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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६१
वाको कीन्हो गुरू हियेमें धारिकै ।
मन हरिचरणन पास रखूं निर्धारिकै ॥
दृष्टि मना अरु बुद्धि जहां जु लगाइया ।
ऐसो कहिये ध्यान विरल कहूँ पाइया ॥
दो० ध्यान करै दृग मूंदि करि, जो कोई नर नार ।
खटका सुनि पलकैं खुलैं, मन चल वारंवार ॥
अष्टपदी ॥
वह नहिं कहियत ध्यान जु खुलि खुलि जात है ।
निश्चल लागै ध्यानजु पूरी बात है ॥
ध्याता ध्यान के बीच ध्यान ध्येय माहिं है ।
तीनौ एकहि होहिं विघ्न कछु नाहिं है ॥
मन हरिचरणन पास कायाकी सुधि नहीं ।
भूखप्यास कछु नाहिं ध्यान लागत तहीं ॥
मन गयो औरै ठावैँ ध्यान जो लाइये ।
सो वह डिगि डिगि जाय न थिरता पाइये ॥
जब नारायण साथ मगन मन है-गयो ।
सबकारज गयो भूलि कछू सुधि ना रह्यो ॥
जैसे भाषत लोय समाधी पुरुष को ।
दिन बीतैं दश बीस नहीं सुधि बुधि कहूँ ॥
कहिये यही समाधि वासना सब जरैं ।
कोटिन मध्ये एक ध्यान एसो धरैं ॥
सोई चरणको दास सोई योगीश है ।
सोइ साधक सोइ सिद्ध जु विस्वेबीस है ॥
दो० ध्यानी ध्यान लगायकै, रहै राम लवलाय ।
आपा बिसरै हरिमिलैं, बहुरि न उपज आय ॥

२६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी ॥
तनकी सुधि बिसराय कछू सुधि ना रहे ।
या विधिसे जो करै ध्यान ताको कहै ॥
हलचल ध्यान जो करै सो हरिसों ना मिलै ।
अफल ध्यान सोइहोय जो मनक्षणक्षणचलै ॥
तीर बनावनहार गुरू हमने कियो ।
ताते यह उपदेश हिये माहीं लियो ॥
ऐसे मन को साधि प्रभू चरणन धरै ।
ह्वांहीं रहै चितलाय जु इतउत ना फिरै ॥
बाइसवों गुरु सांप हमारो जानिये ।
ताते लीन्ही सीख यही पहिचानिये ॥
सदा अकेलो रहै कबौं घर ना करै ।
रैनि जहाँ कहुँ होय वहीं वह बसि रहै ॥
वाकी देखी रहनि जु मनमें लाइया ।
सदारहूँ निर्बंध न मन्दिर छाइया ॥
उपजो मोह न लोभ लगे नहिं दाग है ।
चरणहिंदासा भयो द्वेष नहिं राग है ॥
दो० बँधा जु पानी गांदला, चलता निर्मल होय ।
दोनों रीति विचारिकै, भलो होय सो लोय ॥
तेइसवों मकरी गुरू, उगलि तार भखि जाय ।
ऐसे जग परकाश करि, प्रभुले आप लुकाय ॥
अष्टपदी ॥
तेइसवों गुरु जान हमारो माकरी ।
आप सों काढै तार रहै वामो खरी ॥
फिरि वह तार समेटि लेय उरमें धरै ।

यों हरिलीला जानिय कौतुक सो करै ॥
वसुधाको उपजाय करै पालन जभी ।
फिरि सब लेय मिलाय आप माहीं तभी ॥
जैसे मकरी तारसों जाल बनाइया ।
फिरि आपन वा बीचमें सहज समाइया ॥
जब चाहै वह जाल उदरमें लै धरै ।
मच्छी जाल में फँसै सो नहीं ऊबरै ॥
भाषैं दत्तात्रेय मुक्ति जो चाहिये ।
हरि उतपति क्षय करन शरनमें आइये ॥
जन्म मरण भयमानि भक्ति में पागिये ।
जगके जालसों छूटि वेगिही भागिये ॥
लीजै त्यागि वैराग चरणहीं दास हो ।
हरियश हरिगुण गाय तजो जग वासहो ॥
दो० भृङ्गी मिलि भृङ्गी भवै, सुनो हतो यह बैन ।
अब मन आई सांचही, देखा अपने नैन ॥
अष्टपदी ॥
चौबिसवों गुरु कियो जु भृङ्गी जानिकै ।
वासों निश्चय भई हिये में आनिकै ॥
सुनीहती यह बात जु कोई हरिभजै ।
निशिदिन मन ह्वां लायकै प्रभुसेवा सजै ॥
सो नारायणरूप आप ह्वै जात है ।
यामें संशय नाहिं सांच यह बात है ॥
मन ठहरत ना हुती ये बात सुहावनी ।
सेवक जो कोइ होय सो क्यों होवै धनी ॥
भृङ्गी को हम लखो कीट इक आनिकै ।

२६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राखो उन गृह माहिं आपनो जानिकै ॥
आपन बाहर बैठि ताहि सम्मुख कियो ।
केतक दिवसन माहिं व भृङ्गी करि लियो ॥
भृङ्गी रूपको देखिकै भृङ्गी ह्वै गयो ।
ताते भृङ्गी गुरू हमारे मल छयो ॥
जैसे करै कोइू ध्यान सो वा सम होतहै ।
नहींरहै चरणदास रहै ब्रह्मज्योतिहै ॥
दो० चौबीसौ पूरेकिये, समझिसमझिकरि देखि ।
विरक्त ह्वै जग में रहूं, लगै न माया रेखि ॥
फिरि अपनी कायालखी, रही न जासों प्रीति ।
थके जु इन्द्री स्वाद ही, सहज गई सबरीति ॥
अष्टपदी ॥
भाषैं दत्तात्रेय गुरू इक देह है।
पहिले मोको होतो अधिक सनेहमै ॥
देखो क्षण क्षण देह क्षीण ह्वै जातही ।
नित उठि सुखके काज भला कुछ खातही ॥
बहुत चाव करि आप भलो भोजन कियो ।
दूजे दिन वहि भांति घनोही दुख दियो ॥
इकदिन बस्तर विमल बनाये लायकै ।
फिरि बस्तरके काज फिरूं दुख पायकै ॥
जितनो कियो उपाय काया सुखकाजही ।
कबहूं सुख ना भयो फिरत बेलाजही ॥
इकदिन एक उपाय जु सुखको धारिया ।
दूजेदिन वहि दुःख बहुत विस्तारिया ॥
और लखी यह बात यह काया आपनी ।

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६५
अपनीही होव नाहिं विचारीही धनी ॥
मूरख जानै नाहिं सुयाही भेद को ।
होव ना चरणदास सहै बहु खेद को ॥
दो० बालपने अरु तरुणमें, और बुढ़ापे माहिं ।
तीनो पनमें देह यह, कबहुँ अपनी नाहिं ॥
अष्टपदी ॥
बालकपनमें हाथ बाप अरु मायकै ।
तरुणापन में फँसै त्रिया कर जायकै ॥
वृद्ध अवस्था माहिं पुत्रके हाथहीं ।
पुनि जब मृतकहोय अगिनि जारै तहीं ॥
जो थोंहीं रहिजाय पशू आदिक भखैं ।
देह न अपनी होय ज्ञान मांही लखैं ॥
वादिन ते सुखकाज नहीं श्रमधारिया ।
परालब्ध जो आय उदरमें डारिया ॥
कायाते इककाज भलो पुनि होत है ।
हरि की प्रापत होय जु ज्ञान उदोत है ॥
मृत्यु जबहिं होयजाय य काया ना रहै ।
भारे कैसो गेह जीव काया लहै ॥
जबहीं आवै काल नहीं ठहरायगो ।
खर्चे जो बहु द्रव्य न क्षण रहि जायगो ॥
जबहीं समुझो ज्ञान देहको जीय में ।
भयो विरक्त विचार आपने हीय में ॥
लई सीख चौबीस देहहित त्यागिकै ।
कीन्हो हरिको ध्यान बहुत अनुरागिकै ॥
२१

३८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दत्तात्रेय ये बचन कहे बहु चावसों ।
पुनि तीर्थन को गये भक्तके भावसों ॥
राजा सुनि यह ज्ञान हिये में धारिया ।
हरिसों सुरति लगाय सकल दुख टारिया ॥
चरणहिं दासा होय परमसुखही लियो ।
तन को जगमें राखि जु मन हरिको दियो ॥
दो० दत्तात्रेयी ने कहे, जो राजा से वैन ।
सो मैं भाषा में कियो, समझो पावो चैन ॥
अष्टपदी ॥
चौबीसों के माहिं होय उपदेशदै ।
सतगुरु वाहि उबारि किये सब दूरि भै ॥
उन्हीं के परताप चौबीसौ समझही ।
आई घटके माहिं जु उज्ज्वल बुद्धिही ॥
चौबीसौ तनधारि जु अंग बताइया ।
जासों भयो कल्याण अधिक सुख पाइया ॥
ऐसे हैं गुरुदेव ये निश्चय जानिये ।
सकल विकल सब छोड़ि गुरुही मानिये ॥
गुरुही के परसाद मिलैं नारायणा ।
जन्म मरण बँध छूटि होय पारायणा ॥
समरथ श्री गुरुदेव शीशपर राखिये ।
भवसागर की व्याधि सकलही नाखिये ॥
कहैं मुनी शुकदेव चरणहींदास को ।
वही जु पावै चौथे परमनिवास को ॥
दो० गुरु समान तिहुँलोक में, और न दीखै कोय ।
नाम लिये पातक नशैं, ध्यान किये हरिहोय ॥

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६७
गुरुही के परताप सों, मिटै जगत की व्याध ।
राग दोष दुख ना रहै, उपजै प्रेम अगाध ॥
गुरुके चरणन में धरो, चित बुधि मन अहंकार ।
जब कछुआपा ना रहै, उतरै सबही भार ॥
मन विरक्त के करन को, कीन्हो गुटका सार ।
पढ़ै सुनै चितमें धरै, भवसागर हो पार ॥
इति श्रीचरणदासकृतमनविरक्तकरणगुटकासारसम्पूर्णम् ॥
अथ श्रीस्वामीचरणदासजीकृत
ब्रह्मज्ञानसागरप्रारम्भः ॥
००००००००
दो० जैसे हैं शुकदेव जी, जानत सब संसार ।
भगवत मत परगट कियो, जीव किये बहु पार ॥
तिन मोपै किरपा करी, दियो ज्ञान विज्ञान ।
सो सिप तुमसों कहतहौं, छूटै सब अज्ञान ॥
शिष्य सुनौ अब कहतहौं, परम पुरातन¹ ज्ञान ।
निगुरै² को नहिं दीजियो, ताके तपकी हान ॥
कुण्डलिया ॥
मोक्ष मुक्ति तुम चहतहौ तजौ कामना काम ।
मनकी इच्छा मेटकरि भजौ निरंजन नाम ॥
भजौ निरंजन तत्त्व देह अध्यास मिटावो ।
पंचनके तज स्वाद आपमें आप समावो ॥
जब छूटे झूठी देह जैसेके तैसे रहिया ।
चरणदास यही मुक्ति गुरूने हमसे कहिया ॥
१ पुराना २ जो किसी का मन्त्र न लियेहो ॥

२६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
दो० देह मरै तू है अमर, पारब्रह्म है सोय।
अज्ञानी भटकत फिरै, लखै सो ज्ञानी होय ॥
देह नहीं तू ब्रह्म है, अविनाशी निर्वान।
नित न्यारो तू देहसों, देह कर्म सब जान ॥
डोलन बोलन सोवना, भक्षण करन अहार।
दुख सुख मैथुन रोग सब, गर्मी शीत निहार ॥
जाति वरण कुल देहकी, सूरति मूरति नांव।
उपज विनशै देह सों, पांच तत्त्वको गांव ॥
पावक पानी वायु है, धरती अरु आकास।
पांचतत्त्व के कोट में, आय कियो तैं वास ॥
पांच पचीसौ देह सँग, गुण तीनों हैं साथ।
घट उपाधि सों जानिये, करत रहें उतपात ॥
तामस अरु हिंसा १ करै, वचन चलन विपरीति।
आलस अरु निन्दाकरै, तामसगुण की रीति ॥
डिंभ कपट छल छिद्र बहु, खोटे सब व्यवहार।
झूठ वचन ऐंठो रहै, तामस के गुण धार ॥
मान बड़ाई नामना, सिद्धि चहैं भजि राम।
भोजन नाना स्वादके, राजसगुण के काम ॥
खेल तमाशे राजसी, अरु सुगन्धकी वास।
आपनको ऊंचों गिनै, औरनकी कर हास ॥
दया क्षमा आधीनता, शीतल हिरदय धाम।
सत्य वचन गुण सात्त्विकी, भजन धर्म निहकाम ॥
दुखी न काहू कों करै, दुख सुख निकट न जाय।
समदृष्टी धीरज सदा, गुण सात्त्विकको पाय ॥
१ मारना ॥

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । २६६
राजस सों तामस बढ़ै, तामस सों बुधि नास।
रजगुण तमगुण छांड़िकै, करो सतोगुण वास ॥
सतगुणमें मन थिरकरो, करि आतम सों नेह।
आतम निर्गुण जानिये, गुण इन्द्री सँगदेह ॥
सात्त्विक राजस तामसी, त्रैगुण ते संसार।
तीन पांचको नाशहै, माया ब्रह्म विचार ॥
अहंतत्त्व ॐ भयो, जिनते तीनौ देव।
जिनके परे जु आतमा१, अगम अगोचर२ भेव ॥
उपजै सो माया सभी, विनशि नेकमें जाय।
छल मायासों कहतहैं, सपनो सकल बिहाय ॥
निराकार३ अद्वै अचल४, निर्वासी५ तू जीव।
निरालम्ब६ निर्वैर सो, अज७ अविनाशी सीव ॥
जिह्वा इन्द्री नीरकी, नभकी८ इन्द्री कान।
नासा इन्द्री धरणिकी, करि विचार पहिंचान ॥
त्वचासो इन्द्री वायुकी, पावक इन्द्री नैन।
इनको साधै साधु जो, पद पावै सुख चैन ॥
निद्रा संगम आलकस, भूख प्यास जो होय।
चरणदास पांचौ कही, अग्नितत्त्वसों जोय ॥
रक्त बिन्दु कफ तीसरो, मेद मूत्रको जान।
चरणदास प्रकृति यह, पानीसों पहिंचान ॥
चाम हाड़ नाड़ी कहौं, रोमजान अरु मांस।
पृथिवीकी प्रकृति यह, अन्त सबनको नास ॥
१ सच्चिदानन्दस्वरूपी यस्तिष्ठति स आत्मा २ जो दृष्टि में न आवै
३ जिसका आकार नहीं है ४ जो चल न सकै ५ जिसका कहीं वास नहीं
६ जिसको किसी वस्तुकी चाह नहीं ७ जो जन्म नहीं लेता ८ आकाश ॥

३०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बलकरना अरु धावना, उठना अरु संकोच ।
देह बढ़ै सो जानिये, वायु तत्त्व है शोच ॥
काम क्रोध मोह लोभ भय, तत्त्व आकाश को भाग ।
नभकी पांचौ जानिये, नित न्यारो तू जाग ॥
रोम गगन नाड़ी पवन, मांस अग्नि को अंश ।
त्वचा नीर सौं जानिये, अस्थि¹ मही को वंश ॥
कफ आकाश बिंदु वायुसों, रक्त अग्निसों बूझ ।
मूत्र नीर रणजीत भन, मेद महीसों सूझ ॥
नीर व्योमसपरशँ² पवन, आलस अग्नि पिछान ।
ध्यास नीर रणजीतमन, भूख महीसों जान ॥
उठना तौ आकाश सों, बल करना है वाय ।
बढ़नि अग्निधावन उदक³, संकोचन महिआय ॥
लोभ जु नभकाअंशहै, काम वायुका भाग ।
क्रोध अग्नि जल मोहहै, भय पृथ्वीका लाग ॥
पांच पचीसौ एकही, इनके सकल स्वभाव ।
निर्विकार तू ब्रह्म है, आप आपको पाव ॥
निराकार निर्लिप्त तू, देही जान अकार ।
आपन देही मान मत, यही ज्ञान ततसार ॥
शस्तर छेदि सकै नहीं, पावक सकै न जारि ।
मरै मिटै सो तू नहीं, गुरुगम भेद निहारि ॥
जलै कटै काया यही, बनै मिटै फिरि होय ।
जीवऽविनाशी नित्य है, जानै बिरला कोय ॥
जरा मरण धर्म देह को, भूख प्यास धर्म प्रान ।
सकल विकलमन जानिये, स्वाद सुइंद्री जान ॥
१ हाड़ २ छूना ३ जल ॥

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०१
आंख नाक जिह्वा कहूं, त्वचा जान अरु कान ।
पांचौ इन्द्री ज्ञान हैं, जानै संत सुजान ॥
जो जो इनसों जानिये, निश्चय ना ठहराय ।
कहै सुनै चाखै लखै, सो सोई मिटिजाय ॥
इन्द्री जानि सकै नहीं, मन बुधि लहै न ताय ।
ज्ञानदृष्टि पहिचानिये, वासों वाको पाय ॥
गुदा लिंग मुख तीसरो, हाथ पाँव लखि लेह ।
पांचौ इन्द्री कर्म हैं, यह भी कहिये देह ॥
देह मिटत है स्वप्न ज्यौं, जीव रहत है नित्त ।
देहकर्म बिसराय करि, आतमसों करि हित्त ॥
मन जीतै इन्द्री गहै, चित्त अस्थिर जब होय ।
आतम सों परचो रहै, राखै सुरति समोय ॥
पृथ्वी काल जे ठौर है, गुदै जानिये द्वार ।
पीरो रंग पहिचानिये, पीवन खान अहार ॥
जलको वासा भाल¹ है, लिङ्ग जानिये द्वार ।
मैथुन कर्म अहार है, रंग सफेद निहार ॥
पित्ते में पावक रहै, नैन जानिये द्वार ।
लालरंग है अग्नि को, मोह लोभ आहार ॥
पवन ना²भि में रहत है, नासा जानिये द्वार ।
हरो रंगहै वायु को, गन्ध सुगन्ध अहार ॥
अकाश शीशमें वास है, सरवन दुवारे जान ।
शब्द कुशव्द अहार है, ताको श्याम पिछान ॥
कारण सूक्ष्म लिंग है, अरु कहियत अस्थूल ।
शरीर तीनसों जानिये, मैं मेरी जड़मूल ॥
१ माथ २ तोंदी ॥

३०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाग्रत का अस्थूलहै, स्वप्ने लिंग शरीर ।
कारण जान सुषोपती, तुरिया साक्षी वीर ॥
जाग्रत स्वप्न सुषोपती, तुरी अवस्थ विचार ।
परा पश्यन्ती मध्यमा, वैखरी -वाणी चार ॥
जाग्रत वासा नैन में, स्वप्न कण्ठ अस्थान ।
जान सुषोपत्ति हिये में, नाभि तुरिय मनतान ॥
नाभि मध्य वाणी परा, हिये पश्यन्ती सुक्ख ।
कंठ मध्यमा जानिये, कहूं वैखरी मुख्य ॥
चितबुधिमन अहंकार जो, अन्त:करण सुचार ।
ज्ञान अग्नि सों जारिये, आतमतत्त्व विचार ॥
जलसों मन निश्चय कियो, भयो वायुसों चित्त ।
अहंकार भो अग्निसों, बुधि पृथ्वी सों मित्त ॥
शब्द स्पर्शरु गंधहै, अरु कहियत रसरूप ।
देह कर्म तनमात्रा, तू कहियत निहरूप ॥
शब्दा गुण आकाश का, सपरस गुण है वाय ।
पृथ्वीका गुण गंध है, सो यह प्रकट दिखाय ॥
रूप अग्निका गुण कहूं, रसगुण जलका जान ।
रणजीतबतावै खोलिकरि, ये शिष ले पहिंचान ॥
सरवन मुख इन्द्री भई, तत्त्वाकाश सों दोय ।
त्वचा हाथ इन्द्री युगल, वायुतत्त्व सों होय ॥
पावक सों इन्द्री युगल, भये नैन अरु पावँ ।
जलसों जो इन्द्री भई, लिंग रसना१ दो नावँ ॥
गुदा नासिका दो भई, पृथ्वी सों पहिंचान ।
चरणदास यों कहतहैं, एक कर्म इक ज्ञान ॥
१ जीभ ॥

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०३
राजस सों इन्द्री भई, तामस सों तत्त्व पांच ।
सात्त्विक सों चारौ भये, चरणदास कहैं सांच ॥
तीनौ गुणसे है परे, सो आतम को रूप ।
सो वह दृष्टि न आवई, अगम अगोचर भूप ॥
दश इन्द्री तत्त पांच है, तन्मात्रा भी पांच ।
चारौ अन्तःकरण हैं, ये चौबीसौ बांच ॥
पन्द्रह कों अस्थूल है, नौको लिंग शरीर ।
कारण झीनी वासना, तुरिया निर्मल धीर ॥
जाग्रत में चौबीस हैं, स्वप्ने में नौ जान ।
सुषुप्ति में सब लीन है, ये अँग जड़के मान ॥
तुरिया इकरस आतमा, निर्मल अचल अनाद ।
घटै बढ़ै उपजै नहीं, तहां न वाद विवाद ॥
घटै बढ़े उपजै मिटै, जड़को यही स्वभाव ।
सो सब कौतुक कररही, नाना किये उपाव ॥
चेतन ज्यों को त्यों सदा, सदा अकर्त्ता जोय ।
सब कर्मन सों रहित है, आतम ऐसो होय ॥
काहू ते उपजौ नहीं, वाते भयो न कोय ।
वह न मरै मारै नहीं, राम कहावै सोय ॥
योगयुगतकरि खोजि ले, सुरतिनिरति करिचीन ।
दशप्रकार अनहद बजै, होय जहां लवलीन ॥
तीन बंध नौ नाड़िका, दश बाई को जान ।
प्राणअपान समान है, और कहत उदान ॥
व्यानवायु अरु किरकिरा, कूरम बाई जीत ।
नाग धनंजय देवदत्त, दश बाई रणजीत ॥
नवो द्वारको बंधकरि, उत्तम नाड़ी तीन ।

३०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
इड़ा पिंगला सुषमना, केलि करै परबीन ॥
करतै प्राणायाम के, पावै आतम भेख ।
अनहद ध्वनि के बीचमें, देखै शब्द अलेख ॥
पूरक करि कुंभक करै, रेचक पवन उतार ।
ऐसे प्राणायाम करि, सूक्ष्म करै अहार ॥
धरती बन्ध लगाय करि, दशौ वायु को रोक ।
मस्तक प्राण चढ़ायकै, करै अमरपुर भोग ॥
पांचौ मुद्रा साधिकै, पावै घट को भेद ।
नाड़ी शक्ति चढ़ाइये, षटौ चक्रको छेद ॥
नासाध्यान दृष्टिभ्रुकुटी में, सुरति श्वासके माहिं ।
आतम देखो जातहै, यामें संशय नाहिं ॥
योगयुक्ति कै कीजिये, कै आतम को ध्यान ।
आपा आप विचारिये, परम तत्त्व को ज्ञान ॥
शूद्र वैश्य शारीर है, ब्राह्मण और रजपूत ।
बूढ़ा बाला तू नहीं, चरणदास अवधूत ॥
काया माया जानिये, जीव ब्रह्म है मित्त ।
काया छुटि सूरति मिटै, तू परमातम नित्त ॥
पाप पुण्य आशातजौ, तजौ मान अरु थाप ।
काया मोह विकारतजि, जपै सु अजपा जाप ॥
आप भुलानो आपमें, बँधो आपही आप ।
जाको ढूंढ़त फिरतहौ, सो तुम आपहि आप ॥
इच्छा दुई बिसारिकै, क्यों न होय निर्वास ।
तूतो जीवन्मुक्त है, तजौ मुक्तिकी आस ॥
आपा खोजै आपलखि, आप अपनको देख ।
चरणदास तुहि ब्रह्महै, तूही पुरुष अलेख ॥

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०५
जैसे कछुवा सिमिटिकै, आपहि माहिं समाय ।
तैसे ज्ञानी श्वासमें, रहै सुरति लवलाय ॥
सबघट रमो सो राम है, आदि पुरुष निर्गम्य ।
लखचौरासी योनिमें, एक समानो सम्य ॥
दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, रूप न देखो जाय ।
बिन सूरति बिननामको, घट घट रहो समाय ॥
छप्पय ॥
इच्छा दुइकर दूर आप तू ब्रह्म ह्वै जावै ।
और सो द्वितिया कौन तासुको शीश नवावै ॥
माला तिलक वनाय पूर्व अरु पश्चिम दौरा ।
नाभि कमल कस्तूरि हिरण जंगल भो बौरा ॥
चरणदास लखि दृष्टि भरि एक शब्द भरपूरहै ।
निरखि परखिले निकटहीं कहन सुननकोदूरहै ॥
झूठी सी यह दृष्टि जगत सब झूठो दरशै ।
मूरख जानै सत्य तासुसों फिर फिर परशै ॥
चंद सूर थिर नहीं नहीं थिर पौन न पानी ।
त्रैदेवा* थिर नहीं नहीं थिर मायारानी ॥
नवनाथचौरासीसिद्धजोचरणदास थिर ना रहे ।
ब्रह्म सत्य सर्वज्ञहै आत्म विचार क्यों ना गहै ॥
दो० जो मुख सेती बोलिये, अरु सुनियत है कान ।
जो आंखिन सों देखिये, सबही माया जान ॥
एकै सबतन रमि रह्यो, चेतन जड़के माहिं ।
मायादर्शत है सभी, ब्रह्म लखतहै नाहिं ॥
जैसे तिलमें तेलहै, फूल मध्य ज्यों बास ।
*ब्रह्मा, विष्णु, महेश ॥

३०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दूध मध्य ज्यों घीवहै, लकड़ी मध्य हुंतास १॥
थावर जंगम चर अचर, सबमें एकै होय ।
ज्यों मनको मैं डारि है, बाहर नाहा कोय ॥
एकडोरि मनका गुहै, अवरण वरण निहारि ।
आतम तौ निहरूप है, नित्य अनित्य विचारि ॥
माया यही स्वभावहै, उदय होय छिपि जाय ।
चंचल चपल सुहावनी, ओलं २ ज्यों गलिजाय ॥
परमातम तौ नित्यहै, ताको आदि न अन्त ।
सदाअचल चंचल नहीं, सब गुण रहत अनन्त ॥
सत चेतन आनन्दहै, आदि अन्त मधि हीन ।
आदि अन्त आकारको, सो तू झूठो चीन ॥
सुरति नाम आकारहै, ज्यों भूतनको नाच ।
मृगतृष्णाको नीर है, निकट गये नहिं सांच ॥
चितवत सांचीसी लगै, खोज किये मिटिजाय ।
दीखै है पर है नहीं, कौतुक सो दरशाय ॥
शिष्यवचन ॥
ब्रह्म बिना खाली नहीं, धरबेको इक पावँ ।
मायाको कहाँ ठौरहै, सत गुरु मोहिं बताव ॥
निर्विकार तौ ब्रह्म है, अद्वै अचल अपार ।
आई माया कहांते, सतगुरु कहौ विचार ॥
गुरुवचन ॥
आप ब्रह्म माया भयो, ज्यों जल पाला होय ।
पाला गलि पानी भयो, ऐसे नाहीं दोय ॥
झूठी माया सो कहैं, ज्ञानी पंडित लोय ।
१ अग्नि २ पत्थर ॥

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । '३०७
भर्मभूल सांची लगै, समझै सांच न होय ॥
सोने को गहनो गढ़ै, कहन सुननको दोयं ।
गहनो ना सोनो सबै, नेक जुदो नहिं होय ॥
झूठ सांच दो नावहै, झूठ मिटै इक सांच ।
नाम मिटै सूरत मिटै, भूषण को लग आंच ॥
जाको माया कहतहैं, सो तू नेक निकास ।
जैसे हींग कपूरकी, नेक जुदी कर बास ॥
जल समान तो ब्रह्महै, माया लहर समान ।
लहर सबै वह नीरहै, लहर कहै अज्ञान ॥
खेल खिलौना खांड़के, कीजै लाख पचास ।
सकल खिलौना खांड़है, ऐसे गहि विश्वास ॥
चरणदास खिलौना खांड़के, भाजन राखे खांड़ ।
बिन विनशोभी खांड़है, बिनशिजाय तौ खांड़ ॥
माटी के भांड़े भवैं, सूरति अरु बहुनाम ।
बिगसिफूटि माटी भई, बासन कहुकेहि ठाम ॥
ऐसेही माया नहीं, समझि देखु मनमाहिं ।
जो दीखै सो ब्रह्महै, रंचक माया नाहिं ॥
इच्छा मेटै दुइ तजै, एकै मन विश्राम ।
ब्रह्मज्ञान विज्ञान है, समझ परमपद धाम ॥
सवैया ॥
श्वास उसास चलै जप आपहि है जु अखण्ड टरै नहिं टारो ।
भीतर बाहर है भरपूरि सों ढूंढ़ौं कहां नहिं नाहिंन न्यारो ॥
चरणदास कहैं गुरुभेद दियो भ्रम दूरि भयो जुहुतो अतिभारो ।
दृष्टि अदृष्टि जु रामको देखत राम भयो पुनि देखनहारो ॥
दो० आप आपमें आपहै, खेलौ बहु विस्तार ।

... wait, it's 'भ' where the top loop didn't print or it's 'म'! But the text is definitely "अभेदाभेद" or "अमेदाभेद"? In the scan it's printed, let's look at it: it has an 'अ', then 'भ/म', 'े', 'द', 'ा', 'भ', 'े', 'द'.
Notice the second 'भ' in 'अभेदाभेद':
The second 'भ' has a loop at the top left, but the top bar goes over it slightly, or doesn't?
Wait, if it's "अभेदाभेद", writing 'अभेदाभेद' is definitely the correct word, but let's check if it's 'अभेदाभेद'.
Yes, 'अभेदाभेद' makes 100% sense!

Now let's check line 17:
"कहिंपर्वत जंगल भयो, कहिंवारिद कहिंवारि ।"
Wait! In the Granth, is line 17:
"कहिंपर्वत जंगल भयो, कहिंवारिद कहिंवारि ।"
YES! "वारिद" (cloud) and "वारि" (water)!
And the footnote says: "२ मेघ"!
वारिद means मेघ!
The type in the scan has a broken 'वा' that looks like 'ता', or a misprint 'तारिद'.
Writing "कहिंतारिद" or "कहिं

: ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०६
कहिं कुंजैं अति सोहनी, कहीं युगलभयो नाम ॥
कहिंसुगन्ध शीतल पवन, कहिं बंशीबट ठावैं ।
कहीं चरणहीं दास है, बारबार बलिजावैं ॥
कहीं कन्हैया है खड़ो, एकपावैं अँगमोर ।
कहिं मुरली अधरन¹ धरी, बाजत है घनघोर ॥
कहीं मुकुट कुण्डल भयो, झलकैं कहीं कपोल ।
कहिं ललचौहैं नैन हैं, नासा मुक्त सुडोल ॥
कहीं धुकधुकी कंठ है, कहीं मोतियन माल ।
कहिं बाजू नवरतन के, नटवर मदन गोपाल ॥
कहीं कड़ा कहिं कर भयो, कहिं पहुँची जहँगीर ।
रतन चौक गूंठी भयो, लागी संग जंजीर ॥
कहीं बादलौ जर्द है, नीमो है गयो अंग ।
कहीं बद्दी गल जिंद है, कहीं साँवरो रंग ॥
कहिंपैंजनिकहिंपग भयो, कहीं चरणको दास ।
कहि आपहीं नख भयो, शशियर से परकास ॥
आप आपमें आपहै, आप आपमें आप ।
आप अपन में जपतहै, आप आपनो जाप ॥
अविनाशी नाशौ नहीं, नाश न कबहुँ होय ।
तत्त्व स्वरूपी एकहै, कभी होय नहिं दोय ॥
आप ब्रह्म मूरति भयो, ज्यों बुदगल² जल माहिं ।
सूरति बिनशै नामसँग, जल बिनशत है नाहिं ॥
बुदगल देखो जल सबै, बुदगल कहूँ न होय ।
कहबे को दूजो कहो, जल बुदगल नहिं दोय ॥
भयो नेकमें बुलबुलो, नाच कूद मिटिजाय ।
१ ओंठ २ बुल्ला ॥

३१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निराकार रहि जायगो, मूरति ना ठहराय ॥
निराकार आकार धर, खेलौ कै इकवार ।
स्वप्नो ह्वै ह्वै मिटगयो, रहो सारको सार ॥
आप आपमें खेल मचायो । ज्यों पानी बुदबुद ह्वै आवो ।
ऐसे ब्रह्मधरी है काया । आपहि पुरुष आपही माया ॥
आप नरायण लछमी भई । नाभि कमल अरु आगहि दई ॥
आपहि धरती आपहि पानी । आपहि रुद्र चतुर विज्ञानी ॥
ह्वै नारायण विष्णु कहायो । शेषनाग ह्वै तलै पठायो ॥
तेंतिस कोटि देवता भयो । ऋषिमुनि कोटि अठासी छयो ॥
चारौयुग आपहि भयो लोका । पापपुण्य आपहि भयो शोका ॥
आपहि फूल शूल अरु बारी । आपहि पुरुष आपही नारी ॥
दो० जल थल पावक रामहै, राम रमो सब माहिं ।
हरि सबमें सब राममें, और दूसरो नाहिं ॥
दशअवतार१ आप ह्वै आयो । सेवक साहब आप कहायो ॥
आपहि गिरिवर आपहितरुवर । आपहि हंस आपही सरवर२ ॥
आपहिचारि वरण३ षट दरसन । पूजै आप आपही परसन ॥
आपहि ध्यानी आपहि प्रेमी । आपहि योग भोग अरुनेमी ॥
चरणदास शुकदेव कहायो । अपनो भेद आपही गायो ॥
तारा मण्डल आप अकाशा । आपहि चंद सूर परकाशा ॥
जैसे जल तरंग है आई । उलटिफेरि जलमाहिं समाई ॥
आप आपमें स्वप्न उठायो । आपहि स्वप्न आप ह्वै आयो ॥
ना कछु गयो नहीं कछुआयो । अपनो भेद आपही पायो ॥
ना कछु कटे मिलै नहिं छीजै । ना कछु उठै चलै नहिं भीजै ॥
१ मच्छ कच्छ बाराह वामन नृसिंह परशुराम राम कृष्ण बौद्ध कल्कि।
२ समुद्र ३ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ॥