भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
११० पुस्तक प्रवेश
जितने पुरुष और स्त्री रचे गए हैं सब तुम्हारा ही रूप हैं, कबीर अल्लाह
का और राम का बेटा है, वही कबीर का गुरु और पीर है ।
हिन्दू और तुरुक की एक ही राह है, जो सत्गुरु ने बताई है, कबीर
कहता है, सुनो भाई सन्तो ! राम और ख़ुदा में कोई भेद नहीं है ।
हिन्दू राम कहते हैं, मुसलमान रहीम कहते हैं । आपस में दोनों लड़
लड़ कर मरते हैं, मर्म को कोई नहीं जानता ।
कबीर पहला भारतवासी था, जिसने हिन्दू और मुसलमान दोनों के
लिए बल्कि समस्त मानव जाति के लिए एक सामान्य धर्म का निर्भीकता
के साथ प्रतिपादन किया । उसके अनुयाइयों में हज़ारों हिन्दू और मुसल-
मान शामिल थे । अभी तक कबीरचौरा (काशी) में कबीर के हिन्दू
अनुयायी और मगहर में कबीर के मुसलमान अनुयायी हर साल जमा होकर
कबीर की याद में अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते हैं । कबीरपन्थियों की
संख्या इस समय शायद् दस लाख से अधिक नहीं है, किन्तु कबीर का
प्रभाव इससे कहीं अधिक है, और पञ्जाब, गुजरात, बङ्गाल और दक्खिन
तक फैला हुआ है। मुग़ल साम्राज्य के दिनों कबीर के विचार बराबर
फैलते गए, यहाँ तक कि दूरदर्शी सम्राट अकबर ने 'दीने इलाही' के रूप में
उन्हें सर्वस्वीकृत कराने की कोशिश की । वास्तव में कबीर ही अकबर का
मानसिक पिता था । विधि ने या देश के भीतर तथा बाहर की परिस्थिति
ने कबीर और अकबर को पूरी तरह सफल न होने दिया, किन्तु भारत की
अन्तरात्मा भीतर से पुकार रही है—यदि सत्य है तो यही है, और यदि
भविष्य के लिए कोई मार्ग है तो केवल यही है ।
कबीर के विचारों की मौलिकता और महानता के कारण कबीर के
समय से फिर एक बार उत्तर ने धार्मिक विचारों के क्षेत्र में शेष भारत का
नेतृत्व हाथ में लिया और कबीर ही के विचार अनेक सन्तों और महात्माओं
द्वारा एक बार उत्तर से दक्खिन तक समस्त भारत में फैलने लगे।
पञ्जाब के मुसलमान फ़क़ीर
जिस तरह शुरू की सदियों में दक्खिन भारत, उसी तरह पन्द्रवीं सदी
में समस्त पञ्जाब के नगर और गाँव मुसलमान सूफ़ियों और फ़क़ीरों से
भरे हुए थे। पानीपत, सरहिन्द, पाकपट्टन, मुलतान और उच्च में
अनेक प्रसिद्ध सूफ़ी शेख़ों ने अपनी ज़िन्दगियाँ गुज़ारीं, जिनमें बाबा फ़रीद,
अला उलहक़, जलालुद्दीन बुख़ारी, मख़दूम जहानियाँ, शेख़ इस्माइल
बुख़ारी, दाता गञ्जबख़्श इत्यादि के नाम अपनी सच्चाई और ईश्वरभक्ति के
लिए देश भर में प्रसिद्ध थे। जो ज़बरदस्त क्रान्ति इन महात्माओं ने देश-
वासियों के विचारों में उत्पन्न की, उसी का फल या फूल गुरु नानक का वह
सुन्दर प्रयत्न था जो उस महापुरुष ने ठीक कबीर ही के समान और उसी
की सरणी पर हिन्दू और मुसलमान धर्मों को मिलाने के लिए किया।
नानक
' गुरु नानक का जन्म सन् १४६६ ईसवी में वैशाख शुक्ला तृतीया को
हुआ था। उसने फ़ारसी और संस्कृत दोनों की शिक्षा पाई थी। नानक
नाम उन दिनों हिन्दू और मुसलमान दोनों का नाम होता था। कुछ
दिनों उसने नबाब दौलत ख़ाँ लोधी के यहाँ नौकरी की। तीस साल की
आयु में उसने फ़क़ीरी ली। अपने मुसलमान शिष्य मरदाना के साथ
उसने भारत, लङ्का, ईरान, अरब इत्यादि की यात्रा की। लिखा है कि
पानीपत के शेख़ शरफ़, मुलतान के पीरों, बाबा फ़रीद के उत्तराधिकारी
११२ पुस्तक प्रवेश
शेख़ बह्म ( इब्राहीम ) इत्यादि सूफ़ियों के साथ उसने बहुत दिनों तक
धर्म चर्चा किया । कबीर के समान नानक के मरने पर भी उसके हिन्दू
और मुसलमान शिष्यों में झगड़ा हुआ । अन्त में हिन्दुओं ने उसकी स्मृति
में एक समाधि बनाईं और मुसलमानों ने एक अलग क़ब्र, किन्तु दोनों
इमारतें रावी की बाढ़ में आकर बह गईं ।
नानक का धर्म भी एकता और प्रेम का धर्म था, उसकी सम्प्रदाय में
भी हिन्दु और मुसलमान दोनों शामिल हुए । नानक मक्के पहुँचा । वहाँ
पर मोहम्मद साहय के समान उसने एक .ख़ुदा का प्रतिपादन किया और
अपने को उसका 'ख़लीफ़ा' बताया—
ला इलाह इल्लल्लाह, गोविन्द नानक ख़लफ़ल्लाह ।*
यानी अल्लाह केवल एक है,वही गोविन्द है,नानक उसका ख़लीफ़ा है ।
नानक के पदों में भी संस्कृत, फ़ारसी और अरबी तीनों भाषाओं के
पदों की भरमार है। दोनों धर्मों की पृथकता को मिथ्या बताते हुए उसने
लिखा—
बन्दे इक .ख़ुदाय दे, हिन्दू मूसलमान,
दावा राम रसूल कर, लड़दे बेईमान ।
ना हम हिन्दू ना मूसलमान,
दोनों बिच्च बसे शैतान ।
एकै, एकी, एक सुभान,
- गुरु नानक की जन्मसाखी, न० ३६, पाकनामा ।
बंगाल में कम्पनी का छल-प्रपंच, प्लासी, बक्सर एवं द्वैध शासन की लूट
मानव धर्म ११३
गुरु जी कहिया सुन अब्दुर्रहमान ।
दावा भूलो ताँ इक्क पिछान ।
हिन्दू जपते राम राम, मूसलमान खुदाय,
इको राम रहीम है, मन में देखो लाय ।
यानी—हिन्दू मुसलमान दोनों एक ख़ुदा के बन्दे हैं, किन्तु दोनों
बेईमान, एक राम का और दूसरा रसूल का, झूठा दावा करके लड़ते हैं ।
हम न हिन्दू हैं और न मुसलमान, इन दोनों के दिलों में शैतान
बसा है। गुरु नानक कहते हैं, ऐ अब्दुर्रहमान ! सुनो, ईश्वर एक ही है,
मत मतान्तरों की हठ छोड़ दो, तब उस एक ईश्वर को पहचान सकोगे ।
हिन्दू राम राम जपते हैं, मुसलमान ख़ुदा कहते हैं, किन्तु यदि अपनी
आत्मा के अन्दर ध्यान से देखोगे तो मालूम होगा कि राम और रहीम
एक ही हैं।
एक दूसरे स्थान पर—
तग्ग न हिन्दू पाइया, तग्ग न मूसलमान ।
दोए भूले राह ते, ग़ालिब भया शतान ॥
जित दर लख्ख मोहम्मदाँ, लख ब्रह्मा बिश्न महेश ।
लख लख राम वडीरिएँ, लख राहें लख वैश ।
यानी— मार्ग न हिन्दू को मिला और न मुसलमान को—दोनों मार्ग
से भटक गए, दोनों पर शैतान ग़ालिब हो गया ।
११४ पुस्तक प्रवेश
मालिक के दर पर लाखों मोहम्मद, ब्रह्मा, विष्णु, महेश और राम खड़े
लाखों तरीक़े से स्तुति करते रहते हैं ।
मोहम्मद साहब की तरह नानक ने भी ईश्वर की इच्छा पर अपने
आपको पूरी तरह छोड़ देने का उपदेश दिया ।
गङ्गास्नान, तीर्थयात्रा, जप, पूजा पाठ इत्यादि को नानक ने फ़जूल
बताया, अठारह पुराण और चारों वेदों को निरर्थक बतलाया, प्रतिमा पूजा
का विरोध किया, कबीर के समान राम के अवतार का खण्डन किया, और
जाति भेद को मिथ्या और हानिकर बताया ।
ऊँच नीच के विचार के विरुद्ध नानक ने कहा है—
ज़ोर न कीजे किसी पर, उत्तम मधम न कोय,
हिन्दू मुसलमान नूं, दोहाँ नसीहत होय ।
नीचाँ अन्दर नीच ज़ात, नीचे हाँ अत नीच,
जित्थे नीच सम्हालिए, उत्थे नज़र तेरी बख़्शीश ।
नीचाँ अन्दर नीच ज़ात, सतगुरु रहे बोलाय ।
यानी—किसी पर ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए, कोई ऊँच नीच नहीं
है । हिन्दू और मुसलमान दोनों को यही नसीहत है ।
ईश्वर की बख़्शीश उन्हीं को मिलेगी जो नीचों से भी नीच को, और
सब से अति नीच को अपनाते हैं ।
सद्गुरु उन्हें बुलाते हैं, जो नीच से भी नीच जाति के समझे जाते हैं ।
मुसलमानों को उपदेश देते हुए नानक ने कहा—
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गुरु नानक
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मानव धर्म ११५
मेहर मसीत, सिद्क़ मुसल्ला, हक़ हलाल कुरआन,
शर्म सुन्नत, सील रोज़ा, होय मुसलमान ।
करनी काबा, सच पीर कलमा करम नेवाज़,
तसबीह सातिश भावसी नानक रक्खे लाज ।
यानी—दया को अपनी मसजिद बना, सच्चाई का मुसल्ला बना,
इन्साफ़ को अपनी कुरान बना, विनय को ख़तना समझ, सुजनता का रोज़ा
रख, तब तू सच्चा मुसलमान होगा । नेक कामों को अपना काबा बना,
सच्चाई को अपना पीर बना, परोपकार को कलमा समझ, ख़ुदा की मरज़ी
को अपनी तसबीह, तब ऐ नानक ! ख़ुदा तेरी लाज रक्खेगा ।
ठीक इसी तरह का उपदेश नानक ने हिन्दुओं को भी दिया ।
संयम और सदाचार पर नानक ने बहुत अधिक ज़ोर दिया है । अन्य
सूफ़ियों के समान नानक ने आत्मा की उन्नति के लिए गुरु को परमावश्यक
बताया है । सूफ़ियों की शरीयत, मारफ़त, उफ़्रवा और लाहूत के मुक़ाबले
में नानक ने धर्मखण्ड, ज्ञानखण्ड, कर्मखण्ड और सचखण्ड का उपदेश
दिया । इसमें कोई भी सन्देह नहीं कि नानक सूफ़ी साहित्य से पूरी तरह
परिचित था । उस साहित्य का उसने अपने पद्यों में भरपूर उपयोग किया
और उसी के आधार पर हिन्दू और मुसलमान दोनों को एक मालिक और
एक मार्ग का उपदेश दिया ।
मुग़ल साम्राज्य के अन्त के दिनों में, उस समय की शोकजनक परि-
स्थिति में नानक के अनुयाइयों ने बेहद पलटा खाया । वे नानक के
सार्वभौम सिद्धान्तों के अनुरूप न चल सके । किन्तु संसार के अधिकांश
११६ पुस्तक प्रवेश
महापुरुषों के सिद्धान्तों की उनके अनुयाइयों द्वारा उनके बाद इसी तरह
अवहेलना होती रही है ।
अन्य हिन्दू सन्त
कबीर और नानक के अलावा धन्ना जाट, पीपा, सेना नाई और रैदास
चमार इत्यादि महात्माओं के उपदेश भी ठीक इसी ढङ्ग के हैं। इन सबके
पद्यों और उपदेशों में सूफ़ी विचार, सूफ़ी शब्द और हिन्दू और इसलाम
धर्मों की एकता का ज़िक्र है । रैदास ने एक स्थान पर राम के अवतार से
साफ़ इनकार किया, उसके कोई कोई पद्य फ़ारसी भाषा में भी हैं। रैदास
ने ईश्वर को “सुलतानों का सुलतान” और अपने को उसका “शिकस्ता
बन्दा” बताया है, मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, जात पाँत इत्यादि का इन सब ने
विरोध किया है ।
दादू
कबीर के अन्य अनेक शिष्य देश के अनेक भागों में प्रसिद्ध हैं, जिनमें
एक मशहूर नाम अकबर के समय में दादू का था। कहते हैं कि सम्वत्
१६४२ में दादू की मुलाक़ात फ़तेहपुर सीकरी में सम्राट अकबर के साथ
हुई जिसमें अकबर ने सवाल किया कि ख़ुदा की ज़ात, अंग, वजूद और रंग
क्या है । दादू ने जवाब दिया—
इसक अलह की जाति है, इसक अलह का अंग ।
इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग ॥
यानी—प्रेम (इश्क़) अल्लाह की जाति है, प्रेम ही उसका शरीर है,
प्रेम ही उसका अस्तित्व है, और प्रेम ही उसका रंग है ।
मानव धर्म ११७
दादू के पाँच हज़ार पद्यों में से अनेक उर्दू में और कोई कोई अशुद्ध
फ़ारसी में हैं, मसलन्—
बे मेहर गुमराह ग़ाफ़िल गोश्त ख़ुरदनी,
बे दिल बदकार आलम हयात मुरदनी।
या—
कुल आलम यके दीदम अरवाहे इख्लास,
बद अमल बदकार दुई पाक याराँ पास।
दादू ने भी शरीयत और मारिफ़त इत्यादि पर दरजे बदरजे ज़ोर दिया
है। दादू लिखता है—
हौद हजूरो दिल ही भीतर, गुस्ल हमारा सारं ।
उजू साजि अलह के आगे, तहाँ निमाज गुजारं ॥
काया मसीत करि पञ्चजमाती, मन ही मुला इमामं ।
आप अलेख इलाही आगे, तहँ सिजदा करै सलामं ॥
सब तन तसबी कहै करीमं, ऐसा करले जापं ।
रोज़ा एक दूर करि दूजा, कलमा आपै आपं ॥
अठे पहर अलह के आगे, इकटग रहिवा ध्यानं ।
आपै आप अरस के ऊपर, जहाँ रहै रहमानं ॥
यानी—ऐ दादू, मालिक की मौजूदगी का तालाब दिल के अन्दर है,
उसी तालाब में मैं स्नान करता हूँ, अल्लाह के सामने वज़ू करके वहीं पर मैं
नमाज़ पढ़ता हूँ ।
दादू का शरीर उसकी मसजिद है, जमात के पञ्च उसके मन के अन्दर
११८ पुस्तक प्रवेश
हैं, वहीं पर उसका मुल्ला इमाम है, अलख ईश्वर को सामने खड़ा करके
वहीं पर वह सिजदा करता है और सलाम करता है ।
दादू अपने समस्त शरीर को तसबीह (माला) बना कर उस पर
‘करीम’ का नाम जपता है, उसका केवल एक रोज़ा है और वह स्वयं
अपना ‘कलमा’ है ।
इस तरह दादू अल्लाह के सामने एकाग्र होकर आठ पहर खड़ा रहता
है और अर्श के ऊपर ‘रहमान’ के रहने की जगह पहुंच जाता है ।
नीचे के पद्यों में दादू ने धार्मिक सङ्कीर्णता का विरोध, हिन्दू मुस्लिम
एकता का प्रतिपादन और एक सच्चे सार्वभौम धर्म का उपदेश दिया है ।
ज़ाहिर है कि सूफ़ियों से उसने भरपूर शिक्षा ग्रहण की थी । वह लिखता है—
सब घट एकै आतमा, क्या हिन्दू मूसलमान ।
अलह राम छूटा भ्रम मोरा ।
हिन्दू तुरक भेद कछु नाहीं, देखौं दरसन तोरा ॥
ब्रह्मा विस्नु महेस को कौन पन्थ गुरुदेव ।
महम्मद किसके दीन में, जबराइल किस राह ।
इनके मुर्शिद पीर को, कहिए एक अल्लाह ॥
ये सब किसके ह्वै रहे, यह मेरे मन माँहि ।
अलख इलाही जगत गुरू, दूजा कोई नाँहि ॥
मानव धर्म ११६
दोनों भाई हाथ पग, दोनों भाई कान।
दोनों भाई नैन हैं, हिन्दू मूसलमान॥
ना हम हिन्दू होहिंगे, ना हम मूसलमान।
षट दरशन में हम नहीं, हम राते रहिमान॥
हिन्दू लागे देहुरे, मूसलमान मसीत।
हम लागे इक अलख सों, सदा निरन्तर प्रीत॥
ना तहं हिन्दू देहुरा, ना तहं तुरक मसीत।
दादू आपे आप है, नहीं तहां रह रीत॥
यहु मसीत यहु देहुरा, सतगुरु दिया दिखाय।
भीतर सेवा बन्दगी, बाहरि काहे जाय॥
दून्यू हाथी द्वै रहे, मिलि रस पिया न जाय।
दादू आपा मेटिकर, दून्यू रहे समाय॥
' यानी हिन्दू या मुसलमान सब के घट में एक ही आत्मा है।
अल्लाह और राम एक है मेरा भ्रम दूर होगया, हिन्दू और मुसलमान
में कोई भेद नहीं है। सब में मुझे तू ही तू दिखाई देता है।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पन्थ क्या है, मोहम्मद का दीन क्या है,
जिबराईल का क्या मार्ग है, एक अल्लाह उन सब का पीर और मुर्शिद है।
दादू अपने दिल में जानता है कि वे सब किसके हैं, वही अलख इलाही
सारी दुनिया का गुरु है, उसके सिवा और कोई नहीं।
१२० पुस्तक प्रवेश
हिन्दू और मुसलमान दोनों भाई एक शरीर के हाथ और पैर हैं, दोनों
एक शरीर के दो कान हैं, दोनों भाई दो आँखें हैं ।
न हम हिन्दू होंगे और न मुसलमान, षट दरसन के मतभेद से हमें
कोई सम्बन्ध नहीं। हमें केवल रहमान से प्रेम है ।
हिन्दू देवालय में जाते हैं और मुसलमान मसजिद में । हमारा सम्बन्ध
केवल एक अलख से है। उसी से हमें सदा प्रीत है। हमारे धर्म में न हिन्दू
के देवालय की ज़रूरत है और न मुसलमान की मस्जिद की। न वहाँ
किसी कर्मकांड की ज़रूरत है। वहाँ सम्बन्ध केवल अपनी आत्मा से है ।
सतगुरू ने दिखला दिया है कि यह शरीर ही हमारी मसजिद है और
यही हमारा देवालय है। असली पूजा और नमाज़ अपने भीतर ही की जाती
है फिर लोग बाहर क्यों जाते हैं?
हिन्दू और मुसलमान अपने अपने झूठे अभिमान में दो हाथियों की
तरह एक दूसरे से लड़ रहे हैं। जब तक उनमें अपने अपने धर्म का यह झूठा
अभिमान है वे मिलकर सच्ची ईश्वर भक्ति का रस नहीं ले सकते । दादू ने
अपने इस आपे को मिटा दिया है। इसलिए दोनों मत उसके अन्दर
समा गए हैं ।
पण्डितों, मुल्लाओं, जातपाँत, मूर्तिपूजा, तीर्थस्थान, हज इत्यादि के
विषय में दादू के विचार ठीक वैसे ही थे जैसे कबीर के। पुनर्जन्म या आवा-
गमन के सिद्धान्त को दादू ने अलङ्कार की तरह माना है। गुरु को उसने
वेद और कुरान दोनों से बड़ा बताया है ।
मलूकदास
एक और प्रसिद्ध महात्मा मलूकदास अकबर के समय में सन् १५७४
मानव धर्म १२१
ईसवी में कड़ा, इलाहाबाद में पैदा हुआ और औरङ्गज़ेब के समय में सन्
१६८२ ईसवी में १०८ वर्ष की उम्र में मरा। उसके मठ नेपाल और काबुल
तक में मौजूद थे। उसके विचार मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा अन्य कर्मकाण्ड इत्यादि
के विषय में ठीक कबीर और दादू के से थे। परसेवा, सब धर्मों की एकता,
हिन्दू मुसलमानों के परस्पर प्रेम इत्यादि पर उसके बिचार हर तरह अपने
समय के अन्य महात्माओं के समान थे। वह लिखता है—
माला कहाँ औ कहाँ तसबीह,
अब चेत इनहिं कर टेक न टेकै।
काफ़िर कौन मलेच्छ कहावत,
सन्ध्या निवाज समै करि देखै।
है जमराज कहाँ जबरील है,
काजी है आप हिसाब के लेखै।
पाप औ पुण्य जमा कर बूझत,
देत हिसाब कहाँ धरि फेकै।
दास मलूक कहा भरमौ तुम,
राम रहीम कहावत एकै।
यानी—कहाँ माला और कहाँ तसबीह ! जागो और उनके भरोसे न
रहो, कौन काफ़िर और कौन म्लेच्छ ! वही सन्ध्या और वही नमाज़ । यम
कहाँ है और जिबराईल कहाँ पर है ! ख़ुदा ही आप क़ाज़ी है, और कोई
हिसाब नहीं रखता ।'वही सब के पाप पुण्य को समझता है और हिसाब
रखता है। मलूकदास ! तू कहाँ भूला है, राम और रहीम एक ही के नाम हैं।
१२२ पुस्तक प्रवेश
सत्तनामियों के बारह हुकुम
सत्तनामी सम्प्रदाय का संस्थापक बीरभान दादू का समकालीन था ।
सत्तनामी अपने को साध भी कहते हैं । बीरभान ने केवल एक ईश्वर का
उपदेश दिया, जिसका नाम उसने सत्तनाम रक्खा । सत्तनामी जात पाँत
और छुआछूत के खिलाफ हैं। वे एक दूसरे के साथ खाते पीते हैं, और आपस
ही में विवाह करते हैं । सत्तनामियों में तलाक़ की इजाज़त है, वे मूर्तिपूजा
के विरुद्ध हैं, ध्यान और सदाचार और मनुष्य मात्र की समता पर ज़ोर देते
हैं, मांस मदिरा का निषेध करते हैं । औरङ्गज़ेब के समय में ईश्वरदास
नागर ने सम्राट से इस बात की शिकायत की थी कि सत्तनामी हिन्दू और
मुसलमानों में किसी तरह का भेद नहीं करते । सत्तनामियों के 'आदि
उपदेश' में 'बारह हुकुम' दिए हुए हैं, जिनका सार इस तरह है—
(१) केवल एक ही ईश्वर को मानो, मिट्टी, पत्थर, लकड़ी या किसी
और बनी हुई चीज़ की पूजा न करो ।
(२) दीनता से रहो ।
(३) कभी झूठ मत बोलो, कभी किसी की निन्दा न करो, कभी चोरी
न करो, दूसरे की चीज़ को कभी लालच की निगाह से न देखो ।
(४) कभी बुरी बात न सुनो, सिवाय मालिक के भजनों के और कुछ
न गाओ ।
(५) ईश्वर पर विश्वास करो ।
(६) जात पाँत को मत मानो, किसी से बहस मत करो ।
(७) साफ़ कपड़े पहनो, किसी तरह का तिलक न लगाओ, और न
माला पहनो ।
मानव धर्म १२३
(८) तम्बाकू और मादक द्रव्यों से बचो । किसी मूर्ति के सामने सिर
मत झुकाओ ।
(६) किसी की जान मत लो, किसी को कष्ट मत पहुंचाओ ।
(१०) एक पुरुष के लिए केवल एक स्त्री और एक स्त्री के लिए केवल
एक पुरुष ।
(११) साधुओं की सङ्गत ही तीर्थ है । और
(१२) किसी तरह के अन्ध विश्वासों, नजूम, शकुन, इत्यादि को
न मानो ।
निस्सन्देह ये हुकुम उस समय के हिन्दू धर्म और इसलाम दोनों के
सर्वोच्च सिद्धान्तों को मिलाकर रचे गए थे ।
दाराशिकोह का गुरु बाबालाल
औरंगज़ेब के भाई दाराशिकोह का गुरु बाबालाल भी इसी तरह के
विचारों का मनुष्य था । दाराशिकोह और बाबालाल की बातचीत एक
फ़ारसी किताब 'नादिर-उन-निकात' में दर्ज है । बाबालाल ने अपने
सिद्धान्तों के समर्थन में जगह जगह फ़ारसी कवि हाफ़िज़ के हवाले दिए हैं ।
नारायनी सम्प्रदाय
इसी तरह उस समय की और भी अनेक सम्प्रदायों ने हिन्दुओं और
मुसलमानों को मिलाने की पूरी कोशिश की । नारायनी सम्प्रदाय में हिन्दू
और मुसलमान दोनों एक समान लिए जाते थे । ये लोग पूरब की तरफ़
मुँह करके दिन में पाँच बार ईश्वर प्रार्थना करते थे । उनके ईश्वर के नामों
में एक नाम अल्लाह भी था । वे अपने मुरदों को दफ़न करते थे, इत्यादि ।
१२४ पुस्तक प्रवेश
प्राणनाथ
औरंगज़ेब के अन्त के दिनों में प्राणनाथ और धरनीदास के नाम भी
मशहूर हैं। प्राणनाथ ने अपनी गुजराती पुस्तक 'कुलज़ुम सरूप' में वेदों
और क़ुरान दोनों से हवाले देकर दोनों के सिद्धान्तों की समानता दर्शाई
है। प्राणनाथ जाति भेद, मूर्तिपूजा और ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध था ।
उसके अनुयाइयों में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। और हर नए दीक्षा
लेने वाले को हिन्दू और मुसलमान दोनों के साथ बैठ कर भोजन करना
पड़ता था। यही उनकी दीक्षा थी। प्राणनाथ की एक ख़ास पुस्तक 'क़यामत
नामा' है, जिसमें उसने साफ़ लिखा है कि—"तुम सब का, चाहे हिन्दू
हो या मुसलमान, एक ईमान होना चाहिए।" इस पुस्तक में उसने यहूदी,
ईसाई, मुसलमान और हिन्दू सब के पीर, पैग़म्बरों और महात्माओं की
जीवनियाँ दी हैं और सब में मौलिक समानता दर्शाई है। ईश्वर के लिए
उसने अल्लाह और खुदा दोनों नामों का उपयोग किया है ।
अन्य प्रयत्न
जगजीवनदास, बुल्ला साहब, केशव, चरनदास, सहजोबाई, दयाबाई,
ग़रीबदास, शिवनारायन, रामसनेही इत्यादि के उपदेशों का भी ठीक यही
सार था । जगजीवन के शिष्यों में ब्राह्मण, ठाकुर, चमार और मुसलमान,
सब जातियों के लोग शामिल थे । बुल्ला साहब के उपदेशों में फ़ारसी के
शब्द और सूफ़ी परिभाषाएँ भरी हुई हैं । बुल्ला साहब और केशव दोनों,
दिल्ली के एक मुसलमान फ़क़ीर यारी साहब के शिष्य थे । मुसलमान
फ़क़ीरों के हिन्दू शिष्य और हिन्दू फ़क़ीरों के मुसलमान शिष्य उन दिनों
लाखों की तादाद में पाए जाते थे । सहजो और दयाबाई दोनों स्त्रियाँ थीं
मानव धर्म १२५
और चरनदास की शिष्य थीं। चरनदास ने मूर्तिपूजा का विरोध किया, गुरु
की महिमा और भक्ति का उपदेश दिया। ग़रीबदास कबीर का अनुयायी था,
उसके पद्यों में भी फ़ारसी के शब्द और सूफ़ी परिभाषाएं भरी हुई हैं।
रामसनेही सम्प्रदाय का संस्थापक रामचरन भी मूर्तिपूजा का कट्टर
विरोधी था। ये लोग भी दिन में पाँच मरतबा प्रार्थना करते थे और हर
जाति और हर मज़हब के लोगों को अपने में ले लेते थे। स्वामी नारायन
सिंह की क़ायम की हुई शिवनारायनी सम्प्रदाय में भी सब जाति और सब
मज़हबों के लोग लिए जाते थे। जब कोई शिवनारायनी मरता था तो
उसकी अन्तिम इच्छा के अनुसार उसके शरीर को दफ़न कर दिया जाता था,
या फूँक दिया जाता था और या दरिया में बहा दिया जाता था। मुग़ल
सम्राट मोहम्मदशाह स्वामी नारायनसिंह का शिष्य था। मोहम्मदशाह की
सहायता से यह सम्प्रदाय कुछ दिनों खूब फैली।
पिछले दो तीन सौ साल के अन्दर इनमें से अनेक सम्प्रदायों के रूप
में आकाश पाताल का अन्तर पड़ गया और कहीं कहीं उनके अनुयाइयों का
रहन सहन सम्प्रदाय के क़ायम करने वालों की इच्छा और उनके उपदेशों के
ठीक विपरीत साँचे में ढल गया, फिर भी सम्राट मोहम्मदशाह का दस्तख़ती
परवाना अभी तक शिवनारायनियों के मुख्य मठ बलिया ज़िले में मौजूद है।
अठारवीं सदी में सहजानन्द, दुलनदास, गुलाल, भीका और पल्टूदास
के नाम काफ़ी मशहूर हैं।
जगजीवन के शिष्य दुलनदास ने अपने पद्यों में मुसलमान सूफ़ियों
मनसूर, शम्स तबरेज़, निज़ामुद्दीन, हाफ़िज़, बूअली क़लन्दर और फ़रीद
१२६ पुस्तक प्रवेश
की खूब तारीफ़ें की हैं और ईश्वर को "अल्लाह ला मकाँ" बताया है । गुलाल,
भीका और पल्टूदास के कोई कोई पद्य कविता, भाव और भक्तिरस, तीनों
की दृष्टि से अत्यन्त उच्च कोटि के हैं। इन सब में सूफ़ी परिभाषाएँ भरी
हुई हैं। ख़ुदा को उन्होंने प्रायः 'हक़' (सत्य) कह कर पुकारा है।
पल्टूदास का एक पद है—
पूरब में राम है पच्छिम खुदाय है,
उत्तर औ दक्खिन कहो कौन रहता ।
साहिब वह कहाँ है, कहाँ फिर नहीं है,
हिन्दू औ तुरुक तोफ़ान करता ॥
हिन्दू औ तुरुक मिलि परे हैं खँचि में,
अपनी बर्ग दोउ दोन बहता ।
दास पलटू कहै साहिब सब में रहै,
जुदा ना तनिक मैं सांच कहता ॥
यानी—यदि राम पूरब में है और ख़ुदा पच्छिम में है, तब फिर उत्तर
और दक्खिन में कौन रहता है ? ख़ुदा कहाँ है और कहाँ नहीं है ? हिन्दू
और मुसलमान व्यर्थ तूफ़ान खड़ा करते हैं । हिन्दू और मुसलमान लड़ते'हैं
और दोनों मज़हबों को एक दूसरे के विरुद्ध खँचते हैं । दास पलटू सच
कहता है, ख़ुदा सब में है, वह हरगिज़ बटा हुआ नहीं है । यही सच है।
सत्यपीर की पूजा
जिस तरह उत्तर भारत में हिन्दू और मुसलमानों के धार्मिक मेल की
लहरें चल रही थीं, उसी तरह बङ्गाल और महाराष्ट्र में भी उनके अक्स
दिखाई देने लगे। बारहवीं सदी के बङ्गाल में हिन्दुओं का मुसलमानों की
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मानव धर्म १२७
दरगाहों में मिठाई चढ़ाना, कुरान पढ़ना, और मुसल्मानों के त्योहार
मनाना और इसी तरह मुसल्मानों का हिन्दुओं के धार्मिक रिवाजों की ओर
क्रियात्मक आदर दिखलाना एक आम बात थी। इसी मेल जोल में से
बङ्गाल के अन्दर एक नए देवता की पूजा शुरू हुई, जिसे 'सत्यपीर' कहते
थे। हिन्दू और मुसल्मान दोनों सत्यपीर की पूजा करते थे। कहा जाता है
कि गौड़ का बादशाह हुसेनशाह इस नई सम्प्रदाय का संस्थापक था।
निस्सन्देह सत्यपीर की पूजा सम्राट् अकबर के 'दीने इलाही' का एक
प्रारम्भिक रूप थी।
चैतन्य
पन्द्रवीं सदी के अन्त में बङ्गाल के अन्दर महाप्रभु चैतन्य का जन्म
हुआ। दिनेशचन्द्र सेन ने बङ्गला भाषा और बङ्गला साहित्य के इतिहास
पर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। उसमें वह लिखता है कि
चैतन्य के जन्म से पहले—
“ब्राह्मणों का प्रभुत्व बहुत कष्टकर हो गया था। कुलीनता
के पक्का होने के साथ साथ जाति भेद अधिकाधिक कड़ा होता
चला गया। ब्राह्मण लोग कहने के लिए अपने धर्म में ऊँचे आदर्शों
का प्रतिपादन करते थे, किन्तु जाति बन्धन के सबब मनुष्य
मनुष्य में अन्तर बढ़ता जा रहा था। नीची जातियों के लोग
ऊँची जातियों के लोगों के स्वेच्छाचार के नीचे आहें भर रहे थे।
इन ऊँची जाति के लोगों ने नीची जाति वालों के लिए विद्या के
दरवाज़े बन्द कर रक्खे थे। इन लोगों के लिए अधिक ऊँचे
जीवन में प्रवेश करने की मनाही थी और नए पौराणिक धर्म