भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
जिज्ञासु अरब ८५
ऊपर खींच चुके हैं, शेष भारतवासियों के विचारों, उनके धर्म, उनके साहित्य,
उनकी चित्रकारी, उनके विज्ञान, उनकी निर्माण कला, सारांश यह कि
समस्त भारतीय सभ्यता पर इस्लाम के नए विचारों का गहरा और अमिट
प्रभाव पड़ा। किन्तु इस प्रभाव को बयान करने से पहले यह आवश्यक है
कि हम मोहम्मद साहब के बाद की अरबों के अन्दर की नई धार्मिक लहरों
और उनकी सभ्यता के अन्य पहलुओं पर भी एक नज़र डाल लें ।
इस्लाम आरम्भ से ही एक ईश्वर का मानने वाला था। उसके सिद्धान्त
अत्यन्त सरल थे और पूजा विधि अत्यन्त सुसाध्य । फिर भी मोहम्मद साहब
की मृत्यु के थोड़े दिनों बाद से ही इस्लाम के अन्दर नई नई शाखें फूटने
लगीं। जिस तरह अरब नीतिज्ञों ने पूरब और पश्चिम में अपने साम्राज्य
को बढ़ाना शुरू किया, उसी तरह अरब विद्वानों और जिज्ञासुओं ने संसार
के चारों कोनों से दर्शन, विज्ञान और अनेक विद्याओं की खोज कर अपने
भण्डार को बढ़ाना शुरू किया ।
बौद्ध और हिन्दू ग्रन्थ अरबी में
ईसाई धर्म ग्रन्थों के अरबी में अनुवाद किए गए। सुक़रात, अफ़लातून
और अरस्तू जैसों के गूढ़ दर्शनशास्त्रों, और विज्ञान, वैद्यक, ज्योतिष
इत्यादि पर यूनानी ग्रन्थों के अरबी में अनुवाद किए गए। भारत के साथ
अरबों का घनिष्ठ सम्बन्ध पहले से था ही। भारतीय माल के साथ साथ
भारतीय संस्कृति और भारतीय विद्याओं का लेन देन भी शीघ्र ही शुरू हो
गया। शुरू के ख़लीफ़ाओं के दिनों में अनेक हिन्दू बसरा में ऊँचे ऊँचे पदों
पर नियुक्त थे ।* शाम, काशगर इत्यादि में हिन्दुओं की अनेक बस्तियाँ
- Jean Perier : Vie d'al Hadjdjadg Ibn Yusuf, p. 249-52.
८६ पुस्तक प्रवेश
थीं। खुरासान, अफ़गानिस्तान, सीसतान और बलूचिस्तान इसलाम मत
स्वीकार करने से पहले बौद्ध थे या हिन्दू। बलख़ में एक बहुत बड़ा बौद्ध
विहार था, जिसके बौद्ध मठाधीश अब्बासी ख़लीफ़ाओं के वज़ीर हुआ
करते थे।* बौद्धधर्म की सब मुख्य मुख्य पुस्तकों के अरबी में अनुवाद
किए गए। "किताबुल बुद्ध" और "बिल बहर वा बुदसिफ़" उन्हीं दिनों
की लिखी हुई अरबी भाषा में बौद्धधर्म की प्रामाणिक पुस्तकें हैं। इसी तरह
सुश्रुत, चरक, पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, चाणक्य इत्यादि अगणित संस्कृत
ग्रन्थों के अरबी में अनुवाद किए गए। विशेषकर बुद्ध के जीवन और उसके
सिद्धान्तों का अरब के मुसलमानों पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। धीरे धीरे
जिज्ञासु अरबों में तरह तरह के स्वतन्त्र विचार, नए नए दार्शनिक, और
नई नई सम्प्रदाएँ पैदा होनी शुरू हुईं। इसी परिस्थिति के अन्दर इसलाम
में अद्वैतवाद और सुप्रसिद्ध सूफ़ी विचारों का जन्म हुआ।
इसलाम में अद्वैतवाद
उन्हीं दिनों शिया मुसलमानों की 'गुलात' सम्प्रदाय के आचार्यों ने
अवतारवाद (हुलूल, तशबीह), आवागमन (तनास्रुख़) इत्यादि को
अपने सिद्धान्तों में स्थान दिया और यह प्रतिपादन किया कि मनुष्य की
आत्मा भी बढ़ते बढ़ते ख़ुदा के रुतबे तक पहुँच सकती है। 'अली इलाही'
सम्प्रदाय के लोगों ने एक से अधिक स्त्री के साथ विवाह और तलाक़ की
प्रथा दोनों को नाजायज़ क़रार दिया। मसजिद में जाना और शारीरिक
'शरई' पवित्रता को भी उन्होंने अनावश्यक बताया। अनेक सम्प्रदायों ने
क़ुरान के ज़ाहिरा अर्थों को न मान कर उसे अलङ्कार के रूप में मानना शुरू
- Nicholson : A Literary History of the Arabs, p. 259
किया। ❀ अव्यक्त, निर्गुणु ब्रह्म और सगुण ईश्वर में भेद किया जाने लगा ।
इस तरह की अनेक सम्प्रदायें क़ायम हुईं, जिनमें लोगों को विशेष 'दीक्षा'
देकर भरती किया जाता था । इनमें से कोई कोई सम्प्रदाय यह मानती थी
कि दीक्षित मनुष्य अभ्यास करते करते नबी और स्वयं ख़ुदा के रुतबे तक
पहुँच सकता है । गुरु (पीर) को ईश्वर और कहीं कहीं ईश्वर से भी बढ़
कर रुतबा दिया जाने लगा । मोतज़ली सम्प्रदाय के लोगों ने इस बात का
खुले प्रतिपादन किया कि क़ुरान सदा के लिए निर्भ्रान्त ईश्वर वाक्य नहीं
है, बल्कि मनुष्य जाति की उन्नति के साथ साथ हर मनुष्य की आत्मा के
अन्दर बराबर समय समय पर इलहाम होता रहता है'। अलग़िज़ाली
(१०५७-११५२) ने क़ुरान, शरीयत और मामूली मुसलिम कर्मकाण्ड से
असन्तुष्ट होकर संसार से पृथक तप (रियाज़त), अभ्यास (शग़ल) और
ध्यान (ज़िक्र) शुरू किया और अपनी आत्मा के अन्दर शान्ति अनुभव की।
इस तरह के आज़ाद ख़याल सूफ़ियों के अनेक मठ (ख़ानक़ाहें) क़ायम हुए,
जिनमें अद्वैत (वहदतुलवजूद) का उपदेश दिया जाता था, संयम (नफ़्सकुशी)
पर ज़ोर दिया जाता था और भक्ति (इश्क़) और योग (शग़ल) को मुक्ति
का एक मात्र मार्ग बताया जाता था । कवियों और वैज्ञानिकों में अनेक
तरह के अविश्वासी पैदा होने लगे, जो नबी और क़ुरान से इनकार करते
थे, दोज़ख़ और बहिश्त और रोज़े और नमाज़ का मज़ाक़ उड़ाते थे और
सगुण ईश्वर के अस्तित्व को तर्क विरुद्ध बतलाते थे, यहाँ तक कि ख़लीफ़ा
यज़ीद (मृत्यु सन् ७४४) को भी इन्हीं नास्तिकों में गिना जाने लगा। प्रसिद्ध
विद्वान और महात्मा अबुल अला अलमआरी (मृत्यु सन् १०५७) के विचारों
- Frielhander : Heterodoxies of Shiites. J. A. O. S. No, 23 and 29.
८८ पुस्तक प्रवेश
पर बुद्ध के विचारों की छाप साफ़ दिखाई देती है। अबुल अला आत्मा के
आवागमन में विश्वास करता था, कड़ा निरामिषभोजी था, यहाँ तक
कि दूध और शहद या चमड़े के उपयोग को भी पाप मानता था, प्राणिमात्र
के साथ दया का उपदेश देता था, आहार और वस्त्रों में अत्यन्त परहेज़गार
था और ब्रह्मचर्य को आत्मा की उन्नति के लिए आवश्यक बताता
था, मसजिद, नमाज़, रोज़े और दिखावटी मज़हब का वह बड़ा विरोधी
था।* अपने एक पद में वह लिखता है—
“ला इलाह इल्लल्लाह ! सच है, किन्तु जो मनुष्य कि अँधेरे
में भी उस स्वर्ग को खोजता है, जो स्वर्ग मेरे अन्दर और तुम्हारे
अन्दर मौजूद है, उसकी अपनी आत्मा के सिवा कोई दूसरा रसूल
भी नहीं है।”
अबुलअला संसार को माया मानता था ।
उमरख़य्याम के स्वतन्त्र विचार प्रसिद्ध हैं। रतजगे करना, लम्बे लम्बे
उपवास रखना, और कई तरह के नियम और तप सूफ़ियों ने मोहम्मद
साहब की ज़िन्दगी से सीखे, किन्तु सूफ़ियों के सिद्धान्तों पर ईसाई मत,
प्राचीन ईरान के ज़रथुस्त्री मत और भारतीय हिन्दू और बौद्धमतों इन सब
की छाप भी साफ़ दिखाई देती थी। मोहम्मद साहब ने संसार से पृथक रहने
को मना किया था, किन्तु उनके अनुयाइयों में आरम्भ से ही इस तरह के
लोग पैदा हो गए थे जिनका सिद्धान्त संसार से भागना ( अलफ़िरारो
मिनददुनिया ) था। कट्टर मौलवियों और इन आज़ाद ख़याल सूफ़ियों में
बराबर झगड़ा चला आता था, फिर भी सैकड़ों साल तक हज़ारों और
- Baerlein : Abul-Ala, the Syrian.
लाखों मनुष्य चारों ओर से आ आकर इन सूफ़ियों की ख़ानक़ाहों में जमा
होते थे और इसमें कोई सन्देह नहीं कि उस ज़माने के मुसलमानों के
जीवन और विचारों पर इनका बहुत गहरा प्रभाव था ।
महात्मा मन्सूर का नाम संसार भर में प्रसिद्ध है । मन्सूर ने
भारत की भी यात्रा की थी । उसका मुख्य सिद्धान्त और वाक्य "अनल
हक़" था, जिसका ठीक वही अर्थ है जो 'अहं ब्रह्म' का है। अपने आज़ाद
ख़यालों के सबब से ही मन्सूर को क़ैद किया गया और सन् ६२२ ईसवी में
यातनाएँ दे देकर सूली पर चढ़ा दिया गया । कबीर, दादू, नानक और
अन्य भारतीय महात्माओं के वचनों में मन्सूर के वाक्य के वाक्य इधर से
उधर तक भरे हुए हैं। मन्सूर सबको खुदा मानता था और हर तरह की दुई
को धोखा बतलाता था । क़ुदरती तौर पर इस अद्वैतवाद ने उस समय के
असंख्य मुसलमानों में सब मज़हबों की एकता और एक दूसरे की ओर
उदारता के विचार भी पैदा किए। सूफ़ियों के साहित्य में योगाभ्यास के
मुक़ामात, समाधि, सत्सङ्ग की महिमा, गुरु के महत्व, प्राणायाम इत्यादि का
खूब ज़िक्र आता है और भक्ति के उन्माद में गाने, बजाने और नाचने की
तारीफ़ की गई है । शेख़ बदरुद्दीन के विषय में, जो तेरहवीं सदी में भारत
में आकर रहने लगा था, लिखा है कि जब वह इतना बूढ़ा हो गया था कि
हिल डुल न सकता था तब भी हरि कीर्तन की आवाज़ पर वह तुरन्त अपने
बिस्तरे से कूद कर जवान मनुष्य की तरह नाचने लगता था । जब उससे
पूछा जाता था कि इस निर्बल अवस्था में शेख़ कैसे नाच सकता है तो वह
जवाब देता था, "शेख़ कहाँ है ? इश्क़ नाच रहा है ।" *
- Blochman and Jarrett : Ayeen-i- Akbari, vol, iii, p. 368.
६० पुस्तक प्रवेश
निस्सन्देह सूफ़ियों का मार्ग भक्तिमार्ग था, उनका सिद्धान्त अद्वैत
था, इश्क उनकी पूजा थी और ब्रह्म में लीन होकर तद्रूप हो जाना उनकी
निजात (मोक्ष) थी।
दक्षिण में धर्म सुधार की लहरें
ईसा की आठवीं सदी से पहले भारत की धार्मिक अव्यवस्था का
ज़िक्र हम ऊपर कर चुके हैं। बौद्ध मत समाप्त हो चुका था और शैव मत,
वैष्णव मत और शाक्त मत ने उसकी जगह ले ली थी। बौद्ध मत
के उच्च सदाचार और मनुष्यमात्र की समता के सिद्धान्तों के स्थान पर
फिर से असंख्य देवी देवताओं, मत मतान्तरों, कर्मकाण्ड, जात पाँत, ऊँच
नीच और हज़ारों अन्य पाखण्डों ने अपना साम्राज्य जमा लिया था। मदुरा
के जैन राजा ने जब शैव प्रचारक तिरुज्ञान के उपदेश से जैन मत त्याग
कर शैव मत स्वीकार किया और मदुरा की शेष प्रजा ने जैन मत को छोड़ने
से इनकार किया तो राजा ने तिरुज्ञान की सलाह से अनेक जैनों को
फाँसी पर लटकवा दिया। धर्म के नाम पर इस तरह के अत्याचार उस
समय जैनों और बौद्धों के ऊपर जगह जगह सुनने में आते थे। ऐसी
हालत में उन हज़ारों मुसलमान फ़क़ीरों और सूफ़ियों के सिद्धान्तों और
उनके चरित्र का भारतीय जनता पर हितकर प्रभाव पड़ना, जो शुरू की
सदियों में अधिकतर दक्खिन और पश्चिम में आकर बसे, एक स्वाभाविक
घटना थी। अनेक हिन्दू विद्वानों के चित्तों में भी उस समय अपने देश की
जटिल धार्मिक स्थिति को सुलझाने की चिन्ता उत्पन्न हुई। एक दूसरे के बाद
शङ्कर, रामानुज, निम्बादित्य, वासव, वल्लभाचार्य, माधव इत्यादि अनेक
सन्त, महात्मा भारत के दक्खिन में पैदा हुए, जिन्होंने अपने अपने ढङ्ग से
जिज्ञासु भारत ६१
अपने दुखित देशवासियों को फिर से शान्ति, प्रेम और आशा का सन्देश
सुनाया।
इसलाम का प्रभाव
शुरू से लेकर ईसा की आठवीं सदी तक भारत में जितने धार्मिक और
सामाजिक सुधार के आन्दोलनों ने जन्म लिया, वे प्रायः सब उत्तर ही से
शुरू हुए। किन्तु आठवीं सदी के समय से यह एक नई बात देखने में आती
है कि इस तरह के आन्दोलनों को जन्म देने का श्रेय उत्तर के स्थान पर
अब दक्खिन को मिलने लगा। आठवीं से पन्द्रहवीं सदी तक दक्खिन
भारत का यह बड़प्पन क़ायम रहा। शङ्कर, रामानुज, निम्बादित्य
वासव, वल्लभाचार्य और माधव सब दक्खिन के रहने वाले थे। इसका एक
सबब निस्सन्देह यह था कि उन दिनों अधिकांश मुसलमान सन्त, सूफ़ी
और दरवेश दक्खिन और पच्छिम में ही जाकर बसते थे। इन भारतीय
आचार्यों के उपदेशों और सिद्धान्तों पर इसलाम की साफ़ छाप दिखाई
देती है। एक विद्वान इतिहासज्ञ लिखता है—
“इसलाम के अनुयाइयों की उपस्थिति ने जाति भेद,
आत्मिक जीवन और ईश्वर के अस्तित्व इत्यादि विषयों पर लोगों
को विचार करने के लिए उत्तेजित किया।”*
इतिहास लेखक बार्थ लिखता है—
“अफ़ग़ानों, तुरकों या उनके सहधर्मी मुग़ल विजेताओं
- " The presence of the followers of Islam stimulated thought on such
subjects as caste, spiritual birth and the personality of God."—Kabir and
Kabir Panth, by H. G. Westcott, London, 1907, p. 45.
३२ पुस्तक प्रवेश
के इस देश में आने से बहुत पहले खिलाफ़त के अरब लोग
यात्रियों के रूप में इन तटों पर पहुँच चुके थे और देशवासियों
के साथ तिजारत का सम्बन्ध और मेल जोल पैदा कर चुके थे ।
अब देश के ठीक इन्हीं हिस्सों में नवीं सदी से लेकर बारहवीं
सदी तक वे ज़बरदस्त धार्मिक तहरीकें शुरू हुईं जो शङ्कर,
रामानुज, आनन्दतीर्थ और वासव के नामों के साथ सम्बन्ध
रखती हैं। ऐतिहासिक सम्प्रदायों में से अधिकांश इन्हीं तहरीकों
से पैदा हुईं और बहुत दिनों तक हिन्दोस्तान में इनसे मिलती
जुलती और कोई चीज़ न थी।"*
थोड़ी सी सरसरी तुलना से मालूम हो सकता है कि उस समय के
क़रीब क़रीब सब हिन्दू आचार्यों ने अपने समय के इसलाम से काफ़ी
विचार लिए ।
अब हम आठवीं सदी से लेकर पन्द्रहवीं सदी तक के मुख्य मुख्य
भारतीय आचार्यों और महात्माओं के उपदेशों की इसलाम और सूफ़ियों
के उपदेशों के साथ थोड़ी सी तुलना करते हैं। हमारा हरगिज़ यह
मतलब नहीं है कि इन महात्माओं ने जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन
किया, वे सब किसी न किसी रूप में या कम से कम बीज रूप में भारत
के उससे पहले के धार्मिक साहित्य में मौजूद न थे, इसमें भी सन्देह
नहीं कि ख़ासकर शङ्कर जैसे विद्वानों ने अधिकतर भारत के प्राचीन ज्ञान
भण्डार से ही अपनी ज्ञान पिपासा को तृप्त किया और उसी
आधार पर अपने शेष देशवासियों को ठीक मार्ग पर लाने का प्रयत्न किया।
- Barth: Religions of India.
जिज्ञासु अरब १३
फिर भी नीचे की तुलना से यह स्पष्ट हो जायगा कि कम से कम उस
समय इन आचार्यों ने बहुत दरजे तक इसलाम से अपने सिद्धान्तों में
सहायता और पुष्टि प्राप्त की, और एक दरजे तक भारत ही के अनेक
प्राचीन विचारों ने अरब और ईरान से टक्कर खाकर एक नए वेश और
पुनरुज्जीवित रूप में फिर भारत के अन्दर प्रवेश किया।
सब से पहले हमारा ध्यान शङ्कराचार्य की ओर जाता है। शङ्कराचार्य
ने बौद्ध मत के विरुद्ध उस समय की अनेक हिन्दू सम्प्रदायों को मिला कर
उन्हें दार्शनिक नींव और एक सुन्दर व्यवस्थित रूप देने का ज़बरदस्त
प्रयत्न किया। शङ्कर ने अपने से पहले के हिन्दू धर्म में अनेक नवाचार
किए। उसने सब वर्गों के लोगों के लिए सन्यास की दीक्षा को जायज़
क़रार दिया। 'मनुष्य-पञ्चक' में उसने एक स्थान पर लिखा है— "कोई
भी तत्वदर्शी मनुष्य मेरा सच्चा गुरु है, चाहे वह द्विज हो और चाहे
चाण्डाल।" वैष्णव और शैव आचार्यों ने अनेक स्थानों पर शङ्कर का कड़ा
विरोध किया। शङ्कर का अद्वैतवाद निस्सन्देह भारतीय था, किन्तु उस
समय के मुसलमान सूफ़ियों के अद्वैतवाद के साथ उसमें गहरी समानता
थी। कम से कम शङ्कर से पहले भारत में किसी ने भी अद्वैतवाद को इस
तरह का रूप न दिया था। इसलाम के कठोर एक ईश्वरवाद और शङ्कर
के अद्वैतवाद में भी थोड़ी सी समानता अवश्य है। शङ्कर के समय में
इसलाम भारत में पहुँच चुका था। लिखा है कि जिस प्रदेश में शङ्कर का
जन्म हुआ था, वहाँ का हिन्दू राजा तक इसलाम मत स्वीकार कर चुका
था ।*
- Fawcett : Anthropology, Bulletin, vol. iii, No. I.
५४ पुस्तक प्रवेश
रामानुज और अन्य आचार्यों के उपदेशों में एक ईश्वरवाद पर ज़ोर,
भक्ति का उन्माद, प्रपत्ति, गुरुभक्ति, जातिभेद का ढीलापन, इत्यादि
अनेक बातें इसलाम के साथ मिलती हुई हैं। इनमें से अनेक विद्वानों के
ग्रन्थों में अनेक मुसलमान सूफ़ियों के ग्रन्थों के साथ कहीं कहीं आश्चर्य-
जनक समानता दिखाई देती है।
लिङ्गायत सम्प्रदाय की स्थापना बारहवीं सदी के क़रीब हुई। वासव,
चन्न वासव और एकान्त रमय्या तीनों आचार्य इस सम्प्रदाय के संस्थापक
माने जाते हैं। लिङ्गायत सम्प्रदाय एक शैव सम्प्रदाय है। लिङ्गायत लोग
एक ईश्वर (परशिव) को मानते हैं। अपने गुरु 'अल्लमा प्रभु' को वे
ईश्वर का अवतार मानते हैं। मुसलमानों के 'चार पीरों' के समान वे
भी चार आराध्य मानते हैं। दीक्षा के नियम बिलकुल वैसे ही हैं जैसे
सूफ़ियों में। लिङ्गायत लोग जातिभेद को नहीं मानते। पैरिया ठीक
उसी तरह उनकी सम्प्रदाय में लिया जा सकता है जिस तरह ब्राह्मण।
दोनों में कोई अन्तर नहीं माना जाता। विवाह में कन्या की रज़ामन्दी
आवश्यक समझी जाती है। बाल विवाह की मनाही है। तलाक़ की इजाज़त
है। विधवाओं को पुनर्विवाह की इजाज़त है। मुर्दे बजाय फूँकने के दफ़न
किए जाते हैं। श्राद्ध इत्यादि नहीं किए जाते। लिङ्गायत लोग आवागमन
के सिद्धान्त को नहीं मानते। सब लिङ्गधारी एक दूसरे के साथ खा पी
सकते हैं, विवाह सम्बन्ध कर सकते हैं। ये लोग अपने को 'जङ्गम' या
'वीर शैव' भी कहते हैं। बेलगाम, बीजापुर और धारवाड़ ज़िलों में ३५
फ़ीसदी और मैसूर और कोल्हापुर रियासतों में १० फ़ीसदी आबादी लिङ्गायतों
की है। निस्सन्देह लिङ्गायतों के सिद्धान्तों में अनेक बातें ऐसी हैं जो इसलाम
मुसलमानों का यहाँ बस जाना ५५
में पाई जाती हैं, और उससे पहले की किसी भी भारतीय सम्प्रदाय में
नहीं थीं । 'अल्लम' और अल्लाह शब्द भी निस्सन्देह एक दूसरे से मिलते
हुए हैं ।
इसी तरह सिद्धर सम्प्रदाय के लोगों ने एक ईश्वर को माना, आवागमन
के सिद्धान्त से इनकार किया, वेद और शास्त्रों के प्रमाण को अस्वीकार
किया, मूर्तिपूजा को निन्दनीय ठहराया, जाति भेद को झूठा माना, सत्गुरु
की आवश्यकता पर ज़ोर दिया, इत्यादि । इन लोगों के ग्रन्थों में इसलाम
के शब्द और सूफ़ियों की परिभाषाएँ स्थान स्थान पर पाई जाती हैं ।
मुसलमानों का यहाँ बस जाना
भारतीय जीवन के अनेक पहलुओं पर इसलाम और मुसलमानों के
प्रभाव से थोड़ी देर के लिए हट कर अब हम यह देखना चाहते हैं कि मोहम्मद
बिन. क़ासिम के बाद भारत पर मुसलमानों के कौन कौन से हमले हुए,
मुसलमानों की हुकूमत इस देश में किस तरह क़ायम हुई और किस तरह
बाहर से आने वाले मुसलमान भी इसी देश में बस गए ।
महमूद ग़ज़नवी
सिन्ध पर मोहम्मद बिन क़ासिम के हमले के तीन सौ साल बाद मह-
मpackage/मूद ग़ज़नवी के हमलों का समय आया । ग़ज़नी के शासक महमूद ने कुछ
नगरों को बरबाद किया, कुछ हिन्दू नरेशों के साथ सुलह करके उन्हें सुर-
६६ पुस्तक प्रवेश
क्षित छोड़ दिया, कुछ मन्दिरों को लूटा, और कहा जाता है सोमनाथ पर
हमला करके वहाँ की मूर्ति को तोड़ा और लूट का बहुत सा माल लेकर
ग़ज़नी वापस चला गया। सोमनाथ पर महमूद ग़ज़नवी के हमले की
सच्चाई के विषय में भी प्रामाणिक इतिहासज्ञों में ज़बरदस्त मतभेद है।
महमूद के चरित्र के अनेक गुणों की भी अनेक इतिहास लेखक मुक्त-कण्ठ
से प्रशंसा करते हैं।* किन्तु यह सब बहस हमारे प्रसंग से बाहर है।
इसमें सन्देह नहीं कि महमूद की सेना में हज़ारों सिपाही हिन्दू थे, उसका एक
प्रसिद्ध सेनापति हिन्दू था, जिसका नाम तिलक था और जिसने एक बार
महमूद के एक मुसलमान सेनापति के विद्रोह को दमन किया था। जो कुछ
भी हो महमूद के हमलों का कोई स्थायी असर भारत पर न रह सकता था।
महमूद के हमलों का मूल्य ज़्यादा से ज़्यादा एक धन लोलुप आक्रामक के
हमलों से अधिक नहीं कहा जा सकता। इस देश पर उसका प्रभाव भी
क्षणभङ्गुर था।
मोहम्मद गोरी
सौ साल बाद तुरकों ने अफ़गानिस्तान के ग़ोरी राजकुल को दबाना
और खदेड़ना शुरू किया, जिसके फलस्वरूप मोहम्मद ग़ोरी को भारत पर
हमला करने के लिए क़रीब क़रीब विवश होना पड़ा। मोहम्मद ग़ोरी के
समय से पञ्जाब पर भी मुसलमानों का शासन जम गया। मोहम्मद ग़ोरी
के भारत आने के समय तक भारत की राजनैतिक अव्यवस्था हद को पहुँच
गई थी। तेरहवीं सदी तक उत्तर भारत पर मुसलमानों का राज जम गया।
- Medieval Hindu India, by C. V. Vaidya vol iii, p. 104. and
History of Medieval India, by Ishwari Prashad, p. 91
राजपूत नरेशों ने अलग अलग ख़ासी वीरता के साथ मुक़ाबला किया।
किन्तु उनमें किसी तरह का ऐक्य या नीतिज्ञता बाक़ी न रह गई थी। इसके
बाद सौ साल के अन्दर मैसूर तक अधिकांश भारत पर मुसलमानों की
हुकूमत क़ायम हो गई।
विदेशी और स्वदेशी
ज़ाहिरा देखने में भारतीय जीवन को एक बार गहरा धक्का पहुँचा।
किन्तु जिन मुसलमानों ने बाहर से आकर भारत पर हमला किया वे फिर
भारत में बस गए और भारत ही के होकर रह गए। भारत पर मुसलमानों
की हुकूमत क़ायम होने से पहले जो लाखों भारतवासी इस्लाम धर्म
स्वीकार कर चुके थे, उनके सबब और उस आदर के सबब जो, जैसा हम
दिखा चुके हैं, अधिकांश भारतवासियों के चित्त में इस्लाम की ओर पैदा
हो चुका था, इन बाहर से आने वाले मुसलमानों को भारत के अन्दर
बसने और मिल जुल जाने में काफ़ी सुगमता हुई। एक नस्ल के अन्दर ही
वे पूरी तरह भारतवासी बन गए। उन्हें देशवासियों के हित में अपना हित
और उनके सुख में अपना सुख दिखाई देने लगा। भारत को उस अन्धकार
मय युग में एक प्रधान राजनैतिक शक्ति की आवश्यकता थी। जिन मुसल-
मानों ने विदेशी रूप में इस देश पर हमला किया था, उन्होंने स्वदेशी और
भारतीय बन कर भारत की इस आवश्यकता को बड़ी सुन्दरता के साथ
पूरा किया।
हम कभी किसी भी व्यक्ति या क़ौम के दूसरे व्यक्ति या क़ौम पर हमला
करने को जायज़ क़रार नहीं देते। किसी भी विदेशी हमला करने वाले के
सामने सिर झुका देना या विदेशी सेना से पराजित हो जाना किसी
७
६८ पुस्तक प्रवेश
भी देश के लिए यशस्कर नहीं कहा जा सकता। किन्तु इसके साथ ही
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि कोई जाति विशेष किसी देश
विशेष का ठेका लेकर पृथ्वी पर नहीं उतरी। सच यह है कि बहुत दरजे
तक मानव समाज का जातियों या देशों में बटवारा एक कृत्रिम बटवारा
है। मानव समाज एक विशाल कुटुम्ब है, जिसका घर पृथ्वी है। आजकल
के राष्ट्रीयता के भाव भी जो मानव समाज की आजकल की स्थिति में
हर देश के जीवित रहने के लिए एक दरजे तक आवश्यक प्रतीत होते हैं,
वास्तव में एक अनिवार्य रोग ही हैं। इस विषय को अधिक विस्तार देना भी
हमारे इस समय के प्रसङ्ग से बाहर है। फिर भी हम इतना अवश्य कहेंगे
कि कोई मनुष्य किसी देश के अन्दर विदेशी केवल उस समय तक ही कहा
जा सकता है, जब तक कि वह उस देश की सीमाओं से बाहर किसी दूसरे
देश को अपना घर मानता हो, या उस पहले देश से धन बटोर कर दूसरे
देश को ले जाता हो। किन्तु जिस समय कोई मनुष्य किसी देश को अपना
घर बना लेता है, वहीं पर बस जाता है, देशवासियों के सुख में अपना
सुख और दुख में अपना दुख समझने लगता है, तो फिर चाहे वह किसी
भी धर्म का मानने वाला हो, अच्छे आचरण का हो या बुरे आचरण का,
उसे विदेशी नहीं कहा जा सकता।
अंगरेज़ों के आने से पहले तक अधिकांश समय में अफ़ग़ानिस्तान
भारत का एक प्रान्त था। फिर भी यदि अफ़ग़ानिस्तान को भारत से बाहर
मान लिया जाय तो महमूद ग़ज़नवी के हमले भारत पर विदेशी हमले थे।
मुहम्मद बिन क़ासिम का सिन्ध पर हमला निस्सन्देह विदेशी हमला था।
मोहम्मद ग़ोरी का भारत पर हमला भी विदेशी हमला था। किन्तु जो
मुसलमानों का यहाँ बस जाना ६६
मुसलमान ईरान या अफ़ग़ानिस्तान से आकर एक बार भारत में बस गए,
उनकी हुकूमत किसी तरह विदेशी हुकूमत नहीं कही जा सकती । तेरहवीं
सदी के अन्त से लेकर सोलवीं सदी के शुरू तक ढाई सौ साल का समय
लगातार संग्रामों का समय था। इसके बाद भारत पर केवल मुग़लों का
हमला बाक़ी रह जाता है । जिस बाबर ने तुर्किस्तान से आकर भारत पर
हमला किया वह विदेशी था। पानीपत के मैदान में सन् १५२६ ईसवी में
स्वदेशी और भारतीय इब्राहीम लोधी ने विदेशी बाबर का मुक़ाबला
किया । इब्राहीम लोधी हार गया । बाबर हिन्दोस्तान में बस गया । मुग़ल
साम्राज्य भारत में क़ायम हो गया ।
मुग़ल साम्राज्य से भारत को क्या लाभ हुआ या क्या हानि हुई, यह एक
दूसरे स्थान का विषय है । यहाँ पर हमें केवल यह दिखाना है कि जिस तरह
इस्लाम एक बार भारत में आकर भारत की अनेक सम्प्रदायों में से एक
सम्प्रदाय बन गया, उसी तरह मुसलमान हमलेआवर एक बार भारत में
बस कर अन्य भारतवासियों के समान भारतबासी बन गए । भारत पर
मुसलमानों के शासन के समय की बेशुमार मिसालें इस बात की मिलती
हैं जब कि भारत के मुसलमान शासकों ने बाहर से हमला करने वाले
मुसलमानों का वीरता के साथ मुक़ाबला किया, या स्वयं भारत की सीमा
से बाहर निकल कर बाहर के मुसलमान देशों को विजय किया, उन्हें अपने
भारतीय साम्राज्य का एक अंग बनाया और कभी कभी भारत के हिन्दू
नरेशों को वहाँ का शासक नियुक्त किया ।
अपने धार्मिक विचारों के सबब से भी कोई मनुष्य किसी देश में विदेशी
नहीं कहा जा सकता । धार्मिक आज़ादी हर सभ्य देश का एक आवश्यक
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गुण है, और भारत ने अपने पिछले हज़ारों साल के इतिहास में इस गुण
को अन्य देशों की अपेक्षा ख़ासी सुन्दरता के साथ निबाहा है।
यदि स्वदेशी और विदेशी की इस परिभाषा को स्वीकार न किया जाय
तो भारत, इंगलिस्तान, जरमनी, फ़्रान्स या संसार का कोई भी देश इस
समय ऐसा नहीं है, जो पूरी तरह विदेशियों से बसा हुआ न हो। फिर न
इंगलिस्तान के एङ्गलो सेक्सन वहां के असली बाशिन्दे माने जा सकते हैं
और न जर्मनी या हिन्दोस्तान के 'आर्य' जिन्हें अपने देशों का इस समय
ख़ासा गर्व है। सच यह है कि जिस बाबर ने पानीपत में इब्राहीम लोधी
को परास्त किया वह बाबर विदेशी था, किन्तु जिस बाबर ने दिल्ली में अपना
साम्राज्य क़ायम करके तातार और ईरान से अपना सम्बन्ध सदा के लिए
तोड़ कर भारत को अपना देश बना लिया वह बाबर भारतवासी था। बाद
के मुग़ल सम्राटों में से किसी सम्राट की किसी नीति विशेष का कोई नतीजा
चाहे भारत के लिए हितकर रहा हो या अहितकर, चाहे सम्राट अकबर के
समान उनमें से किसी ने हिन्दू और मुसलमानों को एक दृष्टि से देखा हो,
या चाहे औरङ्गज़ेब के समान किसी तरह के भी भेद भाव द्वारा अपने शासन
को बदनाम किया हो, फिर भी वे सब सम्राट भारतवासी थे और उनका
साम्राज्य स्वाधीन भारतीय साम्राज्य था।
मानव धर्म
हम फिर भारत की उस समय की धार्मिक लहरों की ओर आते हैं।
रामानुज के धार्मिक विचारों और उसके भक्तिमार्ग को दक्खिन से
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गोस्वामी तुलसीदास
[ श्री बहादुर सिंह जी सिंघी, कलकत्ता, की कृपा द्वारा, नवाब मुर्शिदाबाद
के यहां की एक फ़ारसी हस्त लिखित रामायण के समकालीन चित्र से ]
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उत्तर में लाकर उनके प्रचार करने का कार्य रामानन्द ने किया। रामानन्द
ने विष्णु के स्थान पर राम की भक्ति का उपदेश दिया और हर जाति
के लोगों को अपनी सम्प्रदाय में शामिल किया। मैकॉलिफ़ लिखता है
कि—"इसमें कोई सन्देह नहीं कि बनारस में विद्वान मुसलमानों
के साथ रामानन्द की भेंट हुई।" रामानन्द के शिष्यों और अनुयाइयों
में अनेक मुसलमान भी थे। दो नाम उसके शिष्यों में सबसे अधिक
प्रसिद्ध हैं, एक तुलसीदास और दूसरा कबीर। गोस्वामी तुलसीदास की
रामायन सारे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। तुलसीदास का मोहावरा अवधी है।
फिर भी संस्कृत, फ़ारसी, और अरबी तीनों के शब्द भण्डारों से अपनी
पुस्तक को अलंकृत कर एक ऐसी सरल और सर्वप्रिय हिन्दोस्तानी भाषा को
रचने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास को प्राप्त है जिसमें ऊँचे से ऊँचा साहित्य
लिखा जा सका। हिन्दोस्तानी ज़बान के बनाने वालों में गोस्वामी तुलसी-
दास का नाम सदा के लिए स्मरणीय रहेगा।
कबीर
निस्सन्देह कबीर की शुमार भारत के महान से महान तत्वदर्शियों,
धर्माचार्यों और समाज सुधारकों में की जानी चाहिए। कबीर एक अत्यन्त
स्वतन्त्र विचार का महापुरुष था। वह मत मतान्तरों के भेद और हर तरह
के कर्मकाण्ड और रूढ़ियों का कट्टर विरोधी था। हिन्दुओं और मुसलमानों
की एकता का इस देश के अन्दर वह सब से पहला प्रचारक और सब से
महान समर्थक था। उसका जन्म सन् १३६८ ईसवी में हुआ और मृत्यु
सन् १४१८ ईसवी में। कहा जाता है कि कबीर किसी विधवा ब्राह्मणी के
गर्भ से उत्पन्न हुआ था। बनारस के एक मुसलमान जुलाहे नीरू और
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उसकी स्त्री ने कबीर का पालन पोषण किया। बनारस में रह कर कबीर
हिन्दू और मुसलमान दोनों मतों के सिद्धान्तों से पूरी तरह परिचित हो
गया। मोहसिन फ़ानी लिखता है कि कबीर ने लड़कपन ही में अनेक हिन्दू
और मुसलमान विद्वानों और सन्तों से भेंट की। बहुत दिनों वह जौनपुर,
झूँसी इत्यादि में शेख़ तक़ी और अन्य मुसलमान सूफ़ियों और पीरों के
के साथ रहा, जिनका ज़िक्र कबीर साहब ने अपनी 'रमैनी में किया है।
इसके बाद कबीर ने बनारस में अपना सत्सङ्ग शुरू कर दिया। कबीर के
विचार इतने स्वतन्त्र थे कि शुरू में मुसलमान मौलवी और हिन्दू पण्डित
दोनों उससे बेहद नाराज़ हुए। इन लोगों, ने हर तरह से कबीर को कष्ट
पहुँचाने और दिक़ करने की कोशिश की। अन्त में हिन्दू और मुसलमान
दोनों जातियों में से कबीर के हज़ारों अनुयायी हो गए। जीवन भर कबीर
ने अपने पिता का काम यानी कपड़े बुनने का धन्धा नहीं छोड़ा। हिन्दुओं
में यह एक बात सदा से प्रसिद्ध रही है कि काशी में मरने से मनुष्य को
मुक्ति प्राप्त होती है। इसके विपरीत कहा जाता है कि गोरखपुर से १५ मील
पच्छिम में मगहर में मरने वाले को गधे की योनि में जन्म लेना पड़ता है।
कबीर ने अन्त समय निकट आने पर जान बूझ कर इस प्राचीन अन्ध-
विश्वास की अवहेलना प्रकट करने के लिए काशी से मगहर के लिए प्रस्थान
किया और मगहर ही में अपने हज़ारों हिन्दू और मुसलमान अनुयाइयों
की मौजूदगी में चोला छोड़ा। कहा जाता है कि कबीर के मरने के बाद
उसके कुछ हिन्दू और मुसलमान अनुयाइयों में झगड़ा हुआ, हिन्दू उसे
हिन्दू कहते थे और उसके शरीर को जलाना चाहते थे, मुसलमान उसे
मुसलमान मान कर दफ़न करना चाहते थे।