भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २६
क़ायम रहा। दूपले की सब कार्रवाई निष्फल गई। इस पर भी
उसके प्रयत्न जारी रहे। जब खुले संग्राम में न जीत सका तो
उसने अपने गुप्त अनुचरों द्वारा सूबेदार नाज़िरजंग को क़त्ल करवा
दिया और एक बार फिर मुज़फ़्फ़रजंग को दक्खिन का सूबेदार
और चंदासाहब को कर्नाटक का नवाब एलान करवा दिया।
किन्तु त्रिचन्नपल्ली का मज़बूत क़िला मोहम्मद अली के हाथों
में था। त्रिचन्नपल्ली पर ही वह ज़बरदस्त और अंतिम संग्राम
हुआ जिसमें दक्खिन के इन तीनों राजकुलों और अंगरेज़ों तथा
फ़्रांसीसियों—सब की क़िस्मत का फ़ैसला हो गया। त्रिचन्नपल्ली
ही वह चट्टान मानी जाती है जिससे टकराकर इस देश के अन्दर
दूपले और फ़्रांसीसियों की समस्त आकांक्षाएँ चूर चूर हो गईं।
चंदासाहब और फ़्रांसीसियों की सेनाएं एक ओर थीं, मोहम्मद-
अली और अंगरेज़ों की सेनाएं दूसरी ओर। एक फ़्रांसीसी सेना
यूरोप से दूपले की सहायता के लिए भेजी गई, किन्तु वह भी
अंगरेज़ों के इक़बाल से कहीं मार्ग ही में डूबकर ख़तम होगई।
त्रिचन्नपल्ली के संग्राम में फ़्रांसीसियों के पक्ष की हार रही।
मजबूर होकर सन् १७५४ ईसवी में फ़्रांस की सरकार ने दूपले
को फ़्रांस वापस बुला लिया। फ़्रांस ने इसके बाद भारत के
राजनैतिक झगड़ों से तटस्थ रहना ही अपने लिए हितकर समझा।
दोनों यूरोपियन कम्पनियों में संधि हो गई कि आइन्दा भारत
की “देशी रियासतों के आपसी झगड़ों में दोनों में से कोई कभी
दख़ल न दे।” फ़्रांस ने इस शर्त पर अमल किया, किन्तु अंगरेज़ों