भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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सिराजुद्दौला ३६
तरह तरह से अपमान करना शुरू कर दिया। निस्सन्देह वे अब
छेड़ छाड़ का बहाना ढूंढ रहे थे।
सब से पहला अपमान जो इन लोगों ने सिराजुद्दौला का किया
सिराजुद्दौला के वह यह था। प्राचीन प्रथा के अनुसार हर नए
साथ अंगरेज़ों सूबेदार के मसनद पर बैठने के समय तमाम मात-
का व्यवहार हत राजाओं, अमीरों और विदेशी क़ौमों के वकीलों
का दरबार में हाज़िर होकर नज़रें पेश करना
ज़रूरी था। इसका एक मात्र अर्थ यह होता था कि वे नए नवाब
को नवाब स्वीकार करते हैं। सिराजुद्दौला के मसनद पर बैठने के
समय अंगरेज कम्पनी की ओर से कोई नज़र पेश नहीं की गई।
इसके बाद जब कभी अंगरेज़ों को मुर्शिदाबाद के दरबार से कोई
काम पड़ता था, तो वे कभी सिराजुद्दौला से बात न करते थे, बल्कि
ऊपर ही ऊपर ले देकर दरबारियों से अपना काम चला लेते थे।
वे सिराजुद्दौला के साथ पत्र व्यवहार करने से भी बचते थे। उन्होंने
एक बार अपनी क़ासिमबाज़ार की कोठी में सिराजुद्दौला को आने
तक से रोक दिया। निस्सन्देह कोई शासक या नरेश इस तरह के
अपमान को गवारा न कर सकता था। किन्तु इस व्यक्तिगत अप-
मान के अलावा और भी कई ज़बरदस्त सबब थे, जिन्होंने अंत में
सिराजुद्दौला को अंगरेज़ कम्पनी की बढ़ती हुई ताक़त को रोकने के
लिए मजबूर कर दिया। इनमें तीन मुख्य सबब ये थे —
(१) साम्राज्य के क़ानून और नवाब की आज्ञाओं, दोनों के
ख़िलाफ़ अंगरेज़ों ने उस सूबे के अंदर कलकत्ते में और दूसरी जगह
४० भारत में अंगरेज़ी राज
भी क़िलेबंदी कर ली और कलकत्ते के क़िले के चारों तरफ़ एक
बड़ी खंदक खोद डाली।
(२) दिल्ली के सम्राट ने इन परदेशियों पर दया करके बंगाल
के अंदर उनके माल पर हर तरह की चुंगी माफ़ कर दी थी।
कम्पनी के दस्तख़ती पास से जिसे 'दस्तक' कहते थे, कम्पनी का
माल प्रान्त में जहाँ चाहे बिना महसूल आ जा सकता था। अब
इन लोगों ने इस अधिकार का दुरुपयोग शुरू किया और अनेक
हिन्दोस्तानी व्यापारियों से रुपए लेकर उनके हाथ अपने दस्तक
बेचने शुरू कर दिए, जिससे राज की आमदनी को ज़बरदस्त धक्का
पहुँचा। इसके अलावा जिस सम्राट ने इन विदेशियों के माल पर
महसूल माफ़ कर दिया था, उसी की देशी प्रजा का माल जब इन
विदेशियों की कोठियों में या उनकी बस्तियों में जाता था, तो
कम्पनी ने उस पर ज़बरदस्त चुंगी वसूल करना शुरू कर दिया
जिसका क़ानूनन् उन्हें कोई अधिकार न था।
(३) नवाब के जो मुलाज़िम या दरबारी किसी तरह का जुर्म
करते थे, या नवाब के ख़िलाफ़ बग़ावत करते थे, उन्हें अंगरेज़
कलकत्ते में बुलाकर अपनी कोठी में आश्रय देने लगे।
इन सब बातों की शिकायतें सिराजुद्दौला के कानों तक लगातार
और बाज़ाब्ता पहुँचती रहीं, फिर भी वह बरदाश्त करता रहा।
इतने में सिराजुद्दौला को मालूम हुआ कि अंगरेज़ पूर्निया के
नवाब शौकतजंग को सिराजुद्दौला से लड़ाकर उसे मुर्शिदाबाद की
मसनद पर बैठाने की तजवीज़ें कर रहे हैं। शौकतजंग सिराजुद्दौला
सिराजुद्दौला ४१
का एक रिश्तेदार और मुर्शिदाबाद के सूबेदार के अधीन उसका
[हाशिया: सिराजुद्दौला के] एक सामन्त था। सिराजुद्दौला सेना लेकर पूर्णिया
[हाशिया: मातहतों को] की ओर रवाना हुआ। ख़बर सुनते ही शौकतजंग
[हाशिया: फोड़ना] नज़राने लेकर स्वागत के लिए आगे बढ़ा। शौकत-
जंग ने अपने तईं बेक़सूर बतलाया और अंगरेज़ों
के वे सब पत्र सिराजुद्दौला के सामने रख दिए, जिनमें अंगरेज़ों ने
शौकतजंग को सिराजुद्दौला के ख़िलाफ़ भड़काया था।*
किन्तु सिराजुद्दौला की उदारता असीम थी, उसने शौकतजंग
को बहाल रक्खा और अंगरेज़ों के साथ भी दया और क्षमा का
बर्ताव जारी रक्खा। अंगरेज़ों और फ्रांसीसियों दोनों के नाम उसने
केवल यह आज्ञा जारी कर दी कि आप लोग आइंदा न कोई नया
क़िला बनाएँ और न किसी पुराने क़िले की मरम्मत करें। फ्रांसी-
सियों ने नवाब की आज्ञा मान ली, किन्तु अंगरेज़ों ने इस आज्ञा
का और आज्ञापत्र कलकत्ते ले जाने वाले हरकारों दोनों का खुले
अपमान किया।
नवाब मुर्शिदाबाद का एक दीवान उन दिनों ढाका में रहा करता
था। उस समय के दीवान राजा राजवल्लभ को अंगरेज़ों ने अपनी
ओर मिला लिया। सिराजुद्दौला राजवल्लभ से नाराज़ हुआ।
अंगरेज़ों ने राजवल्लभ के बेटे राजा किशनदास को कलकत्ते बुलाकर
अमीचंद के मकान के अन्दर आश्रय दिया। राजवल्लभ की तमाम
धन सम्पति भी किशनदास के साथ कलकत्ते आगई। सिराजुद्दौला
- Bengal in 1756-1757, vol. iii. p. 164.
४२ भारत में अंगरेज़ी राज
ने अंगरेज़ों को आज्ञा दी कि किशनदास को वापस भेज दो, किन्तु
अंगरेज़ों ने साफ़ इनकार कर दिया।
इतने पर भी सिराजुद्दौला ने शांति से ही सब मामले का
निबटारा करना चाहा और क़ासिमबाज़ार की अंगरेज़ी कोठी के
मुखिया वाट्स को बुला कर समझाया कि "यदि अंगरेज़ शान्त
व्यापारियों की तरह देश में रहना चाहते हैं तो अब भी बड़ी खुशी
के साथ रहें, किन्तु सूबे के शासक की हैसियत से मेरा यह हुकुम
है कि वे फ़ौरन उन सब क़िलों को ज़मीन के बराबर कर दें, जो
उन्होंने हाल में बिना मेरी इजाज़त बना डाले हैं।"*
किन्तु अंगरेज़ व्यापारियों ने जिनकी आकांक्षाएँ बहुत बढ़ी हुई
थीं और जिनके षड्यंत्र इस समय दूर दूर तक पहुँच चुके थे, ज़रा
भी परवा न की। उनकी क़िलेबन्दियाँ और अधिक ज़ोरों के साथ
चलती रहीं। सिराजुद्दौला के पास अब सिवाय उन्हें दंड देने और
रोकने के और कोई चारा न था।
लाचार होकर सिराजुद्दौला ने २४ मई सन् १७५६ ई० को
[पार्श्व टिप्पणी: सिराजुद्दौला की] अंगरेज़ी कोठी को घेर लेने के लिए कुछ सेना
[पार्श्व टिप्पणी: अंगरेज़ों पर] क़ासिमबाज़ार भेजी। बावजूद क़िलेबन्दियों
[पार्श्व टिप्पणी: चढ़ाई] और तोपों के क़ासिमबाज़ार की कोठी सिरा-
जुद्दौला की सेना के सामने अधिक देर तक न
ठहर सकी। अंगरेज़ मुखिया वाट्स ने हार मान ली और कोठी
सिराजुद्दौला के सुपुर्द कर दी। वाट्स और कोठी के दूसरे अंगरेज़
- Hastings' MSS. in the British Museum, vol. 29, p. 209.
मराठा, मैसूर (हैदर-टीपू) एवं सिख साम्राज्य को हड़पने के कूटनीतिक षड्यन्त्र
सिराजुद्दौला ४३
विद्रोही इस समय सिराजुद्दौला के हाथों में थे । वह चाहता तो वहीं
उनका काम तमाम कर सकता था । किन्तु उसने उनकी जानें बख़्श
दीं और उन्हें अपने साथ ले लिया। क़ासिमबाज़ार की कोठी के
तिजारती माल को भी उसने बिलकुल हाथ न लगाया। केवल वहाँ
के हथियारों और गोला बारूद को वहाँ से हटा लिया ।
वाट्स और दूसरे अंगरेज़ों को साथ लेकर ५ जून १७५६ को
सिराजुद्दौला कलकत्ते की ओर बढ़ा। उन दिनों की सैन्ययात्रा
निस्संदेह कुछ और ही थी। रेलों का उस समय संसार में कहीं
निशान न था, सड़कें भी हर जगह मौजूद न थीं। बंगाल की
सख़्त से सख़्त धूप और गरमो का महीना, उस पर रमज़ान के
दिन, जब कि सेना के अधिकांश मुसलमान अफ़सर और सिपाही
दिन दिन भर रोज़ा रखते थे । भारी भारी तोपें और अन्य सब
सामान जिसके बिना उन दिनों यात्रा असम्भव थी और जिसे
हाथियों और बैलों से खिंचवाकर ले जाना होता था । इन सब
हालतों में सिराजुद्दौला की सेना ने ११ दिन के अन्दर १६० मील
का सफ़र तय किया ।
अंगरेज़ों के काफ़ी युद्ध के जहाज़ कलकत्ते पहुँच चुके थे और
[हाशिया: तान्नाह में अंगरेज़ों की हार] इन लोगों ने अपनी ओर से सिराजुद्दौला के
विरुद्ध खुली बग़ावत शुरू कर दी थी । इस बीच
- १३ जून को अंगरेज़ी सेना ने कलकत्ते से पाँच
मील नीचे हुगली के इस पार तान्नाह का क़िला वहाँ के मुट्ठी भर
भारतीय संरक्षकों के हाथों से छीन लिया । सिराजुद्दौला ने
४४ भारत में अंगरेज़ी राज
कलकत्ते जाने से पहले इस क़िले को फिर से विजय किया। इस
छोटे से संग्राम में नदी के ऊपर अंगरेज़ों की जहाज़ी तोपें और
किनारे पर से सिराजुद्दौला की तोप दोनों में कुछ देर तक ख़ासा
मुक़ाबला रहा। किन्तु आखिरकार अंगरेज़ी सेना को हारकर अपने
जहाज़ों सहित पीछे हट जाना पड़ा।
सिराजुद्दौला उस समय भी वृथा रक्त बहाने के विरुद्ध था।
अब भी वह इन अंगरेज़ व्यापारियों के साथ अमन
[सिराजुद्दौला की] से रहने के लिए तैयार था। इस यात्रा में उसके
[शान्ति प्रियता] एक दीवान ने कई बार वाट्स को अपने पास
बुलाकर समझाया कि यदि अंगरेज़ अपने इस समय तक के
अपराधों के बदले में बतौर जुर्माने या हरजाने के थोड़ा बहुत
भी धन पेश करने को तैयार हों और आइन्दा अमन से रहने
का वादा करें, तो सुलह की जा सकती है और व्यापार सम्बन्धी
समस्त अधिकार उन्हें फिर से मिल सकते हैं। कलकत्ते के अंगरेज़
अफ़सरों को भी इसकी सूचना दे दी गई। यदि वे चाहते तो उस
समय भी सिराजुद्दौला के साथ सुलह कर सकते थे। किन्तु ये लोग
अपने षडयन्त्रों के बल सिराजुद्दौला का नाश करने की आशा में थे।
ईमानदारी की लड़ाई में वे सिराजुद्दौला का किसी तरह का मुक़ा-
बला न कर सकते थे। फ़ौज और सामान दोनों
[अंगरेज़ों की रिशवतें] की उनके पास बेहद कमी थी। उनका सबसे
[और भेद नीति] बड़ा हथियार था—रिशवतें देकर, लालच देकर
और झूठे वादे करके सिराजुद्दौला के आदमियों और सैनिकों को
सिराजुद्दौला ४५
अपनी ओर फोड़ लेना। वही वाट्स और उसके अंगरेज़ साथी,
जिनकी सिराजुद्दौला ने जानें बख़्शी थीं, इस समय सिराजुद्दौला
की सेना के अन्दर इस प्रकार की साज़िशों के जाल पूर रहे थे।
सिराजुद्दौला की सेना में और ख़ासकर उसके तोपख़ाने में
अनेक यूरोपियन और अन्य ईसाई नौकर थे।
[हाशिया: ईसाई पादरियों के फ़तवे] ईसाई पादरियों के दस्तख़तों से एक दूसरे के
बाद तीन व्यवस्थापत्र यानी फ़तवे निकाले गए,
जिनमें लिखा था कि किसी भी ईसाई धर्मावलम्बी के लिए मुसलमानों
का पक्ष लेकर अपने सहधर्मियों के ख़िलाफ़ लड़ना ईसाई धर्म के
विरुद्ध और महापाप है। ये फ़तवे गुप्त ढंग से सिराजुद्दौला के ईसाई
मुलाज़िमों में बाँटे गये। इन्हीं फ़तवों में सिराजुद्दौला के मुलाज़िमों
को यह भी लालच दिया गया कि यदि तुम नवाब की सेना से
भाग कर अंगरेज़ों की ओर चले आश्रोगे, तो तुम्हें फ़ौरन अंगरेज़ी
सेना में नौकर रख लिया जायगा। इस तरह की चालों द्वारा काफ़ी
नमकहराम सिराजुद्दौला की सेना में पैदा कर दिए गए।
कलकत्ते के अंगरेज़ों का व्यवहार इस अवसर पर अपने हिन्दो-
स्तानी मददगारों के साथ अत्यन्त ख़राब था।
[हाशिया: अपने हिन्दोस्तानी मददगारों के साथ व्यवहार] सिराजुद्दौला के आने की ख़बर पाते ही इन लोगों
ने कलकत्ते के तमाम हिन्दू और मुसलमानों को,
जिनमें अधिकतर कम्पनी के मुलाज़िम, गुमाश्ते,
व्यापारी और मज़दूर थे अरक्षित छोड़ दिया और उनसे कह दिया कि
अंगरेज़ तुम्हारी रक्षा न करेंगे। किन्तु यूरोपियनों, हिन्दोस्तानी
४६ भारत में अंगरेज़ी राज
ईसाइयों, मर्द, औरत और बच्चों, यहाँ तक कि उनके ईसाई गुलामों
तक को उन्होंने अपनी कोठी के आस पास मकानों में जमा कर
लिया और बाहर चारों ओर के हिन्दोस्तानी मकानों को आग लगा
दी, ताकि सिराजुद्दौला से लड़ने के लिए मैदान साफ़ हो जाय ।
इतना ही नहीं, मालूम होता है कि ये लोग उस समय किसी
भी हिन्दोस्तानी पर विश्वास न कर सकते थे। सुप्रसिद्ध श्रमीचंद,
उसके साले हज़ारीमल और दीवान राजवल्लभ के बेटे राजा
किशनदास, इन तीनों को अंगरेज़ों ने क़ैद करके रखना आवश्यक
समझा । यह वही अमीचंद था जिसकी सहायता के बिना अंगरेज़ी
व्यापार या अंगरेज़ी सत्ता दोनों में से किसी के भी पैर बंगाल
के अन्दर हरगिज़ न जम सकते थे और राजा किशनदास अंगरेज़
कम्पनी का वह शरणागत था, जिसे उन्होंने सिराजुद्दौला के हवाले
करने तक से इनकार कर दिया था ।
जिस समय अंगरेज़ सिपाही अमीचंद को पकड़ने के लिए
उसके मकान पर पहुँचे, अमीचंद ने फ़ौरन अपने
ज़नानखाने पर
हमला
को उनके हवाले कर दिया । किन्तु हज़ारीमल
और राजा किशनदास से यह अपमान न सहा
गया। उन दोनों ने अपने आदमियों को अंगरेज़ सिपाहियों पर
गोली चलाने का हुकुम दिया। लड़ाई में हज़ारीमल वीरता के
साथ लड़ा। उसका बाँया हाथ उड़ गया और अंत में तीनों
गिरफ़्तार कर लिए गए। इसके बाद जब अंगरेज़ अफ़सरों ने अपने
उन्मत्त गोरे सैनिकों को अमीचंद के ज़नानख़ाने को ओर बढ़ने का
सिराजुद्दौला ४७
हुकुम दिया, तो अमीचंद के वफ़ादार हिन्दोस्तानी जमादार का रक्त
खौलने लगा। गोरे सिपाहियों की नियत ज़ाहिर थी। श्रौर्म नामक
यूरोपियन इतिहास लेखक इस घटना के विषय में लिखता है —
"अमीचंद के जमादार ने जो एक ऊँची ज़ात का हिन्दोस्तानी था, मकान
को आग लगा दी और फिर कहा जाता है इसलिए ताकि विदेशी लोग घर
की स्त्रियों की बेइज़्ज़ती न कर सकें, उसने ज़नानख़ाने में घुसकर अपने हाथ
से तेरह स्त्रियों का काम तमाम किया और फिर अंत में अपने भी ख़ंज़र घोंप
लिया। किन्तु उसका अपना ज़ख़्म कारगर न हो सका।"*
अनेक अंगरेज़ इतिहास लेखक शिकायत करते हैं कि बहुत से
भारतीय कुलियों, मल्लाहों और नौकरों ने उस समय अंगरेज़
व्यापारियों का साथ छोड़ दिया। यदि यह बात सच है तो ऊपर
के अत्याचारों में इसके लिए काफ़ी वजह मौजूद थी।
१६ जून को सिराजुद्दौला कलकत्ते पहुँचा। १६ और १७ को
[विजयी सिराजुद्दौला] कई छोटी मोटी लड़ाइयाँ हुईं। १८ को शुक्रवार
[का कलकत्ता प्रवेश] के दिन कम्पनी की ओर से साफ़ आज्ञा निकली
कि यदि शत्रु का कोई आदमी ज़ख़्मी होकर
या किसी और वजह से पनाह की प्रार्थना करे तो उस पर कोई
किसी तरह की दया न दिखावे। उसी दिन सिराजुद्दौला की सेना
ने कम्पनी की सेना पर बाज़ाब्ता चढ़ाई की और बावजूद सिरा-
जुद्दौला के अनेक ईसाई नौकरों की नमकहरामी के कम्पनी को
- Orme, vol. ii, p. 60.
४८ भारत में अंग्रेज़ी राज
सेना देर तक सिराजुद्दौला के गोलों का सामना न कर सकी।
अंत में अंगरेज़ों को हार स्वीकार करनी पड़ी।
रविवार २० जून सन् १७५१ को सिराजुद्दौला की विजयी सेना
ने कलकत्ते की अंगरेज़ी कोठी में प्रवेश किया। कोठी के तमाम
अंगरेज़ क़ैद कर लिए गए। सिराजुद्दौला के लिए इस समय
कलकत्ते के इन बागी विदेशी व्यापारियों का वहीं एक एक कर
काम तमाम कर देना और उनकी कोठी को नेस्त नाबूद कर देना
एक बहुत आसान काम था, किन्तु उदार सिराजुद्दौला इन लोगों
के छलों से अभी तक पूरी तरह परिचित न हुआ था।
सिराजुद्दौला के हुकुम से क़िले के अन्दर एक दरबार लगा,
जिसमें तमाम यूरोपियन क़ैदी नवाब के सामने
सिराजुद्दौला की पेश किए गए। क़ैदियों ने नवाब से क्षमा की
उदारता प्रार्थना की। उदार भारतीय नवाब ने उन सब की
जानें बख़्श दीं।* अंगरेज़ इतिहास लेखक जेम्स मिल लिखता है —
“जब मिस्टर हॉलवेल (कलकत्ते की कोठी का मुखिया) हथकड़ी पहने
हुए नवाब के सामने पेश किया गया, तो नवाब ने फ़ौरन हुकुम दिया कि
हथकड़ी खोल दी जाय और स्वयं अपनी सिपहगरी की शपथ खाकर हॉलवेल
को विश्वास दिलाया कि “तुम्हारे या तुम्हारे किसी साथी के सर का एक
बाल भी किसी को छूने न दिया जायगा।”†
यही इतिहास लेखक स्वीकार करता है कि विजयी हिन्दोस्तानी
- Talboys Wheeler's Early Records of British India, vol. i. p. 160.
† History of India, by James Mill, vol, iii. p. 1179.
सिराजुद्दौला
[ 'बँग्लार इतिहास,' नामक बँग्ला ग्रन्थ से ]
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सिराजुद्दौला ४६
सैनिकों ने “पराजित अंगरेज़ों के साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं किया।”
और उनके साथ के “मुसलमान मुल्ला ख़ुदा की बंदगी में लगे
रहे।” क़िले और कोठी के अंदर का गोला बारूद सब नवाब ने
हटवा लिया, किन्तु जितना तिजारती माल कोठी के अंदर भरा
हुआ था उसे सिराजुद्दौला या उसके सैनिकों ने हाथ तक नहीं
लगाया, सिराजुद्दौला की आज्ञा से उसे हिफ़ाज़त के साथ ज्यों का
त्यों रहने दिया गया। यही व्यवहार सिराजुद्दौला ने अंगरेज़ों
की दूसरी कोठियों में किया ।
कलकत्ते के बहुत से अंगरेज़ सिराजुद्दौला की सेना के क़िले में
दाख़िल होने से पहले ही पीछे की ओर से अपने जहाज़ों में बैठकर
भाग गए थे। जो रह गए थे उन्होंने अब सिराजुद्दौला से प्रार्थना
की कि हमारी जान बख़्शी जाय और हमें बंगाल छोड़ कर अपने
साथियों के पास मद्रास चले जाने की इजाज़त दी जाय। सिरा-
जुद्दौला ने सहर्ष उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। अनेक यूरोपियन
इतिहास लेखक इस बात की शहादत देते हैं कि इस अवसर पर
सिराजुद्दौला की शक्ति को देख कर अधिकांश यूरोपियन चकित
और भयभीत हो गए।
जॉन कुक लिखता है कि सिराजुद्दौला की मुसलमान सेना का
नियम था कि वे रात को कभी न लड़ते थे और शाम होते ही
गोलाबारी बंद् कर देते थे। कुक यह भी लिखता है कि यदि ऐसा
न होता तो २० तारीख़ से पहले ही अंगरेज़ों की बुरी हालत हो
गई होती।
४
५० भारत में अंगरेज़ी राज
इस प्रकार कम्पनी के अंगरेज़ व्यापारी सन् १७५६ में भारत
अंगरेज़ों का बंगाल के सब से अधिक उपजाऊ और समृद्ध प्रान्त
से निकाला जाना बंगाल से निकाल बाहर किए गए। हॉलवेल ने
कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम अपनी ३० नवम्बर
१७५६ की चिट्ठी में लिखा :—
“इतनी घातक और शोकजनक आपत्ति बाबा आदम के समय से लेकर
आज तक किसी भी क़ौम या उसके उपनिवेश के इतिहास में न आई होगी।”
सिराजुद्दौला ने ‘कलकत्ते’ का नाम बदलकर ‘अलीनगर’ रक्खा
और अपने एक दीवान राजा मानिकचंद को अलीनगर और उसके
आसपास के इलाक़े का हाकिम नियुक्त किया।
प्रायः समस्त अंगरेज़ इतिहास लेखक अपनी क़ौम की इस हार
के साथ एक भयंकर हत्याकाण्ड का ज़िक्र करते
“ब्लैक होल” का हैं, जिसे “ब्लैक होल” हत्याकाण्ड, या बंगाल में
क़िस्सा “अंधकूप हत्या”, कहा जाता है। ब्लैक होल
कलकत्ते की अंगरेज़ी कोठी के अंदर एक अँधेरी कोठरी या काल-
कोठरी थी, जो अंगरेज़ व्यापारियों ही की बनाई हुई थी और
जिसमें कम्पनी के अफ़सर अपने हिन्दोस्तानी अपराधियों या
क़र्ज़दारों को बंद कर दिया करते थे। इन अंगरेज़ लेखकों का बयान
है कि २० जून की रात को इस १८ फुट लम्बी और कुछ कम चौड़ी
कोठरी में सिराजुद्दौला के हुकुम से १४६ यूरोपियन क़ैदी बंद कर
दिए गए। जून का महीना, जगह की तंगी और ताज़ी हवा न मिल
सकने के कारण अनेक तीव्र यातनाओं के बाद सुबह तक इन १४६
में से केवल २३ ज़िन्दा बचे, और वह भी भयंकर अधमरी
हालत में।
किन्तु उस समय के इतिहास की खोज करने वालों पर अब
यह बात अच्छी तरह प्रकट हो चुकी है कि ब्लैक होल का यह
सारा क़िस्सा बिलकुल झूठा है और केवल सिराजुद्दौला के चरित्र
को कलंकित करने और अंगरेज़ों के बाद के कुचक्रों को जायज़
क़रार देने के लिए गढ़ा गया था।
विद्वान इतिहासलेखक अक्षयकुमार मैत्र ने अपने बंगला ग्रंथ
“सिराजुद्दोला” में इस क़िस्से के विरुद्ध अनेक अकाट्य युक्तियाँ
संग्रह की हैं। अव्वल तो इतनी छोटी (२६७ वर्ग फुट) जगह
में १४६ मनुष्य चावलों के बोरों की तरह भी नहीं भरे जा
सकते। इसके अलावा सैयद गुलाम हुसैन की “सियरउल-
मुताख़रीन” में या उस समय के किसी भी प्रामाणिक इतिहास में,
या कम्पनी के रोज़नामचों, “काररवाई के रजिस्टरों” या मद्रास
कौन्सिल की बहसों में इस घटना का कहीं ज़िक्र नहीं आता।
क्लाइव और वाट्सन ने कुछ समय बाद नवाब की ज़्यादतियों और
कम्पनी की हानियों को दर्शाते हुए नवाब के नाम जो पत्र लिखे,
उनमें इस घटना का कहीं ज़िक्र नहीं आता, न अलीनगर के संधिपत्र
में उसका कहीं नाम है। बहुत समय बाद क्लाइव ने कम्पनी के डाइ-
रेक्टरों के नाम एक लम्बा पत्र लिखा, जिसमें उसने सिराजुद्दौला के
साथ कम्पनी के क्रूर व्यवहार के अनेक सबब गिनवाए हैं। उनमें
इस घटना का कहीं इशारा भी नहीं मिलता। अंगरेज़ों ने अंत में मीर
५२ भारत में अंगरेज़ी राज
जाफ़र के साथ जो संधि की, उसमें कम्पनी के हर तरह के हरजाने
का हिसाब लगाया गया है, किन्तु इन १२३ मनुष्यों के कुटुम्बियों
को मुश्रावज़ा दिलवाने का कहीं ज़िक्र नहीं। जो विदेशी लोग जहाज़ों
में बैठकर भाग निकले थे, उनके बाद १२३ शायद क़िले के अन्दर
बचे भी न थे। कुछ लोगों ने बाद में कुल ऐसे यूरोपनिवासियों
की सूची तैयार करने को कोशिश की, जो उस समय कलकत्ते के
क़िले के अन्दर मरे श्रौर उसे १२३ तक लाने का प्रयत्न भी किया,
फिर भी यह सूची ५६ से ऊपर न पहुंच सकी श्रौर ये ५६ भी किसी
कोठरी में दम घुटकर नहीं मरे, बल्कि लड़ाई के ज़ख़्मों श्रौर मामूली
रोगों के शिकार हुए। फिर बाक़ी ६७ कौन थे ? इत्यादि ।
वास्तव में इस झूठे क़िस्से को फ़रवरी सन् १७५७ ई० में
कलकत्ते के अंगरेज़ मुखिया हॉलवेल ने भारत से विलायत जाते
समय जहाज़ के ऊपर बैठकर गढ़ा था। यह वही हॉलवेल है जिसको
सिराजुद्दौला ने हथकड़ी खुलवा दी थी। अपने झूठों और जाल-
साज़ियों के लिए यह अंगरेज़ काफ़ी मशहूर था।
मिसाल के तौर पर हॉलवेल के अन्य कारनामों में से केवल एक
को यहाँ बयान कर देना काफ़ी होगा। यह घटना कुछ दिनों
बाद की है, किन्तु इस स्थान पर बेमौक़े न होगी। सिराजुद्दौला
के बाद मीर जाफ़र को मसनद पर बैठाने के लिए उसने मीर जाफ़र
से एक लाख रुपए रिश्वत के ले लिए और मीर जाफ़र की खूब
तारीफ़ की। बाद में जब मीर क़ासिम को मसनद पर बैठाने
की ज़रूरत हुई तो उसने तीन लाख रुपए मीर क़ासिम से लेकर
सिराजुद्दौला ५३
चट कर लिए। अब मीर जाफ़र को बदनाम करना उसके लिए
ज़रूरी हो गया। इसलिए कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम उसने एक
लम्बा पत्र लिखा, जिसमें मीर जाफ़र को उसने घोर अन्यायी और
हत्यारा बयान किया और अनेक ऐसे पुरुषों और स्त्रियों की एक
सूची साथ में दी, जिन्हें वह लिखता है कि मीर जाफ़र ने बेक़सूर
मार डाला। प्रत्येक पुरुष के पिता का नाम और प्रत्येक स्त्री के
पति का नाम सूची में दिया गया। छोटी से छोटी तफ़सील तक
इन हत्याओं की हॉलवेल के पत्र में मौजूद है। इसके कई साल बाद
क्लाइव और उसके साथियों ने डाइरेक्टरों को एक और पत्र भेजा
जिसमें उन्होंने बताया कि मीर जाफ़र पर जितने इलज़ाम हॉलवेल
ने लगाए हैं वे सब सर से पाँव तक झूठे हैं और जिन पुरुष स्त्रियों
की सूची हॉलवेल ने अपने पत्र में दी है यह कह कर कि मीर जाफ़र
ने इन लोगों को बेक़सूर मारडाला उनमें से दो को छोड़कर बाक़ी
सब अभी तक ज़िंदा हैं।*
फिर भी सिराजुद्दौला को बदनाम करने और अपने देशवासियों
के काले कारनामों पर मुलम्मा फेरने के लिए उस समय से आज
तक अंग्रेज़ इतिहास लेखकों ने हॉलवेल की ब्लैक होल नामक
कल्पना से पूरा फ़ायदा उठाया है। अंग्रेज़ी स्कूलों की समस्त
पाठ्य पुस्तकों में, जिनमें कि अंग्रेज़ों के ऊपर सिराजुद्दौला के
बेशुमार अहसानों का कहीं ज़िक्र नहीं, उनमें यह क़िस्सा सच्चा
कह कर बयान किया जाता है।
- Letter to the Directors, dated 1st October, 1765, by Clive and others.
५४ भारत में अंगरेज़ी राज
अपनी वीरता और उदारता दोनों का सबूत देने के बाद
[हाशिया: सिराजुद्दौला की] विजयी सिराजुद्दौला २४ जून को कलकत्ते से
[हाशिया: कलकत्ते से वापसी] अपनी राजधानी की ओर लौटा। मार्ग में हुगली
के ऊपर उसने एक दरबार किया, जिसमें फ्रांसीसी
कोठी के वकील ने साढ़े तीन लाख रुपए और डच कोठी के वकील
ने साढ़े चार लाख रुपए अपनी अपनी राजभक्ति दर्शाने के लिए
सिराजुद्दौला की नज़र किए। सिराजुद्दौला ने उन्हें अपना व्यापार
जारी रखने की इजाज़त दे दी। सिराजुद्दौला को अभी तक आशा
थी कि इसी तरह का समझौता अङ्गरेज़ों के साथ भी हो जायगा।
११ जुलाई सन् १७५६ ई० को सिराजुद्दौला मुर्शिदाबाद पहुँच गया।
थोड़े ही दिनों बाद पूर्णिया के नवाब शौकतजंग ने फिर
बग़ावत का झंडा ऊँचा किया। १६ अक्तूबर सन् १७५६ को राज-
महल नामक स्थान पर सिराजुद्दौला और शौकतजंग की सेनाओं
में मुक़ाबला हुआ, जिसमें शौकतजंग काम आया और सिराजुद्दौला
ने विजय प्राप्त की। सिराजुद्दौला अब शौकतजंग की जगह राजा
युगलसिंह नामक एक हिन्दू को पूर्णिया की गद्दी पर बैठाकर
मुर्शिदाबाद लौट आया। इस बार सिराजुद्दौला की प्रजा ने उसे
बधाइयाँ दीं और दिल्ली के सम्राट ने एक नए फ़रमान के ज़रिये
उसे बंगाल, बिहार और उड़ीसा तीनों प्रान्तों की सूबेदारी की
मसनद पर फिर से पक्का किया। यह बात याद रखने योग्य है कि
सिराजुद्दौला आरम्भ से जो कुछ करता था दिल्ली सम्राट के नाम
पर और सम्राट एक सेवक की हैसियत से ही करता था।
सिराजुद्दौला ५५
कलकत्ते से भागे हुए अंगरेज़ कलकत्ते से कुछ नीचे बंगाल
[हाशिया: फल्ता में] की खाड़ी के ऊपर फल्ता नामक स्थान पर जाकर
[हाशिया: अंगरेज़] ठहर गए और क़रीब छै महीने वहीं ठहरे रहे ।
कम्पनी के कारबार की दृष्टि से उस ज़माने में
कलकत्ते की निस्बत मद्रास अधिक महत्व की जगह थी। फल्ता
से इन अंगरेज़ों ने एक ओर तो मद्रास की कोठी के अंगरेज़ों को यह
लिखा कि मद्रास से नई सेना जमा करके बंगाल भेजी जाय और
दूसरी ओर—क्योंकि केवल सेना के बल सिराजुद्दौला से जीतना
वे असम्भव समझ चुके थे—उन्होंने अपने गुप्तचरों के ज़रिये झूठे
सच्चे लोभ दिखलाकर कलकत्ते के राजा मानिकचंद को और
सिराजुद्दौला के अन्य सेनापतियों, दरबारियों और सामन्तों को
अपनी ओर फोड़ने के प्रयत्न शुरू किए । निस्संदेह भेद नीति का
यह विस्तृत जाल ही वह मुख्य उपाय था जिसके द्वारा ये मुट्ठी
भर निर्बल किन्तु चालाक विदेशी बलवान किन्तु अनुभवशून्य
भारतीय नवाब को गिराने की आशा कर रहे थे । स्क्रैफ़टन नामक
अंगरेज़ लिखता है :—
“यह एक बड़े भारी आश्चर्य की बात मालूम होगी कि सूबेदार (नवाब)
ने इतने दिनों इतनी शान्ति से हमें फल्ता में क्यों पड़े रहने दिया । × × ×
इसकी वजह मैं केवल यह बता सकता हूँ कि वह हमें एक बहुत ही तुच्छ
चीज़ समझता था । × × × और उसे इस बात का गुमान भी न था कि
हम सैन्यबल के सहारे फिर बंगाल लौटने की हिम्मत करेंगे ।” ꕤ
- "Reflections" by Scrafton p. 58.