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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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६० भारत में अंगरेज़ी राज
इसके बाद दूसरी जगह, जहाँ मानिकचंद अंगरेज़ों का मुक़ा-
कलकत्ते पर अंग- बला कर सकता था, कलकत्ता थी। किन्तु यहाँ
रेज़ों का फिर से पर उसने या उसके विदेशी दोस्तों ने दिखावे की
क़ब्ज़ा। भी ज़रूरत न समझी। बजबज से भागकर मानिक-
चंद सीधा हुगली पहुँचा। वहाँ से उसने सिराजु-
दौला को कहला भेजा कि “अंगरेज़ों की विशाल ( ? ) सेना के
सामने मैं ठहर न सका।” २ जनवरी सन् १७५७ को मानिकचंद
की ग़ैरहाज़िरी में बहुत आसानी से कलकत्ता फिर से अंगरेज़ों के
हाथों में आगया। इसके बाद तान्नाह का क़िला भी अंगरेज़ी
सेना को पहले ही से खुला हुआ और ख़ाली मिला। ३ जनवरी
सन् १७५७ को कलकत्ते का क़िला ड्रेक और उसकी एक कौंसिल
के हवाले कर दिया गया।
अंगरेज़ इतिहास लेखक एस० सी० हिल लिखता है कि इस
समय सिराजुद्दौला पर हमला करने से पहले अंगरेज़ों के सामने
एक ख़ास सवाल यह था कि सिराजुद्दौला की जगह सूबेदारी का
हक़दार किसको खड़ा किया जाय। कुछ की सलाह थी कि
“सरफ़राज़ ख़ाँ के उन बेटों में से एक को, जो इस समय ढाका में
क़ैद थे, सिराजुद्दौला के ख़िलाफ़ सूबेदारी का हक़दार खड़ा कर
दिया जाय।”* किन्तु यह मामला अभी तय नहीं किया गया।
कलकत्ते के आस पास केवल एक हुगली का क़िला और बाक़ी रह

  • Bengal in 1756—57, vol. i. p. cxxxviii.