उनके तिजारती माल को हाथ न लगाया था ।
सिराजुद्दौला की नीयत यदि कुछ और होती तो कलकत्ते या
फल्ता में से कहीं भी इन विदेशी व्यापारियों का एक एक कर
ख़ात्मा कर डालना और साथ ही उनके समस्त षड़यंत्रों का अंत
कर देना उसके लिए एक बहुत ही आसान काम था । यदि वह
ऐसा कर डालता तो कोई निष्पक्ष इतिहास लेखक उसे दोषी भी न
ठहरा सकता था । किन्तु उस भोले एशियाई नरेश को इन विदेशियों
के चरित्र और उनकी चालों का अभी तक भी पता न था । इस
भोलेपन का मूल्य सिराजुद्दौला और उसके देश दोनों को बहुत
ज़बरदस्त चुकाना पड़ा ।
२० जून सन् १७५६ को अंगरेज़ कलकत्ते से निकाले गए । १६
अगस्त को कलकत्ते के छिन जाने का समाचार मद्रास पहुँचा ।