भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
२० भारत में अंगरेज़ी राज
पास अपने इस कथन के लिये काफ़ी अच्छे प्रमाण थे। उस समय के तमाम
उल्लेखों की पूरी तरह छान बीन करने के बाद सर हेनरी यूल के दिल
पर यह असर पड़ा कि बंगाल की खाड़ी के अंदर कम्पनी के मुलाज़िमों की
नैतिक और सामाजिक अवस्था 'निस्सन्देह भयंकर' थी।'*
थोड़े ही दिनों में ख़ास कर बम्बई के अन्दर अंगरेज़ सौदागरों के
अत्याचार इतने बढ़ गए कि उनकी शिकायत
[पार्श्व-शीर्षक: औरंगज़ेब और] औरंगज़ेब के कानों तक पहुँची । फ़ौरन
[पार्श्व-शीर्षक: अंगरेज़] औरंगज़ेब ने हुकुम जारी कर दिया कि इन
लोगों की कोठियाँ ज़ब्त कर ली जायँ और इन्हें मार कर हिन्दो-
स्तान से बाहर निकाल दिया जाय। सूरत, विशाखपट्टन आदि
कई स्थानों की अंगरेज़ी कोठियाँ ज़ब्त कर ली गईं और वहाँ से
अंगरेज़ों को निकालकर बाहर कर दिया गया। बम्बई को घेर
लिया गया। किन्तु ये लोग काफ़ी चालाक थे, वे फ़ौरन औरंगज़ेब
के क़दमों पर गिर पड़े। उन्होंने कान पकड़ कर अपनी पिछली
ख़ताओं के लिये माफ़ी चाही। आइन्दा के लिये नेक चलनी का
वादा किया और मुग़ल सम्राट से जांबख़्शी की प्रार्थना की।†
- "The English in Bengal were equally notorious for their quarrels. . . .
The old Viceroy, Shayista Khan, called them 'a company of base, quarrelling
people and foul dealers,' and our great modern authority will not gainsay that
the noble had good grounds for his assertion. The impression of the moral
and social tone of the Company's servants in the Bay which has been left on
the mind of Sir Henry Yule by his exhaustive study of the records of the time is
'certainly a dismal one'"—Dr. C. R Wilson's Early Annals of the English
in Bengal, vol. i. p. 66.
† "Stooped to the most abject submission"—Mill, book i, chap v.
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २१
औरंगज़ेब ने उदारता में आकर और उन पर विश्वास करके उन्हें बख्श
दिया और सूरत आदि की कोठियाँ उन्हें वापस दे दीं। सन् १६९०
में औरंगज़ेब ने उन्हें कई नई कोठियाँ क़ायम करने और वहाँ पर
अपनी हिफ़ाज़त के लिये क़िलेबंदी करने तक की इजाज़त दे दी।
औरंगज़ेब ही के समय में उसके पौत्र अज़ीमशाह ने बंगाल के
सूबेदार की हैसियत से हुगली नदी के ऊपर छूतानटी, कलकत्ता
और गोबिन्दपुर नाम के तीन गाँव बतौर जागीर कम्पनी को दे
दिये। उसी समय फ़ोर्ट विलियम क़िले की बुनियाद डाली गई।
जिस समय पहले पहल यह क़िलेबंदी की जा रही थी, औरंगज़ेब
के पास इसकी ख़बर पहुँची। औरंगज़ेब को सलाह दी गई कि इस
क़िलेबंदी को रोका जावे, किन्तु दिल्ली सम्राट की नज़रों में अंगरेज़
उस समय एक इतनी तुच्छ चीज़ थे कि उनकी इन कार्रवाइयों में
दख़ल देना उसे ग़ैर ज़रूरी मालूम हुआ। इन ग़रीब परदेसियों के
साथ वह हर तरह दया और उदारता का ही व्यवहार करना
चाहता था। औरंगज़ेब ने उत्तर दिया :—
"मैं इन चीज़ों में क्यों दखल दूं ? बहुत मुमकिन है कि आसपास की
मेरी देशी रिआया उनसे ईर्षा रखती हो और झगड़े करती हो, फिरंगी लोग
अपनी शक्ति भर अपनी हिफ़ाज़त का इन्तज़ाम क्यों न करें ? ये ग़रीब लोग
इतनी दूर से आये हैं और अपनी रोज़ी के लिये इतनी मेहनत करते हैं। मैं
उन्हें क्यों रोकूं ?"*
- "If he (The Mogul) was told of their planting stockade and putting
a sort of fortification there, why should he trouble himself regarding it?
२२ भारत में अंगरेज़ी राज
औरंगज़ेब के बाद मुग़ल साम्राज्य की निर्बलता का समय
आया। अंगरेज़ों को मौक़ा मिला, उनके अत्याचारों ने और अधिक
गम्भीर तथा भयंकर रूप धारण किया। इस बीच धीरे धीरे भारत
के पूर्वी तथा पश्चिमी तटों पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी की अनेक
नई कोठियाँ बन गईं। अंगरेज़ी व्यापार भारत में बढ़ता गया।
कम्पनी के पत्तीदार और छोटे बड़े मुलाज़िम सभी भारत के धन
से मालामाल हो गए। औरंगज़ेब की मृत्यु के ठीक पचास साल
बाद बंगाल में अंगरेज़ी राज की नींव रक्खी गई, जिसकी कहानी
एक दूसरे स्थान पर बयान की जायगी।
अन्तिम यूरोपियन क़ौम, जो इस सिलसिले में भारत आई,
फ़्रांसीसी थी। फ्रांसीसी या फ्रेंच फ्रांस देश के
फ़्रांसीसियों का रहने वालों को कहते हैं। ईस्ट इण्डिया कंपनी
प्रवेश के मुक़ाबले की एक फ़्रांसीसी कंपनी ठीक उसी
उद्देश से सन् १६६४ ईसवी में क़ायम हुई। फ़्रांसीसियों ने सन्
१६६८ में सूरत, सन् १६६६ में मछलीपट्टन और सन् १६७४ में
पुद्दुचरी (पाण्डिचेरी) में अपनी कोठियाँ बनाईं।
फ़्रांसीसियों की नीति आरम्भ से यह थी कि वे भारतीय
शासकों की खुशामद करके जिस तरह हो उन्हें अपने पक्ष में रखने
की कोशिश करते थे। पुद्दुचरी का नगर उस समय कर्नाटक
Likely enough his native subjects around them were jealous and disposed
to be quarrelsome. Why should not Firanghees defend themselves as best
they might? Poor people! they had come a long way, and seemed to
work hard—he would not interfere. "—Torrens' Empire in Asia, pp. 4, 5.
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २३
के राज में था। दिल्ली सम्राट का एक सूबेदार दक्खिन में रहता
था। करनाटक का नवाब और कई अन्य राजा व नवाब, इस
सूबेदार के मातहत थे। पुद्दुचरी के फ़्रांसीसी मुखिया डूमास ने
करनाटक के नवाब दोस्तअली खाँ को ख़ूब खुश कर रक्खा था।
यह समय १८ वीं सदी के शुरू का समय था, जब कि औरंगज़ेब
की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य का बल घटना शुरू हो गया था।
इस बीच मराठों ने करनाटक पर हमला किया। डूमास ने मौक़ा
पाकर नवाब को सहायता देने का वादा किया। नवाब से इजाज़त
लेकर उसने पुद्दुचरी में क़िलेबंदी कर ली और १२०० यूरोपियन
तथा ५००० हिन्दोस्तानियों की सेना उसमें जमा करली। यूरोप
निवासियों के हाथों में यह पहली हिन्दोस्तानी सेना थी। डूमास
की सहायता काम कर गई। मराठों का करनाटक विजय करने का
प्रयत्न निष्फल गया। करनाटक का नवाब और दिल्ली का सम्राट
दोनों डूमास से खुश हो गए। सम्राट ने प्रसन्न होकर डूमास को
'नवाब' की उपाधि प्रदान की और मुग़ल साम्राज्य के अधीन उसे
दो हज़ार सवारों का सेनापति नियुक कर दिया। पुद्दुचरी के
इलाक़े पर अब फ़्रांसीसियों का पूरा क़ब्ज़ा हो गया।
सन् १७४१ में डूमास की जगह दूप्ले फ़्रांसीसी कंपनी की ओर
से पुद्दुचरी का हाकिम नियुक्त हुआ। दूप्ले एक अत्यंत योग्य और
चतुर सेनापति था, उसके पूर्वाधिकारी डूमास को दिल्ली से नवाब
का ख़िताब मिल चुका था। दूप्ले ने खुद अपने तईं 'नवाब दूप्ले'
कहना शुरू कर दिया। दूप्ले पहला यूरोपनिवासी था जिसके मन
२४ भारत में अंगरेज़ी राज
में भारत के अंदर यूरोपियन साम्राज्य क़ायम करने की आकांक्षा
उत्पन्न हुई । डूपले को भारतवासियों में दो ख़ास कमज़ोरियां नज़र
आईं, जिनसे उसने पूरा पूरा फ़ायदा उठाया । एक यह कि भारत के
विविध नरेशों की उस समय की आपस की ईर्षा और प्रतिस्पर्धा के
दिनों में विदेशियों के लिये कभी एक और कभी दूसरे का पक्ष लेकर
धीरे धीरे अपना बल बढ़ा लेना कुछ कठिन न था, और दूसरे यह
कि इस कार्य के लिये यूरोप से सेनाएं लाने की आवश्यकता न थी।
बल, वीरता अथवा सहनशक्ति में भारतवासी यूरोपनिवासियों
से कहीं बढ़ कर थे । अपने सामयिक अफ़सरों की वफ़ादारी का
भाव भी भारतीय सिपाहियों में ज़बरदस्त था । किन्तु राष्ट्रीयता
के भाव या 'स्वदेश' के विचार तक का उनमें अभाव था ।
उन्हें बहुत आसानी से यूरोपियन ढंग की सैनिक शिक्षा दी जा
सकती थी और यूरोपियन अफ़सरों के अधीन रक्खा जा सकता
था । इसलिये विदेशियों का यह सारा कार्य बड़ी सुन्दरता के साथ
हिन्दोस्तानी सिपाहियों से चल सकता था । डूपले को अपनी इस
महत्वाकांक्षा की पूर्ति में केवल एक बाधा नज़र आती थी, और
वह थी अंगरेज़ों की प्रतिस्पर्धा ।
यूरोप के अंदर भी उन दिनों फ़्रांस और इंगलिस्तान एक दूसरे
के शत्रु थे। थोड़े दिनों के बाद वहाँ फ़्रांस और
[हाशिया: फ़्रांसीसी और] इंगलिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया । कर्नाटक
[हाशिया: अंगरेज़] में क़रीब सौ साल से मद्रास की बस्ती अंगरेज़ों के
अधिकार में थी और यही उस समय उनके भारतीय व्यापार का मुख्य
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २५
केन्द्र था। डूप्ले ने मद्रास अंगरेज़ों से छीन लेने का विचार किया।
दोस्तअली ख़ाँ का उत्तराधिकारी अनवरुद्दीन इस समय करनाटक
का नवाब था। डूप्ले ने अंगरेज़ों के विरुद्ध नवाब के ख़ूब कान भरे।
लाबूरदौने नामक एक फ्रांसीसी के अधीन उसने कुछ जल सेना मद्रास
विजय करने के लिये भेजी और नवाब से यह वादा किया कि अंग-
रेज़ों को मद्रास से निकाल कर मैं नगर आपके हवाले कर दूँगा।
लाबूरदौने ने मद्रास विजय कर लिया, किन्तु इसके साथ ही अंग-
रेज़ों से चालीस हज़ार पाउण्ड नक़द लेकर मद्रास फिर उनके
हवाले कर देने का वादा कर लिया। इसके बाद डूप्ले ने अपने वादे
के अनुसार मद्रास नवाब के हवाले कर देने की कोई कोशिश न की
और न लाबूरदौने के वादे के अनुसार उसे अंगरेज़ों ही को वापस
किया। नवाब को जब इस छल का पता चला, वह फ़ौरन सेना
लेकर मद्रास की ओर रवाना हुआ। डूप्ले भी अपनी सेना सहित
नवाब को रोकने के लिये बढ़ा। ४ नवम्बर सन् १७४६ को मद्रास
के निकट डूप्ले की सेना और नवाब करनाटक की सेना में संग्राम
हुआ। डूप्ले की सेना में भी अधिकतर भारतीय सिपाही ही थे। इस
भारतीय सेना और अपने तोपख़ाने के बल डूप्ले ने विजय प्राप्त की।
इतिहास में यह पहली विजय थी जो किसी यूरोपियन ने किसी
भारतीय शासक के विरुद्ध प्राप्त की। विदेशियों के हौसले और
अधिक बढ़ गये !
अंगरेज़ों और नवाब करनाटक दोनों को फ्रांसीसी धोखा दे
चुके थे, इसलिए ये दोनों अब फ्रांसीसियों के विरुद्ध मिल गए।
२६ भारत में अंगरेज़ी राज
सन् १७४८ ईस्वी में अंगरेज़ी सेना ने पुदुदुच्चरी पर हमला किया,
किन्तु दूपले की सेना ने इस बार भी अंगरेज़ों को हरा दिया। इसी
समय यूरोप के अन्दर फ्रांस और इंगलिस्तान के बीच संधि हो
गई, जिसमें एक शर्त यह तय हुई कि मद्रास फिर से अंगरेज़ों के
सुपुर्द कर दिया जाय। इस प्रकार करनाटक से अंगरेज़ों को निकाल
देने के विषय में दूपले की आशा को एक ज़बरदस्त धक्का पहुंचा
और फ्रांसीसियों की बरसों की मेहनत पर पानी फिर गया।
किन्तु दूपले का हौसला इतनी जल्दी टूटने वाला न था।
फ्रांसीसी और अंगरेज़ी कंपनियों में प्रतिस्पर्द्धा बराबर जारी रही।
ये दोनों कंपनियां इस देश में अपनी अपनी सेनाएं रखती थीं और
जहाँ कहीं किसी दो भारतीय नरेशों में लड़ाई होती थी तो एक
एक का और दूसरी दूसरे का पक्ष लेकर लड़ाई में शामिल हो
जाती थी। भारतीय नरेशों की सहायता के बहाने इनका उद्देश
अपने यूरोपियन दुशमन को समाप्त करना होता था।
दक्खिन भारत की राजनैतिक अवस्था इस समय बहुत
[हाशिया: दक्खिन भारत में मोरचे] बिगड़ी हुई थी। मुग़ल सम्राट की ओर से
नाज़िरजंग वहां का सूबेदार था। नाज़िरजंग
का एक भतीजा मुज़फ़्फ़रजंग अपने चचा
को मसनद से उतारकर खुद सूबेदार बनना चाहता था।
इसीलिये नाज़िरजंग ने मुज़फ़्फ़रजंग को क़ैद कर रक्खा था।
उधर अनवरुद्दीन करनाटक का नवाब था। किन्तु उससे पहले
नवाब दोस्तअली ख़ाँ का दामाद चंदासाहब अनवरुद्दीन को गद्दी
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २७
से उतार कर खुद करनाटक का नवाब बनना चाहता था।
साहूजी तञ्जोर का राजा था, और एक दूसरा हक़दार प्रतापसिंह
साहूजी को हटाकर तञ्जोर का राज लेना चाहता था। इनमें
करनाटक का नवाब सूबेदार के अधीन था और तञ्जोर का राजा
करनाटक के नवाब का बाजगुज़ार था। इन तीनों शाही घरानों
की इस आपसी फूट से अंगरेज़, फ्रांसीसी और मराठे तीनों
फ़ायदा उठाने की कोशिशें कर रहे थे। दिल्ली के मुग़ल दरबार
में इतना बल न रह गया था कि साम्राज्य के एक कोने में इस
तरह के झगड़ों को दबाकर सच्चे हक़दारों के हक़ की हिफ़ाज़त
कर सके। इस सम्बन्ध में अनेक साज़िशें और लड़ाइयाँ हुईं,
जिनमें अंगरेज़ों ने नाज़िरजंग और अनवरुद्दीन का पक्ष लिया
और फ्रांसीसियों ने मुज़फ़्फ़रजंग तथा चंदासाहब का, किन्तु
इन झगड़ों का सूत्रपात तञ्जोर से हुआ।
सबसे पहले चंदासाहब ने तञ्जोर के राजा साहूजी को गद्दी से
उतार कर उस पर अपना क़ब्ज़ा कर लिया। मराठों ने तञ्जोर पर
चढ़ाई करके चंदासाहब को क़ैद कर लिया और प्रतापसिंह को
वहाँ की गद्दी पर बैठा दिया। कहते हैं कि तञ्जोर की प्रजा साहूजी
की अपेक्षा प्रतापसिंह से खुश थी। अंगरेज़ों ने अब साहूजी का
पक्ष लिया और साहूजी को फिर से गद्दी पर बैठाने के बहाने
कंपनी की सेना फ़ौरन मौक़े पर पहुंच गई। वहाँ पहुँच कर
अंगरेज़ों ने देखा कि प्रतापसिंह का पक्ष अधिक मज़बूत है, इसलिये
ऐन मौके पर साहूजी के साथ दग़ा कर वे प्रतापसिंह से मिल
२८ भारत में अंगरेज़ी राज
गए। देवीकोट का नगर और क़िला प्रतापसिंह ने इस कृपा के
बदले में अंगरेज़ों को दे दिया। साहूजी को सदा के लिये पेन्शन
देकर अलग कर दिया गया और प्रतापसिंह तंजोर का राजा
बना रहा। करनाटक में नवाब अनवरुद्दीन अंगरेज़ों पर मेहरबान
था ही, इसीलिये फ्रांसीसी अनवरुद्दीन की जगह चंदासाहब
को नवाब बनाना चाहते थे। डूप्ले ने मराठों को नक़द धन देकर
चंदासाहब को क़ैद से छुड़वा लिया और फिर उसे करनाटक की
गद्दी पर बैठाने का प्रयत्न किया। ३ अगस्त सन् १७४९ को
आम्बूर की लड़ाई में फ्रांसीसियों की सहायता से अनवरुद्दीन
का काम तमाम कर चंदासाहब करनाटक का नवाब बन गया।
यहाँ तक डूप्ले को ख़ासी सफलता हुई।
किन्तु तंजोर अभी तक प्रतापसिंह के अधिकार में था और
प्रतापसिंह अंगरेज़ों के पक्ष में था। डूप्ले ने इसके लिए दक्खिन के
सूबेदार ही को बदलना चाहा। उसने नाज़िरजंग के विरुद्ध मुज़फ़्फ़र-
जंग के साथ साज़िश की। चाचा की क़ैद से भागकर मुज़फ़्फ़रजंग
ने फ्रांसीसियों की सहायता से अपने तईं दक्खिन का सूबेदार एलान
कर दिया और चंदासाहब के साथ मिलकर सबसे पहले तंजोर
पर चढ़ाई की। सूबेदार नाज़िरजंग ने तंजोर के राजा प्रतापसिंह की
सहायता के लिए सेना भेजी। दोनों पक्षों के बीच एक गहरा संग्राम
हुआ जिसमें मुज़फ़्फ़रजंग फिर से क़ैद कर लिया गया। चंदा-
साहब की जगह अनवरुद्दीन का बेटा मोहम्मद अली करनाटक का
नवाब बना दिया गया और नाज़िरजंग सूबेदारी की मसनद पर
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २६
क़ायम रहा। दूपले की सब कार्रवाई निष्फल गई। इस पर भी
उसके प्रयत्न जारी रहे। जब खुले संग्राम में न जीत सका तो
उसने अपने गुप्त अनुचरों द्वारा सूबेदार नाज़िरजंग को क़त्ल करवा
दिया और एक बार फिर मुज़फ़्फ़रजंग को दक्खिन का सूबेदार
और चंदासाहब को कर्नाटक का नवाब एलान करवा दिया।
किन्तु त्रिचन्नपल्ली का मज़बूत क़िला मोहम्मद अली के हाथों
में था। त्रिचन्नपल्ली पर ही वह ज़बरदस्त और अंतिम संग्राम
हुआ जिसमें दक्खिन के इन तीनों राजकुलों और अंगरेज़ों तथा
फ़्रांसीसियों—सब की क़िस्मत का फ़ैसला हो गया। त्रिचन्नपल्ली
ही वह चट्टान मानी जाती है जिससे टकराकर इस देश के अन्दर
दूपले और फ़्रांसीसियों की समस्त आकांक्षाएँ चूर चूर हो गईं।
चंदासाहब और फ़्रांसीसियों की सेनाएं एक ओर थीं, मोहम्मद-
अली और अंगरेज़ों की सेनाएं दूसरी ओर। एक फ़्रांसीसी सेना
यूरोप से दूपले की सहायता के लिए भेजी गई, किन्तु वह भी
अंगरेज़ों के इक़बाल से कहीं मार्ग ही में डूबकर ख़तम होगई।
त्रिचन्नपल्ली के संग्राम में फ़्रांसीसियों के पक्ष की हार रही।
मजबूर होकर सन् १७५४ ईसवी में फ़्रांस की सरकार ने दूपले
को फ़्रांस वापस बुला लिया। फ़्रांस ने इसके बाद भारत के
राजनैतिक झगड़ों से तटस्थ रहना ही अपने लिए हितकर समझा।
दोनों यूरोपियन कम्पनियों में संधि हो गई कि आइन्दा भारत
की “देशी रियासतों के आपसी झगड़ों में दोनों में से कोई कभी
दख़ल न दे।” फ़्रांस ने इस शर्त पर अमल किया, किन्तु अंगरेज़ों
३० भारत में अंगरेज़ी राज
ने बारबार उसे उल्लघंन करना ही अपने लिए अधिक लाभदायक
पाया । सन् १७६६ ईसवी में फ़्रांसीसी कम्पनी तोड़ दी गई। आज
भारत में केवल पुदुदुचरी, चंदरनगर और एक दो और छोटे छोटे
स्थान फ्रांस के क़ब्ज़े में बाक़ी हैं ।
अब हम १८ वीं सदी के मध्य तक पहुँच चुके । पुर्तगालियों,
अंगरेज़ी राज डच और फ़्रांसीसियों तीनों में से किसी की भी
की नींव सत्ता भारत में क़ायम न रह सकी। इसके बाद
केवल अंगरेज़ों की कहानी बाक़ी रह जाती है।
हिन्दोस्तान में अंगरेज़ सौदागरों के राजनैतिक प्रभुत्व की नींव सन्
१७५७ में प्लासी के प्रसिद्ध संग्राम में रक्खी गई, जिसका विस्तृत
वृत्तांत अगले अध्याय में दिया जायगा।
दूसरा अध्याय
सिराजुद्दौला
सन् १७०७ ई० में सम्राट् औरंगज़ेब की मृत्यु हुई। मुग़ल साम्राज्य
[हाशिया: नवाब अलीवर्दी] का बल और विस्तार उस समय अपनी परा-
[हाशिया: ख़ाँ] काष्ठा पर था, किन्तु साम्राज्य के नाश के बीज
बोए जा चुके थे। औरंगज़ेब के बाद ही दिल्ली के
शाही दरबार का दबदबा घटना शुरू हो गया। चारों ओर छोटी
छोटी बादशाहतें साम्राज्य से टूट टूट कर अलग होने लगीं और
अलग अलग सूबों के सूबेदार नाम मात्र को साम्राज्य के अधीन रहे,
किन्तु वास्तव में अपने अपने विशाल राज्यों के स्वच्छंद शासक
बन गए।
नवाब अलीवर्दी ख़ाँ मुग़ल सम्राट् के अधीन बंगाल, बिहार और
उड़ीसा तीन प्रांतों का सूबेदार था। मराठों की शक्ति बढ़ रही थी,
३२ भारत में अंग्रेज़ी राज
मराठों ने बंगाल पर हमले शुरू किये। इन हमलों से अपनी रक्षा करने
के लिये अलीवर्दी ख़ाँ ने दिल्ली से मदद की प्रार्थना की, किन्तु दिल्ली
दरबार से उसे किसी तरह की सहायता न मिल सकी। मजबूर
होकर नवाब अलीवर्दी ख़ाँ ने दिल्ली को सालाना मालगुज़ारी भेजना
बंद कर दिया, किन्तु इस पर भी वह अपने तईं सम्राट् का एक
सेवक और उसकी प्रजा मानता रहा और सम्राट् के अधीन केवल
एक सूबेदार की हैसियत से शासन करता रहा।
इसमें संदेह नहीं कि बंगाल की तमाम रिआया अलीवर्दी ख़ाँ
और उसके पूर्वजों के शासन में अत्यंत सुखी
उस समय का और .खुशहाल थी। अंग्रेज़ इतिहास लेखक
बंगाल एस० सी० हिल उस समय के किसानों की हालत
के विषय में लिखता है :—
“मैं समझता हूँ सामाजिक इतिहास के हर विद्यार्थी को स्वीकार करना
होगा कि अठारवीं सदी के मध्य में बंगाल के किसानों की हालत उस समय
के फ़्रांस या जर्मनी के किसानों की हालत से बढ़कर थी ।”*
यह उस समय के ग्रामों की हालत थी। अब यदि उस समय
के शहरों की हालत पर नज़र डाली जाय तो बंगाल की राजधानी
मुर्शिदाबाद के विषय में स्वयं प्रसिद्ध अंग्रेज़ सेनापति क्लाइव
लिखता है :—
“मुर्शिदाबाद का शहर उतना ही लम्बा, चौड़ा, आबाद और धनवान है
जितना कि लंदन का शहर। अंतर इतना है कि लंदन के धनाढ्य से धनाढ्य
- Bengal in 1756-57, by S. C. Hill, vol. i. p. xxiii
सिराजुद्दौला ३३
मनुष्य के पास जितनी सम्पत्ति हो सकती है उससे बेइंतहा ज़्यादा सम्पत्ति
मुर्शिदाबाद में अनेक के पास है।”*
हिन्दुओं और मुसलमानों के साथ सूबेदार के व्यवहार में
किसी तरह का भेदभाव न था। सूबेदार के अधीन तीनों प्रान्तों में
अधिकांश रियासतों का शासन हिंदू राजाओं के हाथों में था।
मुर्शिदाबाद के दरबार में अनेक उच्च से उच्च पद हिन्दुओं को मिले
हुए थे। एस० सी० हिल लिखता है कि “देश का व्यापार और
दस्तकारियाँ क़रीब क़रीब सब हिन्दुओं ही के हाथों में थीं।”†
अंगरेज़ जाति के लोग सब से पहिले भारत के पच्छिमी तट
[हाशिया: बंगाल को लूटने] पर उतरे, किन्तु उनकी राजनैतिक सत्ता की
[हाशिया: की योजना] नींव पहले पहल बंगाल में पड़ी। इसके दो सबब
बताए जा सकते हैं। सब से पहला और मुख्य
सबब यह था कि जब कि पच्छिमी तट पर मराठों की विशाल
जल सेना उस समय मौजूद थी, जो अपने समय में संसार की
सब से ज़बरदस्त जल सेना मानी जाती थी, मुग़लों के पास
कोई जल सेना थी ही नहीं और बंगाल का दरवाज़ा समुद्र से
आने वालों के लिए चौपट खुला हुआ था। दूसरा सबब यह था
कि पच्छिमी प्रान्तों की निस्बत बंगाल कहीं अधिक उपजाऊ और
- "The city of Murshidabad is as extensive, populous, and rich as the
city of London; with this difference that there are individuals in the first
possessing infinitely greater property than any of the last city. "—Clive.
† Bengal in 1756-57, Introduction.
Empire is overflowing with gold and silver. She has always been feeble and defenceless. It is a miracle that no European Prince with a maritime power has ever attempted the conquest of Bengal. By a single stroke infinite wealth might be acquired, which would counter balance the treasures of both Peru and Mexico."
"The Moghuls have no policy. Their armies are worse than nothing. They have no fleet. Constant rebellions happen inside the empire. The rivers and ports are open to foreigners. This country can be easily conquered, or made tributary, as easily as the Spaniards subdued the naked inhabitants of America."
"x x x Ali Verdi Khan has three crores of pounds sterling (nearly 30 crore rupees) in his treasury. His annual revenue is at least two million pounds. His provinces are open on the sea side. Three..."
YES! THIS IS THE EXACT HISTORICAL TEXT!
Now, look at the English original:
"The Mogul Empire is overflowing with gold and silver."
How did Pandit Sundarlal translate "overflowing with gold and silver"?
"मुग़ल साम्राज्य सोने और चाँदी से लबालब भरा हुआ है।"
YES! "overflowing with gold and silver" -> "सोने और चाँदी से लबालब भरा हुआ है"!
Wait! Why does it look like "जयालय" or whatever in the print?
Look at the scan quality:
It's a vintage, low-res scan/photocopy of a book from the 1920s/1930s (Bharat mein Angrezi Raj was published in
सिराजुद्दौला ३५
जहाज़ों में डेढ़ हज़ार या दो हज़ार सैनिक इस काम के लिए काफ़ी
होंगे × × × ।'" ✻
कर्नल मिल इस सारे कुचक्र को ईस्ट इण्डिया कम्पनी से
छिपाकर पूरा करना चाहता था। क्योंकि उसके अनुसार "कोई
कम्पनी बात को गुप्त नहीं रख सकती।"
मिल जिस ढंग से चाहता था, उस ढंग से बंगाल विजय नहीं
[हाशिया: ईस्ट इंडिया कम्पनी] किया गया और शायद हो भी न सकता था,
[हाशिया: की ग़द्दारी] किन्तु लक्ष्य अंगरेज़ कम्पनी का भी यही था।
कम्पनी के अंगरेज़ों ने अपनी कोशिशें बराबर
जारी रक्खीं। तिजारत के काम में इन लोगों का हिन्दुओं से
अधिक वास्ता पड़ता था। दोनों बनिये थे। इसलिए अठारवीं
- The Mogul Empire is overflowing with gold and silver. She has
always been feeble and defenceless. It is a miracle that no European prince
with a maritime power has ever attempted the conquest of Bengal. By a
single stroke-infinite wealth might be acquired, which would counterbalance
the mines of Brazil and Peru.
• "The policy of the Moguls is bad; their army is worse; they are
without a navy. The Empire is exposed to perpetual revolts. Their ports
and rivers are open to foreigners. The country might be conquered, or laid
under contribution as easily as the Spaniards overwhelmed the naked
Indians of America.
". . . Ali Verdi Khan . . . has treasure to the value of thirty
millions sterling. His yearly revenue must be at least two millions. The
provinces are open to the sea. Three ships with fifteen hundred or two
thousand regulars would suffice for the undertaking. . . The East India
Company should be left alone. No Company can keep a secret. . . ."—
Colonel Mill's letter to Francis of Lorraine in 1746. Quoted from Bolt's
Considerations of the Affairs of Bengal, Appendix.
३६ भारत में अंगरेज़ी राज
सदी के मध्य में बंगाल के अन्दर हमें यह लज्जाजनक दृश्य देखने को
मिलता है कि उस समय के विदेशी ईसाई कुछ हिन्दुओं के साथ
मिलकर देश के मुसलमान राज के ख़िलाफ़ ग़दर करने और उस राज
को नष्ट करने के षड्यंत्र रच रहे थे। अंगरेज़ कम्पनी के गुप्त मदद-
गारों में मुख्य कलकत्ते का एक मालदार पञ्जाबी व्यापारी अमीचंद
था। उसे इस बात का लालच दिया गया कि नवाब को ख़तम कर
मुर्शिदाबाद के ख़जाने का एक बड़ा हिस्सा इन सेवाओं के बदले में
तुम्हें दे दिया जायगा और “इंगलिस्तान में तुम्हारा नाम इतना
अधिक होगा जितना भारत में कभी न हुआ था।” कम्पनी के मुला-
ज़िमों को आदेश था कि “अमीचंद की ख़ूब खुशामद करते रहो।”*
अंगरेज़ षड्यंत्रकारियों में एक ख़ास नाम इस समय करनल
स्कॉट का मिलता है। करनल स्कॉट ने बहुत दिनों बंगाल में रह
कर खूब मेल जोल बढ़ाया और अमीचंद की मदद से चुपके चुपके
कई बड़े बड़े हिन्दू राजाओं और रईसों को अपनी ओर मिला
लिया। अमीचंद के धन और अंगरेज़ कम्पनी के झूठे सच्चे वादों
ने मिलकर नवाब के अनेक दरबारियों और सम्बन्धियों की नियत
को डाँवा डोल कर दिया।
उधर कलकत्ते में अंगरेज़ों और चंदरनगर में फ़्रांसीसियों की
क़िलेबंदियाँ बराबर जारी थीं।
नवाब अलीवर्दी ख़ाँ को इन सब बातों का थोड़ा बहुत पता
चल गया। उसे इस बात का भी पता चल गया कि दक्खिन में
- Clive's letter to Watts.
सिराजुद्दौला ३७
और करमंडल तट पर किस तरह के कुचक्रों द्वारा ठीक उसी
समय अंगरेज़ और फ्रांसीसी दोनों अपने पैर फैलाते जा रहे थे।
नवाब ने अपना सन्देह दूर करने के लिए करनल स्कॉट को अपने
दरबार में बुलाया। करनल स्कॉट ने आने का वादा किया और
फिर टालकर मद्रास की ओर चला गया। नवाब ने अंगरेज़ों और
फ़्रांसीसियों दोनों को हुकुम दिया कि आप लोग फ़ौरन क़िलेबंदियाँ
करना बंद कर दें। उसने अंगरेज़ और फ़्रांसीसी कम्पनियों के
वकीलों को दरबार में बुलाकर उनसे कहा —
"तुम लोग सौदागर हो, तुम्हें क़िलों की क्या ज़रूरत ? जब तुम मेरी
हिफ़ाज़त में हो तो तुम्हें किसी दुश्मन का डर नहीं हो सकता।"
बहुत सम्भव है, अलीवर्दी ख़ाँ इस विषय में अपनी इच्छा पूरी
[हाशिया: सिराजुद्दौला को अलीवर्दी ख़ाँ की आख़री नसीहत] कर पाता, किन्तु वह इस समय बूढ़ा था। उसकी
उम्र ने अधिक वफ़ा न की। अंत समय निकट
आने पर एक दूरदर्शी नीतिज्ञ के समान उसने
अपने नवासे और उत्तराधिकारी सिराजुद्दौला
को पास बुलाकर इस प्रकार नसीहत की—
"मुल्क के अंदर यूरोपियन क़ौमों की ताक़त पर नज़र रखना। यदि खुदा
मेरी उम्र बढ़ा देता तो मैं तुम्हें इस डर से भी आज़ाद कर देता—अब मेरे
बेटा, यह काम तुम्हें करना होगा। तैलंग देश में उनकी लड़ाइयों और
उनकी कूटनीति की ओर से तुम्हें होशियार रहना चाहिये। अपने अपने बाद-
शाहों के बीच के घरेलू झगड़ों के बहाने इन लोगों ने शहनशाह (मुग़ल
सम्राट) का मुल्क और शहनशाह की रिआया का धन माल छीन कर आपस
' or 'अं' / 'श्रौर' or 'और'?
Wait! Look at the glyph closely:
Does it have the loop of 'श'?
Let's zoom in 500% on "श्रंगरेज़ी" in the title:
It has:
- A horizontal headline (shirorekha)
- A loop hanging down from the headline, curving right, then a diagonal down to the left... wait!
Look at "श्र" in "विश्राम" or "श्री":
A standard Devanagari 'श्र' is composed of 'श' (which has a loop at top left, curves right, then down-left) and a ra-kār (diagonal down-left).
In "श्रंगरेज़ी" here:
It has the loop at top-left, curves down to the bottom, loops, and has a horizontal bar connecting to the vertical stem!
WAIT! LOOK AT IT CLOSELY!
DOES IT HAVE A HORIZONTAL BAR CONNECTING TO THE VERTICAL STEM?!
YES! IT CONNECTS TO THE VERTICAL STEM!
WAIT! Look at "श्र" in Sanskrit: 'श्र' does NOT connect with a middle horizontal bar! 'श्र' has a vertical stem on the right, and the left curve touches the stem near the top, and ra-kār goes down-left.
Here, look at "श्रंगरेज़ी":
It has a loop at the top left, goes down, loops at the bottom, goes across to the vertical stem, AND has a vertical
अलीवर्दी ख़ाँ
[ द० ब० पारसनीस कृत “इतिहास संग्रह” से ]