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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

५४ भारत में अंगरेज़ी राज
अपनी वीरता और उदारता दोनों का सबूत देने के बाद
[हाशिया: सिराजुद्दौला की] विजयी सिराजुद्दौला २४ जून को कलकत्ते से
[हाशिया: कलकत्ते से वापसी] अपनी राजधानी की ओर लौटा। मार्ग में हुगली
के ऊपर उसने एक दरबार किया, जिसमें फ्रांसीसी
कोठी के वकील ने साढ़े तीन लाख रुपए और डच कोठी के वकील
ने साढ़े चार लाख रुपए अपनी अपनी राजभक्ति दर्शाने के लिए
सिराजुद्दौला की नज़र किए। सिराजुद्दौला ने उन्हें अपना व्यापार
जारी रखने की इजाज़त दे दी। सिराजुद्दौला को अभी तक आशा
थी कि इसी तरह का समझौता अङ्गरेज़ों के साथ भी हो जायगा।
११ जुलाई सन् १७५६ ई० को सिराजुद्दौला मुर्शिदाबाद पहुँच गया।
थोड़े ही दिनों बाद पूर्णिया के नवाब शौकतजंग ने फिर
बग़ावत का झंडा ऊँचा किया। १६ अक्तूबर सन् १७५६ को राज-
महल नामक स्थान पर सिराजुद्दौला और शौकतजंग की सेनाओं
में मुक़ाबला हुआ, जिसमें शौकतजंग काम आया और सिराजुद्दौला
ने विजय प्राप्त की। सिराजुद्दौला अब शौकतजंग की जगह राजा
युगलसिंह नामक एक हिन्दू को पूर्णिया की गद्दी पर बैठाकर
मुर्शिदाबाद लौट आया। इस बार सिराजुद्दौला की प्रजा ने उसे
बधाइयाँ दीं और दिल्ली के सम्राट ने एक नए फ़रमान के ज़रिये
उसे बंगाल, बिहार और उड़ीसा तीनों प्रान्तों की सूबेदारी की
मसनद पर फिर से पक्का किया। यह बात याद रखने योग्य है कि
सिराजुद्दौला आरम्भ से जो कुछ करता था दिल्ली सम्राट के नाम
पर और सम्राट एक सेवक की हैसियत से ही करता था।